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गोलमगढ़ का गुप्तकालीन शिवालय: एक वास्तुशिल्पीय अध्ययन (An Architectural Study)

 

भारतीय संस्कृति धर्म से जीवंत रही है। ईश्वर की सगुण भक्ति की परम्परा यहाँ प्रबल है अतः भगवान को मूर्त रूप में देखने के लिए उनकी मूर्तियाँ बनाई गईं। इसी माध्यम से उनकी पूजा, भक्ति की जाने लगी और देवमूर्ति को रखने के लिए जो स्थान बनाए गए, उन्हें ही मंदिर, देवालय या देवायतन कहा जाने लगा। वैदिक साहित्य में प्रकृति संबंधी देवी-देवताओं जैसे—इन्द्र, वायु, अग्नि व सविता आदि का उल्लेख मिलता है। वेदोत्तर काल में त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु व महेश की पूजा भी आरंभ हुई। अतः तत्संबंधी देव मूर्तियां भी बनाई जाने लगीं। संभवतः ये मूर्तियाँ काष्ठ या पाषाण की रहीं होंगी, जो समय-समय पर क्षरित भी होती चली गईं। इन्हें स्थापित करने के लिए सर्वप्रथम चबूतरे या थान (स्थान) बनाए जाते थे जिन्हें कई बार पत्तों या चटाई आदि से आच्छादित भी कर दिया जाता रहा। ठीक वैसे ही, जैसे घरों में सत्यनारायण भगवान की कथा के दौरान, उन्हें एक चौकी पर स्थापित कर, केले के पत्तों से ऊपर आच्छादन कर एक मंडप का रूप दिया जाता है।

 

परन्तु संभवतः प्रारंभ में रहे ये मंडप स्थान इतने मजबूत नहीं बनाए गए कि स्थायी रह पाते अतः इनके उल्लेख आज ग्रंथों में ही अधिक मिल पाते हैं, पुरातत्व के साक्ष्य के रूप में कम। ब्राह्मण धर्म के कर्मकाण्डों ने जैन और बौद्ध धर्म के उदय को रास्ता दिया अतः स्मारकों में चैत्य एवं विहार बनने लगे। इस तरह की मूर्तियाँ और स्मारक कुषाण काल तक बनते रहे, परन्तु कुषाण काल के उत्तरार्द्ध और गुप्तकाल के प्रारंभ में ब्राह्मण धर्म के बढ़ते महत्व के चलते देवालयों का निर्माण शुरू हुआ। भारत में मंदिर बनने की प्रमुख परिपाटी यहीं से आरंभ होती है, जिसके संरचनात्मक उदाहरण भी अब मिलने लगे हैं। इनमें गुप्तकालीन मंदिर वास्तुकला के अंतर्गत दो तरह के मंदिर प्राप्त होते हैं— 1. प्रारंभिक गुप्तकालीन मंदिर (Temples of Early Gupta Period) व 2. उत्तर गुप्तकालीन या परवर्ती गुप्तकालीन मंदिर (Temples of Late Gupta Period)।

 

प्रारंभिक गुप्तकालीन मंदिर एक ऊँचे चबूतरे (platform) पर बनते थे जिस पर जाने के लिए सीढ़ियाँ बनी रहतीं थीं। यह वर्गाकार होते थे, बिना चूने-गारे के; पत्थर से बनते थे, जिन्हें जोड़ने के लिए लोहे के अंकुश का प्रयोग किया जाता था। इनकी छत सपाट हुआ करती थी। जिस पर भीतर से खिले हुआ कमल का अंकन होता था, इनके सामने स्तम्भों पर आधारित एक लघु मुखमंडप होता था। मंदिर के इस मंडप के स्तम्भों पर अलंकरण होते थे जबकि मुख्य मंदिर के बाह्य भागों में स्तंभ बिल्कुल सादे होते थे। द्वार शाखा पर गंगा-यमुना की प्रतिमाएँ ऊपर की तरफ बनी मिलती थीं। मंडप के स्तम्भों पर सिंह युग्म, लता-पत्र युक्त कुंभ आदि बने हैं।

 

चित्र—1: मंदिर सँख्या—17, साँची, मध्य प्रदेश (साभार: commons.wikimedia.org)

 

इस तरह के छत, द्वार और स्तम्भों के आधार पर आरंभिक गुप्तकालीन मंदिरों में सांची का मंदिर संख्या—17, मुकुन्द दर्रा (कोटा), तिगवा (जबलपुर), एरण के नरसिंह, वराह मंदिर में मिलते हैं। सांची और तिगवा के संरचनात्मक मंदिरों में इसी तरह का वर्गाकार गर्भगृह व सपाट, चपटी छत प्राप्त होते हैं, पत्थरों को जमाते हुए मंदिर संरचना खड़ी कर ऊपर लंबी पट्टी के पत्थर की छत दी गईं हैं और सामने स्तंभयुक्त लघुमंडप है। (चित्र—1. सांची, 2. तिगवा, 3. दर्रा)

 

चित्र—2: कंकली देवी मंदिर, तिगवा, मध्य प्रदेश (साभार: templepurohit.com)

 

चित्र—3: दर्रा मंडप, कोटा, राजस्थान (साभार: theheritagetourism.com)

 

परन्तु तिगवा से तीन मील पूर्व में स्थित कुंडा नामक ग्राम का छोटा सा लाल पत्थर का शिव मंदिर ‘शंकरगढ़’, वर्गाकार, लंबी पट्टियों को सजाकर बनाया गया है, जिसे गुप्तकाल के अत्यारंभिक मंदिर होने का अनुमान किया जाता है (350 ईसवी से पूर्व), संभवतः गोलमगढ़ का यह शिवालय भी कुछ ऐसा ही अत्यारंभिक काल का रहा हो। स्थापत्य या भवन संरचना की दृष्टि से भी इस शिवालय के महत्व को आंका जा सकता है। श्री ए. एल. श्रीवास्तव जी ने भी अपने साक्षात्कार में बताया कि यह मंदिर अपने स्थापत्य में गुप्तकाल के प्रारंभिक या पूर्व मंदिरों की विशेषता लिए हुए प्रतीत होता है। (चित्र—4)

 

चित्र—4: पूर्वी एवं उत्तरी प्रवेश द्वार, शिव मंदिर, गोलमगढ़

 

चित्र—5: ऊँचा चबूतरा (high platform), पश्चिमी पहलू, शिव मंदिर, गोलमगढ़

 

राजस्थान में भी गुप्तकाल के शिलालेख, मंदिर एवं कला के उदाहरण प्राप्त होते हैं। यह रंगमहल, बडोपल, भरतपुर, गंगधार, मुकुन्द दर्रा, चारचौमा, रंगपुर, केशोरायपाटन, मांकनगंज, नगरी, चित्तौड़, बड़वासन आदि में मिलते हैं, जिसमें से कई आज तो अवशेष रूप में ही हैं और इनमें से दर्रा का मंडप, कुछ स्तम्भों के साथ बचा है। इसकी कुछ सामग्री कोटा संग्रहालय में है तो कुछ झामरा गांव के मंदिरों में लगा दी गई है। चारचौमा का भी रूप बाद के समय में बदल दिया गया है, बस चतुर्मुखी शिवलिंग गर्भगृह में पूजान्तर्गत है। तात्पर्य यह है कि अब इन मंदिरों के गुप्तकालीन अवशेष ज्यादा हैं। परन्तु संरचनात्मक रूप से बचे हुए गुप्तकालीन भवनों में, यदि कोई अपने आरंभिक रूप में शेष और विद्यमान (In Situ) है तो, वह है—यह शिवालय, जो कि अपने स्थापत्य में प्रारंभिक गुप्तकालीन मंदिरों के निर्माण संबंधी विशेषताओं पर खरा उतरता नजर आता है। एक ऊँचे चबूतरे, (मंदिर से काफ़ी नीचे से लगभग नौ से दस पंक्तियों में लम्बे पत्थरों की पट्टियों को जमीन पर बिछाते हुए एक ऊँचा चबूतरा बनाया गया है, जिसके दक्षिणी-पश्चिमी कोने पर उतरने के लिए कुछ सीढ़ियाँ भी हैं), पर स्थित यह मंदिर वर्गाकार है, जिसकी लम्बाई-चौड़ाई, लगभग दस फीट है। (चित्र­—5-7)

 

चित्र—6: द्वार पक्ष के मध्य भाग में पत्थरों की पंक्तियाँ

 

चित्र—7: एक कील, उत्तरी पहलू, शिव मंदिर, गोलमगढ़

 

बिना चूने या गारे के, पत्थरों को एक के ऊपर एक करीने से जमाते हुए ही इस मंदिर को बनाया गया है, जिसे जोड़ने व मज़बूती देने के लिए कहीं-कहीं पर, लोहे की कील या छड़ लगाई गईं हैं जो हमें उत्तर-पूर्वी घटपल्लव के स्थान पर दिखाई भी देती हैं। नीचे से ऊपर मंदिर निर्माण हेतु क्रमशः सबसे नीचे पत्थर की दो पट्टियों (थल्लियों) को जमाते हुए, एक ऊँचे, चौड़े पत्थर को रखकर अविकसित वेदीबंध या वेदिका बनाई गई है, जिस पर एक और पत्थर की पंक्ति जमाते हुए, द्वार पक्खों या पेड्या भाग हेतु दो चौड़े पत्थरों को रखते हुए उस पर, हर दिशा में स्थित द्वार पक्खों पर दो-दो यानि कुल आठ घटपल्लव की आकृतियाँ बनायी गई हैं। जो एक तरह से प्रवेश पर अलंकृत पूर्णकुंभ बनातीं हैं जो कि समृद्धि का द्योतक है। इसके ऊपर पत्थरों के आकार के अनुसार कहीं तीन तो कहीं चार पंक्तियों में जमाते हुए दीवार खड़ी की गयी है, इन पत्थरों को किनारे पर कुछ कटाव देकर तक्षण देने की कोशिश की गई है, यह व्यवस्था दीवारों पर दायें-बायें के कोने पर एक पंक्ति के बाद हर दूसरी पंक्ति पर की गई है। (चित्र—8-10)

 

चित्र—8: पत्थर की पट्टियाँ

 

चित्र—9: पश्चिमी एवं उत्तरी प्रवेश द्वार, शिव मंदिर, गोलमगढ़

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

चित्र—10: द्वार पक्ष के कोनों में कटाव

 

श्री हरफूल सिंह जी ने इस तरह की ‘शुकनास भाग’ की व्यवस्था को बताते हुए इसे ‘मानव निर्मित प्रयास’ बताया है। जिसके ऊपर छत की शुरूआत करते हुए पहले स्तम्भ शीर्ष जैसे ब्रैकेट देते हुए मुख्य चपटी सपाट छत बनायी गई है, जो प्रारंभिक गुप्तकालीन परम्परा के अनुसार लगभग पाँच पंक्तियों में, लम्बे पत्थर की पट्टियाँ रखकर बनाई गई हैं।

 

ये पूरी संरचना प्रारंभिक गुप्तकालीन मंदिरों का ही आभास कराती हैं। परन्तु चूंकि यहाँ पर चार दरवाजे बनाने थे इसलिए ऊपर के छत के पत्थर की पट्टियाँ, पूरी-पूरी लम्बी पट्टी हर जगह नहीं होकर ऊपर की तीन पंक्तियों में ही हैं और चारों द्वारों के मध्य भाग में प्रवेश का रूप देने के लिए कदली छत (Corbelled Roof) बनाई गई है, जिसमें पत्थरों को टिकाने हेतु, सामने से छत के एक—एक पत्थर को आगे की तरफ निकाल कर जमाने का प्रयास किया है, जो द्वार सिरदल पर एक विशेष आकार भी बना लेते हैं तथा ये आपस में भार सहन करते हुए परस्पर टिके रहते हैं, और इनके ऊपर फिर लम्बे सपाट पत्थरों की लम्बी पट्टियाँ देकर सपाट चपटी छत बना दी गई है (चित्र—11-13), जो प्राचीन भारतीय वास्तु परम्परा है और ये सपाट चपटी छत, प्रारंभिक गुप्तकालीन मंदिरों की विशेषता भी है। हालांकि श्री शिवकुमार गुप्त ने अपना मत रखते हुए कहा है कि ‘यहाँ पर सपाट लंबी एक पट्टी वाली पट्टियाँ नही हैं, जैसा कि सांची वगैरह में हैं, अतः इसे प्रारंभिक गुप्तकालीन कहना मुश्किल है’, उन्होंने कदली छत की तरफ इंगित किया है। परन्तु जब दरवाजे या प्रवेश चार बनाने थे तो छत वाले भाग में एक पट्टी वाले लंबे पत्थर कहाँ से स्थापित किये जाते अतः कदली छत का रूप प्रवेश स्थान पर देते हुए, तब ऊपर सपाट लंबे पत्थर रखे गये हैं, जिससे प्रारंभिक गुप्तकालीन छत परम्परा भी बनी रही और सर्वतोभद्र रूप भी स्पष्ट हो गया। इसी तरह से श्री हरफूल सिंह जी ने यहाँ शिखर होने की संभावना भी व्यक्त की है परन्तु अभी तक मुझे ऐसी कोई वास्तु सामग्री नहीं दिखी, जिससे शिखर का तनिक भी अनुमान हो, जैसा कि दर्रा में आमलक वास्तु खंड प्राप्त हुआ है। अतः उपरोक्त आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि अपने संरचनात्मक स्थापत्य में तो यह शिवालय प्रारंभिक गुप्तकालीन निर्माण परम्परा को ही अपना रहा था। पंरतु मूर्ति विज्ञान में परवर्ती गुप्तकालीन परम्परा को भी अपनाता दिख रहा है क्योंकि इस तरह के घटपल्लव बाद के समय में बन रहे थे, लगभग पाँचवी शताब्दी के ऊत्तरार्द्ध में, अतः ऐसा प्रतीत होता है कि संभवतः यह निर्माण प्रारंभिक गुप्तकाल से परवर्ती गुप्तकाल की तरफ सक्रांति काल को इंगित कर रहा हो। (चित्र—14)

 

चित्र—11: कदली छत (corbelled roof) का ख़ाका

 

चित्र—12: सपाट छत (flat roof), शिव मंदिर, गोलमगढ़

 

चित्र—13: मंदिर की अंदरूनी छत

 

परन्तु यहाँ पर जो सबसे खास बात है, जो इसे अन्य गुप्तकालीन मंदिरों (चाहे प्रारंभिक हो या परवर्ती) से अलग कर, विशिष्ट बनाकर पूरे भारत में अभी तक अद्वितीय बनाती है, वो है इसका सर्वतोभद्र और त्रिशूल-लिंग के साथ चर्तुदिक दर्शनीय होना। इसकी इस विशेषता से सभी विद्वान व कलामर्मज्ञ सहमत हैं कि ऐसी कोई संरचना अभी तक देखने में नहीं आई है।

 

चित्र—14: दक्षिणी, पश्चिमी एवं उत्तरी प्रवेश द्वार, शिव मंदिर, गोलमगढ़

 

संभवतः यहाँ पर इस अद्वितीय शिवलिंग को ध्यान में रखते हुए ही यह सर्वतोभद्र मंडप बनाया गया है क्योंकि शिवलिंग के आकार अनुसार ही चौकोर योनिपट्ट बनाया गया था और वह इस तरह से निर्मित है कि योनिपट्ट के आसपास कहीं चलने की जगह नहीं है। अब इस चर्तुदिक दर्शनीय शिवलिंग को संरक्षित करते हुए, उसके ऊपर एक लघु सर्वतोभद्र मंडप बनाकर चार प्रवेश बना दिए गए हैं, जिससे भक्तगण बाहर से भी दर्शन एवं प्रदक्षिणा कर सके इसलिए एक ही त्रिशूल व लिंग रेखाकृति चारों ओर एक जैसी बनाई गई है ताकि जिस भी दिशा से देखा जाए, शिवलिंग का एक ही रूप दिखे और बिना अंदर प्रवेश किये बाहर से भी पूजा—दर्शन किए जा सके। (चित्र—15-17)

 

चित्र—15: एक मंडप, शिव मंदिर परिसर, गोलमगढ़

 

वस्तुतः इस पूरे क्षेत्र को देखकर और यहाँ विद्यमान वास्तु स्मारकों से तो यही लगता है कि एक सर्वोत्तम गुणवत्ता वाले पत्थरों की उपलब्धता, शांत वातावरण, हरे-भरे पेड़ तथा पानी की सुविधा ने ही यहाँ किन्हीं शैवाचार्यों को रहने को प्रेरित किया, जिन्होंने यहाँ इस निर्माण को कराया, शैव भक्त साधु ने स्थानीय लोगों से प्राप्त चढ़ावे की अर्थ सामग्री की सहायता से, आस-पास के कारीगरों की मदद से व निर्माण सामग्री की उपलब्धता पाकर, इस शिवलिंग और उसको सुरक्षित करते हुए एक सादगीपूर्ण मंडप बनाते हुए उसके चार द्वार बनाकर, उसके प्रवेश अलंकरण हेतु समृद्धि के प्रतीक ‘पूर्ण कुंभ का घटपल्लव’ को बनवा दिया हो। जिसके बाद संभवतः पूर्व मध्य काल तक तो शैव उपासक यहाँ रहते ही रहे क्योंकि नाले के दूसरी तरफ भी कुछ लघु देवकुलिकाओं में शिवलिंग व देवी प्रतिमा स्थापित हैं। एक पुराना संभवतः पूर्व मध्यकाल का मंदिर है, जहाँ लघु शिवलिंग स्थापित है और समीप ही दो स्मारक—एक ऊँचे चबूतरे पर 14 स्तम्भ सहित मंडप बना है और कुछ ही दूरी पर दूसरा, चारों ओर स्थानीय तरीके से पत्थरों को जमाकर तीन ओर दीवार खड़ी करते हए, ऊपर पत्थरों की पट्टियों से सपाट छत से ढकते हुए, दक्षिण की तरफ मुख किए एक शैव मठ(?) जो भी आज खंडित अवस्था में है। इस मठ के प्रवेश पर घनी झाड़ियों का फैलाव हो जाने से अंदर घुस पाना तो दूर, देख पाना भी संभव नहीं है। अनुमानतः स्तम्भों पर आधारित, दीवारों से घिरा शैवमठ ही प्रतीत होता है, जहाँ साधु वगैरह रहते रहे होगें। इन सभी स्मारकों में सबसे प्राचीन स्मारक तो गुप्तकालीन विशेषता लिए सादगी पूर्ण तरीके से बना यह शिवालय है और इसकी सादगी भी अपने कला सौष्ठव और सुंदरता को आज भी बयां कर रही है, भले ही एक लम्बे समय के बाद यहाँ बसावट काफ़ी कम हो गई हो और मध्यकाल तक आते-आते प्रमुख केन्द्र बिजोलियां—मेनाल की तरफ (सातवीं से बारहवीं शताब्दी तक) हो गए हों और यह देवरिया की खानों में स्थित गोलमगढ़ का शिवालय कोई मुख्य केन्द्र न भी रहा हो धीरे—धीरे यह क्षरण की ओर बढ़ता रहा। अभी भी चारों ओर झाड़—झंखाड़ खड़े हैं, पत्थर बिखरे पड़े हैं, बेहद दुर्दशा हो रखी है, न रास्ते का पता चलता है और न इंसानों का। पर फिर भी अपनी प्रकृति की गोद में समाया यह लघु प्राचीन शिवमंडप, इतना अनूठा है कि इसके जैसा दूजा कोई नहीं दिखा है अभी तक; न राजस्थान में, न भारत में। तभी तो यह अद्वितीय, असाधारण बन पड़ा है। इसके काल का निश्चित निर्धारण तो कर पाना मुश्किल है, कुछ विद्वान इसे प्रारंभिक गुप्तकालीन कहते हैं तो कुछ इसे घटपल्लव के आधार पर परवर्ती गुप्तकालीन मानते हैं। अभी तक के समग्र अध्ययन से यह मुख्य विशेषताओं से प्रारंभिक गुप्तकालीन लगता है, हाँ, घटपल्लव अलंकरण तो इसे उत्तर गुप्तकालीन मंदिरों के ज्यादा करीब ले जाते हुए प्रतीत होते हैं अतः इस सक्रांति काल के शिवालय का समय निर्धारण अभी निश्चित नहीं परन्तु इसके खोजकर्ता के रूप में मेरे लिए तो यह कालजेय है, जिसका आकर्षण मुझे बरबस यहाँ आने को प्रेरित करता है और संभवतः कला के विशेषज्ञ और पारखी भी इस पाषाण मंदिर की अप्रतिम सुंदरता से इंकार नहीं कर सकते।  

 

चित्र—16: शैव मठ परिसर, गोलमगढ़

 

चित्र—17: मठ एवं मंडप की छत, गोलमगढ़

 

संदर्भ

 

अग्रवाल, आर.सी. 2005-06. ‘रिसेंटली डिसकवर्ड चर्तुदिक शिवलिंग फ्रॉम गोलमगढ़, राजस्थान.’ प्राग्धारा, जर्नल ऑफ़ यू.पी. स्टेट आर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट, लखनऊ. 16: 279-81.

 

अग्रवाल, पृथ्वी कुमार. 1994. गुप्तकालीन कला एवं वास्तु. वाराणसी: बुक्स एशिया.

 

अग्रवाल, पृथ्वी कुमार. 2002. प्राचीन भारतीय कला एवं वास्तु. वाराणसी: विश्वविद्यालय प्रकाशन.

 

गुप्त, परमेश्वरी लाल. 1989. भारतीय वास्तुकला. वाराणसी: विश्वविद्यालय प्रकाशन.

 

गुप्ता, शिल्पी. 2006. ‘गोलमगढ़ (बिजोलियां) का एक अज्ञात एवं अनुपम गुप्तकालीन मंदिर.’ शोध पत्रिका, उदयपुर: राजस्थान विद्यापीठ. 57 (1-4): 80-87.

 

शुक्ल, द्विजेन्द्रनाथ. 1968. भारतीय वास्तुशास्त्र-प्रतिमाविज्ञान. लखनऊ: वास्तु-वांग्मय प्रकाशनशाला.

 

श्रीवास्तव, ए. एल. 2002. भारतीय कला. इलाहाबाद: किताब महल.

 

श्रीवास्तव, ब्रजभूषण. 2001. प्राचीन भारतीय प्रतिमा विज्ञान एवं मूर्तिकला. वाराणसी: विश्वविद्यालय प्रकाशन.

 

सहाय, सच्चिदानंद. 1989. मंदिर स्थापत्य का इतिहास. पटना: बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी.

 

अन्य स्रोत

 

श्री ए. एल. श्रीवास्तव, भारतीय कलामर्मज्ञ, भिलाई (छत्तीसगढ़) से साक्षात्कार के आधार पर, (दिनांकअक्टूबर 15, 2017).

 

श्री चंद्रमणि सिंह, कला एवं संस्कृति मर्मज्ञ, जयपुर से साक्षात्कार के आधार पर, (दिनांकनवम्बर 28, 2017).

 

श्री शिवकुमार गुप्त, भारतीय कलामर्मज्ञ, जयपुर से साक्षात्कार के आधार पर, (दिनांकदिसम्बर 23, 2017).

 

श्री हरफूल सिंह, पुरातत्ववेत्ता, जयपुर से साक्षात्कार के आधार पर, (दिनांक दिसम्बर 5, 2017).