डॉ चंद्रमणि सिंह

डॉ चंद्रमणि सिंह जी राजस्थान की प्रसिद्ध विदुषी और कला एवं संस्कृति की मर्मज्ञ हैं| बनारस के भारत कला भवन में कार्यरत चंद्रमणि जी को, राजमाता गायत्री देवी ने जयपुर आकर सिटी पैलैस संग्रह पर कार्य करने हेतु आमंत्रित किया, तब से आज तक चंद्रमणि जी जयपुर में ही अपनी बौद्धिक सेवाएं दे रहीं हैं| उन्होंने सिटी पैलैस संग्रह के आधार पर जयपुर के वस्त्र कला परंपरा पर अपना लेखन कार्य प्रारंभ किया| इनके द्वारा जयगढ़ कि मर्रम्मत का कार्य, जवाहर कला केंद्र के निदेशक के पद पर 22 वर्षों तक किया गया है|

'कपड द्वार मोनुमेंट्स', 'प्रोटेक्टेड मोनुमेंट्स ऑफ़ राजस्थान', 'जयपुर राज्य का इतिहास', आदि प्रसिद्ध पुस्तकों के साथ अनेकानेक शोधपत्र राजस्थान की कला संस्कृति पर लिखे हैं| वर्तमान में चंद्रमणि जी प्राकृत भारती संसथान, जयपुर से जुड़ी हुई हैं|

इन्हें INTACH जयपुर कि सलाहकार समिति के सदस्य एवं प्रख्यात विद्वान् के रूप में, कला एवं संस्कृति में दिए गए इनके योगदान के लिए राज्य सरकार कि ओर से 15 अगस्त 2015 को सम्मानित किया गया|

डॉ. शिल्पी गुप्ता द्वारा गोलमगढ़, बिजोलियां के शिवालय के संदर्भ में कलामर्मज्ञ डॉ. चन्द्रमणि सिंह से बातचीत के अंश, दिनांक:- 28.11.2017 .

डॉ. चंद्रमणि सिंह, जयपुर में कला एवं संस्कृति मर्मज्ञ हैं | डॉ. शिल्पी गुप्ता द्वारा खोजे गए गोलमगढ़ स्थित शिवालय के सन्दर्भ में इन्होंने खोजकर्ता से बातचीत की। जिसके कुछ अंश इस प्रकार हैं —

 

डॉ. चंद्रमणि सिंह: गोलमगढ़ का शिव मंदिर बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि ये मेरे हिसाब से तो यह Early Gupta Period (प्राग् गुप्त काल) में जाएगा और आपने अगर देखा हो तो ये दर्रा के मंदिर के निकट है, पर यह उससे पूर्व का होना चाहिए। दर्रा विकसित रूप है और इसमें इस शैली का विकास होना शुरू हुआ है। दर्रा में इसी तरह के decorative forms मिलते हैं और वो ज्यादा विस्तृत रूप से बनाया गया है। लेकिन यह मंदिर दर्रा के पूर्व रूप का है। इसमें दर्रा के समान ही घुमावदार अलंकरण बनाए गए हैं तो इसकी शुरूआत हो रही है। ये भी सफेद पत्थर का बना है जैसे दर्रा का, उसी क्षेत्र का है यानि हाड़ौती का तो स्वाभाविक था कि इस शैली की शुरूआत इधर से हुई होगी।

 

डॉ. शिल्पी: चौहान, प्रतिहार, परमार मंदिरों से इसमें क्या भिन्नता है?

 

डॉ. चंद्रमणि: ये सभी चौहान, प्रतिहार, परमार बाद के हैं। ये उनसे पहले का है और शिवलिंग का जो रूप हम यहाँ देख रहे हैं, वो भी भिन्न है। क्योंकि इसमें शिवलिंग में त्रिशूल है, त्रिशूल वाला शिवलिंग पहली बार देखा है, पहले कभी नहीं देखा था और जो कुषाणकालीन शिवलिंग मिलते हैं, एकमुख या चर्तुमुख के, उनसे तो यह भिन्न है ही यानि बाद का है, गुप्त काल का है और ये जो early शिवलिंग है, उनमें रखा जाना चाहिए।

 

पत्थरों का जो ढांचा, हम यहाँ देख रहे हैं, ये भी दर्रा की तरह ही है इसलिए हमें तो बिल्कुल ही ऐसा लग रहा है कि जैसे दर्रा में या उसके पूर्व रूप के सामने ही खड़े हैं। उसको ASI (Archaeological Survey of India) ने प्रोटेक्ट किया है। अच्छी तरह से रूप संवार के पूरा कर दिया है। इसका रूप अभी वैसे नहीं बना है क्योंकि शायद ASI की दृष्टि इस ओर गई नहीं है। तो आप लोग प्रयास करें कि ASI के अधिकारी इसे देख लें और इसको भी उसी तरह से तैयार किया जाए, जैसे दर्रा के किए गए हैं। तो इसका रूप भी बदल जाएगा, इसमें जैसे पत्थर बिखरे पड़े हैं, उसमें पत्थर बड़े संवार कर रख दिए हैं, वैसे ही इसको कर दिया जाए।

 

ये सर्वतोभद्र प्रकार का है, आपने सही देखा क्योंकि ये चारों ओर एक जैसा ही होता है, शिवलिंग की आकृति गोल ही है। जिसमें त्रिशूल की रेखाकृति बनी हुई है।

 

डॉ. शिल्पी: आपने हाड़ौती के मंदिरों पर काम किया है, Protected Monuments of Rajasthan लिखा है, तो आपको क्या लगता है कि इसे किसने बनवाया?

 

डॉ. चंद्रमणि: हमें देखकर तो ये साधारण लगता है क्योंकि उन दिनों ऐसा रिवाज था कि कोई भी चाहता था कि हम अपने नाम से मंदिर, बावड़ी बनवा दें तो उसमें ज्यादा खर्च नहीं होता था तो किसी ने पत्थरों से बनवा दिया, पत्थरों को जमा दिया, थोड़ी सी खुदाई करवा दी। हो सकता है कि किसी साधु का भी हो, जैसे सीकर में हर्ष का बहुत बड़ा मंदिर है लेकिन वह भी जनता का ही बनाया हुआ है। उसमें किसी राजा या मंत्री ने मदद नहीं की। लोगों ने, साधु ने वहाँ जो चढ़ावा आता था, उसी से इकट्ठा कर बनाया है। उसी तरह का भी ये हो सकता है कि वहाँ एक शिव मंदिर रहा हो तो, चढ़ावा वगैरह आता है तो लोग सोचते हैं कि उससे मंदिर बनवा दिया जाए। उधर एक बात और है कि उस क्षेत्र में शैव मठ बहुत हैं, जो इनमें घिरे हुए स्थान हैं दहलनपुर आदि, वहाँ सब जगह आपको मिलेगा कि मंदिर के साथ मठ बने हुए हैं। महल जैसे मठ बने हुए हैं।

 

डॉ. शिल्पी: कनेर की पुतली आपने देखा है तो उसके पास है ये?

 

डॉ. चंद्रमणि: कनेर की पुतली भी पहले का है, दहलनपुर तो मध्यकाल का है। क्योंकि उन्होंने भी नहीं लिखा है, कनेर की पुतली पर तो मनकोड़ी ने लिखा है, पर उन्होंने इसका जिक्र नहीं किया है।

 

डॉ. शिल्पी: जब मैं रिसर्च का काम कर रही थी मेनाल-बिजोलियां पर 2004 में, तब इस मंदिर को देखा था। इसके पास और भी देखे थे मैंने और उनको प्रकाशित भी किया पर, यहाँ पर मेरा सवाल है कि इन मंदिरों को संरक्षित करने के लिए सरकार कोई प्रयास नहीं कर रही, आपने तो जयगढ़ के पुर्ननिर्माण के लिए भी काम किया है, तो आप क्या कहेंगी?

 

डॉ. चंद्रमणि: अच्छा, बहुत अच्छा काम है। आप इसे आगे बढ़ाइए और दो-चार मंदिरों को खोजिये क्योंकि बहुत से पड़े होंगे। देखिये, सरकार के लिए इतना संभव नहीं है, हम सरकार की तरफ से नहीं बोल रहे हैं, हमारे यहाँ इतने इमारतें हैं कि मान लीजिए, करा भी दें तो कोई वहाँ देखने वाला नहीं है, इसमें जनता की सहभागिता चाहिए, उनमें जागरूकता होनी चाहिए कि ये हमारी चीज है, इसको हम सुरक्षित रखें। क्योंकि होता क्या है कि करा देते हैं तो चौकीदार रखने पड़ते हैं, तनख्वाह देनी पड़ती है, ये बड़ी भारी समस्या है। अच्छा, चौकीदार रख भी दे तो वह भाग जाता है। जैसे नीलकंठ, अलवर में भी एक बार ऐसी स्थिति हुई कि चौकीदार कहाँ से लाएं तो वहीं गांव वालों में से ही चौकीदार बना दिया।

 

डॉ. शिल्पी:  जी, वो भी एक अच्छा प्रयास है, गांव वाले वहीं हैं तो अपनी चीजों को सुरक्षित रखेंगे और वहीं रहते भी हैं तो देखभाल हो जाएगी लेकिन मुझे लगता है कि जो ऐसी इमारतें हैं जो बहुत दुर्लभ हैं, उन्हें तो सुरक्षित करना चाहिए क्योंकि आसपास के लोग गाँव वाले हैं, वो खुद से कुछ कर नहीं पाएंगे। खुद से कुछ समझ नहीं पाएंगे। 2004 में एक और मंदिर मैंने देखा था, तब उसका रूप पुराना था परन्तु अभी कुछ साल पहले 2016 में जब गई तो देखा कि वहीं के गांव वालों ने उसे अपने तरीके से संरक्षित तो कर दिया पर उसका मूल रूप ही परिवर्तित कर दिया।

 

डॉ. चंद्रमणि: हाँ, ये भी करते हैं। अगर एक बार सरकार संरक्षित कर दे तो फिर गांव वालों द्वारा व्यवस्था करवायी जाए तो ठीक रहेगा। ये ज़रूर है कि एक दो बार किसी को भेजे, कोई अधिकारी जाए, लेक्चर हो या स्कूल, या पंचायत से जोड़े तो अच्छा रहता है। इस तरह से करना चाहिए।

 

डॉ. शिल्पी: आज कल सड़क बहुत अच्छी हो गई है। फिर भी सरकार जब तक इनको संरक्षित नहीं करेगी, तब तक गांव वाले इसका महत्व नहीं समझेंगे, सरकार को ही इसके लिए प्रयास करना चाहिए, खासकर जो बहुत unique monument हैं, अन्यथा ये नष्ट हो जाएंगे।

 

डॉ. चंद्रमणि: समय के साथ नष्ट हो जाएंगे, करना तो चाहिए क्योंकि देखिए पहले नीलकंठ में कोई सड़क नहीं थी, हम चढ़कर गए थे, राजगढ़ से बस से गए क्योंकि उन दिनों कोई सवारी नहीं जाती थी।

 

आपको बहुत बधाई कि आपने इसको खोजा। राजस्थान के पूर्व गुप्तकालीन या प्रारंभिक मंदिरों में इसको रख सकते हैं। इसकी सुरक्षा तो होनी ही चाहिए। मेनाल-बिजोलियां में ASI के क़ाफ़ी लोग रहते हैं, तो वहाँ से प्रयास किया जा सकता है।