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छत्तीसगढ़ का देवार समुदाय The Devars of Chhattisgarh

स्वर्गिय ज्वालाराम देवर, छत्तीसगढ़ २०१८  

 

 

देवार , छत्तीसगढ़ की एक घुमंतू जाति है जो वहां की जनप्रिय लोक कथाओं एवं लोकगीतों का गायन कर अपनी आजीविका कमाते रहे हैं।  यह जाति अब छत्तीसगढ़ के विभिन्न नगरों के तालाबों, नदियों या खुले मैदानों में अपने डेरे तानकर रहने लगी है। देवार अपना संबंध छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास से जोड़ते  हैं ।  वे मध्यकालीन  छत्तीसगढ़ी राज दरबारों  में गायक कलाकार के रूप में उनका मनोरंजन करते थे।  किंतु उन्नीसवीं सदी में इस क्षेत्र में आये  भीषण अकाल ने इस  जाति को यहां वहां भटकने  पर मजबूर कर दिया। छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक और पुरातन नगरी रतनपुर में अब इक्के दुक्के देवार परिवार है लेकिन इनका मूल संबंध इसी नगरी से रहा है। 

वर्तमान में देवर अपनी जीविका के लिए  बंदरों का खेल दिखाकर या सांप को नचाकर कुछ कमा लेते हैं।  सुअर पालन इनका प्रमुख व्यवसाय हो गया है।कुछ बूढ़े देवार  सारंगीनुमा वाद्य रुंजू बजा कर भीख मांग लेते हैं। भीख मांगने वालों को ''जोगी देवार'' कहा जाता है। 
देवर स्त्रियां पहले  विवाह और अन्य मांगलिक अवसरों पर लोगों के घरों में या गलियों में नाचती थीं  लेकिन अब वे मंचों पर लोक गायन और लोक नृत्य प्रस्तुत करने लगीं हैं।

 

इस जाति में संगीत के प्रति एक विशिष्ठ लगाव और प्रतिभा पाई जाती है।छत्तीसगढ़ की वाचिक परम्परा को इस समुदाय के लोक गायकों ने सदियों से जीवित रखा है।  इस समुदाय की स्त्रियों की इस निपुणता और प्रतिभा को सबसे पहले प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने पहचाना और उन्होंने अपनी रंगमंडली में कुछ देवर महिलाओं को स्थान दिया। जिससे देवार समुदाय के लिए संभावनाओं का एक नवीन द्वार खुल गया। वर्तमान  में सोनऊराम निर्मलकर जैसे शोधकर्ताओं ने इस समुदाय की बदली जीवनशैली और इनके छत्तीसगढ़ी संस्कृति में  योगदान को प्रस्तुत किया है। इस समुदाय की रेखा देवार ,समकालीन लोककथा गायन में अपनी एक विशिष्ट देवार शैली को स्थापित करने में सफल रहीं हैं।  

 

इस मॉड्यूल में देवार समुदाय की वर्तमान स्थिति एवं उनकी  कलात्मक गतिविधियों को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। 

 

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.