सरोज केरकेट्टा (Saroj Kerketta)

सिमडेगा, झारखंड की रहने वाली सरोज केरकेट्टा एक वरिष्ठ आदिवासी लेखिका हैं। आप अपनी मातृभाषा खड़िया के साथ-साथ हिंदी में पिछले 50 सालों से निरंतर लिख रही हैं। झारखंड की आदिवासी कला, साहित्य एवं संस्कृति विषयक आपके कई लेख अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। आप संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सीनियर फेलोशिप अवार्ड से सम्मानित हैं।

मूलतः पहले लोग कपड़े नहीं पहनते थे, क्योंकि उन्हें नहीं पता था कि बुनाई कैसे की जाती है। दुनिया की पहली बुनकर हैम्ब्रुमाई नाम की एक लड़की थी, जिसे सृष्टिकर्ता मताई ने यह कला सिखाई थी। नदी किनारे बैठकर उसने लहरों और तरंगों को देखा और उसका अनुकरण अपने डिजाइनों में किया। वह जंगल में गई और पेड़ों की शाखाओं, बांस की पत्तियों के पैटर्न को देखा, पौधों और फूलों को देखा और इस तरह की चीज़ों से डिजाइन बनाना सीखा।[i]

झारखंड के पारंपरिक आदिवासी वस्त्रों की पहचान ‘लाल पाड़’ वाली साड़ी, गमछे और चादर हैं। मोटी सूत से बनने वाले ये सफेद और लाल किनारों (लाल पाड़) वाले ये कपड़े झारखंड के सभी आदिवासी समुदायों द्वारा समान रूप से इस्तेमाल किए जाते हैं। ‘लाल पाड़’ दिखने में तो एक जैसा लगता है, पर वास्तव में इसका डिजाइन एक सा नहीं होता। मुंडा, खड़िया, संथाल, हो, उराँव आदि सभी आदिवासी समुदायों के कपड़ों के ‘लाल पाड़’ का डिज़ाइन और पैटर्न एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न और अलग-अलग होता है।

‘लाल पाड़’ वाले इन विशिष्ट और पारंपरिक आदिवासी कपड़ों को बुनने और बनाने का काम झारखंड में ‘चिक बड़ाईक’ आदिवासी समुदाय के लोग करते हैं। स्वतंत्र भारत के पहले दो दशक तक, जब तक कि मिल के कपड़ों का बाजार आदिवासी इलाकों में नहीं पहुँचा था, झारखंड के हर इलाके में चिक बड़ाईक समुदाय के देशज करघों की आवाज सुनाई देती थी। लेकिन औद्योगिकीकरण, आधुनिकीकरण के प्रभाव और वस्त्रों के प्रति बदलती हुई अभिरुचियों के कारण अब यह अनूठी आदिवासी वस्त्र कला परंपरा मिटने के कगार पर है। फिर भी झारखंड के कुछ चिक बड़ाईक परिवार वस्त्र बनाने की इस पारंपरिक आदिवासी कला को अभी भी जारी रखे हुए हैं। वे आज भी पारंपरिक और देशज तौर-तरीकों से ‘लाल पाड़’ वाले कपड़े बुनते और बनाते हैं।

 

चिक बड़ाईकों का निवास क्षेत्र और बसाहट

चिक बड़ाईक जनजाति झारखंड के 32 आदिवासी समुदायों में से एक है, जिन्हें संवैधानिक भाषा में ‘अनुसूचित जनजाति’ कहा जाता है। ये लोग मुंडा, हो, खड़िया, उराँव, संथाल आदि अन्य आदिवासी समुदायों की तरह ही झारखंड के मूल निवासी हैं। प्रायः सभी मानव विज्ञानियों और समाजशास्त्रियों ने एक स्वर से चिक बड़ाईकों को कपड़ा बुनने वाला आदिम कारीगर समुदाय माना है। ये मुख्यतया वर्तमान झारखंड राज्य के खूंटी, रांची, गुमला, लोहरदगा और सिमडेगा जिलों में निवास करते हैं। पर इनकी सघन आबादी सिमडेगा जिले में है। झारखंड के अलावा ये लोग बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों सहित अंडमान-निकोबार में भी रहते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में इनकी जनसंख्या 54,000 और समूचे भारत में कुल आबादी 1,18,000 है।

 

चिक बड़ाईक बुनकरों का इतिहास

सन् 2000 में गठित झारखंड राज्य में कई बुनकर जातियाँ रहती हैं जिन्हें पान, पांड़, तांती, स्वांसी, कोस्टा, चिक, चिक-बड़ाईक और जोल्हा (जुलाहा) आदि नामों से जाना जाता है। इनमें से जोल्हा बुनकर मुस्लिम समुदाय से हैं। शेष जातियों का संबंध कोल, द्रविड़ और आर्य कही जाने वाली प्रजातियों से माना जाता है। हालांकि ये वर्गीकरण औपनिवेशिक हैं पर मानवशास्त्री और इतिहासकार अभी भी जाति-प्रजाति संबंधी अध्ययनों में इसे ऐतिहासिक संदर्भों के रूप में इस्तेमाल करते हैं। जोल्हा, पान, तांती, कोस्टा और चिक बड़ाईकों का प्राथमिक पेशा कपड़े बुनना है पर पांड़ और स्वांसी जातियाँ कपड़ा बुनाई के अलावा अन्य कई दूसरे काम भी करते हैं। चिक बड़ाईकों को छोड़कर शेष सभी जातियों को झारखंड में ‘अनुसूचित जाति’ (दलित) वर्ग में रखा गया है। लेकिन जहाँ तक झारखंड के बुनकर जातियों के नृजातीय (Anthropological) पहचान और इतिहास की बात है तो इसको लेकर मानवशास्त्रियों और समाज विज्ञानियों में काफ़ी मतभेद हैं। चिक बड़ाईकों के बारे में हमें सबसे पहली जानकारी डाल्टन से मिलती है।[ii] जिनके अनुसार झारखंड के चिक बड़ाईक ‘कोलारियन और द्रविड़’ नस्लों की तुलना में ‘आर्य’ नस्ल के ‘हिंदू’ हैं। जबकि रिज़ले का मत है कि चिक बड़ाईक लोग ‘द्रविड़’ वंश के हैं।[iii]

डाल्टन का मानना है कि पान और चिक बड़ाईक वास्तव में एक ही जाति के दो भेद हैं। सिंहभूम के हो आदिवासियों के बीच रहने वाले खुद को ‘पान’ जबकि छोटानागपुर में मुंडा, खड़िया और उराँव आदिवासी बसाहटों में रहने वाले स्वयं को ‘चिक बड़ाईक’ कहते हैं। दोनों का ही मुख्य पेशा कपड़ों की बुनाई करना है। चिक बड़ाईकों के बारे में डाल्टन लिखते हैं—

मैंने देखा है कि कारीगरों के बीच बुनकर एक विशिष्ट समुदाय हैं, जो अभी भी अपमानित और तुच्छ हैं। परिणामस्वरूप इनमें से कई मुसलमान बन गए हैं। मेरे विचार से इससे इस बात का भी उद्घाटन होता है कि आदिवासियों के बीच इनकी एक बड़ी संख्या क्यों बची हुई और संरक्षित है। सिंहभूम के ‘हो’ आदिवासी समुदाय के अध्ययन के दौरान मैंने स्पष्ट रूप से हिंदू मूल के बुनकर ‘तांति’ जाति को देखा है जो प्रायः प्रत्येक हो गांवों में समुदाय के एक आवश्यक घटक के रूप में निवास करते हैं। इनके अलावा हमारे पास साउदर्न ट्रिब्यूटरी इस्टेट के पान या पानवा, गंडा और चिक, पश्चिमी जिलों के पाब और पानिका जैसे हजारों बुनकर हैं। लाक्षणिक विशेषताओं की दृष्टि से ये लोग कोलारियन (मुंडा समूह) या द्रविड़ के बजाय आर्य या हिंदू हैं। उनकी आदतें समान रूप से एक जैसी हैं। जो भोजन के मामले में हिंदू प्रतिबंधों को तो अस्वीकार करते हैं, लेकिन हिंदू देवताओं और देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। उनके पास विशिष्ट सामुदायिक रीति-रिवाज भी नहीं हैं जिससे उनकी पहचान (हिंदुओं से) एक अलग जाति के रूप में की जा सके। यह दास बुनकर जाति, अगर मैं उन्हें इस प्रकार से वर्णित करने में सही हूँ, तो छोटानागपुर प्रांत में इनकी संख्या 50,000 से कम नहीं होगी|[iv]

इसके साथ ही डाल्टन यह भी कहते हैं कि ‘पान’ लोग सिंहभूम के इलाके में ‘आर्यों के बचे हुए अवशेष’ हैं जिन्हें बाद में आए ‘हो-मुंडा’ आदिवासियों ने अपने अधीन किया। परंतु रिज़ले इसे सही नहीं मानते। वे मुंडा और द्रविड़ आदिवासियों को मूल बाशिंदा स्वीकार करते हुए पान और चिक बड़ाईकों को प्रजातीय रूप से द्रविड़ मूल के होने की संभावना व्यक्त करते हैं। चिक बड़ाईकों के बारे में रिज़ले का मत है—

उड़ीसा के उत्तरी और छोटानागपुर के दक्षिणी और पश्चिमी हिस्से में पमोआ, पान, पब, पनिका, चिक, चिक-बड़ाईक, बड़ाईक, गंडा, महतो, स्वांसी, तांती आदि विभिन्न नामों से बुनकर, टोकरी बनाने वाली और सेवा देने वाली अनेक जातियाँ बिखरी हुई हैं। ... जिनकी उत्पत्ति का इतिहास अब पता लगाना मुश्किल है। ये लोग मानभूम में खुद को ‘बड़ाईक’ कहते हैं। बड़ाईक अर्थात् ‘महान लोग’। इस पद का उपयोग जदुबंसी राजपूत, बिंझिया, रउतिया और खण्डित लोग करते हैं। पश्चिमी लोहरदगा और सरगुजा में ये चिक या चिक बड़ाईक के नाम से मिलते हैं। सिंहभूम में वे स्वांसी या तांती हैं, और पश्चिमी के ट्रिब्यूटरी राज्यों में उन्हें गंडा कहा जाता है। ... लेकिन ‘पान’ जाति के विभिन्न उपभेदों का परीक्षण करने पर उनके द्रविड़ मूल के होने का मजबूत प्रमाण मिलता है। इनकी जाति के टोटेम में टट्टू, भैंस, बंदर, कछुए, कोबरा, मोंगोज़, उल्लू, राजा-कौवा, मोर, सेंटीपेड, विभिन्न प्रकार के हिरण, जंगली, अंजीर, जंगली बेर, और कई अन्य चीजें मिलती हैं, जिन्हें मैं पहचानने में असमर्थ हूँ। इससे कुल मिलाकर इनका वास्तविक रिश्ता द्रविड़ों से ही जुड़ता है|[v]

इनसाइक्लोपीडिया मुंडारिका के लेखक फादर हॉफमैन (1857-1928), सुप्रसिद्ध मानवशास्त्री सरत चंद्र रॉय (1871-1942), राय साहब चुन्नीलाल राय (1919) और कुमार सुरेश सिंह (1935-2006) के अनुसार झारखंड के बुनकर और कारीगर जातियों में पान और चिक बड़ाईक निश्चित रूप से आदिवासी मूल के हैं—

रांची जिले में कई बुनकर जातियाँ रहती हैं। इनमें चिक लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है। जो मुख्य रूप से पुराने संबलपुर रोड (रांची से कर्रा, बसिया और कोलेबीरा जाने वाली सड़क) के पश्चिम में क्षेत्र में रहते हैं। मुंडा देश के पूर्वी क्षेत्र में रहने वाली बुनकर जाति मुख्य रूप से ‘पान’ या ‘पांड़’ है। मुस्लिम जुलाहों की आबादी रांची, मांडर, कुड़ु और लोहरदगा थानों में सबसे अधिक है। साथ ही इन इलाकों में ततवा, कटिया, कोस्ट और दास जैसी अन्य बुनकर जातियाँ भी निवास करती हैं। ये लोग उत्तरी भारत या उड़ीसा जैसे अधिक सभ्य जिलों से आप्रवासी होने का दावा करते हैं, जबकि चिक और पान के बाहर से आने की कोई परंपरा नहीं है|[vi]

लोक विश्वास और पुरानी कहानियों के अनुसार चिक बड़ाईक लोग स्वयं को आदिवासियों की तरह ही झारखंड का मूल और प्राचीन बाशिंदा मानते हैं। बड़ाईक लोक कथाओं के अनुसार छोटानागपुर में पहले दो ही समुदाय रहा करते थे—मुंडा और चिक बड़ाईक। प्राचीन समय में वे लोग सैनिक और महल-रक्षक हुआ करते थे। लेकिन नागवंशी राजा बैरीसाल के समय में उनकी सामाजिक अवनति हुई और अपना अस्तित्व बचाने के लिए उन्हें बुनकर का ‘अपमानजनक’ पेशा अपनाना पड़ा।

अपनी जातिगत उत्पत्ति के संबंध में बेड़ो के पूरन राम बड़ाईक और खेदू राम बड़ाईक ने राय साहब चुन्नीलाल राय को एक लोककथा सुनाई थी, जो उनकी क़िताब के अनुसार इस प्रकार है—

राजा बैरीसाल के जमाने में एक उराँव आदिवासी मछली मारने के लिए कोयल नदी में गया। उसने नदी के किनारे एक ‘गड़हा’ में मछली फंसाने वाली ‘कुमनी’ लगा दी। जब कुछ देर बाद उसने कुमनी निकाली तो उसमें मछलियों की बजाय रंग-बिरंगे चमकीले पत्थर भरे हुए थे। उराँव आदिवासी ने उनमें से सिर्फ एक चमकीला पत्थर रखकर बाकी सबको वापस नदी के उसी गड़हे में फेंक दिया और अपने घर लौट आया। बाद में तंबाखू के बदले में उसने वह चमकीला पत्थर जो कि वास्तव में कीमती हीरा था बनिए को दे दिया। बनिया उस हीरे को बेचने के लिए राजा के पास गया। क्योंकि उसकी कीमत राजा छोड़कर और कोई नहीं दे सकता था। राजा ने बनिए से पूछा कि यह हीरा उसे कहाँ से मिला? जवाब में बनिया चुप रहा। इससे राजा क्रोधित हो गया और उसने सिपाहियों को आज्ञा दी कि अगर वह हीरे का स्रोत नहीं बता रहा है तो उसे ज़िंदा जमीन में गाड़ दिया जाए। जान के डर से बनिया ने बता दिया कि उसे यह हीरा एक उराँव आदिवासी से मिला है। राजा तुरंत दल-बल सहित उस आदिवासी के पास जा पहुँचा और उससे हीरे के बारे में पूछताछ की। आदिवासी ने राजा को पूरी बात बता दी। राजा ने आदिवासी से कहा कि वो उसे उस जगह ले चले जहाँ उसने बाकी हीरे फेंक दिए हैं। उराँव आदिवासी के बताए ‘गड़हा’ में राजा के आदमियों ने बहुत खोजा पर उन्हें एक भी हीरा नहीं मिला। तब राजा स्वयं ‘गड़हे’ में उतर कर हीरे खोजने लगा। पूरा दिन और उसके अगले दो दिन बीत जाने पर भी जब राजा ‘गड़हा’ से बाहर नहीं आया तो लोगों ने सोचा कि शायद उसको मछलियां खा गई हैं और अब वह जीवित नहीं बचा है। बड़ाईक और मुंडाओं ने तब विचार किया कि राजा के नहीं रहने से देश का शासन-प्रशासन कैसे चलेगा। अंत में वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि दोनों राज्य का आधा-आधा हिस्सा आपस में बांट लेंगे और राज करेंगे।

इस बीच सातवें दिन की शाम को, जब गड़हा के पास राजा के राजा के साइस (घोड़े की देखभाल करने वाला) को छोड़कर कोई और मौजूद नहीं था, राजा अपने दोनों हाथ में हीरे लेकर बाहर आया। बाहर निकलते ही उसने साइस से पानी मांगा क्योंकि उसे बहुत जोरों की प्यास लगी थी। साइस ने हाथ जोड़कर राजा से कहा कि यहाँ पर उन्हें पानी देने वाला कोई आदमी नहीं है। साइस ने राजा से इसलिए ऐसा कहा क्योंकि वह अछूत था। लेकिन राजा बहुत प्यासा था। उसने साइस को आदेश दिया कि वह फौरन उन्हें पानी पिलाए। साइस ने आज्ञा का पालन किया। पानी पीने के बाद राजा ने कहा कि आज से तुम्हारे हाथ का पानी सब कोई पीएंगे। इसके बाद राजा ने बड़ाईक और मुंडा को बुलाने का आदेश दिया। राजा के बुलावे पर मुंडा सरदार तो वहाँ फौरन हाजिर हो गया पर बड़ाईक नहीं पहुँचा। असल में उसे साइस की इस बात पर विश्वास ही नहीं हुआ कि गड़हा में डूबकर मर गया राजा उसमें से जिंदा निकल आया है। इससे राजा बहुत गुस्सा हो गया और उसने राजधानी पहुँच कर तुरंत आदेश जारी कर दिया कि सभी बड़ाईकों को मार डाला जाए। नतीजतन कई सारे बड़ाईक मार डाले गए। राजा के कोप से बचने के लिए कुछ बड़ाईक लोगों ने बुनकरों का वेश और पेशा अपना लिया। तब से ही बड़ाईक लोग हमेशा के लिए बुनकर बन गए|[vii]

 

चिक बड़ाईकों की ‘लाल पड़िया’ आदि वस्त्र कला

भारत के प्रायः सभी आदिवासी समुदायों में वस्त्र बनाने और बुनने की परंपरा रही है। इन आदिवासी वस्त्रों की खासियत कई कारणों से है। आदिवासी कपड़े एक ओर जहाँ सभ्यता के विकासक्रम को समझने में मदद करते हैं, वहीं ये विभिन्न आदिवासी समुदायों के विश्वासों और उनकी कलात्मक अभिरुचियों को भी अभिव्यक्त करते हैं। आदिवासी पहचान और संस्कृति से जुड़ी आदिवासी वस्त्र परंपरा भारत के बहुरंगी समाज की सबसे जीवंत कला है जो सदियों की यात्रा के बावजूद अभी भी अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। इन्हीं में से एक है झारखंड के आदिवासियों का ‘लाल पाड़’ या ‘लाल पड़िया’ वाली अदभुत और आकर्षक वस्त्र परंपरा। बहुचर्चित आदिवासी लेखिका वंदना टेटे का कहना है कि मुंडा समूह, जो नृजातीय रूप से भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे प्राचीन निवासी हैं, उन्होंने ही वस्त्र कला की शुरुआत की थी।[viii] क्योंकि पेड़ के छालों से कपड़ा बुनने की प्राचीनतम कला आज भी मुंडा समूह के ‘गदाबा’ आदिवासी समुदाय में प्रचलित है। लेकिन कृषिकर्म की शुरुआत होते ही छाल की जगह कपास ने ले ली जिससे सूती कपड़े का निर्माण और विकास संभव हुआ। झारखंड के चिक बड़ाइक इसी पारंपरिक आदिवासी वस्त्र कला के वाहक हैं।

 

वस्त्रों के प्रकार

चाहे पुरुषों के पारंपरिक कपड़े हों या फिर स्त्रियों के या कि आम तौर पर विभिन्न ज़रूरतों के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले दूसरे तरह के कपड़े, प्रायः सभी उजले रंग और लाल पाड़ वाले होते हैं। इसीलिए इनको ‘लाल पाड़’ अथवा ‘लाल पड़िया’ लुगा (कपड़ा) कहते हैं। झारखंड के सिर्फ संथाल लोगों में ही लाल के अलावा गहरे हरे रंग की किनारी अथवा पाड़ का प्रचलन है। मशीनीकरण, आधुनिकता और कपड़ों की रुचि में आए बड़े बदलाव के बावजूद झारखंड के सभी समुदाय आज भी शादी-ब्याह, पर्व-त्योहार एवं अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक अवसरों पर प्रमुखता से लाल पाड़ वाले कपड़ों का प्रयोग करते हैं।

झारखंड के पारंपरिक आदिवासी वस्त्रों में मुख्य रूप से ‘पिंधना’ (साड़ी), ‘लहंगा’, ‘करया’, ‘तोलोंग’ (लंगोट), ‘गमछा’, ‘बरकी’ और ‘पेछौरी’ हैं—

पिंधना: आदिवासी लोग साड़ी को ‘पिंधना’ कहते हैं। इसकी लंबाई करीब 12 हाथ और चौड़ाई दो हाथ होती है। साड़ी के दोनों किनारियों पर ‘लाल पाड़’ बना होता है| (Fig.1)

  • बरकी: ‘बरकी’ ओढ़ने की मोटी चादर है। यह करीब छः हाथ लंबी और चार हाथ चौड़ी होती है। स्त्रियों की बरकी के किनारे पर डिज़ाइन बना रहता है। परंतु पुरुषों की बरकी में कोई डिज़ाइन नहीं होता है। चूंकि इसका ‘अरज’ (चौड़ाई) ज्यादा होता है इसलिए इसे जोड़कर बनाया जाता है। जिससे इसके बीच की सिलाई डिज़ाइन की तरह दिखती है।
  • पेछौरी: यह भी ओढ़ने की चादर है और इसकी लंबाई भी बरकी जितनी ही होती है। पर चौड़ाई में यह उससे आधी रहती है। यानी लगभग दो हाथ चौड़ी।
  • लहंगा: इसे मुख्यतः किशोर उम्र तक की लड़कियाँ लुंगी की तरह पहनती हैं। यह करीब तीन हाथ लंबा होता है।
  • करया: ‘करया’ और ‘तोलोंग’ पुरुषों का वस्त्र है जिसे लंगोट की तरह पहना जाता है। पर यह लंगोट की तुलना में काफ़ी बड़ा यानी लंबा होता है। जिससे इसका एक छोर कमर के आगे और दूसरा छोर पीछे की तरफ नीचे घुटने तक झूलता रहता है। ‘करया’ और ‘तोलोंग’ की लंबाई पांच हाथ और चौड़ाई एक मूठ होती है।
  • गमछा: यह लगभग चार हाथ लंबा और डेढ़ हाथ चौड़ा होता है। इसके दोनों तरफ तीन बड़ी पतली लाइनें और दोनों छोर पर नौ-नौ खड़ी लाइनें होती हैं, लगभग एक ईंच की। गमछे का प्रयोग कई रूपों में होता है इसलिए इसके अलग-अलग डिज़ाइन और लंबाई होती हैं। (Fig. 2)

 

Fig.1.पिंधना – आदिवसीयो की साड़ी सोज्न्य (सौजन्य: सरोज केरकेट्टा)
Fig.1. पिंधना – आदिवसीयो की साड़ी सोज्न्य (सौजन्य: सरोज केरकेट्टा)

 

Fig.2.गमछा – इसका प्रयोग कई रूपों में होता है | (सौजन्य: सरोज केरकेट्टा)
Fig.2. गमछा – इसका प्रयोग कई रूपों में होता है  (सौजन्य: सरोज केरकेट्टा)

 

‘लाल पाड़’ बनाने की तकनीक

  • रूई को धुनना, कातना और तसरना: परंपरागत रूप से चिक बड़ाईक लोग पहले कपास से सूत और फिर उससे कपड़ा बुना करते थे। कपास से पहले रूई बनाई जाती थी जिसे धुन कर तकली से उसका सूत कात लिया करते थे। काते हुए सूत को ‘तसरा’ में तसरते यानी उसको लकड़ी में लपेट लेते थे। इस प्रक्रिया को चिक बड़ाईक लोग ‘तसरना’ कहते हैं।
  • रंग बनाना: कपड़ा बुनने की प्रक्रिया में सबसे पहले काम रंग बनाना होता है। झारखंड के आदिवासी वस्त्रों में मुख्यतः एक ही रंग का इस्तेमाल होता है। वह है लाल रंग। लाल रंग बनाने के लिए प्रकृति में उपलब्ध संसाधनों, जैसे फरसा (पलाश) फूल (Butea monosperma), चइली पेड़ की छाल, चरू-तवा की कालिख (The soot of tawa), केले का गाध और कंदरी कांदा का माड़ इस्तेमाल में लिया जाता है।
  • लाल रंग का ही एक दूसरा शेड कत्थई होता है। जिसे चिक बड़ाई समुदाय ‘सेहरूआ’ रंग कहते हैं। इस रंग को हर्रा (Terminalia chebula) के फलों और चइली के छालों को पका कर बनाते हैं। कुछ चिक बड़ाई कालिख को डोरी (महुआ) (Bassia latifolia) या करंज (Millettia pinnata) तेल में मिलाकर इस रंग को तैयार करते हैं।
  • धागे को मज़बूती देना: कपड़ों के टिकाउपन के लिए जरूरी है कि धागा कड़क और मजबूत हो। इसके लिए कंदरी कांदा के माड़ में धागों को डुबोकर उन्हें कड़क और मजबूती प्रदान की जाती है।
  • धागा ओरियाना, सोझियाना, गोछियाना और माड़ना: यह एक पूरी प्रक्रिया होती है जिसमें धागा को पहले ओरियाया (बराबर करना) किया जाता है। फिर माड़ लगाकर उसे सुखाया, सोझियाया (धागे उलझे नहीं, सीधे रहें), गोछियाया (धागें आपस में चिपके नहीं) और सरियाया (व्यवथित करना) जाता है। तब ही धागा बुनने के लिए करघे पर चढ़ाने लायक होता है।

 

‘लाल पाड़’ बनाने के औजार

कपड़ा बनाने के लिए हथकरघा का इस्तेमाल होता है जो पूरी तरह से देशज तकनीक पर आधारित है। इसके प्रमुख औजार हैं—

  • लुंडी-ताना: यह लकड़ी से बना औजार है जिससे कपड़े की चौड़ाई यानी ‘अरज’ तय की जाती है। इसकी चौड़ाई करीब दो हाथ की रहती है। (Fig. 3)
  • कुइंछ: यह नारियल के रेशे से बनी एक बड़ी और चौड़ी झाड़ुनूमा कूची होती है। जिससे माड़ लगे धागे को सुखाते समय सोझियाने का काम किया जाता है। इससे धागा आपस में सटते, उलझते नहीं हैं और बिल्कुल सीधे रहते हैं।
  • भरना: यह ‘पांच खड़ी और चार पड़ी’ लकड़ियों बना चौकोर और घूमने वाला औजार है जिसमें घागा को तसरने से पहले लपेटकर सोझियाया जाता है। (Fig. 4)
  • टसरा: धागा ओरियाने और तसरने यानी लपेटने का डंडा। यह बांस, सरई या गम्हार का होता है। इसमें सूत लपेटा जाता है। यह करीब डेढ़ से दो हाथ लंबी एक पतली लकड़ी होती है।
  • हाथा भांड़ी: यह लकड़ी से बना कपड़ा बुनने का मुख्य औजार है। यह करघे का मूल औजार है जो धागों को आपस में बुनकर उन्हें कपड़े का रूप प्रदान करने का काम करता है।
  • करघा राच: यह हाथा भांड़ी से जुड़ा होता है जो उसका बैलेंस बनाने और उसे ऊपर-नीचे करने का काम करता है।
  • बायर फनी: बुनाई के दौरान धागे इससे होकर गुजरते हैं। यानी यह धागे को नियंत्रित करता है ताकि प्रत्येक धागा व्यवस्थित तरीके से हाथा भांड़ी तक जाए। कपड़ा बुनाई के दौरान यह धागे के दोनों छोरों पर रहता है।
  • मांगा गड़हा: यह जमीन में खुदा घुटने तक गहरा गड्ढा होता है। इसी में पंयरी जपनी होती है जिसे पैरों से चलाया जाता है।
  • पंयरी जपनी (जोल): बुनाई के दौरान इसे पैरों से चलाते है जो धागे को ऊपर-नीचे करने का काम करता है।
  • डोंगी: इस औजार को बुनते समय हाथ से चलाते हैं जिससे मनचाही डिज़ाइन बुनी और बनायी जाती है। इसका आकार नाव जैसा होता है और बुनाई के वक्त यह करघे पर लहरों की तरह नीचे-ऊपर होती रहती है इसीलिए इसको ‘डोंगी’ कहते हैं।
  • भांड़ी: इसमें हाथा भांड़ी से बुना हुआ कपड़ा आकर लिपटता रहता है।

समूचा करघा जिन तीन खूंटों पर टिका रहता है उन्हें ‘पार्वती खूंटा’, ‘महादेव खूंटा’ और ‘दिलौना खूंटा’ कहते हैं। पार्वती खूंटा धागों के पहले छोर पर, हाथा भांड़ी महादेव खूंटा पर और भांड़ी दिलौना खूंटा पर स्थित होता है।

ये सभी औजार चिक बड़ाईक लोग स्वयं बनाते हैं। इनको बनाने के लिए गम्हार (Gmelina arborea) और सखुआ (Shorea robusta) की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है ताकि ये मजबूत और टिकाउ रहें। लोहे की कील के अलावा इन औजारों के निर्माण में किसी और धातु का इस्तेमाल नहीं होता है।

 

Fig.3.लुंडी-ताना - यह लकड़ी से बना औजार है जिससे कपड़े की चौड़ाई यानी ‘अरज’ तय की जाती है |(सौजन्य: सरोज केरकेट्टा)
Fig.3. लुंडी-ताना - यह लकड़ी से बना औजार है जिससे कपड़े की चौड़ाई यानी ‘अरज’ तय की जाती है  (सौजन्य: सरोज केरकेट्टा)

 

Fig.4. भरना-यह ‘पांच खड़ी और चार पड़ी’ लकड़ियों बना चौकोर और घूमने वाला औजार है जिसमें घागा को तसरने से पहले लपेटकर सोझियाया जाता है |( सौजन्य: सरोज केरकेट्टा)
Fig.4. भरना-यह ‘पांच खड़ी और चार पड़ी’ लकड़ियों बना चौकोर और घूमने वाला औजार है जिसमें घागा को तसरने से पहले लपेटकर सोझियाया जाता है  ( सौजन्य: सरोज केरकेट्टा)

 

जितने आदिवासी समुदाय, उतने तरह के ‘लाल पाड़’

झारखंड के आदिवासी कपड़ों के ‘लाल पाड़’ का डिज़ाइन एक सा नहीं होता। मुंडा, खड़िया, संथाल, हो, उराँव आदि सभी आदिवासी समुदायों के कपड़ों के पाड़ का अलग-अलग डिज़ाइन और पैटर्न होता है। इनकी बारीकियाँ और इनमें मौजूद भिन्नताओं को नहीं जानने के कारण आम तौर पर इन्हें एक ही जैसा ‘लाल पाड़’ वाला मान लिया जाता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि पाड़ की डिज़ाइन के साथ-साथ इनके लाल रंग में शेड्स में भी फर्क होता है। यानी आप ‘लाल पाड़’ की डिज़ाइन और उसके शेड से जान सकते हैं कि कपड़े को पहनने वाला व्यक्ति मुंडा, खड़िया या कोई उराँव आदिवासी है। मतलब समग्रता में ‘लाल पाड़’ जहाँ झारखंड के सभी आदिवासी समुदाय की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है, वहीं इसके एक खास डिज़ाइन से किसी एक विशेष आदिवासी समुदाय की भी पहचान होती है।

सिमडेगा जिले के चिक बड़ाईक कारीगरों के अनुसार पहले पाड़ में एक ही रंग ‘लाल’ का इस्तेमाल होता था। लेकिन अब लाल के साथ-साथ कत्थई रंग के भी पाड़ बनने लगे हैं। लाल रंग का पाड़ सरना (मूल आदिधर्मी) वालों के लिए और कत्थई पाड़ ईसाई आदिवासी समुदाय के लिए। हालांकि फर्क सिर्फ रंग में ही हुआ है। डिज़ाइन अभी भी दोनों का एक ही रहता है।

 

सांस्कृतिक-धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ा है ‘लाल पाड़’

मानव सभ्यता के आरंभ से ही, जबसे इंसानों ने कपड़े बनाना और पहनना शुरू किया है, कपड़े हमेशा से जातीय पहचान, सामाजिक रीति-रिवाज और सांस्कृतिक-धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा रहे हैं। चिक बड़ाईकों द्वारा निर्मित ‘लाल पाड़’ वाले कपड़े भी झारखंड के विभिन्न आदिवासी समुदायों की संस्कृति एवं धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़े हैं। जैसे, विवाह के अवसर पर ‘पेछौरी’ और एक विशेष साड़ी, जिसे ‘मायसारी’ कहते हैं, दिया जाना अनिवार्य है। विवाह में दिए जाने वाले इन दोनों कपड़ों की बुनावट और डिज़ाइन खास ढंग की होती है। पर्व-त्यौहारों पर पहनने वाले कपड़े भी विशेष होते हैं जिन्हें सिर्फ ऐसे ही अवसरों पर पहना जाता है। गाँव का आदिवासी धार्मिक प्रमुख, जिसे ‘पाहन’ कहते हैं, वह धार्मिक अवसरों पर विशेष तरह की ‘पगड़ी’ पहने बिना कोई भी धार्मिक कार्य नहीं कर सकता है। इसी तरह बिरसाइत धर्मावलंबी मुंडा, आदिधर्मी (सरना) खड़िया और टाना संप्रदाय के उराँव लोग भी धार्मिक अवसरों पर खास ढंग के कपड़े पहनते हैं। जन्म और मृत्यु संस्कार में भी जो कपड़े काम में लिए जाते हैं, वह रोजमर्रा के पहने जाने वाले कपड़ों से बिल्कुल अलग होते हैं।

 

संकट में आदिवासी ‘लाल पाड़’

औपनिवेशिक समय में हुए औद्योगिकरण की प्रक्रिया आज़ादी के बाद बहुत तेजी से भारत में फैली जिससे पारंपरिक लघु एवं कुटीर उद्योग-धंधों को जबरदस्त धक्का पहुँचा। कारखाने की बनी सस्ती चीज़ों ने हाथ से बनने वाली वस्तुओं का बाज़ार हड़प लिया। बाहरी शिक्षा-दीक्षा, सिनेमा, साहित्य कला एवं सांस्कृतिक आरोपण के फलस्वरूप लोगों की रुचि में बदलाव आया। झारखंड की जनता भी इसकी चपेट से बच नहीं सकी। उनके पहनावे, वेश-भूषा, खान-पान, रहन-सहन और सोच-विचार में भी परिवर्तन हुआ। ‘पूंजी’ के प्रचलन ने परस्पर आधारित सामाजिक-आर्थिक संरचना को छिन्न-भिन्न कर दिया। इससे चिक-बड़ाईकों द्वारा बनाए गए कपड़ों का इस्तेमाल कम होता चला गया। करघे ठप्प पड़ गए। इसके कारण अधिकांश चिक बड़ाईकों को जीने के लिए बुनाई का पारंपरिक पेशा छोड़कर दूसरी आजीविका तलाशनी पड़ी। कुछ पूर्णतः खेती में लग गए तो ज्यादातर मजदूरी के लिए आसपास के रांची, राउरकेला जैसे शहरों की ओर पलायन कर गए। अनेक परिवारों को विकासीय परियोजनाओं और नगरीकरण के कारण भी विस्थापित होना पड़ा है। चिक बड़ाईकों के पारंपरिक पेशे के समर्थन और सहयोग में सरकारी और कुछ ग़ैर-सरकारी एजेंसियाँ सामने आई हैं, पर दीर्घकालिक और व्यवस्थित योजना के अभाव में उसका कोई खास लाभ इन्हें नहीं मिल पा रहा है। 

(प्रस्तुत लेख चिक बड़ाईक बुनकर कारीगरों श्री अजय मेहर : गाँव- धवई पानी, पंचायत- कोनमेंजरा, प्रखंड- ठेठईटांगर, जिला-सिमडेगा, श्री गंगाधर बड़ाईक : गाँव- तेतइर टोली उर्फ बड़ाईक टोली, पंचायत- टुकुपानी, प्रखंड-ठेठईटांगर, जिला- सिमडेगा, श्री सुधन बड़ाईक : गाँव- जराकेल, प्रखंड- बानो, जिला- सिमडेगा, श्री सुंदर मेहर, श्री तपेश मेहर एवं श्रीमती बसमइत मेहर : गाँव एवं प्रखंड- बांसजोर, जिला- सिमडेगा (झारखंड) और श्री विश्राम बड़ाईक : गाँव- बुचा टोली, झुन्मुर, प्रखंड- रायबोगा, बिरमित्रापुर, जिला- सुंदरगढ़ (उड़ीसा) से 18 से 22 सितंबर 2018 के बीच मिली जानकारियों पर आधारित है।)

 

[i] एलविन, वैरियर. 1959. द आर्ट ऑफ नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर ऑफ इंडिया. शिलांग: नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी|

[ii] डॉल्टन. 1872. डिस्क्रिप्टिव एथनोलॉजी ऑफ बंगाल. कलकत्ता: ऑफिस ऑफ द सुपरिटेंडेंट ऑफ गवर्नमेंट प्रिंटिंग|

[iii] रिज़ले, एच. 1891. द ट्राइब्स एंड कास्ट्स बंगाल. कलकत्ता: बंगाल सेक्रेटेरिएट प्रेस

[iv] डॉल्टन. 1872. डिस्क्रिप्टिव एथनोलॉजी ऑफ बंगाल. कलकत्ता: ऑफिस ऑफ द सुपरिटेंडेंट ऑफ गवर्नमेंट प्रिंटिंग

[v] रिज़ले, एच. 1891. द ट्राइब्स एंड कास्ट्स बंगाल. कलकत्ता: बंगाल सेक्रेटेरिएट प्रेस

[vi] राय, राय साहब चुन्नीलाल. 1919. ‘वीवर कास्ट्स एंड सब-कास्ट्स इन रांची.’ द जर्नल ऑफ द बिहार-उड़ीसा रिसर्च सोसायटी (5): 382-401

[vii] राय, राय साहब चुन्नीलाल. 1919. ‘वीवर कास्ट्स एंड सब-कास्ट्स इन रांची.’ द जर्नल ऑफ द बिहार-उड़ीसा रिसर्च सोसायटी (5): 382-401

[viii] टेटे, वंदना. 2013. आदिवासी साहित्य: परंपरा और प्रयोजन. रांची: प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन.

 

संदर्भ

एलविन, वैरियर. 1959. द आर्ट ऑफ नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर ऑफ इंडिया. शिलांग: नॉर्थ-ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी.

टेटे, वंदना. 2013. आदिवासी साहित्य: परंपरा और प्रयोजन. रांची: प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन.

डॉल्टन. 1872. डिस्क्रिप्टिव एथनोलॉजी ऑफ बंगाल. कलकत्ता: ऑफिस ऑफ द सुपरिटेंडेंट ऑफ गवर्नमेंट प्रिंटिंग.

नंदी, श्यामल राय. 2004. द चिक बड़ाईक्स ऑफ छोटानागपुर: ए स्टडी ऑन कल्चर, बायोडेमोग्राफी, एंड हेल्थ. एंथ्रोपोलोजिकल सर्वे ऑफ इंडिया.

पंकज, अश्विनी कुमार. 2017. प्राथमिक आदिवासी विमर्श. रांची: प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन.

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राय, राय साहब चुन्नीलाल. 1919. ‘वीवर कास्ट्स एंड सब-कास्ट्स इन रांची.’ द जर्नल ऑफ द बिहार-उड़ीसा रिसर्च सोसायटी (5): 382-401.

राय, सरत चंद्र. 1912. मुंडाज एंड देयर कंट्री. कलकत्ता: सिटी बुक सोसायटी.

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रिज़ले, एच. 1891. द ट्राइब्स एंड कास्ट्स बंगाल. कलकत्ता: बंगाल सेक्रेटेरिएट प्रेस.

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‘चिक बड़ाईक इन इंडिया.’ ऑनलाइन ऐट  https://joshuaproject.net/people_groups/16552/IN (अभिगमन तिथि सितम्बर 23, 2018).