छत्तीसगढ़ अपनी खनिज संपदा एवं वन संपदा के साथ-साथ खानपान के लिये भी प्रसिद्ध है। किसी भी प्रान्त का खान -पान वहां की भौगोलिक स्थिति , जलवायु और वहां होने वाली फसलों पर निर्भर करता है। छत्तीसगढ़ एक वर्षा और वन बहुल प्रान्त है, यहाँ धान ,हरी भाजी -सब्जियां और मछली का उत्पादन बड़ी मात्रा में होता है और यही सामग्रियां यहाँ का मुख्य आहार हैं।

 

खान -पान की दृष्टि से छत्तीसगढ़ में सरगुजा-रायगढ़ क्षेत्र , रायपुर-बिलासपुर का मैदानी इलाका और बस्तर क्षेत्र में भिन्नताएं हैं। चावल और चावल से बने भोज्य  सभी जगह लोकप्रिय हैं परन्तु स्थानिय व्यंजनों और पकवानों में विभिन्नता है। बस्तर के आदिवासियों के आहार में प्राकृतिक रूप से उगने अथवा प्राप्त होने वाली सामग्री की प्रमुखता है।

 

भोजन बनाने का काम प्रायः महिलायें करती हैं। छत्तीसगढ़ की महिलाएं भांति-भांति के व्यंजन बनाने में निपुण होती हैं। गाँवों में सुबह नित्य क्रिया के पश्चात बासी चावल (भात) को लकड़ा चटनी में खाकर काम पर जाते हैं। साथ में पन पिटाव, मोटी चावल की रोटी किसी साग के साथ ले जाते हैं। फिर वापस शाम को दाल भात जो बनता है खाते हैं। चावल के पानी को न पसाकर, माड़ भात भी खाने का प्रचलन है। इसे पेज पसइया कहते हैं। सुबह-दोपहर को प्रायः चावल (भात) को चटनी या सुक्टी के साथ खाते हैं।

 

भोजन को कई प्रकारों में बांटा जा सकता है जैसे रोज बनाया जाने वाला भोजन, तीज त्योहार पर बनने वाले भोजन/पकवान, बच्चे के जन्म एवं उत्सवों पर बनाया जाने वाला भोजन, विवाह आदि में बनने वाले भोजन तथा मरनी में बनने वाला भोजन।इस मॉड्यूल में छत्तीसगढ़ के खान -पान की विभिन्न धाराओं को प्रस्तुत किया गया है।

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.