डॉ. राजेन्द्र सिंह/ Dr Rajinder Singh

Dr. Rajinder Singh holds an MA in Anthropology and Sociology, and did his Doctoral Research on Adivasi traditions of Bastar. He is based in Jagdalpur, Chhattisgarh.

 

संपूर्ण विश्व में मानव संस्कृति व सभ्यता का उद्भव व विकास नदियों के किनारे ही हुआ है। इसी कारण मानव समुदाय के जीवन व संस्कृति में नदियों का विशेष स्थान है। भारत के मध्य-पूर्व क्षेत्र में स्थित छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिण में स्थित बस्तर संभाग के मध्य में प्रवाहित इंद्रावती, इस क्षेत्र की एक प्रमुख नदी है। अपने प्रवाह से मानव समुदायों, वन तथा जीव-जंतुओं को जल संपदा से परिपूर्ण कर जीवन संचरण में सहायक होने के कारण बस्तर तथा उड़ीसा राज्यों में इसे ‘जीवनदायनी’ या ‘जीवनरेखा’ या ‘लाइफलाइन’ की संज्ञा दी जाती है।

इंद्रावती नदी का उद्गम उड़ीसा राज्य में ईस्टर्न घाट के दंडकारण्य रेंज में कालाहांडी ज़िला अंतर्गत धरमगढ़ तहसील के रामपुर थूयामूल के निकट डोंगरला पहाड़ी पर 3000 फीट की ऊँचाई पर हुआ है। इंद्रावती नदी, का प्रवाह पूर्व से पश्चिम की ओर है। इंद्रावती नदी, अपने उद्गम के बाद उड़ीसा से छत्तीसगढ़ राज्य में प्रवेश करती है तथा छत्तीसगढ़ राज्य के अंतिम पश्चिमी छोर से यह दक्षिण की ओर प्रवाहित होती हुई छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र-तेलंगाना राज्य की सीमा पर बीजापुर जिले के भद्रकाली नामक ग्राम के समीप गोदावरी नदी में मिलती है। इंद्रावती नदी, अपनी लंबाई का लगभग एक तिहाई भाग उड़ीसा राज्य में तथा लगभग दो तिहाई भाग बस्तर में प्रवाहित होती है। अपने उद्गम से गोदावरी संगम तक इंद्रावती नदी 535 किमी लंबा सफ़र तय करती है, जिसमें से उड़ीसा राज्य के कालाहांडी, नवरंगपुर तथा कोरापुट ज़िले में 164 किमी, छत्तीसगढ़ व उड़ीसा राज्य सीमा पर 9.5 किमी तथा छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर, दाँतेवाड़ा, बीजापुर जिले में 233 किमी एवं छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र राज्य सीमा पर 129 किमी प्रवाहित होकर गोदावरी नदी में मिलती है।

 

प्रमुख सहयोगी नदियाँ व नाले

इंद्रावती नदी की 30 से अधिक सहायिका नदियाँ व नाले हैं। इंद्रावती नदी की उत्तरी सहयोगी नदियों में भवरडीग, नारंगी, निबरा, कोटरी, गुडरा, गोइंदर, भसकेली प्रमुख हैं तथा दक्षिणी सहयोगी नदियों में चिंतावागु, शंखिनी, डंकिनी, नंदीराज, चिंतावागु आदि नदियाँ प्रमुख हैं।

 

उद्गम संबंधी पौराणिक मिथक

इंद्रावती नदी का उल्लेख अनेक प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में पाया जाता है। इसे रामायण में वर्णित तीन मंदाकिनी नदियों में से एक कहा गया है। बस्तर के अभिलेखों (धारण महादेवी का कुरूसपाल अभिलेख, Epigraphia Indica, Vol. X, No. 31) में इसे इंद्र नदी कहा गया है। एक हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार इंद्रावती नदी का उद्गम स्वर्ग के राजा इंद्र, उनकी पत्नी इंद्राणी के पृथ्वी पर भ्रमण तथा प्रेयसी उदंती से संबंधित बताया गया है।

 

प्रागैतिहासिक विवरण

इंद्रावती नदी के किनारे प्रागैतिहासिक काल के अवशेष भी प्राप्त होते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि इंद्रावती नदी क्षेत्र प्राचीन मानव का आश्रयस्थल रहा है। बस्तर संभाग के अनेक स्थलों पर इंद्रावती नदी के किनारे प्रागैतिहासिक कालीन पाषाण उपकरण प्राप्त होते हैं। इनमें जगदलपुर के समीप स्थित कालीपुर, माटेवाड़ा, घाटलोहंगा, देउरगांव, करंजी, चित्रकोट आदि क्षेत्र से पूर्व पाषाणकाल, पाषाणकाल तथा उत्तर पाषाणकालीन उपकरण प्राप्त होते हैं।

 

ऐतिहासिक विवरण, प्रमुख शहर व गाँव तथा उनकी ऐतिहासिकता

बस्तर क्षेत्र में इंद्रावती नदी अपने आँचल में इतिहास को समेटे हुये हैं। बस्तर में नल, गंग, नाग तथा काकतीय नामक राजवंशों ने शासन किया है। जिनके राज्य का विस्तार इंद्रावती नदी के दोनों ओर रहा है। इन राजवंशों में गंग राजवंश की राजधानी इंद्रावती नदी के किनारे पर स्थापित बारसूर नगर मंदिरों तथा तालाबों के लिये प्रसिद्ध है।

नाग वंश के शासनकाल में उनके राज्य को चक्रकोट्य मंडल तथा मधुर मंडल के नाम से जाना जाता था, यह राज्य इंद्रावती नदी के किनारे ही स्थापित था। चक्रकोट्य मंडल की राजधानी कुरूसपाल तथा मधुर मंडल की राजधानी राजपुर चित्रकोट जलप्रपात के समीप स्थित है। चित्रकोट जलप्रपात के समीप स्थित नारायणपाल नामक ग्राम 11वीं सदी में बने विष्णु मंदिर के लिये प्रसिद्ध है।

बस्तर के सबसे प्रमुख चालुक्य (काकतीय) राजवंश ने लगभग 600 वर्ष शासन किया। इस रियासत का विस्तार उड़ीसा से बस्तर क्षेत्र में इंद्रावती नदी के अधिकांश प्रवाह क्षेत्र में रहा है। इनके द्वारा स्थापित राजधानी बारसूर, मधोता, कुरूसपाल, राजपुर तथा जगदलपुर इंद्रावती नदी के किनारे स्थित है। जगदलपुर शहर इंद्रावती नदी के किनारे स्थित सबसे प्रमुख शहर है।

 

नदी किनारे निवासरत प्रमुख मानव समुदाय

इंद्रावती नदी के बस्तर प्रवाह क्षेत्र में मैदानी, पठारी तथा पहाड़ी क्षेत्र आते हैं। जिसमें अनेक मानव समुदाय निवास करते हैं। इंद्रावती नदी के बस्तर प्रवेश क्षेत्र में भतरा, हल्बा, सवरा, माहरा, पनका, कुम्हार समुदाय, मध्यवर्ती क्षेत्र में राजा मुरिया, भतरा, माड़िया, दंडामी माड़िया, हल्बा, मुंडा, कुडुख, केंवट, धाकड़, सुंडी, महारा आदि तथा मध्यवर्ती क्षेत्र से संगम तक माड़िया, दंडामी माड़िया, हल्बा, गोंड, दोरला, परधान, राजगोंड, सुंडी, कोष्ठा, केंवट, राउत, महार, तेलंगा आदि जनसमुदाय निवास करता है।

 

नदी पर आजीविका के लिये आश्रित समुदाय

बस्तर में इंद्रावती नदी के मैदानी क्षेत्र में बसे में बसे भतरा, हल्बा, मुरिया आदि मानव समुदाय की आजीविका कृषि आधारित है। इस क्षेत्र में पर्याप्त मानसूनी वर्षा तथा इंद्रावती नदी के कारण भूमिगत जल का ऊँचा स्तर बहुफ़सली कृषि हेतु आदर्श स्थिति प्रदान करता है। इंद्रावती नदी के किनारे निवासरत कुडुख व केंवट समुदाय की आजीविका नदी पर आश्रित है। इन परिवारों के सदस्य का मुख्य कार्य नाव चलाना तथा मछली मारना है। वे छोटी-छोटी डोंगियों पर ग्रामीणों को नदी पार कराते हैं व पारिश्रमिक प्राप्त करते हैं। इसी प्रकार अनेक समुदाय के स्त्री-पुरूष सदस्य मछली मारने का कार्य करते हैं।

 

इंद्रावती के जलीय जीव-जंतु

इंद्रावती नदी के प्रवाह क्षेत्र में अनेक जलीय जीव जंतुओं का वास है। जिसमें विविध प्रकार की मछलियाँ, केकड़े, कछुआ, जलीय सर्प, मगर आदि हैं। छत्तीसगढ़ के प्रवाह क्षेत्र में चित्रकोट जलप्रपात के पश्चात् बिंता से मिचनार तक मगर का प्राकृतिक रहवास है। इस क्षेत्र में इंद्रावती नदी में बोध मछली पायी जाती है। ‘बस्तर की शार्क’ के नाम से प्रसिद्ध यह मछली 150 किलो तक वज़नी होती है।

 

वनस्पति तथा थलचर

इंद्रावती नदी सिंचित भू-क्षेत्र में विपुल वन संपदा पाया जाता है। इंद्रावती नदी मैदानी भाग में चित्रकोट जलप्रपात तक साल वृक्षों के वन पाये जाते हैं। चित्रकोट जलप्रपात के पश्चात् संगम स्थल तक मिश्रित प्रजाति के सघन वन पाये जाते हैं। जिसमें साल, सागौन, हर्रा, बीजा, बेहड़ा, अर्जुन, शीशम, तेंदू, आम, महुआ आदि के वृक्ष हैं। इन वनों में शेर, बाघ, भालू, हिरण, नीलगाय, मोर, वनभैंसा, खरगोश आदि अनेक वन्य प्राणी तथा विविध प्रजाति के पक्षी पाये जाते हैं।

बीजापुर जिले में इंद्रावती नदी के किनारे 2799 वर्ग किमी में फैले इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना सन् 1975 में की गयी तथा सन् 1983 से इसे प्रोजेक्ट टाइगर के अंतर्गत शामिल किया गया है।

 

जलप्रपात

इंद्रावती नदी, बस्तर जिला मुख्यालय से पश्चिम दिशा में 40 किमी दूरी पर चित्रकोट नामक स्थल पर एक विशाल जलप्रपात का निर्माण करती है। यहाँ इंद्रावती नदी 96 फीट ऊँचे, विशाल जलप्रपात के रूप में गिरती है। चित्रकोट जलप्रपात का आकार घोड़े की नाल के समान है। इसका स्वरूप कनाडा के विशाल नियाग्रा जलप्रपात के सदृश होने के कारण इसे ‘भारत का नियाग्रा’ कहा जाता है। यह छत्तीसगढ़ राज्य का सबसे बड़ा, सबसे चौड़ा तथा सर्वाधिक जल प्रवाहित करने वाला जलप्रपात है। चित्रकोट जलप्रपात वर्षाकाल में मटमैला तथा विशाल जलराशि युक्त, शीत व ग्रीष्मकाल में स्वच्छ जलयुक्त शांत व शीतल होता है। सूर्य के प्रकाश तथा प्रपात में गिरने से उत्पन्न जलबिंदूओं के परावर्तन से बनने वाला इंद्रधनुष चित्रकोट जलप्रपात के प्रेक्षकों का मनमोह लेता है।

 

संगम

इंद्रावती नदी अपने उद्गम से उड़ीसा राज्य तथा छत्तीसगढ़ की प्रवाह यात्रा पूर्ण कर छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र-तेलंगाना राज्य की सीमा पर बीजापुर जिला के भोपालपट्नम तहसील के भद्रकाली नामक ग्राम के समीप गोदावरी नदी में मिलती है।

  

संकट

वर्तमान में उडीसा-छत्तीसगढ़ सीमा के समीप प्रवाहित जोरा नाला के कारण इंद्रावती नदी का अस्तित्व संकट में है। जिसके कारण इंद्रावती नदी का जल सबरी नदी में प्रवाहित हो रहा है। इससे ग्रीष्मकाल में इसका सतत प्रवाह खंडित हो जाता है। रेत उत्खनन, तट पर शवदाह, गंदगी, कचरा फेंकने, प्रदूषित व गंदे जल की निकासी व निरंतर बढ़ते प्रदूषण के कारण नदी अपने स्वरूप को खो रही है।

 

विकासीय परिदृश्य

दांतेवाड़ा जिले के बारसूर क्षेत्र में इंद्रावती नदी पर ‘बोधघाट परियोजना‘ नामक एक वृहत बाँध परियोजना का निर्माण किया जा रहा था, किंतु पर्यावरण संबंधी आपत्तियों के कारण इसे रोक दिया गया है। बस्तर जिले के जगदलपुर के समीप इंद्रावती नदी के किनारे नगरनार में एन.एम.डी.सी. (National Mineral Development Corporation) द्वारा वृहत् स्टील प्लांट स्थापित किया जा रहा है। इंद्रावती नदी के जल संसाधन के उपयोग हेतु उड़ीसा राज्य में खातीगुड़ा बाँध बनाया गया है। इसे सतत प्रवाहमान बनाये रखने, सिंचाई सुविधाओं के विकास, जलापूर्ति तथा भूजल स्तर को बनाये रखने के उद्देश्य से नगरनार से चित्रकोट तक नौ एनीकट (Anicut) का निर्माण किया गया है। यातायात सुविधाओं के विकास के लिये इंद्रावती नदी पर अनेक पुलों का निर्माण किया गया है।

 

निष्कर्ष

इंद्रावती नदी का उद्गम से संगम तक का सफर विविध भौगोलिक परिदृश्य, परिवेश, समुदाय व संस्कृति के मध्य प्रवाहमान होकर पूर्ण होता है। इंद्रावती नदी, अपने जलसिंचन क्षेत्र में भौगोलिक परिदृश्य, मानव तथा उसके जीवन, वन तथा पर्यावरण के बदलते स्वरूप की साक्षी रही है। वर्तमान में इंद्रावती नदी प्राकृतिक तथा मानवीय कारणों से अपना मूल स्वरूप खो रही है। इंद्रावती नदी के जल का अन्यत्र प्रवाह, बाँध, एनीकट, व्यापक जलदोहन आदि के कारण इसका अविरल जलप्रवाह ग्रीष्मकाल में बाधित होता है। इंद्रावती नदी की यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक एवं भविष्य के लिये संकटकारी है। जन, शासन एवं प्रशासन का निरंतर, सामूहिक, समन्वित प्रयास ही इंद्रावती नदी के संकट का निवारण कर सकता है।

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.