मुश्ताक खान

चित्रकला एवं रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर।
भारत भवन ,भोपाल एवं क्राफ्ट्स म्यूजियम ,नई दिल्ली में कार्यानुभव।
हस्तशिल्प,आदिवासी एवं लोक कला पर शोध एवं लेखन।

 

 

 परसौदा बड़े गांव सारंगगढ़ से भटगांव जाने वाले मुख्य सड़क मार्ग पर स्थित है और एक औसत दर्जे का गांव है। यहाँ की आबादी मिश्रित है तथा यह अच्छा खेतिहर इलाका है। गांव के मध्य में एक मंदिर और एक पक्की चौपाल बनी हुई है। इसी चौपाल के सामने वाले घर के बाहरी बराम्दे में इन जोगियों ने अपना डेरा बनाया हुआ था।

गांव के बुजुर्गों ने बताया कि धान की फसल कटने के बाद नवम्बर माह से मार्च माह तक इस क्षेत्र में गोरखपंथी जोगी गांव-गांव घूमते हैं। पिछले अनेक वर्षों से यह सिलसिला जारी है। यह जोगी जो इस वर्ष इस गांव में आये हैं यही पिछले लगभग २० वर्षों से लगातार जनवरी-फरवरी माह में यहाँ आ रहे हैं। यह अकेले अथवा तीन-चार के समूह में आते हैं। एक गांव में लगभग पंद्रह दिन डेरा डाले रहते हैं। प्रतिदिन प्रत्येक जोगी अलग अलग भिक्षाटन के लिए निकलता है और दिन ढले सभी अपने डेरे में वापस आ जाते  हैं। प्रत्येक जोगी जिस घर में कथागायन करता है तो वह लगातार तीन-चार दिन उस घर में जाता रहता है। पांचवे दिन वह उस घर से भिक्षादान ग्रहण करता है। एक बार जिस घर से भिक्षा लेली फिर दोबारा उस घर से भिक्षा नहीं लेते। अधिकांशतः यह जोगी उन्हीं घरों में जाते हैं जहाँ यह पिछले अनेक वर्षों से जा रहे हैं।  

गोरखपंथी जोगियों के इस समूह में तीन सदस्य थे, बालकदास, त्यागी बाबा और राम बालक बाबा। राम बालक सबसे बड़े लगभग ६० वर्ष के, त्यागी बाबा लगभग ५० वर्ष तथा बालकदास ४४ वर्ष की आयु के रहे होंगे। यह लोग अपने बारे में बात करना पसंद नहीं करते और न ही अपनी निजी जिंदगी के बारे में कोई जानकारी देते हैं। उन्होंने बताया कि वे गोरखनाथ पंथ के मानने वाले हैं और गोरखपुर के गोरखनाथ सेवाश्रम से जुड़े जूना अखाड़ा के सदय हैं। उनके अखाड़े में साधुओं के अनेक समूह हैं। प्रत्येक समूह एक कुटिया से जुड़ा होता है। उनकी कुटिया के १०८ सदस्य हैं। यह सदस्य छोटे-छोट समूहों में विभिन्न प्रांतों में घूमते हैं और गोरखपंथ का प्रचर-प्रसार करते हैं। जो जिन प्रांतों की बोली समझता है वह उन्हीं प्रांतों में जाता है। वे स्वयं बंगाल, बिहार, झारखण्ड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जाते हैं।

 

Gorakhpanthi Tyagi Jogi

Image: Gorakhpanthi, Tyagi Jogi, Chhattisgarh

 

Gorakhpanthi, Balakdas Jogi

Image: Gorakhpanthi, Balakdas Jogi, Chhattisgarh.

इस बार यह तीनों एक समूह में हैं परन्तु हर बार ये एक समूह में रहें यह निश्चित नहीं है। समूह के सदस्य हमेशा बदलते रहते हैं। यह तीनों ही पिछले बीस वर्षों से अधिक समय से लगातार छत्तीसगढ़ आ रहे हैं परन्तु प्रत्येक वर्ष इनके समूह की रचना पृथक होती है। यह कहते हैं हमतो रमता जोगी बहता पानी हैं, हमारा कुछ निश्चित नहीं है। हमलोग अधिकांशतः रायगढ़, बिलासपुर अथवा रायपुर तक रेल से आते हैं उसके बाद पैदल गांव-गांव जाना शुरू करते हैं।

यह लोग गेरुआ वस्त्रधारी, हाथ में कमंडल और चिमटा लिये रहते हैं। सर पर लम्बी जाटा-जूट, कन्धों पर दो-तीन झोलियाँ और थैले टाँगे रहते हैं। यह एक सारंगी बजाते हुए कथा एवं भजन गायन करते हैं। लकड़ी की बनी सारंगी में लोहे एवं तांत के तार लगे होते हैं जिसे घोड़े के बाल लगी गज से बजाया जाता है। गज में घुँघरू बंधे रहते हैं जो सारंगी बजाते समय गज को झटका देने पर झंकार भरी ताल उत्पन्न करते हैं। इनकी कथा गायकी सरल और माधुर होती है। राजा भरथरी, राजा गोपी चाँद और श्रवण कुमार की कथा ये बड़े ही मार्मिक स्वर में गाते हैं।

ये कहते हैं, हम लोग राजा भरथरी और राजा गोपीचंद की कथाएं गाते हैं क्योकि वे हमारी गोरखनाथ परम्परा के योगी थे और राजा भरथरी तो गोरखनाथ के प्रथम शिष्य भी थे। इनका जयगान हमारी गोरख परम्परा का जय गान है। इनके अतिरिक्त हम श्रवण कुमार तथा राजा हरिश्चंद्र की कथा भी गाते हैं जिन्होंने उच्च नैतिक मूल्यों की स्थापना की थी। दिन को हम घर-घर जाकर भजन गाते हैं और शाम को डेरे पर लौटने के बाद फिर गांववाले हमारे डेरे पर एकत्रित हो जाते हैं और कथा और भजन करते हैं। जो अनाज भिक्षा में मिलता है उससे बालक भोजन करते हैं या गांव में पड़ाव के अंतिम दिन भंडारा कर देते हैं। वजनी सामान उठाये घूमना संभव नहीं केवल जो पैसा मिलता है उसे रख लेते हैं शेष वहीं  समाप्त कर देते हैं।

 

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.