Ayesha Ahmed Khan

Ayesha Ahmed Khan is a writer based in Sarguja, Chhattisgarh. She holds Master's degrees in Sociology and Hindi.

 

छत्तीसगढ़ का स्मरण करते ही मानस पटल पर अनेक चित्र उभर जाते है। कितने राज वंश जिन्होंने यहाँ राज्य किया - नंद, मौर्य, वकाटक, नल, पांडु  शरभपुरीय, सोम, कलचुरी, नाग, गोंड तथा मराठा, अपनी छाप और खान पान छोड़े और मर खप गये।

छत्तीसगढ़ अपनी खनिज संपदा एवं वन संपदा के साथ-साथ खन पान के लिये भी प्रसिद्ध है।

भोजन एक अपरिहार्य अनिवार्यता है।  सृष्टि के प्रारंभ से इन्सानों की खाद्य प्रकृति अवश्य ही समान रही होगी। धरती पर मनुष्यों से पहले पशुओं की सृष्टि हुई बहुसंख्य पशु मांसाहारी होते हैं इसलिये यह अनुमान लगाना गलत न  होगा कि आदिकालीन मानवों ने पशु जगत का अनुकरण कर, मांसाहार को अपनाया होगा। पर धीरे धीरे विकास होता गया और मानव कृषि और बागवानी सीखता गया।

कालांतर में  धीरे -धीरे खाद्यान्न और वनस्पति की आवश्यकता बढ़ने लगी। लोग  खेत और बाड़ियों में दलहन, तिलहन, साग, भाजी उगाते ओर उसी से भोजन तैयार करते थे। समय के साथ साथ आवश्यकताऐं बढ़ती गई खान पान का  शौक भी बढ़ता गया। कई प्रकार के भोजन राजमर्रा और विभिन्न अवसरों के हिसाब से बनाये जाने लगे। चावल, सोया, मेमुरी , मक्का, उड़द, अरहर कुर्थी, कोदो, कुटकी की फसल लगाई जाने लगी और भोजन में इनका उपयोग होने लगा । मक्का को  रोटी के रूप में, कच्चे मक्का को आग में भूंजकर, गादा के रूप में उबाल कर प्रयोग करने लगे। शाकाहर के साथ ही जंगलों में जाकर शिकार करके मांस की आपूर्ति होने लगी। तालाबों, नदियों से मछली मारकर उसे भी भोजन में शामिल कर लिया गया ।

 

 

रसोई का काम करती महिला , सरगुजा। 

 

भोजन बनाने का काम  प्रायः महिलायें करती है। छत्तीसगढ़ की महिलाएं भांति - भांति के व्यंजन बनाने में निपुण होती हैं । जिस नारी को रांधना,पसाना (रोटी बनाना) नहीं आता उसे अपमान सहना पड़ता है। यहाँ पढौनी भात, खाना प्रायः मिट्टी के बर्तनों में बनाया जाता है। लोहे की कढाई भी प्रयोग करते हैं भोजन के लिए काम आने वाले सामान्य बर्तन हैं - मटका, हांण्डी, ढक्कन । बांस की वस्तुओं को सुपड़ा, कुण्डा, सटी, टोकरी के अलावा लोहे की बाल्टी, चिमरा, जैसी खलबाटा आदि का इस्तेमाल होता है।

 

सरगुजिहा  आहार का सन्दर्भ और प्रकार

 

भोजन में इस्तेमाल होने वाली सामग्री  अनाज, गुड़, शक्कर आदि रखने के लिये मिट्टी से बने मटकों का उपयोग  होता है । ये छोटे छोटे आकार के होते है। इन्हें स्थानीय कुम्हार बनाते हैं । हाण्डी का  तेल, घी, शहद, आदि द्रव्य पदार्थ रखने के लिए उपयोग किया जाता है। छोटी मटकी का उपयोग सब्जी बनाने और दूध गर्म करने के लिये किया जाता है। अनाज रखने के लिये प्रायः कोठी का उपयोग होता है जो कच्ची मिट्टी से बानी होती है।

भोजन प्रायः दो प्रकार का बनता है, शाकाहरी और मांसाहारी । सामान्य जन  वनों से कई फल, फूल और कंदमूल का संकलन कर लेते हैं, महुआ इसमें प्रमुख है। महुआ का प्रयोग शराब बनाने  के अलावा उबाल कर खाने में किया जाता है। महुए को भूनकर भी खाने का प्रचलन है, इसकी की रोटी भी बनाई जाती है।

भोजन को कई प्रकारों में बांटा जा सकता है जैसे रोज बनाया जाने वाला भोजन, तीज त्योहार पर बनने वाले भोजन/पकवान, बच्चे के जन्म एवं  उत्सवों पर बनाया जाने वाला भोजन। विवाह आदि में बनने वाले भोजन तथा मरनी में बनने वाला भोजन।

 

भोजन के प्रकार -

 

भोजन को कई प्रकार में बंटा है

1. प्रतिदिन  बनने वाले भोजन

2. तीज,त्योहार पर बनने वाले भोजन

3. जन्म,उत्सव,विवाह में बनने वाले भोजन

4. मरनी में बनने वाले भोजन।

5. प्रमुख पेय।

 

प्रतिदिन बनने वाले भोजन -

 

सरगुजा की मुख्य फसल धान है इसीलिए चावल,भात यहाँ प्रतिदिन खाया जाता है।

नए चावल को पैनाझंझिया में बनाया जाता है।

 

चावल का पेज एवं लकड़ा के फूलों की चटनी। 

 

यहाँ नाश्ता, दिन और रात तीनो समय चावल ही बनता है।मजदूरी करने वाले लोग सुबह ठंडी में ताजा भात दाल,कोई भी फसली सब्जी,चटनी के साथ खाकर काम मे निकल जाते हैं।

काम मे दिन में पन पियाऊ(lunch time, tifin)के लिए हाँथ की बनी मक्का,गेहूं,चना,चावल की रोटी  चूल्हे में पकी,सेंकी साथ में टमाटर,लहसुन,कोई भी चटनी साथ लेकर जाते हैं।

रात को फिर चावल कोई भी दाल अरहर,उरद,कुरथी,बटरा,खेसारी की दाल या कोई सुकसी या सब्जी खाते हैं।

 

गर्मी के दिनों में सुबह बोरा भात(रात को भात, चावल में पानी डाल कर रख देते हैं)कच्चे प्याज़ और मिर्ची के साथ खाते हैं और चावल के बचे पानी को पी कर काम में निकल जाते हैं।

जिससे दिन भर उनको प्यास लगती है लू लगती है।

 

तीज त्योहार में बनने वाले भोजन -

 

किसी भी त्योहार में जो मांसाहारी हैं उनके घर में मुर्गा या बकरे का गोश्त बनता है।ज्यादातर कुछ लोग आपस में मिलकर बकरा,बकरी को काट कर गोश्त बांट लेते हैं।

साथ ही त्योहारों में कटहल,कोहड़ा की सब्जी,डुबकी,बरा,बनाते हैं। पकवानों में फरा,मीठा नमकीन करी,लकठो,पुआ,अनरसा, भजिया,भफोरी,उबला मउहा बनाते हैं।

त्योहारों में मउहा, का दारू,चावल का हड़िया जमकर पीते हैं।

 

पुआ रोटी 

 

जन्म उत्सव,विवाह आदि में भी तीज त्योहारों में बनने वाले भोजन ही बनते हैं। विवाह में बकरा और डुबकी,कटहल,कोहड़ा जरूर बनता है।विवाह में महुआ दारू,हड़िया जरूरी है।

वर पक्ष से धान, दाल आदि भेजा जाता है। समधी मिलन में वधु पक्ष वर पक्ष को दारू भेट करता है और पूजा में भी दारू रखा जाता हूं।

लड़की को समान के साथ खाने का सामान भी दिया जाता है।

 

मरनी का खाना -

 

घर मे किसी की मृत्यु होने पर तीन दिन तक घर मे चूल्हा नहीं जलता। पास पड़ोस के लोग और रिश्तेदार सादा भोजन भेजते हैं।

तीसरे दिन से तेरही तक सादा बिना तेल मसाले का,बिना छौके बघारे भोजन पकता है। दसही के दिन पंडित को अपनी हैसियत के हिसाब से दान पुण्य किया जाता है।

उस दिन सभी प्रकार के भोजन बनते हैं।

 

सरगुजा अंचल में विभिन्न  प्रचलित व्यंजन और पकावान -

1.    अरसा या अनरसा   - यह आटे, गुड़, खसखस से बनता है

 

अनरसा बनाने हेतु आवश्यक सामग्री , शक्कर , चावल का आंटा  और तैयार अनरसा। 

 

2.    अंगाकर                - पत्तों में लिपटी मोटी रोटी

3.    इण्डहर                 - कोचई पत्ते, पीढ़ी तथा कढ़ी युक्त भजिया

4    करी                     - मोटा सेव, मीण व नमकीन

5.    करी के लडडू  (लहुआ)

6.    कचैरी                  - कचैड़ी

7.    कड़ही (कढ़ी)        - बुदिया कढ़ी, नंश कढ़ी, नंगरा कढ़ी (केवल कढ़ी)

8.    कथिला                 - कनकी की कढ़ी

9.    कांकड़ा                 -चावल के आंटे की पूड़ी, चावल के आंटे की ढिलका रोटी

10.    खंण्डल                  -बेसन के करते की खट्टी कढ़ी

11.    कोचई पान         - गुड़ से पकी धुइयां , कोचई पपची धुइया की बातशाही

12.    कोचई भंजुरी, कोचई पीठा।

13.    खपुरी              -साद सेंकी रोटी

14.    खसता रोटी, खाजा, खुरमा सभी आटे की।

15.    धारी               - कढ़ी में डुबोई बेसन रोटी।

16    धुधरी             -दालों को उबाल कर खाना

17.    चकोली          - चावल का मुखरू

18.    चसेला           - शंकर कंद की रोटी पुड़ी।    

19.    ढेढरी            - बेसन का नमकीन

20    डुबकी           - उडद दाल की पीठी को भाप कर पकाना।,

 

तैयार डुबकी  

 

 

21.    तसमई          -खीर, तुमा तसमाई, लौकी का खीर

22.    तीखुर           - आटे का कतरा।

23.    तिल भुन्जीया   - तिल गुड़ की भुजिया

24.    दलिया, दही बरा (दही बड़ा)

25.    टुर कुसली         - दुध फटा (दुध में डुबा फटा) नुनहाफटा (नमकीन फटा)

26.    पकुआ लस्सी     - आटे का पतला हलुआ। तीखुर -(दुध में डुबी कटी)

27.    पूरनपोली         - दाल भरी पुड़ी , फेनी - गीले पीसे चावल की मिठाई

28.    पीड़िया           - चाॅवल घी, शक्कर की बनी मिठाई।

29.    बफौरी          - भाप में बनाया गया उरद बड़ा (बरा बरी)

30.    बड़ी (बरी) ,बड़ी के भी कई प्रकार हैं। छोटी बड़ी, कोहड़ा बड़ी, रखिया बड़ी, चना बड़ी, मुनगा बड़ी आदि।

 

 

रखिआ वड़ी और उसे बनाने की सामग्री। कुमड़ा , मूंग की दाल। 

 

3१ .    बटकर        - मसूर कढ़ी, बुुदिया रायता रायता के भी कई प्रकार है।

33.    भजिया       - मूग बेसन, लड्डु, तिवरा, उरद, तिवरा, आदि का भजिया बनता है

34    प्रसाद       - आटे को भुजकर शंक्कर मिला कर बनाया जाता है।

35.    हड़फोड़वा     - नये चावल की बिना तेल की मीठी रोटी

36.    रसियाफल     -    गन्ने के रस में डुबी कटी।

37.    चिवरा           - चिवड़ा

38.    साग            - कई प्रकार के साग बनाये जाते है।

 

तैयार सरसों का साग। 

 

39.    दूढ़ी            -तिल के लड्डु

40.    भोजन प्रायः 2 बार या कहीं कहीं पर तीन बार बनता है।

 

विशेष व्यंजन -

 

1.     बासी चाॅवल (भात) और लकड़ा चटनी     - गावों में सुबह नित्य क्रिया के पश्चात बासी चावल (भात) को  लकड़ा चटनी में खाकर काम में जाते हैं। साथ में पन पिटाव, मोटी चाॅवल की रोटी किसी साग के     साथ ले जाते है। फिर वापस शाम को दाल भात जो बनता है खाते हैं। चावल के     पानी को न पसाकर, माड़ भात भी खाने का प्रचलन है। इसे  पेज पसइया कहते हैं ।     सुबह-दोपहर को प्रायः चांवल (भात) को चटनी या सुक्टी के साथ खाते हैं ।

2.    सुक्टी  कई प्रकार के बनाए जाते  हैं , जैसे लकड़ा सुक्टी , चना सुक्टी , सरसों सुक्टी , इत्यादिं। सीजन में साग, भाजी को सुखाकर गाव वाले हाट बाजार   में बेचते हैं। सुक्टी को गरम गरम चाॅवल के पानी (माड़) में में डुबा दिया जाता है फिर उसमें लहसून, मिर्ची, नमक पीस कर मिला दिया जाता है।

 

चावल: प्रमुख आहार - 

 

 चावल, गोल दमची या मिट्टी के बर्तन में बनता है। उसे पसा के ही बनाते हैं । नया चाॅवल को पैने में बनाया जाता है।  पैना, गोल डोंगे घमेला की तरह होता है, जिसके तले में गोल छेद भाप अंदर जाने के लिये रास्ता होता है। पहले गोल मुॅह के बर्तन  डेकची में पानी को गर्म करने हेतु चढ़ा दिया जाता है। अब पैने में धुले चाॅवल को दबा दबा के भर दिया जाता है। चावलों दबाकर इसलिए भरते हैं ताकि वह निकलकर   गिरे नहीं। फिर इस चावल भरे पैना को गरम पानी के डेकची के उपर चढ़ा दिया जाता है और पैने को ढक्कन से ढांक देते हैं। यदि डेकची और पैने के बीच में कहीं से भाप निकलती है तो वहां  पत्ते या कपड़े के टुकड़े को भिगाकर लपेट देते हैं ताकि भाप बाहर न निकले ।

 

चावल को धोते हुए। 

 

पैने में धुले चाॅवल को दबा दबा के भर दिया जाता है। 

 

चावल भरे पैना को गरम पानी के डेकची के उपर चढ़ा दिया जाता है और पैने को ढक्कन से ढांक देते हैं। 

 

डेकची में गर्म पानी की भाप इस दौरान उपर चढ़ जाती है। गर्म भाप उके कारण चावल कड़े होजाते हैं । अब चावल को चम्मच की सहायता से धीरे धीरे   डेकची में डाल देते हैं और पैने को हटा देते हैं। इससे भाप से गर्म होकर कड़े हुए चावल डेकची के उबलते पानी में पकने लगते हैं। जब चाॅवल पक जाता है तब उसे पसा लिया जाता है। नये चावल को इस तरह बनाने से उनका पुराने चाॅवल की तरह अलग अलग दाना बनता है।

 

दलहन -

 

सरगुजा क्षेत्र में  कुरथी, उड़द, मसूर, की दाल ज्यादा खाते हैं। अरहर , चना, आदि की दाल भी खाई जाती है। सामान्यतः दालें, हल्दी - नमक डाल कर पकाई जाती है, फिर लहसुन मिर्ची से छौंक दिया जाता है। कुछ दालों केा कच्चे धुले चावल के पानी में पकाया जाता है, जिसे चाउरधोवन कहते हैं । उरद की  दाल को डुबकी की तरह भी पकाया जाता है।

 

शाक -भाजी -   

 

सभी फसली सब्जी खाई जाती हैं । सब्जी को काट- धोकर तेल में नमक मिर्ची, जीरा, गोलमिर्च पीस कर मसाला भूनकर बनाया जाता है।सब्जी ज्यादातर सरसों के तेल में  बनती है। अक्सर दारू शराब के साथ मांस बनता है। बकरा, मुर्गी आदि के साथ जंगल में जो जानवर मिल जाये शिकार करके खाते हैं।

साग-    भाजी का ज्यादा चलन है।  लालभाजी, पालक, मेंथी, सरसों, चेच , हरी भाजी, मयुवा, चना, सरसों, मुनगा, भाजी, कोई लोग लार भाजी को सुखाकर या ताजी बनाते हैं। लहसुन, मिर्च के फोरन डालकर भाजी बनाते हैं ।

 

सरसों का साग 

 

चटनी भी अक्सर बनती है लहसुन मिर्चा की चटनी, बरी चटनी, लकड़ा के फुल और पत्ती की     चटनी, चना साग की चटनी, प्याज को भुनकर धनिया पत्ती के साथ सिल में पीस कर बनाते     हैं।

गावों के लोग बरसात के मौसम में करील, फुटु, खुखड़ी, की खुब खाते हैं। और भी कई जंगली कंदमूल खाते है।

 

 

 

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.