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बस्तर के पारम्परिक काष्ठशिल्प

बस्तर, छत्तीसगढ राज्य का एक महत्वपूर्ण आदिवासी सांस्कृतिक क्षेत्र है। अविभाजित बस्तर जिले का क्षेत्रफल केरल राज्य से भी अधिक था। खनिज संपदा एवं बीहड़ वनों से समृद्ध इस क्षेत्र में देश के कुछ सर्वधिक महत्वपूर्ण आदिम समूह निवास करते हैं। यहां के वनों में साल, सागौन और बीजा की लकड़ी बहुतायत में मिलती है। पहले जब जंगलों की इतनी कटाई नहीं हुई थी, तब लकड़ी और भी सुलभ थी। लकड़ी को काटना, छीलना एवं उस पर नक्काशी करना आसान था। सम्भवतः यही कारण रहा कि लकड़ी आदिवासियों की कलात्मक अभिव्यक्ति का प्रिय माध्यम रहा। बस्तर में काष्ठशिल्प की एक सुदीर्घ एवं समृद्ध परंपरा रही है। यहां आम जीवन के साथ-साथ पूजा अनुष्ठानों, नृत्य समारोहों एवं व्यक्तिगत उपयोग की वस्तुओं में लकड़ी से बनी सुन्दर कलाकृतियों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

 

समूचे बस्तर में आदिवासियों एवं गैर-आदिवासियों की अनेक जातियां एवं उप-जातियां निवास करती हैं। इनमें मुरिया समुदाय के युव सर्वाधिक कुशल काष्ठशिल्पी होते हैं। यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि बस्तर के कुछ लोहार भी लकड़ी का काम करते हैं। वर्तमान में बस्तर का सर्वाधिक सुन्दर काष्ठशिल्प लोहार जाति के शिल्पियों द्वारा ही बनाया जा रहा है। गोलावंड गांव के सुकमन लोहार तो इस कला में भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं ।

               

                           

                                        कार्यरत काष्ठशिल्पी   (फोटो: २०१८)    

                                                                                                                                                       

कार्यरत काष्ठशिल्पी (फोटो:२०१८) 

 

बस्तर के परंपरागत आदिवासी काष्ठशिल्प अपने स्वरूप एवं बनावट में तो विलक्षण हैं ही, उनकी सतह पर किया जाने वाला अलंकरण भी विशिष्ट है। यूं तो विश्व के अनेक आदिवासियों में लोहे के गर्म औजार द्वारा  लकड़ी की सतह को दाग कर चिह्न बनाने की परंपरा देखने को मिलती है, लेकिन बस्तर के आदिवासी काष्ठशिल्प में इसका उपयोग बहुत ही कलात्मक रूप में देखने को मिलता है। इस पद्धति के प्रयोग से वे तम्बाकू रखने की डिब्बियों, धनुष बाण, बांसुरी, कुल्हाड़ी, कंघियां, गेड़ी, चरहे एवं अन्य सजावटी कृतियों को अलंकृत करते हैं। इस पद्धति से लकड़ी की सतह पर अकृति तो उभरती ही है, साथ ही गर्म लोहे से जलने के कारण काली-भूरी रेखाएं भी उभर आती हैं, जिससे बनी आकृति और भी आर्कषक दिखने लगती है। अलंकरण के लिए शिल्पी लोहे के चाकू को भट्ठी में रक्त-तप्त करते हैं एवं गरम चाकू से लकड़ी को बनाए जाने वाले डिजाइन के अनुरूप उकेरते हुए दागते हैं। इस प्रकार दागने से लकड़ी का वह भाग जल जाता है और बनाई जाने वाली आकृति उभर आती है।

 

                                                                                                        

                                                                                                                      रक्त तप्त लोहे के चाकू से लकड़ी की सतह को जलाकर अलंकरण करता मुरिया शिल्पी (फोटो:२०१८)

                                                                                                                   

यदि हम बस्तर के पारम्परिक काष्ठशिल्प पर दृष्टिपात करें तो प्रतीत यह होता है कि उनका एक बड़ा भाग मुरिया आदिवासियों की घोटुल संस्कृति से जुड़ा है। इसमें कंघियां, मुखौटे, तम्बाकू रखने की डिब्बियां, वाद्ययंत्र, दरवाजे, विभिन्न प्रकार के खाम्ब एवं उपयोगी वस्तुएं प्रमुख हैं। माना जाता है कि बस्तर की काष्ठशिल्प परम्परा में एक बड़ा मोड़ काकतिय राजाओं द्वारा जगन्नाथ पुरी से देवी का रथ बनाने वाले काष्ठशिल्पी लाने के बाद हुआ । अन्य प्रकार की मूर्तियों एवं नक्काशीदार पैनल आदि का प्रचलन बस्तर में सन 1964 में आए बंगाली शरणार्थियों द्वारा काष्ठशिल्प का व्यापार आरंभ करने के बाद हुआ जान पड़ता है।

 

वर्ष 1970 के बाद जब बस्तर के काष्ठशिल्प शहरी बाजार में आ गए और उनकी मांग बढ़ी तो अनेक आदिवासी एवं गैर-आदिवासी युवकों ने इसे अजीविका का साधन बना लिया। आज बस्तर का काष्ठशिल्प शहरी बाजार में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना चुका है। देश के कुछ निर्यातक इनका निर्यात भी करते हैं।

 

वास्तव में आज स्वयं बस्तर के आदिवासी अपने उपयोग के लिए बहुत ही कम काष्ठशिल्प बनाते हैं। मुरिया आदिवासियों की घोटुल व्यवस्था लगभग समाप्त हो चुकी है। इसके कारण मुरिया युवकों द्वारा घोटुल में बनाए जाने वाले काष्ठशिल्प अब नहीं बनाए जाते हैं। उनके द्वारा लकड़ी की कघियां, तम्बाकू रखने की डिब्बियां एवं अलंकृत दरवाजे, मुखौटे, चरहे (वाद्ययंत्र) आदि स्वयं के उपयोग के लिए बनाया जाना बहुत कम  हो चुका है। माड़िया आदिवासी भी लकड़ी के मृतक स्तम्भों के स्थान पर पत्थर या सिमेंट के मृतक स्तम्भ बनवाने लगे हैं। आज बस्तर का पारंपरिक काष्ठशिल्प पूरी तरह व्यवसायिक होता जा रहा है । 

 

 

काष्ठशिल्प के केन्द्र

 

वर्तमान में बस्तर के अनेक गांवों में काष्ठशिल्प बनाने का काम होता है। यह गांव जगदलपुर, देउरगांव, परचनपाल, मन्धोता, मुंजला, तारागांव, सोनारपाल, गोलावंड, करणपुर, बडरा, उमरगांव, नाहरपारा, कुसमा, मोलाई, गढ़बंगाल, कौलचुर, भॉड, मुंडागांव, बनियागांव, एड़का और बखुरूपारा आदि है। दंतेवाडा क्षेत्र के गीदम, कटे कल्याण, भेरमगढ़ एवं फरसपाल गांव में माड़िया मृतक स्तंभ बनाने का काम होता है। गढ़बंगाल, भॉड, इच्छापुर, गोलावंड, उमरगांव आदि में अब भी अच्छे परंपरागत काष्ठशिल्प बनाए जाते हैं। जगदलपुर एवं देउरगांव नक्काशीदार फर्नीचर, सजावटी पैनल एवं मूर्तियां बनाने के सबसे बड़े केन्द्र बन चुके हैं।

 

जगदलपुर: यहां सबसे अधिक काष्ठशिल्पी कार्यरत है, जिनमें अधिसंख्य बंगाली एवं उड़िया कारीगर हैं। कुछ लोहार, गोण्ड एवं मुरिया आदिवासी भी काम करते हैं। यहां नक्काशीदार फर्नीचर एवं सजावटी मूर्तियां अधिक बनाई जाती हैं, जिनका स्वरूप बस्तर की आदिवासी कला एवं बंगाल की काष्ठ नक्काशी का मिश्रित रूप है। इसका प्रमुख कारण वर्ष 1964 के लगभग जगदलपुर आकर बसे बंगाली शर्णाथियों द्वारा काष्ठशिल्प का व्यवसाय करना रहा। उन्होंने एक विशेष शैली की मानव आकृतियां एवं सजावटी सामान बनाना आरंम्भ किया। आज जगदलपुर के काष्ठशिल्प बाजार पर बंगाली शिल्पियों एवं व्यापारियों का ही अधिपत्य है ।

कार्यरत काष्ठशिल्पी  (फोटो:२०१८)

परचनपाल: यहां छत्तीसगढ़ शासन द्वारा स्थापित एक शिल्पग्राम, एम्पोरियम एवं काष्ठशिल्प कार्यशाला है। लगभग 20 आदिवासी काष्ठशिल्पी यहां काम करते हैं। यहां छोटा फर्नीचर एवं सजावटी मूर्तियां बनाई जाती हैं।

 

देउरगांव: कोण्डागांव से जगदलपुर जाने वाली मुख्य सड़क पर स्थित देउरगांव काष्ठशिल्प का प्रमुख केन्द्र है। यद्यपि यहां पारिम्पक आदिवासी काष्ठशिल्प नहीं बनाए जाते लेकिन यहां बनाए जाने वाले नक्काशीदार फर्नीचर एवं सजावटी मूर्तियां बस्तर की आदिवासी पारिम्परिक काष्ठशिल्प कला के बहुत नजदीक हैं, जो बस्तर की वर्तमान आदिवासी काष्ठशिल्प कला का प्रतिनिधित्व करते हैं। यहां एक एम्पोरियम, एक बड़ा वर्कशॉप और काष्ठशिल्पियों की एक संस्था भी है, जहां काष्ठशिल्प का प्रशिक्षण दिया जाता है।

 

मंधैाता: मंधौता काष्ठशिल्प का पारम्परिक केन्द्र नहीं है। वर्ष 2003–04 मे प्रशासन द्वारा यहां काष्ठशिल्प प्रशिक्षण केन्द्र खोला गया। इस केन्द्र में 20 महिलाओं को काष्ठशिल्प का प्रशिक्षण दिया गया है, जो छोटे आकार की सजावटी मूर्तियां तैयार करती हैं।

 

इन गांवों के अतिरिक्त मंजुला, तारागांव, सोनारपाल, भॉड़, इच्छापुर, मुंडागांव आदि में भी कुछ काष्ठशिल्पी काम करते हैं।  

 

गोलावंड: बस्तर के सबसे अच्छे परंपरागत आदिवासी काष्ठशिल्प बनाने का काम इसी गांव में होता है। इस गांव में केवल पांच शिल्पी ही कार्यरत हैं, जिनमें सुकमन लोहार का काम सर्वश्रष्ठ है। उन्हें भारत सरकार का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला है। वे माताझूला एवं देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाने में विलक्षण हैं। उनके बनाए माताझूला भारत भवन भोपाल एवं शिल्प संग्रहालय नई दिल्ली में संग्रहित हैं।

 

गढ़बंगाल: यह गांव आरंभ से ही पारम्परिक काष्ठशिल्प का केन्द्र रहा है। मुरिया आदिवासी बहुल इस क्षेत्र में यहां के अधिकांश काष्ठशिल्पी मुरिया युवक ही हैं। मधर, बेलगूर, पन्डी, रामू आदि यहां के जाने-माने काष्ठशिल्पी रहे हैं। मंधर अब जीवित नही हैं, लेकिन बेलगूर अब भी बहुत ही सुंदर कंघियां बनाते हैं। इस क्षेत्र में घोटुल संस्कृति अब भी कुछ बची हुई है। इस कारण नृत्य गान में काम आने वाले उपादान यहां आज भी बनाए जाते हैं। नक्काशीदार दरवाजे, माताझूला, मृतक स्तंभ, एवं आदिवासी मूर्तियां, कंघियां, तम्बाकू की डिब्बियां, तीर-धनुष, कुल्हाड़ी, बांस की नक्काशीदार बांसुरी आदि यहां से बनवाए जाते थे। यहां लकड़ी पर गर्म चाकू से जलाकर सुन्दर डिजाइन बनाने का काम बहुत अच्छा होता है।

 अलंकृत कंघी उकेरता मुरिया काष्ठशिल्पी (फोटो: २०१८)

 

इसके अतिरिक्त करनपुर  में लगभग बारह काष्ठशिल्पी हैं। बड़रा में पांच काष्ठशिल्पी हैं। उमरगांव में लगभग आठ काष्ठशिल्पी हैं। नाहरपारा में बारह काष्ठशिल्पी हैं। कुसमा में छः काष्ठशिल्पी हैं। मोलाई में लगभग बारह काष्ठशिल्पी कार्यरत हैं।

पारम्परिक काष्ठशिल्प

 

अध्ययन की सुगमता के लिए बस्तर के पारम्परिक काष्ठशिल्प निम्न वर्गों मे रखे जा सकते हैं।

 

  • दशहरा रथ
  • देव प्रतिमाएं
  • आनुष्ठनिक उपादान
  • नृत्य-संगीत के उपकरण
  • उपयोगी वस्तुएं
  • बाजार उन्मुख समकालीन काष्ठशिल्प

 

 

दशहरा रथ

 

 

रथ, कभी भी आदिवासी संस्कृति एवं जीवनशैली का अंग नहीं रहे हैं। देवी-देवताओं हेतु रथ बनाने की प्रथा बस्तर के आदिवासियों की मूल प्रथा नहीं है। बस्तर के काकतिय वंश के राजाओं द्वारा अपनी इष्टदेवी दतेंश्वरी के लिए प्रति वर्ष दशहरे पर रथयात्रा आयोजित कराने और रथ बनवाने की प्रथा को समय बीतने के साथ ही आदिवासियों ने अपना लिया। डॉ. राम कुमार बेहार के अनुसार महाराज पुरूषोतम देव सन 1465 में पुरी गए थे। लौटते हुए वे वहां से रथ बनाने वाले कारीगर भी लेते आए थे। लेखक बंसत लाल झा के अनुसार महाराज पुरुषोतम देव को पुरी के राजा द्वारा 16 चक्रों का रथ देने का आदेश हुआ था, परन्तु राजा पुरुषोतम देव ने उनमें से चार चक्र जगन्नाथजी को दे दिए और तब से प्रतिवर्ष गोंचा पर्व के अवसर पर चार चक्रों के रथ पर जगदलपुर में जगन्नाथजी की शोभा यात्रा निकाली जाती है। शेष 12 चक्रों का रथ उन्होंने अपनी इष्टदेवी दंतेश्वरी को दे दिया। कहा जाता है  पहले 12 चक्रों का रथ ही चलता था, लेकिन उसे चलाने में असुविधा होने के कारण आठ और चार चक्रों के दो रथ बनाए जाने लगे और तब से दशहरे पर दो रथ चलाए जाते हैं।

                                                                                                                                                                                                         

                                                                                                                                            दशहरा रथ का ढांचा 

 

प्रो. बेहार लिखते हैं कि रथ का निर्माण कार्य मउरगांव की संवरा जनजाति के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी से करते आ रहे हैं। रथ की लकड़ी लाने का कार्य अलग-अलग गांवों के जिम्मे है। रथ निर्माण में कोई बढ़ई नियुक्त नहीं किया जाता। सब काम आदिवासी अपने परम्परागत औजारों से करते हैं। रथ की सजावट का कार्य बीरनपाल गांव के आदिवासी करते हैं।                                                                           

                                                                                   

                                                                                                                       रथयात्रा के लिए बनाया गया  छोटा रथ। (फोटो:१९९८ )

 

बाद में जगदलपुर में दशहरा पर आयोजित की जाने वाली प्रमुख एंव राजवंशीय रथयात्रा की देखा-देखी अनेक गावों के लोग भी अपने गांव में स्थापित दंतेश्वरीमाता की रथयात्रा आयोजित करने लगे हैं। इसके लिए वे छोटा रथ बनाकर गांव की मातागुढ़ी में रखते हैं और उसे जात्रा के अवसर पर सजाकर बाहर निकालते हैं।

 

 

देव प्रतिमाएं

 

बस्तर के अधिकांश आदिवासी मूर्ति पूजक नहीं रहे हैं। अनगढ़ पत्थर एवं अन्य प्रकृतिक वस्तुएं ही उनके लिए देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। संभवतः इसी कारण बस्तर में काष्ठ निर्मित देव प्रतिमाएं बहुत ही कम हैं। यूं कहे कि यहां देवी-देवताओं की काष्ठ प्रतिमाएं बनाने का रिवाज आमतौर पर नहीं के बराबर है। कुछ पुरानी मातागुढ़ियों में सीतलामाता, बूढ़ीमाता आदि की काष्ठप्रतिमा मिलती हैं, जो बहुत ही सादा और विवरण रहित हैं।

 

                                                                                      

                                                                                                                                                     देवी काष्ठ प्रतिमाएं (फोटो: २०१८)

वर्तमान में जो काष्ठ देव प्रतिमाएं बस्तर की आदिवासी कला के नाम पर बाजार में बिक रहीं हैं, वे आदिवासियों द्वारा बनाई जाती हैं, लेकिन केवल बेचने के लिए या शौकिया तौर पर घोटुल में रखने के लिए। डॉ. वैरियर एल्विन ने मध्य भारत की आदिवासी कलाओं का विस्तृत लेखजोखा प्रस्तुत किया है, लेकिन उसमें इन काष्ठ देव प्रतिमाओं का कोई उल्लेख नहीं है। इसी प्रकार पंडित केदारनाथ ठाकुर ने भी अपनी पुस्तक, बस्तर भूषण, में इनका कोई उल्लेख नहीं किया है। प्रतीत यह होता है कि इस प्रकार की काष्ठ प्रतिमाओं का चलन बस्तर में दशहरा की रथयात्रा आरंभ होने के बाद हुआ होगा, क्योंकि रथ की सजावट के लिए लकड़ी की मूर्तियां बनाई जाती थी। 

 

 

आनुष्ठानिक उपादान

 

बस्तर के आदिवासियों में काष्ठ शिल्प मुख्यतः आनुष्ठानिक उपादानों के रूप में ही पाए जाते हैं, जो विभिन्न अनुष्ठानों का अभिन्न अंग होते हैं। इन्हें निम्न समूहों में बांटा जा सकता है चलायमान देवस्थान, विभिन्न प्रकार के खाम्ब  एवं माता झूला

 

चलायमान देवस्थान: आंरभ में आदिवासी समाज एक घुमक्कड़ समाज होता था। वे एक जगह टिक कर नहीं रहते थे। संभवतः इसी वजह से उनके देवस्थान भी स्थानांतरित होते रहते थे। चलायमान देवस्थान बनाने की परंपरा इसी कारण अस्तित्व मे आई होगी। वर्तमान में बस्तर में अनेक प्रकार के चलायमान देवस्थान भी बनाए जाते हैं। जात्रा एवं मढ़ई में देवी-देवता के प्रतिनिधि-स्वरूप इन्हें ले जाया जाता है। इनका विवरण निम्न प्रकार हैः

                     

 

 

 

 

             

                                               देवी का चलायमान देवस्थान - डोली (फोटो: १९९८)                                                                                                             पाटदेव का चलायमान देवस्थान - आंगा  (फोटो:१९९८)

              ​                                                                                                                                                                                                                                                          

  चलायमान देवस्थान - विमन (मंदिर) (फोटो: १९९८) 

 

 

         

 

                                                 चलायमान देवस्थान - कुर्सी  (फोटो: १९९८)                                                                                                                      अनुष्ठानिक कुर्सी पर की गयी नक्काशी।(फोटो:१९९८)                                          

खाम्ब -  खाम्ब एक लकड़ी से बना एक मोटा एवं लम्बा खूंटा है। सामान्यतः आदिवासियों में एवं एक हद तक गैर-आदिवासियों में भी विभिन्न अवसरों पर खाम्ब स्थापित करने की प्रथा है। यह खाम्ब किसी वृक्ष का तना या शाख से बना अनगढ़ खूंटा भी हो सकता है। इस पर नक्काशी की गई हो सकती है। यह खाम्ब किसी देवी-देवता का प्रतिनिधि-स्वरूप भी हो सकता है और किसी अवसर विशेष पर किसी अनुष्ठान पूर्ति हेतु भी स्थापित किया जा सकता है।

    

                                                       घोटुल खांब (फोटो: २०१८)     

 

         

                                                   मड़िआ मृतक स्मृति खांब (फोटो: १९९८)                                                                                                                             

बस्तर के आदिवासियों में विभिन्न आयोजनों एवं अनुष्ठानों के लिए अलग-अलग प्रकार के खाम्ब स्थापित करने की परम्परा रही है। इनमें कुछ खाम्ब देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। भीमा देव के लिए उनके देवस्थान पर स्थापित किया जाने वाला खाम्ब इसी श्रेणी में आता है। विवाह खाम्ब, बलिदान खाम्ब और माड़िया मृतक खाम्ब महत्वपूर्ण अनुष्ठानों की पूर्ति हेतु बनाए जाने वाले खाम्ब हैं, जबकि घोटुल खाम्ब सजावट एवं उपयोग की दृष्टि से बनाया जाता है।

 

झूला: झूला सत्ता, एश्वर्य, विलासिता, प्रतिष्ठा एवं वैभव का प्रतीक है। प्राचीन काल से ही झूला, देवी-देवताओं एवं राजसी वैभव के साथ जुड़ा रहा है। आदिवासियों एवं गैर-आदिवासी सभी समाजों में यह देव स्थान एवं अनुष्ठानों का महत्वपूर्ण अंग रहा है। हिन्दू समुदाय में झूला देवी-देवताओं के साथ एक महत्वपूर्ण उपादान है। आदिवासी समुदायों में झूला उनके देवी-देवताओं के साथ कब और कैसे जुड़ा यह कहना कठिन है, लेकिन बस्तर में यह बहुत पहले से ही देव गुढ़ी एवं पूजा अनुष्ठानों का महत्वपूर्ण अंग है। यहां के शिल्पी लकड़ी, लोहा, पीतल-कांसा आदि माध्यमों से देवी झूला बनाते हैं। यहां विशेष बात यह है कि किसी पुरुष देव को झूले पर बैठने का अधिकार नहीं है, केवल देवियां ही इस पर झूलती हैं।  

        

                                                     माता गुड़ी का  कांटा झूला (फोटो: २०१८)                                                                                                         माता गुड़ी का नक्काशीदार दोहरा माता झूला  (२००८)

अधिकांश शिल्पी यह बताते हैं कि बस्तर के आदिवासी समाज में झूला मूलतः एक परीक्षण उपकरण था, जिसे देव गुढ़ी के प्रांगण में इसलिए स्थापित किया जाता था कि वे जांच सकें कि गुनिया पर आई हुई देवी सत्य है अथवा नहीं।  इन झूलों की सीट पर नुकीली मोटी कीले जढ़ी होती हैं, जिन पर बैठकर गुनिया अपनी सत्यता की परीक्षा देता है। संभवतः बाद में जब देवी की प्रतिमाएं बनने लगीं तब उन्हे झूले में बैठा हुआ भी बनाया जाने लगा। ये झूले दो प्रकार के होते हैं, कांटा झूला और माता झूला।

 

 

उपयोगी वस्तुएं

 

आदिवासी लकड़ी से निर्मित घरेलू व जीवनोपयोगी वस्तुओं में भी कलात्मक अलंकरण व आकृतियां बनाते हैं। बस्तर की मुरिया जनजाति अत्यन्त कलाप्रिय है,  इसीलिए वे अपने दैनिक उपयोग की वस्तुओं में कलात्मक अलंकरण बनाकर उन्हें सुन्दरता प्रदान करते हैं। वे अपने चाकू,  हंसिया, बाल-संवारनें की कंघियां या हेअर पिन,  दारा-कसेर नामक चाकू,  कुतुल (पीढ़ा), अनाज मापक काठा, पईली, सन्दूक, दाल घोटनी, दर्पण के फ्रेम, लकड़ी की घिर्री, तीर-धनुष, लकड़ी की कुल्हाड़ी, लड़ाई के अस्त्र, भाले आदि पर भी सुन्दर अलंकरण बनाकर सजावट करते हैं। नृत्य के लिए उपयोगी गेड़ियों में कलात्मक अलंकरण बनाई जाती हैं। कुछ महत्वपूर्ण कलात्मक उपयोगी वस्तुए निम्न हैः

 

पड़िया (कंघियां): प्राचीन काल से ही हड्डियों, पशु-सींग, हाथी दांत, धातु एवं लकड़ी से निर्मित कंघियों का इस्तेमाल होता रहा है। आदिवासियों के सामाजिक जीवन में कंघियां मात्र प्रसाधन का साधन नहीं हैं, वरन उनकी सामाजिक संरचना, धार्मिक विश्वास, मान्यताओं और गहरी आस्था से जुड़ा जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है।

      

                              मुरिआ जनजाति की युवतियों द्वारा प्रयोग में लायी जाने वाली कंघी                                                                           कंघी बालों में खोंसे मुरिआ जनजाति की युवती  (फोटो:२०१८)

 

बस्तर की मुरिया जनजाति के युवक-युवतियों के लिए कंघी अन्य लोगों से अधिक अर्थपूर्ण होती है, क्योंकि घोटुल घरों के आत्मीय क्षणों में यह बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह पीठ तथा बांह को गुदगुदाने के लिए प्रयोग की जाती है। तम्बाखू रखने के केस की तरह प्रयुक्त की जाती है। यह प्रेम और आपसी सम्बन्धों को दर्शाती है। यह एक अत्यन्त लोकप्रिय व्यक्तिगत गहना मानी जाती है। मुरिया युवक अपनी मित्र युवतियों के लिए विशेष तौर से कंघियां बनाते हैं, जिसे युवतियां अपने बालों में सजाती है। कंघियां कुंआरेपन का प्रतीक हैं। इसलिए मुरिया लोगों में यह सामाजिक नियम ही बन गया है कि विवाहित युवती को एक निश्चित समय सीमा में युवकों द्वारा दी गई कंघियां बालों से निकाल देनी होगी।   

 

गौटा (तम्बाकू की डिब्बी): बस्तर में आमतौर पर तम्बाकू का सेवन किया जाता है। स्त्री-पुरुष, बच्चे-बूढे, जवान सभी इसके शौकीन होते हैं। अधिकांश लोगों के पास तम्बाकू रखने की डिब्बी रहती है। यह डिब्बी लकड़ी की बनाई जाती है, जो गौटा के नाम से प्रसिद्ध है।

 

ये डब्बियां अधिकतर शंखाकार होती हैं, लेकिन अब यह विभिन्न आकार-प्रकार मे उपलब्ध होती जा रही हैं। लकड़ी की डिब्बी अच्छे प्रकार से कारीगरी के साथ बनाई जाती है। इन डिब्बियों में सीसा मढ़ कर और भी खूबसूरत बनाया जाता है। डिब्बियों को कमर में खोंस लेते हैं।

 

 

मुखौटे:  एक समय मुखौटे बस्तर की आदिवासी काष्ठशिल्प परंपरा का महत्वपूर्ण अंग थे, लेकिन आज वे विस्मृत हो चुके हैं। इनका प्रयोग वास्तविक आदिवासी जीवन में लगभग समाप्ति पर है। मुखौटा यानी जो मुख की ओट करे, अर्थात चेहरे पर चढ़ाया गया नकली चेहरा। मुखौटा किसी का रूप धारण करने हेतु लगाया जाता है। दूसरे तरह के मुखौटे नृत्य, नाट्य् आदि में लगाए जाते हैं।

                                                                                 

                                                                                                                                   बस्तर की मुरिआ जनजाति के मुखौटे (फोटो:२००८)

वेरियर एलविन ने आदिवासी मुखौटों के बारे में लिखा है कि बस्तर की मुरिया जनजाति के मुखौटे आनुष्ठानिक नृत्यों के लिए बनाए जाते हैं। नियमित नृत्यों में टोली का कोई मजाकिया व्यक्ति मुखौटा पहनकर नर्तकों के चारों ओर कूद-फांद कर मनोरंजन करता है। मुरिया जनजाति के छेरता उत्सव में नृत्य के अवसर पर मुखिया, जिसे नकटा कहा जाता है, एक मुखौटा पहनता है, जो आमतौर पर तूम्बे का बनाया जाता है। मुखौटा पहने होने के कारण चेहरा न दिखने से उसकी सहज प्रवृत्तियां खरमस्ती के लिए उसे खूब अभिप्रेरित करती हैं। मुरिया मुखौटे में पीतल के दो छल्ले आंखों के लिए लगाए जाते हैं। नाक मधुमक्खी के मोम की बनायी जाती है। मुंह के लिए एक छेद काट कर बना दिया जाता है और दांत दर्शाने के लिए चावल के दाने लगा दिए जाते हैं। दाढ़ी के लिए बकरी अथवा भालू के बाल चिपका दिये जाते हैं और सिर पर मोर पंखों का एक गुच्छा लगा दिया जाता है। आज इस प्रकार के मुरिया मुखौटे बहुत ही कम देखने को मिलते हैं। घोटुल व्यवस्था के साथ इन मुखौटों का भी प्रचलन समप्ति पर है।

 

बस्तर की भतरा जनजाति में भतरा नाट्य की परम्परा रही है। इस नाट्य में विभिन्न मुखौटों का चलन है। गणेश, जामवन्त, हनुमान, ताड़का, नरसिंह, बाली, सुग्रीव आदि पात्रों के लिए मुखौटों का प्रयोग किया जाता है। भतरा नाट्य के यह मुखौटे उड़ीसा की मुखौटा बनाने की परंपरा से बहुत प्रभावित हैं और संभवतः उन्हीं के संसर्ग से भतरा आदिवासियों में प्रचलन में आए हैं। ये मुखौटे आज भी प्रचलन में हैं।

 

मुखौटों के निर्माण के लिए सिवना, सागौन, आम, खमार, सेमर, डूमर, सलैया की लकड़ी का चयन करते हैं। ये मुखौटे वजनी और बड़े होते हैं। एक निश्चित आकार की ठोस व मोटी लकड़ी को सावधानी-पूर्वक खोखला किया जाता है। मुख्य भाग पर नाक, कान, के चिह्न बनाए जाते हैं। मुंह और आंख बनाने के लिए उस भाग को काट दिया जात है। मुखौटे का मुंह अक्सर चैकोर अथवा आयताकार रखा जाता है। कभी-कभी नथुने भी खोखले कर दिए जाते हैं। मुखौटों की आकृतियों के अनुसार उनमें साज-सज्जा भी की जाती है। नाक, कान, आंखों की सजावट के लिए लाल, सफेद रंगों का प्रयोग किया जाता है। चावल, कद्दू के बीज, लकड़ी के टुकड़े या शीशे के टुकड़े से दांत बनाए जाते हैं। दाढ़ी के लिए गाय, बकरी, घोड़ा, भालू के बाल मोम से चिपका दिए जाते हैं। कहीं-कहीं रंग-रेखाओं से भी बाल दर्शाए जाते हैं। लकड़ी के अतिरिक्त तूम्बे से भी मुखौटा बनाया जाता है।

 

दारा-कसेर (मुरिया चाकू): मुरिया आदिवासी युवक दारा-कसेर नामक  एक चाकू का प्रयोग करते हैं, जो कि कमर में बांधा जाता है। इस चाकू के खोल पर सुन्दर आकृतियां उकेरी जाती हैं। इस पर सामान्यतः फूल, ज्यामितिय डिजाइनें तथा कभी-कभी जानवरों की सुन्दर आकृतियां बनाई जाती हैं।

 

कुतुल (पीढ़ा): मुरिया जनजाति के युवा-गृह घोटुल में बैठने तथा सिरहाने रखने के लिए एक विशेष प्रकार का पीढ़ा जिसे हल्बी बोली में 'कुतुल' कहते हैं, काम आता है। इस पीढ़े पर नक्काशी द्वारा अलंकरण भी किया जाता है। वे इनमें अधिकांशतः आड़ी तिरछी रेखाएं, ज्यामितीय डिजाइनें बनाते हैं। कभी-कभी कंघियां और मानव-आकृतियां भी उकेरी जाती हैं। इस प्रकार के पीढ़ा नारायणपुर एवं कोण्डागांव क्षेत्र में बनाए जाते हैं।

 

                                                                                     

                                                                                       मुरिया जनजाति के युवा-गृह घोटुल में बैठने तथा सिरहाने रखने के लिए एक विशेष प्रकार का पीढ़ा (फोटो: १९८९)

 

पइली: बस्तर में चावल, दाल एवं अनाज मापने के लिए तराजू के स्थान पर एक प्रकार के बर्तन का प्रयोग किया जाता है, जिसे पइली, पइला अथवा काठा भी कहा जाता है। विभिन्न भारों के लिए अलग-अलग  माप के पईला होते हैं। पइला वास्तव में लकड़ी का बना हुआ एक बेलनाकार बर्तन होता है। अनेक बार इन पर कलात्मक डिजाइनें उत्कीर्ण की जाती हैं। इन पर बनी आकृतियां काफी आकर्षक होती हैं। इनमें प्रमुख रूप से बेलबूटे, फूल-पत्तियां, मानव आकृतियां, पशु-पक्षी आकृतियां और ज्यामितीय अलंकरण उकेरे जाते हैं।

 

ढेकी: यह धान कूटने का एक घरेलू उपकरण है, जो लगभग प्रत्येक कृषक के घर में होता है। इसकी सहायता से धान का छिलका अलग करके चावल निकाला जाता है। इसे ठेमरू वृक्ष की लकड़ी से बनाया जाता है, जो बहुत ही सख्त और मजबूत होती है। कई बार ढेकी के मुख्य खूंटे को सुन्दर आकृति में बनाया जाता है।

 

लकड़ी की कुल्हाड़ी:  बस्तर के आदिवासी सामान्य जीवन में लोहे से बनी कुल्हाड़ी जिसे वे टंगिया कहते हैं, का प्रयोग करते हैं। नृत्य समारोहों में कुछ नर्तक लकड़ी की कुल्हाड़ी को लेकर भी नृत्य करते हैं। वे लकड़ी की इन कुल्हाडियों पर सुन्दर डिजाइन बनाकर सजावट करते हैं। इन पर अलंकरण के लिए शिल्पी लोहे के गरम चाकू से लकड़ी पर बनाए जाने वाले डिजाइन के अनुरूप दागते हैं। वे इनमें अधिकांशतः आड़ी तिरछी रेखाएं, ज्यामितीय डिजाइन, मछली, सर्प, कंघियां, सूर्य, और चन्द्रमा के चित्र बनाते हैं। इस प्रकार की कुल्हाड़ियां नारायणपुर, कोण्डागांव एवं जगदलपुर क्षेत्र में बनाई जाती हैं। आजकल शहरी बाजार में इनकी बहुत मांग है।

 

दरवाजे: मुरिया घोटुल गृह एवं देवगुढ़ी के दरवाजों पर सुन्दर व सुरूचिपूर्ण अलंकरण करते हैं। दरवाजों पर पशु-पक्षी, चन्द्र-सूर्य, मनुष्य, कंघियां, फूल और कई ज्यामितीय डिजाइनें बनाई जाती हैं। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, भोपाल द्वारा मरकाबेड़ा बस्तर के घोटुल से प्राप्त दो पल्लों के दरवाजे पर मैथुनरत युवक-युवती, नाचते हुए पुरुष, कंघियां, सूरज-चन्द्रमा, फूल तथा कई प्रकार के ज्यामितीय डिजाइन देखने को मिलते हैं। जैसे पक्षी के लिए पंखों का जोड़ा, मछलियों के लिए हड्डियां और कछुए के लिए अंडाकार आकृति में मुंह और पैर दर्शाते हैं। उर्वरता और स्थायित्व के प्रतीक मछलियों और कछुए का अंकन किया जाता है। जनजातीय अवधारणा में दरवाजों पर उकेरी गई आकृतियां और चिह्न शुभ-सूचक व मांगलिक होते हैं। वे दुष्ट आत्माओं के प्रकोप और बाह्य बाधाओं के गृह-प्रवेश होने से रोकते हैं और उनकी रक्षा करते हैं।

 

                                                                          

                                                                                                                                       देवगुड़ी का नक्काशीदार दरवाज़ा (फोटो:२०१८)

आज बस्तर के किसी भी घोटुल गृह या देवी गुढी में कलात्मक दरवाजे देखना दुलर्भ हो गया है। यह प्रथा भी लगभग समाप्ति पर है। शहरी बाजार हेतु इस प्रकार के दरवाजे बनाए जाने लगे हैं। मैंने अपने शोधकार्य के दौरान कौण्डागावं क्षेत्र की एक मातागुढ़ी में दरवाजे की चैड़ी चैखट पर सुन्दर एवं कलात्मक नक्काशी देखी, जिस पर आदिवासी अनुष्ठानों सम्बंधी गतिविधियां एवं प्रतीक चिह्न उकेरे गए थे।

 

 

नृत्य-संगीत के उपकरण

 

गेड़ी: बस्तर की मुरिया जनजाति में गेड़ी नृत्य एक लोकप्रिय नृत्य है। इस नृत्य में युवक बांस एवं लकड़ी से बनाई गेड़ियों पर चढ़कर नृत्य करते हैं। गेड़ी  लगभग छः फिट लम्बे बांस में लगभग दो फिट की ऊंचाई पर लकड़ी का एक प्लेटफार्म जोड़कर बनाई जाती है। इस प्लेटफार्म पर पैर रखकर नर्तक खड़ा होता है तथा दोनों पैरो में गेड़ियों द्वारा संतुलंन बनाए रखकर नृत्य करता है। इस नृत्य के लिए उपयोगी गेड़ियां, जिन्हे हल्बी बोली में डिटांगे कहा जाता है, पर अनेक युवक सुन्दर एवं कलात्मक डिजाइन बनाते हैं। ये डिजाइन रेखिक एवं ज्यामितिक होते हैं। नारायणपुर क्षेत्र के  लगभग प्रत्येक गांव के घोटुल में गेडियां उपलब्ध रहती हैं।

                                 गेड़ी नृत्य करते एवं डुडरा वाद्य बजाते मुरिआ युवक (फोटो: २०१८)

 

चरहेः यह एक प्रकार का वाद्ययंत्र है, जिसे लकड़ी एवं बांस से बनाया जाता है। बस्तर की मुरिया जनजाति के युवकों में चरहे नृत्य अत्यंत लोकप्रिय है। इस नृत्य के अवसर पर नर्तक अपने कन्धे पर चरहे रखता है। चरहे में एक लगभग चार फिट लम्बा बांस का टुकड़ा होता है, जिसके शीर्ष पर लकड़ी की चार चिड़िया लगी होती हैं, इन चिड़ियों की गर्दन एवं धड़ अलग-अलग होते हैं, जिन्हे एक धागे द्वारा एक-दूसरे से सम्बद्ध किया जाता है। प्रत्येक चिड़ियां को संचालित करने हेतु एक धागा होता है और सभी धागों का मुख्य सिरा नर्तक के हाथ में होता है। नर्तक जब भी धागे को खींचता है,  चिड़िया की गर्दन ऊपर-नीचे होती है और लकड़ी के पट्टे आपस में टकराकर आवाज करते हैं। लयबद्ध तरीके से जब सभी नर्तक धागा खींचते और छोड़ते हैं, तब एक तालबद्ध ध्वनि उत्पन होती है। इसी ध्वनि पर चरहे नृत्य होता है। यह नृत्य नारायणपुर क्षेत्र में अधिक प्रचलित है।                                                                         

                                                             

 

     

                                                 चरहे वाद्ययंत्र (फोटो: १९९८)

                                                                                

                                                             चरहे वाद्ययंत्र (फोटो: १९९८)

मांदरीः मांदरी एक प्रकार के ढ़ोलक जैसा वाद्ययंत्र है, जो बीजा वृक्ष की लकड़ी को खोखला करके बनाया जाता है। आदिवासी युवक अपने लिए इसे स्वयं ही बना लेते हैं। इसके दोनो सिरों पर बैल का चमड़ा मढा जाता है। चमड़े को आपस में सूत की डोरी द्वारा कस लिया जाता है। बीजा वृक्ष की लकड़ी की यह विशेषता होती है कि यह सूखकर फटती नहीं है। यह वाद्य गोण्ड,  माड़िया आदिवासियों का प्रिय वाद्य है। युवक इसे कुडड़िग एंदना नृत्य जो विवाह एवं अन्य उत्सवों पर किया जाता है, बजाते हैं।

 

डुडरा: यह बीजा की लकड़ी का बना वाद्ययंत्र है, जिसे अधिकांशतः गौण्ड, मुरिया, माडिया आदिवासी युवक गले में लटका कर नृत्यों के समय बजाते हैं। इसे डेढ़ फिट लम्बा और लगभग छः इंच मोटा रखा जाता है। यह लकड़ी की बनी चपटी आयताकार एवं खोखली घंटी के समान होता है, जिसे लकड़ी की दो छड़ों की सहायता से पीट-पीटकर बजाया जाता है। कुछ लोग इस पर नक्काशी भी करते हैं।

 

 

बाजारोन्मुख समकालीन काष्ठशिल्प

 

वर्तमान में बस्तर में बनाए जाने वाले काष्ठशिल्पों का लगभग 90 फीसदी भाग शहरी बाजार हेतु बनाई जाने वाली काष्ठ कलाकृतियां हैं। बस्तर के काष्ठशिल्पियों की अजीविका शहरी बाजार पर ही निर्भर करती है। इनमें नक्काशीदार फर्नीचर एवं सजावटी पैनल बड़ी मात्रा में बनाए एवं बेचे जाते हैं।

               

                                                                           आदिवासी स्त्रियां  (फोटो: २००८)                                                                                          सल्फी झाड़ से सल्फी हांडी  उतरतीं आदिवासी स्त्रियां (फोटो: २००८)

 

                                                                 

                                                                                     

                                                                                                                                                        नक्काशीदार फर्नीचर (फोटो: २००८)

 

शहरी ग्राहकों के लिए बनाए जाने वाले बस्तर के काष्ठशिल्पों में लकड़ी की विभिन्न मूर्तियां, मुरिया युगल, माड़िया-माड़िन, माता-शिशु, पनिहारिन, लकड़हारिन, नृत्यरत मुरिया युवक-युवतियां, मुरिया वृद्ध वृद्धा, सल्फी वृक्ष और युवक, टंगिया धारी माड़िया, मुरिया युवती, शेर और युवक, कांवड़धारी युवक, ढ़ोल वादक, मांदर वादक, हांडी वाली युवती, जनजातीय काष्ठ कला की श्रेष्ठ कृतियां हैं। पशु-पक्षियों में घोड़ा, हाथी, शेर, गौर, कछुआ, मछली, चिड़िया, शेर, बगुला, मुर्गा, मोर आदि शिल्पकृतियां हैं।

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.