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पंथी गीत

पंथी गीत 1

सत से धरती टिके है, सत से खड़े अगास।

सत से सृष्टि सिरजे, कह गये घासीदास।

 

1. जगमग जोत जलय हो सतनाम के मंदिर म...

नाम के मंदिर म सतनाम के मंदिर म... जगमग जोत जलय हो...

काकर घर परे निस अंधयरियां काकर अंगना दियना बरय हो...

मुरख अंगना निस अंधयरियां

ज्ञानी के अंगना दियना बरय हो...

2. काकर घर म बिस के लहरा

काकर घर म अमरित चुहय हो...

 

भावार्थ

सत्य से धरती स्थिर है और सत्य से सूरज प्रतिदिन अपने कर्म पर रत है। इसी तरह पूरी सृष्टि या ब्रह्मांड सत्य से सृजित है। सत्य या सकरात्मक तत्व न हो, तो किसी चीज का सृजन संभव नहीं है। न ही सदा के लिए उनका स्थिर रहना संभव है। सत्य सार तत्व है। अतः सतनाम ही सार है। गुरु घासीदास  कहते है कि सतपुरुष पिता के द्वारा सृजित घट-रूपी मंदिर में सतनाम-रूपी दीप निरंतर जगमग करते जल रहे हैं। हालांकि, अज्ञानता और मूर्खता के कारण वहां अंधेरा व्याप्त है। वहां न तो कुछ दिख रहा है और न ही सद्विचार सूझ रहे हैं, जबकि ज्ञानी लोगों के घर सदैव प्रकाशवान होते हैं। आगे की पंक्ति में वह कहते हैं कि जो अधर्मी या पापी हैं, उनके घर में वासना-रूपी विष का लहरा है। इस वजह से ऐसे घर-परिवार, समुदाय मृतप्राय हैं, जबकि धर्मी और पुण्यात्मा लोगों के घर में सदैव अमृत वर्षा होती है। अर्थात् वे सजीव व जागृत रहते हैं। इसके फलस्वरूप सफलता उनके कदम चूमती है। इसलिए हे संत जन, सदैव, ज्ञान, पुण्य और धर्म को आत्मसात करो। इससे सदैव उन्नति करते सुख को प्राप्त करोगे।

 

 

पंथी गीत 2

साखी- घासीदास घनघोर गुरु पग बंदव कर जोर

भूले सुध सुरता दिहव, गुरु मोर सबद कहंव तोर

मय कहंवा ल लानव हो आरुग फुलवा

क इसे मंय चढावंव साहेब आरुग फुलवा

 

1. बगिया के फूल ल सबो भौंरा जुठारे हे साहेब

कहां ले आरुग फूल लान के चढावंव साहेब

2. गाय के गोरस ल बछरू जुठारे हे

कहां के आरूग गोरस लानव साहेब

3. कोठी के अन्न ल सुरही जुठारे हे

कहां के आरुग चाउर के तस्म ई बनानंव साहेब

4. नदिया के पानी ल मछरी जुठारे हे

कहा के आरुग जल मय लानव साहेब

5. आरूग हवे हमर हिरदय के भाव साहेब

ओही ल सरधा से तोर चरन म चढावंव साहेब

 

भावार्थ

हे सदगुरु, आप हमारे श्रेष्ठ गुरु हैं। इसलिए हाथ जोड़कर आपकी चरण वंदना कर रहा हूं। साथ ही यह विनती है कि मुझे पूर्ण स्मृति करावें, ताकि आपके शब्द को यथावत ज्यों की त्यों अभिव्यक्त कर सकूं।

 

मैं आपकी पूजा अर्चना कैसे करूं, कौन से और कैसे फूल आपके चरणों में समर्पित करूं, क्योंकि समस्त वनों, उद्यानों में खिलने वाले फूल अपवित्र हैं। उन्हें भंवरे ने जूठे कर दिए है। अतः वे जूठे व अपवित्र फूल आपके योग्य नहीं हैं। इसी तरह, गाय के दूध को बछड़े ने जूठा कर दिया है। अन्नागार में रखे अन्न सुरही नामक कीट-पंतगे द्वारा जूठे कर दिए गए। आपके भोग हेतु तस्मै, चीला, रोठ आदि नहीं बनाए जा सकते, क्योंकि ये जूठे और अपवित्र वस्तु आपके योग्य नहीं। आगे गुरु बाबा कहते हैं कि सागर, नदी-नाले, कुएं, तालाब के जल को मगरमच्छ और मछलियों ने जूठे कर दिए हैं। अर्थात जल भी अपवित्र हो गए, जो आपके योग्य नहीं हैं।

 

अतएव, इस दुनिया में ऐसी वस्तु या द्रव्य नहीं है, जो पवित्र हो और जिसे मैं आपको समर्पित कर सकूं। थोड़ी असमंजस के बाद गहराई से विचारकर कहते हैं कि इस हृदय और मन में उत्पन्न विचार या भाव ही पवित्र है, जो अभी व्यक्त नहीं हुआ है। ऐसे पवित्र भाव को मैं आपके चरणों पर समर्पित करता हूं।

 

 

पंथी गीत 3

बीजमंत्र सतनाम है, संत हिरदय सो खेत

अधर नागर चलावहि, सद्गुरु साहेब सेत

करमा बने हे, धरमा बोये हवय धान

नाम के नंगरिहा, चलय खेत जोते सियान

बल-रूपी बइला चाप-रूपी नांगर

धरम धरती के उपर रेंगे दुमन आगर

छरिया होइगे हैरान, गाभी बने हे गुमान

बु़द्धि के बियासी अउ नियम के निंदाई

प्रेम-रूपी पांत धरे चाल हे चलाई

पानी भरे हवे परान, ग्यान गंगा समान

सत रूपी सफरी हे मन मंदुरिया धान

बुद्धि दूबराज, बाको गुन गुरमटिया समान

धान लुवत हे किसान होवय देश महान

 

 

भावार्थ

सतनाम ही बीज-रूपी महामंत्र हैं और संत पुरुष हृदय ही खेत हैं।

 

सद्गरु की कृपा से मनभावन लहलहाती फसल उपजेंगी। हे संत, जन-भाव भजन में ही चेत लगावें, ध्यान लगावें। कृषि वृत्ति द्वारा बाबा जी इस भजन के माध्यम से जनमानस को उपदेश देते कहते हैं कि सतरुपी पुरुष ही कुशल किसान बनकर इस संसार में धर्म-रूपी धान बो रहे हैं।

 

यहां सतनाम धारी हल चलाने निकल पड़े हैं। उनके पास पुरुषार्थ-रूपी बैल हैं, जो धर्म-रूपी धरती पर तेज गति से चल रहे हैं। तेजी से धान बोवते देख कर उन्हें सिंचित करने वाले दरिया, नदी, तालाब हैरान हैं कि कैसे इतने विशाल क्षेत्र को सिंचित कर सकेंगे। गाभी अर्थात् खेत का उपजाऊपन बडे ही गर्व से अपने अंदर स्वाभिमान भर रहे हैं कि इसे बेहतर तरीके से संवारेंगे। सारे खरपतवार निकाल दिए गए हैं। हर चीज प्रेम-पूर्वक आबद्ध है। कोई चीज अस्त-व्यस्त नहीं है। चाक-चौबंद होकर धर्म-रूपी कृषि कार्य निष्पादित हो रहे हैं। सद्गुरु ही सफल कृषक हैं। प्राण-रूपी पानी लबालब भरा हुआ है। ज्ञान की गंगा अनवरत प्रवाहमान है। ऐसे सम और सुखद संयोग से धान की बालियां लहलहा रही हैं। देखिए, उधर बुद्धि-रूपी दूबराज धान अपनी सुगंध फैला रहे हैं और इधर गुण-रूपी गुरमटिया धान भी इठालाने-झुमने लगे हैं। इस तरह सदगुरु इस महान देश में धर्म-रूपी धान उगाकर सर्वत्र सुख, शांति और सत्य का विस्तार कर रहे हैं।

 

 

पंथी गीत 4

साखी - प्रथम गुरु को सुमरनि जिहि रचि जहान

पानी से पैदा हुए कि सतपुरुष निरवान

सतपुरुष एक वृक्ष बने निरंजन भइगे डार

तीन देव साखा भये कि पन्ना भये संसार

मुखड़ा - सुमरन गांवव तोर बंदना ल गांवव तोर

घासीदास बाबा पंइया परत हवन तोर

यह संसार जलारंग भारी

कइसे उत्पति सृष्टि बिस्तारी

तंय बता दे गुरु मोर ज्ञान लखा दे गुरु मोर

जीव-जन्तु से भरे संसारा

अपनेच सख से करे निस्तारा

हद में बंधे फिरे चहुं ओर

हद छोड़ गये जो अन हद

पावै दुःख पीड़ा बड़ बिपत

सतनाम सुमरन मुकति हे तोर

 

 

भावार्थ

सद्गुरु ने इस सुन्दर व भव्य संसार की रचना की है। यह संसार पानी से उत्पन्न है और सतपुरुष ही समस्त चराचर का संचालन कर रहे हैं और सभी अपनी सीमाओं में आबद्ध हैं। सतपुरुष एक विशलकाय वृक्ष हैं। तना निरंजन हैं और शाखा त्रिदेव हैं। त्रिदेव अर्थात् ब्रम्हा, विष्णु व महेश भारतीय संस्कृति की तीन शाखाएं हैं। हालांकि, सभी के जड़ बीज सतनाम ही हैं और उस वृक्ष के अनगिनत असंख्य पत्ते ही यह संसार और जनमानस है। हे सदगुरु, गुरुघासीदास हम आपके शरणागत है। आपका सुमिरन कर रहे हैं। वंदना गा रहे हैं। आप ज्ञानी हैं। कृपया, हमारी शंकाओं का समाधार करें कि यह संसार और इसकी विविधताओं की रचना कैसे हुई, किसने किया। गुरु घासीदास कहते हैं कि इस सृष्टि का विस्तार सागर से है। यह संसार पहले जलमग्न था। धीरे-धीरे इनमें सप्तद्वीप नव खंड उभरे और उनमें आद्रज, उष्मज, पिंडज और अंडज चार राशियों में जीव-जन्तु की उत्पत्ति हुई। इन जीव-जन्तुओं से संसार भरा और परस्पर द्वंद हुए पर जो शक्तिशाली बलशाली रहे, वह टिके रहे। प्रत्येक चीज प्राकृतिक नियमों से आबद्ध है। जिन्होंने हद पार किए, उनका विनाश हुआ और वे दुःख-पीड़ा एवं संकट से ग्रसित रहे। इन संकट से, दुःख से मुक्ति सतनाम सुमिरन और ज्ञानार्जन से ही संभव है।

 

 

पंथी गीत 5

साखी - डोंगरी उपर जाइके सत म धियान लगाय

सब संतन सकेल के गुरु

गुप्त भेद बतियाय

तंय तो राधि डारे जेवन हो आगी के बिना

आगी के बिना साहेब पानी के बिना दूसरे व्यक्ति

तन कर चूल्हा मन कर आगिन ज इल्या हो

देखो अजब रसोइय्या

हिया कर हड़िया भक्ति करि भात चित्त के चेटवा चल इय्या हो

चित्त के चेटुआ च लौय्या हो

बरी बैराग बरम कर बटकर

करम करेला तरोइरुया हो

दया के दाल-भाव के भाजी

चटनी चाल चतुर इय्या हो

आदत के आमा, आचार विचार के

पतरी प्रेम परसोइय्या हो

घट कर धींव विस्वास सुपारी

सरधा सवांस सहरैय्या हो

घासी दास गुरु के गारी गावै

सद्गुरु हवे जेवनइय्या हो

 

भावार्थ

पहाड़ी की शिखर पर अपने विशिष्ट शिष्यों को अपने साथ ले जाकर गुरु घासीदास ने सतनाम पर ध्यान लगाकर उन शिष्यों को और उपस्थित जनसमूह को सतनाम के गुप्त ज्ञान को सार्वजनिक किया। लोगों को अवगत कराया, जिससे उनकी क्षुधा मिट गई। वे सब तृप्त हो संतत्व को प्राप्त हुए। इस प्रसंग से आह्लादित संत गा उठे।

 

देखो-देखो हमारे कुशल रसोइए ने कैसे बिना आग और पानी का भोजन बनाया और हम सभी को प्रेम पूर्वक परोसकर खिलाकर तृप्त किया। तन-रूपी चूल्हे में मन की आग जलाया, हृदय-रूपी हांडी में भक्ति-रूपी भात पक रहे हैं। दया का दाल व भाव की भाजी पकाई जा ही है। चतुराई-रूपी चटनी तीखी है, जो भोजन को स्वादिष्ट व चटपटा बना रही है। आदत-रूपी आम का अचार बना है, विचार का छौंक भी उसमें समाहित है। स्वाभाव का और विचार ही सजकर स्वादिष्ट आचार बना है। प्रेम-रूपी पत्तल बिछा है और सदगुरु उसमें यह सब सामाग्री परोस रहे हैं। घी डाले गए हैं, जिसकी सुगंध सुवासित है। विश्वास-रूपी पान-सुपाड़ी है। लौंग इलायची सुगंधित सुवास है, जो प्रशंसनीय है। संतजन घासीदास गुरु की यह प्रशंसा गा रहे हैं। वे ऐसे अजब रसोइया हैं जो बिना आग और पानी के स्वादिष्ट भोजन पकाकर, संतजनों को प्रेम-पूर्वक ज्ञान-भोग कराकर मानसिक क्षुधा को संतृप्त किए हैं।

 

 

पंथी गीत 6

गाड़ी अटके रेत म ब इला अटके घाट

हंसा अटके सतनाम बिना सद्गुरु लगावे पार

चल चलो हंसा अम्मरलोख जाइबोन

इंहा हमर संगी कोनो न इये हो

एक संगी हवे बर बिहाई

देखे म जियरा जुड़ाथे

ओहू तिरई बनत भरके

मरे म दुसर बनाथे

एक संगी हवे कुख कर बेटवा

देखे म धोंसा भुताथें

ओहू बेटा बनत भर के

बहु आये ले बहुराथे

एक संगी हवय धन अउ लछमी

देखे म चोला लोभाथे

धन अउ लछमी बनत भर के

मरे म ओहू तिरियाथे

एक संगी हवे परभू सतनाम

पापी मन ल मनाथे

जनम मरन सबोदिन के

ओही सरग अमराथै

 

 

भावार्थ

नदी के किनारे रेत पर गाड़ी फंस गई है। उसमें जुते बैल को छोड़ देने पर वह घाट पर जाकर पानी पीने के चलते वहां फंस गए हैं। मतलब सभी अस्त-व्यस्त हैं। कोई कार्य निष्पादित नहीं हो रहा। मानव तन के हंसा सतनाम के बिना अटक कर मुसीबत में फंसे अनेक कष्ट पा रहे हैं। अब तो सदगुरु ही सहारा हैं जिनके कृपा से ही वह भवसागर पार कर सकता हैं। गुरु ही इनकी नैय्या पार लगाएंगे।

 

हे जीव, इस संसार में हमारा कोई नहीं है। एक मित्र बनाए और एक सुन्दर स्त्री से विवाह किए। कष्ट या मुसीबत आने पर ये अन्य आश्रय तलाश लेते हैं। अर्थात कोई सच्चा संगी नहीं है। इसके अतिरिक्त, कोख से जन्में पुत्र को देखकर हृदय तृप्त होता है कि चलो अपना कुछ तो है, जो सदा साथ देगा। पर यह क्या, बहू के आते ही वह हमें त्याग कर दूर चला जाता है। एक संगी संपत्ति भी है, जिससे लगता है कि इसके चलते मुझे कुछ नहीं होगा। हालांकि, मृत्यु होने पर इसका साथ छूट जाता है। कहने का आशय कि पत्नी, पुत्र, संपदा किसी काम नहीं हैं। ये मुसीबत में साथ छोड़ देते हैं। एक संगी सतनाम है, जिनकी निरंतर अराधना करने से अमरलोक जा सकते हैं।

 

 

पंथी गीत 7

साखी - तन के मोह छोड़ परन्दिा पिंजरा बिन ये मइना

मया म भुलाये सतनाम बिसारे काबर तय नयना

ये माटी के काया ह न ई आवय कछु काम

ये माटी के चोला ह न ई आवय कछु काम

तयं सुमर ले सतनाम

बाल पन सब खेल गवाये

भौंरा बांटी मे मन ल लुभाये

बितगे उमरिया तोर तमाम न इ जपे तंय सतनाम

आये जवानी रंग मातन लागे

गलियन खूब सुहावन लागे

सखी-संगी, मन भवन लागे

बीतगे उमरिया तोर तमाम

नइतो जपे तय सतनाम

तय सुमरले सतनाम

 

 

भावार्थ

हे हंसा, इस तन-रूपी पिजड़े का मोह छोड़ दे, क्योंकि यह पिजड़ा जीर्ण-शीर्ण हो चुका है। इसके प्रेम में फंस कर सतनाम को क्यों विस्मृत कर रहे हो! सतनाम ही तम्हें निर्वाण देकर मुक्त करेंगे। हे हंसा, रे मन, तू नित्य सतनाम का सुमिरन कर और सद्-मार्ग पर चल, क्योंकि यह नश्वर शरीर जो मिट्टी से निर्मित है, काम आने वाला नहीं है। केवल मिट्टी से मिट्टी मिल जाएगा। लड़कपन के खेल में उम्र खपा दिए। युवावस्था आते ही मदमस्त हो गए। घर-द्वार अच्छा नहीं लगता। परिजन और उनकी सीख नहीं सुहाते। अब तो चेत जाओ। सतनाम का सुमिरन करो और अपने जीवन को संवारो।

 

पंथी गीत 8

साखी- गुरु मिलन को जाइये तज माया अभिमान

ज्यों-ज्यों पग आगे धरत कोटिन यज्ञ समान

झन भुलावे बाबाके अम्मर कहानी ल

गले-गाले गुरु के गाथा सुहानी ल

अठरा दिसंबर सरता सो छप्पन अघ्घर पुन्नी गुरुवार ग

गिरौदपुरी म महंगू अमरौतिन घर गुरु लिन्ह अवतार ग

टू मन आगर होके सुनावंव गुरु के गाथा सुहानी ल

बलपन म महिमा दिखाए चिरई अउ बुधरू ल जिलाये

गरियार बइला ल आधु फांद के अधेर-अधर नागर चलाये

मुट्ठी भर बिजहा खाड़ी भर धनहा करे अजब किसानी ल

सफूरा संग बिहाव रचाए, ससुर के मान बढ़ाये तंय

कमती होइस भत बराती बर, झाल में हाथ लगाये तंय

देखत देखत झाल भरगे परगट अन्न कुवारी ह

बाहरा-खेत के मुंही म रहिस धुटवा भर पानी ग

उही पानी म टू ठिन मछरी बोलय अमरित बानी ग

दरस पाके घासी गुरु के तारिन अपन जिनगानी ल

 

भावार्थ

गुरु मिलन एक सकरात्मक अनुष्ठान की तरह है, जो मनोवांछित फल प्रदान करता है। हे संत जन, आप लोगों से करबद्ध प्रार्थना है कि महान गुरु की अमर कहानी को कभी न भूलें कि उन्होंने किन परिस्थितियों में मानव कल्याण के सूत्र तलाशे और लोगों को सदमार्ग पर लाया।

 

उनका जन्म 18 दिसम्बर 1756 को गुरुवार के दिन हुआ था। पिता का नाम मंहगू दास था, जबकि माता का नाम था मरौतिन। जिन्होंने जगत का भार उठाया, मानवता व सत्य को प्रतिष्ठित किया, उनकी गाथा को मैं गाकर सुना रहा हूं। उनकी महिमा अद्भुत थी। एक बार उन्होंने मृत घायल पंछी का इलाज कर, उसे नवजीवन दिया। ठीक उसी तरह, बुधारु के सर्पदंश का इलाज किया। मुठ्ठी भर बीज से पांच एकड़ में धान बोकर एक अप्रतिम कृषि कार्य को निष्पादित किया। अपने विवाह समारोह के दौरान भोजन कम पड़ा तो उन्होंने सबको तृप्त कर दिया। इसी तरह, एक दिन भ्रमण करते खेत के पानी में मछली को जोड़े को देखा तो उन्हें नदी में छोड़ आए। यह रूपक जीवों पर दया, अहिंसा व सात्विक आहार-विहार की नैतिक सीख देते हैं। जब गुरु घासीदास बाबा निरीह पशु-पंक्षी, हिरण, गाय, मछली के कल्याण की कामना करते हैं, तब मनुष्य के कल्याण की क्यों नहीं। वह मानव प्रजाति को प्रेरणा देते रहेंगे।

 

 

पंथी गीत 9

1. साखी- आए हस अकेला नरतन आवे तंय अकेला

सोच समझ के सउदा कर ले मया के लगे हे मेला

मनखे के का चिन्हा हे जात

सब उतरिन एकेच धाट

तंय तो छुआछूत म जिनगी ल बिता डारे रे मानुस मुरख गंवार

तंय तो जात-पात के जाल में अरझ गये रे

जात पंछी म जरूर

सोल्हाई कोकड़ा अउ मंजुर

ओमन एके पेड़  में खोंधरा बना डरिन रे मानुस मुरख गंवार

 

2. जात पशु म जरूर

बधवा भालू अउ लंगूर

ओमन बीच जंगल में सुन्ता मढ़ा डरिन हो

3. जात अन्न म जरूर

धान तिवरा अउ मसुर

ओमन मनखे मन के भूख ल मिटा डरिन हो

4. जात पेड़ मं के जरूर

आमा, अमली अउ बंबुर

ओमन छाजन बनके जिनगी ल संवार डारिन हो

5. जात मनखेच म जरूर

एक नारी अउ पुरूष

ओमन दस दरवाजा महल सिरजा डारिन हो

 

 

भावार्थ

सखी, अकेले ही इस संसार में आना है और अकेले ही यहां से जाना है। हम सभी मुसाफिर होते हुए परस्पर इतने भेदभाव क्यों करते हैं? जात-पात, मोह-माया में क्यों उलझे हैं?

 

अरे मूर्ख गंवार मनुष्य, क्यों नाहक जात-पात ऊंच-नीच में फंसा हुआ है? मनुष्य एक है। इसकी केवल दो जाति है- एक पुरुष और दूसरी महिला। यह दोनों मिलकर सुन्दर घर और अपने संतति बना लेते हैं।  

 

हां, पक्षियों में जातियां हैं और वे दूर से देखते ही पहचाने जा सकते हैं, जैसे मैना, बगुला, मोर। हालांकि, विभिन्न रंग, आकृति, प्रवृत्तियों के बावजूद एक वृक्ष के शाखा पर वे लोग धोंसला बनाकर मिलजुल कर रह लेते हैं।

 

इसी तरह पशुओं में भी जातियां हैं। बाघ, भालू, लंगूर, हाथी, गाय, कुत्ते सभी अलग हैं पर सभी परस्पर मिलजुल कर रह लेते हैं, लेकिन मनुष्य क्यों नहीं। इसी तरह अनाज धान, तिवरा, मसुर, अलग-अलग हैं। पर साथ मिलकर भोजन बन लोगों के भूख मिटाते हैं। वृक्ष की भी जातियां हैं। आम, इमली, बबूल सभी मानव उपयोगी हैं। मनुष्य एक होकर भी परस्पर विरोधी क्यों है? आक्रामक और हिंसक क्यों है? इस सुन्दर प्रकृति का विनाशक क्यों है? अरे मूर्ख, नाहक जात-पात छूआछूत में अपना बेशकीमती जीवन बर्बाद कर रहा है। कब चेतोगे तुम?

 

 

पंथी गीत 10

साखी- सत्य फूल धरती फूले सूर्य फूलय अगास

कंवल फूल मन सरवर मं फूले जहां खेले घासीदास

घासीदास गुरु की बंदना, अम्मरदास परणाम

बालकदास तोहि सुमरंव सिद्ध होत सब काम

तोला नेवता हे आबे गुरुघासीदास

हमर गांव म जंयती हे

करिया बादर छाए हवे धपटे हे अंधियार

मनखे ल मनखे माने नही घोर अतियाचार

बगरादे बाबा सत के परकास

दूनो आंखी हमय फेर होगे मनखे अंधरा

मोह-माया म मगन होके पूजै लोहा पथरा

सिरजादे मनखे मन के हिरदय म धाम

आगी लग गे चारोमुडा मं जरय ये संसार

आके अमरित चुहो दे बाबा करदे ग उद्धार

बिनय करत हवन हमन बारंबार

 

 

भावार्थ

सत्य-रूपी फूल धरती पर खिलते हैं तो सूर्य-रूपी फूल आसमान में। हमारे मानस सरोवर में कमल फूल खिला हुआ है, जहां गुरु घासीदास आनंदमय विचरण करते हैं। गुरु घासीदास बाबा की वंदना करते हैं। गुरु अम्मरदास को प्रणाम करते हैं। हे गुरुघासीदास बाबा आपको सादर आमंत्रण है। आप यहां व्याप्त अराजकताओं को दूर कर मानवता का कल्याण करिए। चारों तरफ जुल्म, अन्याय का राज है। वातावरण विषाक्त है। आप जैसे समर्थवान ही आकर इस अंधेरे में प्रकाश फैला सकते हैं।

 

हे गुरुघासीदास बाबा मानव हृदय को आप धाम में परिवर्तित कर दीजिए, ताकि किसी का कोई अमंगल ही न हो सके।

 

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.