No Events Found In This Domain

Workspace

गोलमगढ़ का गुप्तकालीन शिवालय: एक प्रतिमाशास्त्रीय अध्ययन (An Iconographical Study)

 

भीलवाड़ा जिले के बिजोलियां नामक स्थल के 10 किमी के अन्दर ही स्थित गोलमगढ़ गांव के, देवरिया की खानों में प्रारंभिक गुप्तकाल की शिल्पकला का एक बेहतरीन उदाहरण, यहाँ मौजूद एक शिवालय है। शिवालय में पूजान्तर्गत भाग में ठीक मध्य में लगभग पाँच फीट का एक शिवलिंग है, जो शास्त्रों के आधार पर ही बनाया गया है क्योंकि यह शिवलिंग; ब्रह्म भाग, विष्णु भाग एवं रूद्र भाग में विभक्त है। जो राजलिंग या मानुष लिंग के रूप में बनाये जाते थे, इस तरह के शिवलिंगों में नीचे से ऊपर क्रमशः—ब्रह्म भाग चौकोर बनते थे, उसके ऊपर बीच में विष्णु का भाग अष्टकोणीय होता था और सबसे ऊपर पूजा के लिए शिव का रूद्र भाग या पूजा भाग होता था (चित्र—1), जिस पर व्यक्ति पूजा हेतु जल, फल-फूल चढ़ाते थे। वृहत्संहिता, विष्णुधर्मोत्तर पुराण, मत्स्य पुराण ऐसे त्रिभाग (tripartite) शिवलिंग का उल्लेख करते हैं और यही सब बात हम यहाँ पर भी देखते हैं कि सबसे नीचे चौकोर ब्रह्म भाग (20 इंच) है, उससे ऊपर 10 इंच का अष्टकोणीय (आठ हिस्सों में निर्मित) विष्णु भाग है और ऊपर शिव का रूद्र भाग (30 इंच) है, शिवलिंग की ऊपरी सतह अंडाकार है (चित्र—2-6)। यह शिवलिंग आगे और पीछे से थोड़ा चौड़ा और चपटा है, जबकि दोनों किनारे (पूर्व और पश्चिम की तरफ) कम स्थान लिये हुए हैं।

 

चित्र—1: त्रिभाग (Tripartite) शिवलिंग (साभार: www.google.co.inurlsa)

 

चित्र—2: शिवलिंग का पश्चिमी एवं उत्तरी पहलू, शिव मंदिर, गोलमगढ़

 

चित्र—3: शिवलिंग की उपरी सतह

 

चित्र—4: चौकोर ब्रह्म भाग एवं योनिपट्ट के अवशेषों सहित शिवलिंग का निचला भाग, गोलमगढ़

 

यह शिवलिंग बलुआ पत्थर (sandstone) से मानव निर्मित है। अतः स्वयंभू नहीं है बल्कि शास्त्रानुसार निर्मित मानुष लिंग है, इसमें खास बात यह है कि इसके रूद्र भाग में शैव उपासना के प्राथमिक प्रतीक—त्रिशूल एवं लिंग की रेखाकृति बनी हुई है। इसमें ऊपर की ओर एक इंच छोड़कर 12 इंच के भाग में शिव के शस्त्र—त्रिशूल की दंडविहीन रेखाकृति बनी हुई है, जो बहुत स्पष्ट रूप से बनायी गयी है। इसके नीचे रेखाओं से लिंगाग्र (glans penis) जैसी आकृति बनायी गयी है, जो अपने निचले हिस्से में वापस से पाँच इंच के ऊर्ध्वलिंग की रेखाकृति के रूप में उभरता है। अति विशेष बात यहाँ यह भी है कि यह त्रिशूल व लिंग रेखाकृति, इस शिवलिंग के चारों ओर (उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम) बनाये गये हैं, जिसे हम किसी भी दिशा से देखे तो एक समान दिखाई दे सके अतः यह चर्तुदिक् दर्शनीय (चारों दिशाओं से दिखाई देने वाला) शिवलिंग बन पड़ा है और अभी तक ऐसा कोई और शिवलिंग नहीं मिला है जिसमें इस तरह से त्रिशूल एवं लिंग रेखाकृति बनी हुई हो और यह चारों दिशाओं में एक समान रूप से बनायी गयी हो या देखी जा सकती हो इसलिए यह शिवलिंग अपने आप में अद्वितीय है।

 

चित्र—5: शिवलिंग का अष्टकोणीय विष्णु भाग

 

चित्र—6: रूद्र भाग, शिवलिंग, गोलमगढ़

 

कुषाण एवं गुप्तकाल में चार-पाँच फीट के शिवलिंग तो कई मिलते हैं। राजस्थान में कुषाणकाल के शिवलिंग, मथुरा से लगे हुए राजस्थान के भरतपुर क्षेत्र—अघापुर (लिंगाग्र सहित एकमुखी शिव, चित्र—7), गामड़ी (यक्ष एवं शिवाकृति), चौमा बंडपुरा (लिंगाग्र में पुष्पमाला सहित [जैसे, चित्र—8], अमृतघट, स्त्री मुखाकृति, सिंह, यक्षाकृति) नांद, अजमेर (चतुर्मुखी—क्रमशः लकुलीश, विष्णु, एकानंशा, वासुदेव एवं बलदेव की पंक्तियों सहित) आदि से प्राप्त हुए हैं। जबकि गुप्तकाल के शिवलिंग—दर्रा (अज्ञात), चारचौमा (चतुर्मुखी शिवलिंग), माकनगंज (चतुर्मुखी शिवलिंग) एवं प्रारंभिक गुप्तकाल का एकमुखी शिवलिंग, रंगमहल से प्राप्त हुए हैं।

 

चित्र—7: अघापुर, राजस्थान (साभार: truthabouthinduism.wordpress.com)

 

चित्र—8: माला सहित लिंगाग्र (Glans Penis) (साभार: www.youtube.com)

 

चित्र—9: करमदंडा, गुप्तकालीन शिवलिंग (साभार: Wannapat Ruangsup’s Thesis)

 

प्रतिमालक्षण व शास्त्र अनुसार निर्मित रूद्र, विष्णु, ब्रह्म भाग के अनुसार बने ‘त्रैराशिक शिवलिंग’, बाद के भी कालों, समय में बनते रहे हैं परन्तु गोलमगढ़ जैसा शिवलिंग अभी तक कहीं नहीं मिला है। कुछ शिवलिंग जैसे करमदण्डा, ऊत्तरप्रदेश से लखनऊ संग्रहालय में संरक्षित कुमारगुप्त के समय का गुप्तकालीन आकृतिविहीन पाषाण शिवलिंग भी कुछ इसी प्रकार का है, जो गुप्तकाल में पाषाण पर बने चौकोर ब्रह्मभाग, अष्टकोणीय विष्णु भाग और ऊपर रूद्रभाग युक्त है, जिसमें लिंगांग पर ब्रह्मसूत्र रेखा भी है (चित्र—9), अंतर इतना है कि इसमें कोई आकृति नहीं बनी है, जबकि विष्णु भाग पर एक गुप्तकालीन शिलालेख है जो कुमारगुप्त प्रथम के समय के एक मंत्री ‘पृथ्वीसेन’ का जिक्र करता है जो बाद में उसका सेनापति (General) बन गया था। जबकि यहां पर त्रिशूल व लिंग रेखाकृति है, जिसे लिंगाग्र ब्रह्मसूत्र रेखा के साथ दिखाते हुए नीचे भी पाँच इंच की उध्र्व लिंग रेखाकृति रूप में बनाया गया है और इसके ऊपर त्रिशूल का चिन्ह स्पष्ट कर दिया है (चित्र—10,11)। दोनों ही प्रतीक—त्रिशूल और उध्र्वलिंग (Trident and Ithyphallic) शिव के साथ ही जुड़े रहते हैं अतः इससे शिवलिंग को प्रमाणित करते हुए और एक असाधारणरूप देते हुए, चारों दिशाओं से समान रूप से अंकित करते हुए ‘चर्तुदिक् दर्शनीय’ (श्री ए.एल.श्रीवास्तव द्वारा इसे ‘चर्तुदिक् दर्शनीय’ कहना ज्यादा उपयुक्त माना गया है, जो सही ही है), बना दिया गया है, जो अन्यत्र अभी तक प्राप्त नहीं होता (चित्र—12,13)।

 

चित्र—10: त्रिशूल का रेखाचित्र (Line drawing)

 

चित्र—11: रूद्र भाग पर लिंग, शिवलिंग

 

चित्र—12: शिवलिंग का पूर्वी पहलू 

 

इस तरह के कुछ शिवलिंग, जिसके रूद्र भाग में लिंग और ब्रह्मसूत्र रेखाकृति है, हमें मथुरा की कुषाण कला (चित्र—14), अरवालेम, दक्षिण भारत में भी कई जगह प्राप्त होते हैं। इस तरह के शिवलिंग बाद के उड़ीसा के परशुरामेश्वर देवल में भी दिखाई देते हैं, जहाँ एक खुले स्थान पर एक सहस्त्रलिंग तथा मंदिर के पूर्वी दीवार पर बने शिवलिंग (चित्र—15) तथा एक अन्य अल्पप्रसिद्ध दैत्यावश्वर मंदिर में पूजान्तर्गत (Cult Image) रूप में है।

 

चित्र—13: शिवलिंग का दक्षिणी पहलू, गोलमगढ़

 

चित्र—14: मथुरा से प्राप्त शिवलिंग (साभार: www.pinterest.com)

 

चित्र—15: ब्रह्मसूत्र रेखा के साथ शिवलिंग, उड़ीसा (दीपक भट्टाचार्य के लेख से साभार [2005-06: 96-99])

 

ये सभी शिवलिंग शास्त्रों के अनुसार ही बनाये जाते रहे हैं, जैसा कि यहाँ पर भी दिखाई दे रहा है, ये शिवलिंग मंदिर में (In Situ) है। एक बात यह भी है कि सामान्यतः विष्णुभाग योनिपट्ट के साथ समानान्तर होकर ऊपर की तरफ निकला नहीं रहता है परन्तु यहां पर संभवतः शिल्पियों ने पूर्णतः शास्त्रसम्मत न होते हुए अपने अनुसार विष्णु भाग को योनिपट्ट से थोड़ा ऊपर बनाया है, जो बाहर से दृष्टव्य है या वह योनिपट्ट के टूटने से बाहर दिख रहा है। साथ ही त्रिशूल की रेखाकृति भी संभवतः इन्हीं शैवभक्तों ने अपनी स्वतंत्र इच्छानुसार ही बनायी है क्योंकि शास्त्र में तो अद्यावधि इसका उल्लेख देखने में नहीं आया है, परन्तु शिवास्त्र होने से स्वाभाविक भी है। गोलमगढ़ के इस शिवलिंग के साथ ही चौकोर योनिपट्ट भी बना हुआ था, जो अब खंडित अवस्था में है और इसके कुछ खंड, बाहर ही पड़े हैं (चित्र—16)। श्री हरफूल सिंह जी के अनुसार इस शिवलिंग में बने लिंग, पंचास्य लिंग को प्रतीकात्मक तौर पर प्रस्तुत करते हैं, जो शिव के सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरूष रूप हैं और ऊपर का सतह ‘ईशान’ का है। ये प्रकृति के पंचमहाभूतों के प्रतीक हैं।

 

चित्र—16a: चौकोर योनिपट्ट का एक खंड, शिव मंदिर

 

चित्र—16b: जल प्रणालिका का एक खंड, योनिपट्ट,  शिव मंदिर, गोलमगढ़

 

घटपल्लव (Vase and Foliage) —

 

इस मंदिर में प्रतिमाशास्त्र के आधार पर शिवलिंग के अलावा जो एकमात्र दूसरी अभिव्यक्ति है, वह है ‘घटपल्लवों के अलंकरण’ की जो इस सर्वतोभद्र शिवालय के चारों द्वारों के दोनों पक्खों पर निर्मित हैं। अर्थात् हर द्वार पर दो यानि कुल आठ घटपल्लव यहाँ बने हुए हैं। जिसमें आज भी कुछेक की स्थिति यथावत् है जबकि कुछ बारिश और समय के साथ-साथ जीर्ण हो चले हैं और उत्तरी द्वार का एक घटपल्लव तो खत्म ही हो चुका है, मात्र उसके कुछ पत्रगुच्छ ही बचे हैं।

 

वस्तुतः घटपल्लवाकृति—एक घड़े से निकलती पुष्प की पखुडियाँ है, जो बाहर की तरफ सीधी निकलकर, अधिक फैलाव के कारण घट से दोनों ओर भी लटक कर फैल जाती हैं। पत्रगुच्छ के रूप में, यह घटपल्लव आकृति ‘पूर्ण समृद्धि’ का प्रतीक मानी जाती है, जो प्राचीन समय से भारतीय अलकंरण परम्परा में बनाया जाता आ रहा है। सांची की मूर्तिकला में उत्तरी तोरण द्वार के सिरदलों के दृश्यों में एवं गजलक्ष्मी प्रतिमाओं के साथ भी घट तथा उनसे निकलते कमल के सुंदर बेलें बनाये गये हैं जो पूर्ण पुष्प या कली रूप में नज़र आते हैं (चित्र—17)। प्रारंभिक एवं बाद के मंदिरों में भी ये घटपल्लव अलंकरण मुख्य द्वारशाखा, स्तंभों पर बनाये जाते रहे हैं, जो शुभ सूचक चिन्ह है। पालि साहित्य ‘पुण्णघटपटिमंडित घर’ का उल्लेख करता है। आज भी हमारे घरों में मंगलकलश रखे जाते हैं या पूजा-पाठ के दौरान स्थापित किये जाते हैं तथा घर से बाहर यात्रा में जाते समय प्रवेशद्वार पर जल से भरा कलश, जिसमें पुष्प भी डले हों, देखकर निकलना शुभयात्रा का संकेत माना जाता है।

 

चित्र—17: घटपल्लव, साँची स्तूप—1 (साभार: commons.wikimedia.org)

 

गोलमगढ़ के इस शिवालय में बने ये घटपल्ल्व बहुत गहरे नहीं है अपितु ये भी यहां पर त्रिशूल व लिंगारेखाकृति की तरह, रेखीय आकृति के रूप में ही बनाये गये हैं, मंदिर के निचले हिस्से में द्वार पक्खों पर दोनों ओर जमाये हुए पत्थरों पर, (एक तरह से द्वार पेड्या जैसे स्थान पर) इनका रेखांकन किया गया है। वस्तुतः दरवाजों का रूप देने हेतु, जो पत्थर एक के ऊपर एक जमाये गये हैं, जो कहीं पतले तो कहीं चौड़े भी हैं, उन्हीं पर प्रवेश द्वारों पर शुभ प्रतीक के रूप में कमल या पुष्प की डिजाइन (Lotus Motif) से सज्जित एक मोटी रस्सी (Twisted Rope—घड़े को टिकाने हेतु जो मिट्टी या कपड़े की ‘इण्डोणी’ बनायी जाती है) पर एक चौड़े आकार के चपटे घट को रखा गया है, जिसकी गर्दन भी छोटी है। इससे कमल की पंखुड़ी को निकलते हुए सृजित किया है जो कहीं दोहरे पंक्ति वाली और कहीं एकल पत्तों के रुप में है परंतु इसके अधिक होते पत्रों ने दोनों किनारों पर लटककर सुंदर पत्र गुच्छों का रूप भी ले लिया है (चित्र—18,19)। इस तरह के पत्रलता और बेलें काफी सुघड़ रूप में गुप्तकालीन मंदिरों की द्वारशाखा में जैसे- दशावतार मंदिर, देवगढ़ तथा राजस्थान में हमें हाड़ौती के गुप्तकालीन मंदिर ‘दर्रा’ के शिवालय के अलंकरणों में मिलते हैं, परन्तु दर्रा में घटपल्लव नहीं है। अन्तर यह है कि यहां इस प्रकार के तक्षण या नक्काशी हल्की रेखाओं से बनाये गये हैं, अन्यत्र अधिकांशतः गुप्तकालीन मंदिरों में वो गहरे व पूर्ण नक्काशी तक्षण वाले होते हैं।

 

चित्र—18: घटपल्लव, दक्षिणी पहलू, शिव मंदिर, गोलमगढ़

 

चित्र—19: घटपल्लव, पूर्वी पहलू, शिव मंदिर, गोलमगढ़

 

गोलमगढ़ के शिवालय के घटपल्लव सामान्यतः चौड़े आकार के हैं क्योंकि जिस आधार पर चौड़े पत्थरों को यहाँ जमाया गया है, उतने पूरी जगह को घेरते हुए इन्हें रेखांकित किया गया है अतः आपस में एक समान नहीं है, इनमें थोड़ा बहुत फर्क भी नजर आता है परन्तु इनको बनाने के पीछे छिपी भावना स्पष्ट नज़र आती है कि इसे एक द्वार का रूप देते हुए इसे समृद्धि सूचक घटपल्लवों से सजाया गया है, जो कि मंदिरों में बनने वाले मांगलिक चिन्ह ही हैं और श्री एल. श्रीवास्तव द्वारा इन्हें ‘द्वार पक्खा’ कहा जाना ही ज्यादा सही प्रतीत होता है, बजाय द्वार स्तंभ कहने के, प्रवेश द्वार पर ही ये सुंदर घटपल्लव बनाये गये हैं (चित्र—20,21)। राजस्थान में तो अभी तक मंदिरों के द्वार या स्तंभों पर इतने चौड़े घटपल्लव नजर नहीं आते, मध्यकालीन मंदिरों पर ये बनते रहे हैं पर इनका चौड़ापन स्तंभों की जगह के अनुसार कम हो गया है, लेकिन देवगढ़ के दशावतार मंदिर (झांसी, ऊ.प्र.) के स्तंभों पर बने घटपल्लव काफी चौड़े हैं और उन्हें भी ऐसी ही मोटी पद्म रस्सी पर एक चपटे-चौड़े, छोटी गर्दन वाले घट पर रखा गया है, जिससे पत्र दल बाहर फैल रहे हैं (चित्र—22)।

 

चित्र—20: घटपल्लव, उत्तरी पहलू, शिव मंदिर, गोलमगढ़

 

चित्र—21: अलंकृत घटपल्लव, पश्चिमी पहलू, शिव मंदिर, गोलमगढ़

 

चित्र—22: घटपल्लव, दशावतार मंदिर, देवगढ़, ऊ.प्र. (साभार: www.pinterest.com)

 

इसी तरह के समान घटपल्लवाकृति तिगवा के कंकाली देवी मंदिर के मंडप स्तंभों के ऊपरी हिस्से में बने हैं (चित्र—23)। एरण के विष्णु मंदिर (चित्र—24) पर भी ऐसे ही घटपल्लव प्राप्त होते हैं अतः इनसे यह अनुमान होता है कि ऐसे चौड़े और चपटे घट वाले ‘घटपल्लव’ उत्तर गुप्तकालीन मंदिरों की परम्परा रही है। इस आधार पर गोलमगढ़ के इस शिवालय को गुप्तकाल के संक्रांति काल में रखा जा सकता है। अंतर इतना है कि सांची स्तूप, देवगढ़, एरण, तिगवा सभी के उपरोक्त मंदिर, अपनी नक्काशी और अलंकरण में इस शिवालय से कहीं ज्यादा अलंकृत व उत्तम हैं, उनकी अपेक्षा यहाँ अलंकरण में सादगी है परन्तु घटपल्लव स्पष्ट है।

 

चित्र—23: घटपल्लव, तिगवा (साभार: teamgsquare.blogspot.com)

 

चित्र—24: घटपल्लव, विष्णु मंदिर मंडप, एरण, म.प्र. (साभार: commons.wikimedia.org)

 

संभवतः इसका कारण यही रहा हो कि यह एक छोटा क्षेत्र रहा और यहाँ पर साधु-महात्मा रहते हों, उन्होंने ही अपनी शिवभक्ति में इस लघु शिवालय को बनवाया हो, उनके पास दानपुण्य से जो चढ़ावा आता हो, उसी के आधार पर यह शिवलिंग और उसको सुरक्षित करते हुए यह लघु शिवालय (मंडप) बना दिया गया और स्थानीय लोगों और कारीगरों की सहायता से उपलब्ध धन के आधार पर लघु रूप में सादगी के साथ, अल्प तक्षण के साथ बना दिया गया जो अधिकतर आवश्यकता को ध्यान में रखकर किया गया होगा। अतः त्रिशूल, लिंग, घटपल्लव आदि रेखाकंन (Line Drawing) के रूप में ही बना दिये गये, जिससे उनकी भाव अभिव्यक्ति भी हो जाए और कम सामग्री में कार्यसिद्धि भी हो जाए।

 

झालरापाटन के चंद्रभागा नदी के किनारे बना शीतलेश्वर महादेव मंदिर (689 ई. तिथि अंकित मंदिर) के कुछ भाग आज भी अति प्राचीन है जबकि कुछ भाग बाद में भी जोड़े गये हैं। इसी मंदिर के कुछ स्तंभों में नीचे की तरफ बने घटपल्लव गोलमगढ़ के इस मंदिर से कुछ मिलते हैं, यहाँ बने घटपल्लव यद्यपि ज्यादा अलकृंत हैं। परन्तु इसके घट के एकदम नीचे का हिस्सा, गोलमगढ़ के घट से मिलता है, अतः राजस्थान का यही घटपल्लव अभी तक, गोलमगढ़ के घटपल्लव से थोड़ा मिलता-जुलता नज़र आता है, इस आधार पर यह शिवालय, शीतलेश्वर महादेव का अग्रगामी माना जा सकता है। श्री शिवकुमार गुप्त जी ने इस शिवालय के घटपल्लव अलंकरण को देखते हुए, इसे परवर्ती गुप्तकालीन बताया है।

 

अतः प्रतिमा विज्ञान के आधार पर तो यहाँ गोलमगढ़ में, असाधारण शिवलिंग तथा घटपल्लव विद्यमान है। इस तरह के शास्त्रसम्मत शिवलिंग तो लगभग प्रथम शताब्दी से बनते रहे हैं। घटपल्लव अंकन भी पूर्व से बनते रहे हैं पर इस तरह के थोड़े चौड़े घटपल्लव गुप्तकाल में बन रहे थे। परन्तु चूंकि हूबहू ऐसी कोई संरचना या प्रतिमा या अलकंरण नहीं, अतः इस शिवालय का निश्चित समय निर्धारण अभी कठिन है, लेकिन ऐसे शिवमंडप अद्भुत और प्राचीन हैं, इसलिए संरक्षण के हकदार तो हैं ही, इस तरह की अद्वितीय धरोहरें, भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण सूची में शामिल होने ही चाहिए अन्यथा ये नष्ट होती विरासतें, हमारे प्राचीन इतिहास की विलुप्तता का ही संकेत दे रही हैं, अतः भारतीयों का यह दायित्व है कि हम अपनी ही धरोहरों के लिए, इतिहास के लिए स्वयं जिम्मेदार बनें। पुरासम्पदा हमारे देश की थाती हैं, ये मूक स्मारक अपनी व्यथा बोल नहीं सकते पर यदि हम इन्हें अपनी विरासत कह, बड़े हक से गर्व अनुभव करतें हैं तो इनको समझ, इनकी सार-संभाल करना भी भारतीयों का ही कर्त्तव्य है। 

 

संदर्भ

 

अग्रवाल, आर.सी. 2005-06, ‘रिसेंटली डिसकवर्ड चर्तुदिक शिवलिंग फ्रॉम गोलमगढ़, राजस्थान.’ प्राग्धारा: जर्नल ऑफ़ यू.पी. स्टेट आर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट, लखनऊ. 16: 279-81.

 

अग्रवाल, पृथ्वी कुमार. 1994. गुप्तकालीन कला एवं वास्तु. वाराणसी: बुक्स एशिया.

 

गुप्त, परमेश्वरी लाल. 1989. भारतीय वास्तुकला. वाराणसी: विश्वविद्यालय प्रकाशन.

 

गुप्ता, शिल्पी. 2006. ‘गोलमगढ़ (बिजोलियां) का एक अज्ञात एवं अनुपम गुप्तकालीन मंदिर.’ शोध पत्रिका, उदयपुर: राजस्थान विद्यापीठ. 57 (1-4): 80-87.

 

ढाका, अम्बिका. 2012. ब्रह्मनिकल टेम्पल आर्ट एण्ड आर्किटेक्चर इन हाड़ौती. दिल्ली: भारतीय कला प्रकाशन.

 

बनर्जिया, जी.एन. 2002. द डवलपमेंट ऑफ़ हिन्दू ऑइकनोग्राफी. नई दिल्ली: मुंशीराम मनोहरलाल पब्लिशर्स प्राइवेट लिमिटेड.

 

भट्टाचार्य, दीपक. 2012. ‘द ब्रह्मसूत्र ऑन द शिवलिंग एण्ड द ओरिएंट पाथ: थियोरोटिकल एण्ड एस्ट्रोनॉमिकल स्टडी.’ जर्नल ऑफ़ दि एशियाटिक सोसाइटी. LIV (2): 9-24.

 

राव, टी. गोपीनाथ. 1985. एलीमेंट्स ऑफ़ हिन्दू ऑइकनोग्राफ़ी, वोल्यूम द्वितीय. दिल्ली: मोतीलाल-बनारसी दास.

 

श्रीवास्तव, ए. एल. 1963. लाइफ़ इन सांची स्कल्पचर्स. नई दिल्ली: अभिनव पब्लिकेशंस.

 

श्रीवास्तव, ए. एल. 1999. भारतीय कला प्रतीक. इलाहाबाद: उमेश प्रकाशन.

 

श्रीवास्तव, ब्रजभूषण. 2001. प्राचीन भारतीय प्रतिमा विज्ञान एवं मूर्तिकला. वाराणसी: विश्वविद्यालय प्रकाशन.

 

सोमपुरा, प्रभाशंकर. 1975. भारतीय शिल्प संहिता. बम्बई: सौम्या पब्लिकेशंस प्रा.लि.

 

Wannapat, Ruangsup. 2013. 'The Emergence And Development Of Brahmanism In Thailand With Special Reference To The Iconography Of Brahmanical Deities (Up To 13th Century A.D.).’ PhD Thesis, Department of History, Deccan College Post Graduate and Research institute, Pune. Online at     https://shodhganga.inflibnet.ac.in/bitstream/10603/.../5/chapter%205,%20.... (viewed on November 6, 2017).

 

अन्य स्रोत

 

श्री ए. एल. श्रीवास्तव, भारतीय कलामर्मज्ञ, भिलाई (छत्तीसगढ़) से साक्षात्कार के आधार पर, (दिनांक—अक्टूबर 15, 2017).

 

श्री चंद्रमणि सिंह, कला एवं संस्कृति मर्मज्ञ, जयपुर से साक्षात्कार के आधार पर, (दिनांक— नवम्बर 28, 2017).

 

श्री शिवकुमार गुप्त, भारतीय कलामर्मज्ञ, जयपुर से साक्षात्कार के आधार पर, (दिनांक—दिसम्बर 23, 2017).

 

श्री हरफूल सिंह, पुरातत्ववेत्ता, जयपुर से साक्षात्कार के आधार पर, (दिनांक—दिसम्बर 5, 2017).