सरोज केरकेट्टा (Saroj Kerketta)

सिमडेगा, झारखंड की रहने वाली सरोज केरकेट्टा एक वरिष्ठ आदिवासी लेखिका हैं। आप अपनी मातृभाषा खड़िया के साथ-साथ हिंदी में पिछले 50 सालों से निरंतर लिख रही हैं। झारखंड की आदिवासी कला, साहित्य एवं संस्कृति विषयक आपके कई लेख अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। आप संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सीनियर फेलोशिप अवार्ड से सम्मानित हैं।

झारखंड के पारंपरिक वस्त्रों की पहचान लाल पाड़ वाली साड़ी, गमछे और चादर  हैं। मोटी सूती कपड़े से बनने वाले ये उजले और लाल रंग के कपड़े झारखंड के सभी आदिवासी समुदायों द्वारा समान रूप से इस्तेमाल किए जाते हैं। इन पारंपरिक आदिवासी कपड़ों को बुनने और बनाने का काम मुख्यतः झारखंड के सिमडेगा जिले के ‘चिक बड़ाईक’ आदिवासी समुदाय के लोग करते हैं। आज से पांच दशक पहले तक, जब तक कि मिल के कपड़ों का बाजार आदिवासी इलाकों में नहीं पहुँचा था, तब प्रायः हर गांव में चिक बड़ाईक समुदाय के करघे दिखाई देते थे। लेकिन आधुनिकीकरण और वस्त्रों के प्रति बदलती हुई अभिरुचियों के कारण इस आदिवासी कला का प्रायः लोप हो गया। फिर भी अभी भी कुछ आदिवासी और चिक बड़ाईक परिवार पारंपरिक वस्त्र को बनाने का काम जारी रखे हुए हैं। वे आज भी पुराने तौर-तरीकों से कपड़ा बनाते हैं। अभी तक झारखंड के चिक बड़ाईकों की इस वस्त्र बुनाई परंपरा पर व्यवस्थित अध्ययन नहीं हुआ है और न ही ‘लाल पाड़’ के अलग-अलग डिजाइनों और पैटर्न की विशिष्टता को भारतीय वस्त्र परंपरा एवं आदिम कला के संदर्भ में देखने की कोशिश हुई है। क्योंकि कपड़े पर बनाया जाने वाला लाल पाड़ की डिजाइन एक सा नहीं होता। मुंडा, खड़िया, संताल, हो, उरांव आदि सभी आदिवासी समुदायों के कपड़ों के पाड़ का अलग-अलग डिजाइन और पैटर्न होता है। ऐसा माना जाता है कि मुंडा समूह, जो नृजातीय रूप से भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे प्राचीन निवासी माने जाते हैं, ने इस वस्त्र कला की शुरुआत की थी। पहले ये आदिम तरीके से बने करघों पर इसे बुना करते थे।

इस मोड्यूल में झारखंड की आदिवासी वस्त्र कला परंपरा के चिक बड़ाईक आदिवासी समुदाय पर केंद्रित है, जो सिमडेगा जिले में रहते हैं। अपने इस अध्ययन में मैं चिक बड़ाईकों के वस्त्र निर्माण से संबंधित, इतिहास, तकनीक, कपड़ों के डिजाइन एवं पैटर्न, समुदाय की वर्तमान स्थिति आदि को जानने और उनका डॉक्यूमेंटेशन करने का प्रयास किया गया है।