छत्तीसगढ़ की वाचिक परम्परा अत्यंत संपन्न है विशेष तौर पर लोक काव्यों, लोक कथाओं और लोक गीतों के क्षेत्र में यह अद्वितीय है। देश की आज़ादी के बाद जिन प्रदेशों से सर्वाधिक लोक कथा गायकों ने नाम कमाया है उनमें छत्तीसगढ़ भी एक है। वाचिक परम्परा की इस सम्पन्नता में यहाँ के अनेक घुमन्तु समुदायों का बड़ा हाथ है। इन समुदायों के लोग विभिन्न धार्मिक नायकों एवं कथानकों को गाकर भिक्षा वृति कर जीवन यापन करते रहे हैं। इनमें देवार, वासुदेवा, जोगी आदि समुदाय प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त बाहर राज्यों से इस क्षेत्र में आकर कथा गायन करने वालों में गोरखनाथ सम्प्रदाय के नाथ जोगी मत्वपूर्ण हैं। एक समय गोरखनाथ सम्प्रदाय का प्रमुख केंद्र गोरखपुर कौसल राज्य का अंग था और छत्तीसगढ़ का मध्य-पूर्वी भाग इसी राजीके अधीन था, जिसे दक्षिण कौसल कहा जाता था। अतः एक ही राज्य की सीमा में गोरखपंथी जोगियों का भ्रमण स्वाभाविक ही था।

 

गोरखनाथ या गोरक्षनाथ नाथ योगी थे। ऐतिहासिक रूप से उनके जीवन काल का समय विवदित है, परन्तु इस बात पर लगभग सहमति है कि वे दसवीं शताब्दी से पहले हुए हैं। गोरखनाथ ने समूचे भारत का भ्रमण किया और अनेकों ग्रन्थों की रचना की। उनका मन्दिर उत्तरप्रदेश के गोरखपुर नगर में स्थित है। गोरखनाथ के नाम पर ही इस स्थान का नाम गोरखपुर पड़ा। गोरखनाथ का मानना था कि योगी का परम लक्ष्य सिद्धियों के पास जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही होना चाहिए। हठयोगी प्रकृति को चुनौती देकर उसके सारे नियमों से मुक्त हो जाता है। वह अदृश्य प्राकृतिक सत्ता को लाँघकर परम शुद्ध प्रकाश हो जाता है।

 

गोरखनाथ के हठयोग की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले सिद्ध योगियों ने गोरखवाणी का प्रचार-प्रसार किया था। यह एकेश्वरवाद पर बल देते थे- ब्रह्मवादी थे तथा शिव के अतिरिक्त कुछ भी सत्य नहीं मानते थे। एक मान्यता के अनुसार नौ नाथ योगियों का क्रम इस प्रकार है मत्स्येन्द्र अथवा मछंदरनाथ, गोरखनाथ, गहिनीनाथ, जालंधरनाथ, कृष्णपादनाथ, भर्तृहरिनाथ, रेवणनाथ, नागनाथ और चर्पटनाथ।

सिद्धों की भोग-प्रधान योग-साधना की प्रतिक्रिया के रूप में आदिकाल में नाथपंथियों की हठयोग साधना आरम्भ हुई। इस पंथ को चलाने वाले मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ) तथा गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) माने जाते हैं। इस पंथ के साधक लोगों को योगी, अवधूत, सिद्ध, औघड़ कहा जाता है।

भारत में नाथ योगियों की परंपरा बहुत ही प्राचीन रही है। नाथ समाज भगवान शंकर को आदिनाथ और दत्तात्रेय को आदिगुरु मानता है। इन्हीं से आगे चलकर नौ नाथ और 84 नाथ सिद्धों की परंपरा शुरू हुई। नाथ बाबा कमंडल, चिमटा धारण किए हुए जटाधारी होते हैं।

पूर्व में इस समप्रदाय का विस्तार असम और उसके आसपास के इलाकों में ही सिमित रहा, बाद में समूचे प्राचीन भारत में इनके योग मठ स्थापित हुए।

गोरखनाथ के हजारों शिष्यों ने विश्व भर में घूम-घूम कर धूना स्थान निर्मित किए। इन्हीं शिष्यों से नाथों की अनेकानेक शाखाएं हो गईं।

Gorakhpanthi Balakdas Jogi

Image: Wandering Gorakhpanthi, Balakdas Jogi in Chhattisgarh.

भारतीय सनातन धर्म के वर्तमान स्वरूप की नींव आदिगुरू शंकराचार्य ने रखी थी। शंकर का जन्म ८ वीं शताब्दी के मध्य में हुआ था जब भारतीय जनमानस की दशा और दिशा बहुत बेहतर नहीं थी। ऐसे में शंकराचार्य ने सनातन धर्म की स्थापना के लिए कई कदम उठाए जिनमें से एक था देश के चार कोनों पर चार पीठों का निर्माण करना। यह थीं गोवर्धन पीठ, शारदा पीठ, द्वारिका पीठ और ज्योतिर्मठ पीठ। इसके अलावा आदिगुरू ने मठों-मन्दिरों की सम्पत्ति को लूटने वालों और श्रद्धालुओं को सताने वालों का मुकाबला करने के लिए सनातन धर्म के विभिन्न संप्रदायों की सशस्त्र शाखाओं के रूप में अखाड़ों की स्थापना की शुरूआत की।

भारत की आजादी के बाद इन अखाड़ों ने अपना सैन्यचरित्र त्याग दिया। इन अखाड़ों के प्रमुख ने जोर दिया कि उनके अनुयायी भारतीय संस्कृति और दर्शन के सनातनी मूल्यों का अध्ययन और अनुपालन करते हुए संयमित जीवन व्यतीत करें। इस समय १३ प्रमुख अखाड़े हैं, जिनमें प्रत्येक के शीर्ष पर महन्त आसीन होते हैं। इन प्रमुख अखाड़ों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार हैं,

१. श्री निरंजनी अखाड़ा

२. श्री जूना दत्तया जूनाअखाड़ा

३. श्री महानिर्वाण अखाड़ा

४. श्री अटल अखाड़ा

५. श्री आह्वान अखाड़ा

6. श्री आनंद अखाड़ा

७. श्री पंचाग्नि अखाड़ा

८. श्री नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा- यह अखाड़ा ईस्वी ८६६ में अहिल्या-गोदावरी संगम पर स्थापित हुआ। इनके संस्थापक पीर शिवनाथ जी हैं। इनका मुख्य दैवत गोरखनाथ है और इनमें बारह पंथ हैं। यह संप्रदाय योगिनी कौल नाम से प्रसिद्ध है।

९. श्री वैष्णव अखाड़ा

१०. श्री उदासीन पंचायती बड़ाअखाड़ा

११. श्री उदासीन नया अखाड़ा

१२. श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा

१३. निर्मोही अखाड़ा

श्री नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा की ही परंपरा में है गोरखपुर स्थित गोरखनाथ सेवा संसथान तथा गोरखपंथी जूना अखाड़ा। इसी अखाड़े से सम्बद्ध जोगी भारत के अनेक प्रांतों में गोरखनाथ की अलख जागते घुमते रहते हैं। इन्हीं की किसी शाखा के जोगी सदियों छत्तीसगढ़ के गांव-गांव घूम कर गोरखपंथी परंपरा से सम्बंधित कथा गीत सुनाकर इन कथागीतों में वर्णित चरित्रों को अजर अमर बनाये हुए हैं।