हज़ार रूपों और हज़ार कहानियों वाला संताली वाद्ययंत्र ‘बानाम’

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Published on: 13 July 2020

अश्विनी कुमार पंकज

अश्विनी कुमार पंकज एक प्रसिद्ध कथाकार, सांस्कृतिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र शोधकर्ता हैं। वह मुख्य रूप से आदिवासी कला-संस्कृति, इतिहास और साहित्य पर लिखते हैं। 'पेनाल्टी कॉर्नर', 'मरंङ गोमके जयपाल सिंह मुंडा', 'माटी माटी अरकाटी' और 'आदिवासियत' उनकी लोकप्रिय पुस्तकें हैं। वह 14 आदिवासी और क्षेत्रीय भाषाओं वाले एक पाक्षिक अखबार ‘जोहार दिसुम ख़बर’ और त्रैमासिक कला पत्रिका ‘रंगवार्ता’ का प्रकाशन-संपादन करते हैं।

संताल आदिवासियों का ष्बानामष् दुनिया का एक ऐसा वाद्ययंत्र है जिसके हज़ारों रूप हैं और जो अपनी कहानी के अलावा और भी हज़ारों कहानियां सुनाता है।  यानी यह एक ऐसा लोककथात्मक आदिवासी वाद्य है जिसकी कोई दूसरी कॉपी नहीं होती। इसलिए कि प्रत्येक बानाम अपनी बनावट और रूप.रंग में एक.दूसरे से बिल्कुल भिन्न होता है। अर्थात् हर संताल जो बानाम बजाना चाहता है उसे अपना बानाम खुद बनाना पड़ता है। इसी वजह से किसी एक बानाम की डिजाइन दूसरे बानाम से नहीं मिलती। आदिवासी संगीत व काष्ठ कला परंपरा और आदिवासियत की विरासत से जुड़ा हुआ यह वाद्य संताल आदिवासियों के आध्यात्मिकए सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन का एक अभिन्न अंग है। यह आदिम और लोकप्रिय तार वाद्ययंत्र आकार.प्रकार में ष्इकताराष्ए ष्सारंगीष् या ष्वायलिनष् जैसा दिखता है परंतु रूप और ध्वनि में इन सबसे भिन्न होता है। इसे बजाते हुए संताल कलाकार पुरखा कहानियोंए मिथकीय गाथाओं और गीतों का गायन करते हैं। यानी ष्बानामष् एक लोकवाद्य भी है और लोककथा भी।

प्रस्तुत मॉड्यूल में तीन लेख शामिल हैं। पहले लेख में बानाम और उसको प्रयोग करने वाले संताल आदिवासी समुदाय का परिचय दिया गया है। दूसरा लेख बानाम के मिथकीयए ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पक्ष पर केन्द्रित है जबकि तीसरे में बानाम के डिजाइनों सहित उसके निर्माण के बारे में सचित्र विवरण प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।