26 Nov 2018 - 17:00
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बस्तर के चलायमान देवस्थान

  

     

भारत में चलायमान देवस्थानों की परिकल्पना अति प्राचीन है।  लगभग सभी धर्मों में इनका महत्त्व और भूमिका है। ग्रामीण एवं आदिवासी समुदायों में इनके विभिन्न स्वरूप होते हैं। मिटटी, धातु, लकड़ी और कपड़े आदि अनेक माध्यमों से बने ये चलायमान देवस्थान, देवी-देवताओं के आवागमन का महत्वपूर्ण साधन रहे हैं।  वर्ष भर में ऐसे अनेक अवसर आते हैं,  जब स्थानीय देवी-देवता किन्हीं अनुष्ठानों अथवा रस्मों की पूर्ती के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करते हैं। इस समय उनकी मूर्तियां किसी वाहन अथवा उपादान द्वारा लायी जाती हैं। कई बार मूर्तियां नहीं बल्कि उनके स्थान पर यह चलायमान उपादान ही उनका प्रतिनिधित्व करते हैं।

 

आंरभ में आदिवासी समाज एक घुमक्कड़ समाज था। वे एक जगह टिक कर नहीं रहते थे। इस कारण उनके देवस्थान भी स्थानातरित होते रहते थे। चलायमान देवस्थान बनाने की परंपरा के आरंभ होने में इस तरह के तथ्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही होगी।  वर्तमान में बस्तर में गांव की देवगुढ़ियों के साथ-साथ अनेक प्रकार के चलायमान देवस्थान भी बनाए जाते हैं जैसे आंगा, डोली, विमन, कुर्सी, गुटाल, कोल्हा, छत्र, डांग और बैरख। इनका विवरण निम्न प्रकार है:

 

 

आंगा

 

बस्तर के लगभग सभी आदिवासियों एवं गैर-आदिवासियों में  प्रमुखता से प्रचलित चलायमान देव स्थान आंगा है। यह पुरुष देवों के लिए समर्पित किया जाने वाला उनका वाहन, आसन या प्रतिनिधि-स्वरूप है। आंगा, पाट देव का चलायमान देवस्थान है। वास्तव में आंगा क्या है, यह कोई भी आदिवासी नहीं बता पाता, वे इसके बारे में कोई निश्चित उत्तर नहीं दे पाते हैं। वे कहते हैं कि यह देव की मूर्ति नहीं है, पर इस पर देव आता है। इसी पर देव को खिलाते हैं, इसकी सहायता से देव को एक गांव से दूसरे गांव ले जाते हैं। आंगा व्यक्गित तौर पर या समूचा गांव सामूहिक तौर पर बनवा सकता है। इसे केवल पुरुष ही उठा सकते हैं, छू सकते हैं। आमतौर पर आंगा को 12-13 वर्ष के बच्चों द्वारा ही उठवाया जाता है। मान्यता है कि देव बच्चों के आंगा उठाने से जल्दी प्रसन्न होता है।

बरकई गांव की मढ़ई में विभिन्न गांवों से लाये गए आंगा।  (फोटो:२०१८)

 

आंगा, साग की लकड़ी के दो गोल लट्ठों से बनाया जाता है। लट्ठों को जोड़ने का कार्य वृक्ष की छाल से बांधकर किया जाता है। मध्य में एक अन्य लकड़ी लगाई जाती है, जिसका अगला सिरा नाग के फन जैसा बनाया जाता है। इसे कोको कहा जाता है। जब आंगा को निकाला जाता है या उसके द्वारा देव का आह्वान किया जाता है, तब आंगा का श्रृंगार किया जाता है। इस समय आंगा का पुजारी आंगा के कोको पर चांदी के पतरे का बना नागफन फिट करता है तथा आंगा की भुजाओं पर लोगों द्वारा मनौती पूर्ण होने पर चढ़ाई गई चांदी की पत्तियां बांधता है और चारों कोनों पर मोर पंख के गुच्छे फिट करता है।

 

आमतौर पर देव गुढ़ी में आंगा को चार खूंटों पर रख कर सुलाया जाता है। जब इसकी पूजा करनी होती है, तब इसका श्रृंगार कर गुढ़ी की छत से बंधी चार सांकलों द्वारा झुलाया जाता है। जब आंगा को खिलाना (नृत्य कराना) होता है, तब इसे चार लोगों द्वारा उठाकर देव गुढ़ी के बाहर लाया जाता है। कोई भी व्यक्ति, जिसे देव ने सपने में या अन्य प्रकार आंगा बनाने की प्रेरणा दी हो, वह आंगा बना सकता है। एक बार आंगा की स्थापना हो गई, तो फिर उसे सदैव के लिए निभाना पड़ता है।

 

मुझे अपने शोधकार्य के दौरान वर्ष 1992 और 2004 में जो विवरण आंगा के बारे में मिले वे निम्न प्रकार हैं।

 

 

1. गांव केसकाल में विश्राम धुर्वा के घर स्थापित आंगा

गांव केसकाल में विश्राम धुर्वा के घर स्थापित आंगा। जिसे जगदलपुर दशहरा यात्रा में लेजाने हेतु तैयार किया गया है। (फ़ोटो: १९९८)

 

केसकाल गांव के विश्राम धुर्वा ने बताया कि आंगा केवल पाट देव का बनता है। किसी भी देवी का आंगा नहीं बनाया जा सकता। पाट देव पुल्लिंग होता है। देव कुल में पाटदेव, देवी-देवता ओर भूत-प्रेत के बीच का स्थान रखता है। पाट देव की पूजा का निर्वाहन कुटुम्ब के पुरखों से चली आ रही परम्परा से होता है। किसी व्यक्ति के कुटुम्ब में पाट देव माना जाता रहा हो, तो उसे भी मानना पड़ता है।

 

गांवों में समय-समय पर अनेक नए आंगा बनाए जाते रहते हैं। परन्तु इनका बनाया जाना इस बात पर निर्भर करता है कि कोई पाट देव किसी परिवार को सताए और फिर अपना आंगा स्थापित किए जाने की  मांग करे।

 

विश्राम धुर्वा कहते हैं कि केसकाल गांव में कुंवरपाट का आंगा है। यह आंगा मरई गोत्र के धुर्वा वंश से है। मरई का अर्थ होता है नाग। अतः ये नागवंशी हैं। इसलिए इस आंगा के मध्य में चांदी का बना नाग का फन लगाते हैं। विश्राम धुर्वा इसके पावे हैं। 'पावे' का अर्थ है पाट देव के मन्दिर में, लिपाई-पुताई सफाई करने वाला, देवता को गहने पहनाने, सजाने में सहायता करने वाला। यह पुजारी का सहायक होता है। पावे की नियुक्ति गांव के जमींदार, सरपंच आदि द्वारा की जाती है।

 

विश्राम धुर्वा कहते हैं बस्तर में हजारों आंगा हैं। इस क्षेत्र के समस्त आंगा जात्रा के अवसर पर केसकाल घाटी स्थित भंगाराम देव के मन्दिर में एकत्रित होते हैं। जात्रा का आयोजन माघ माह के शानिवार को होता है। भंगाराम आसपास के चालीस गांवों के देवों का मुखिया है। अतः पूरे परगना के 40 गांवों के देवी-देवता इसकी जात्रा में आते हैं। जात्रा में असली और नकली देवताओं की भी जांच होती है। भंगाराम सभी आंगा की जांचकर बता देता है कि कौन देव नकली है। किस ने उसे गांव वालों को धोखा देने के लिए बनाया है। सिद्ध हो जाने पर नकली आंगा को वहीं तोड़कर फेंक दिया जाता है।

 

केसकाल गांव का यह आंगा वर्ष में दो बार बाहर निकाला जाता है। एक तो भगांराम की जात्रा के समय, दूसरे मार्च माह में केसकाल बाजार के मेले में। इस मेले में अनेक आंगा, एवं डोलियां और अन्य देवी-देवता आते हैं। यह मेला होली के चार-पांच दिन बाद लगता है।

 

यदि किसी गांव के किसी व्यक्ति पर कोई भयानक विपदा आ गई और वहां कोई आंगा नही है, तो वे केसकाल के आंगा को अपने गांव आमन्त्रित करते हैं। इसके लिए उस व्यक्ति को केसकाल पुलिस थाना में सूचना देना पड़ती है और आंगा के आने-जाने का खर्चा देना पड़ता है। आंगा लेकर पुजारी और पावे दोनों जाते हैं। जब आंगा से विपत्ति दूर करने के उपाय पूछे जाते हैं, तब यदि आंगा आगे की ओर आएगा तो समझते हैं 'हां'  और यदि आंगा पीछे की ओर जाए तो समझते हैं 'न'। इस प्रकार पावे एवं पुजारी की सहायता से आंगा के माध्यम से पाट देव ग्रामीणों की समस्याओं के निराकरण हेतु उपाय की स्वीकृति देता है। लोग पाट देव से मन्नते मांगते हैं और उनके पूरा होने पर आंगा को चांदी की पत्तियां पहनाते हैं।

 

2. ग्राम आमाडीह (विश्रामपुरी) सर्रूराम गौण्ड के घर स्थापित फूलकुंवर पाट का आंगा

           

ग्राम आमाडीह (विश्रामपुरी) सर्रूराम गौण्ड के घर की देवगुड़ी में स्थापित फूलकुंवर पाट का आंगा। साथ ही दिवार पर डोली लटकी हुई है। (फोटो: १९९८)

सर्रूराम गौण्ड कहते हैं कि आंगा को महिलाएं नहीं उठा सकतीं, क्योंकि मासिक धर्म होने से अपवित्र हो सकती हैं। कुछ लोगों ने कहा कि यदि महिलाएं नहाई और पवित्र हों तो आंगा को हाथ लगा सकती हैं। आंगा की प्रतिदिन पूजा करते हैं। सोमवार को विशेषतः पूजते हैं। पूजा नहाकर, नीम्बू, नारियल, फूल-अगरबत्ती से करते हैं। वर्ष में मढ़ई मेले और जात्रा के अवसर पर आंगा को देव स्थान से बाहर निकाला जाता है। जैसे मांहचेनी जात्रा, भादों जात्रा, दशहरा जात्रा और मढई जात्रा के समय।

 

यदि आंगा बहुत पुराना हो गया हो या उसकी लकड़ी सड़ गई हो तो खराब लकड़ी को निकाल कर नाले या तालाब में प्रवाहित कर देते हैं और नई लकड़ी से आंगा बना लेते हैं। यह सारा काम समारोहपूर्वक होता है, जिसके लिए सारा गांव चंदा करता है। नए बने आंगा को पूरी तरह सजाया जाता है और पूजा की जाती है। आंगा बनाने के लिए सिरस की लकड़ी काम में लाई जाती है। बनाने का काम बढ़ई करता है।

 

 

3. ग्राम आमाडीह (विश्रामपुरी) फोटकूराम मरकाम के घर स्थापित फूलपाट का आंगा

ग्राम आमाडीह (विश्रामपुरी) फोटकूराम मरकाम के घर से जात्रा के लिए बाहर निकला गया फूलपाट का आंगा।  (फोटो: १९९८)

 

आमतौर पर मनौतियां पूरी होने पर आंगा पर मिट्टी की मूर्तियां नही चढ़ाई जातीं, लेकिन यहां आंगा के स्थान में मिट्टी की बैल की मूर्तियां भी रखी हैं, लेकिन वे चढाई नहीं गई हैं। वे दीवाली के समय की हैं। प्रथा है कि लोग दीवाली को मिट्टी के बैल खरीद कर लाते हैं, बच्चे उनसे खेलते हैं। बाद में उन्हें गांव के देवस्थान में रख दिया जाता है।

 

 

ग्राम बोरई (विश्रामपुरी) में ग्रामीणों से बातचीत के अनुसार मढ़ई एवं जात्रा के समय छोटे-छोटे लड़कों से आंगा इसलिए उठवाया जाता है, क्योंकि पाटदेव उन पर जल्दी आ जाते हैं। मान्यता है कि उम्रदराज लोग तो ढोंग भी कर सकते हैं, लेकिन बालक ऐसा नहीं करते। उन पर आए हुए देवता का लोग जल्दी विश्वास भी कर लेते हैं। बच्चे आंगा उठाए चलते हैं तो देव उन पर रीझ जाता है और वह बच्चों पर आ जाता है और फिर वे आंगा उठाए खेलने लगते हैं, नृत्य करते हैं।

 

पाटदेव की पीतल की मूर्ति यहां बनवाया जाना ठीक नहीं माना जाता। आंगा के लिए केवल चांदी के पतरे ही बनवाए जाते हैं। आंगा में पीतल के गहने भी नहीं चढ़ाते। आंगा और माता एक ही गुढ़ी में एक साथ रह सकते हैं। एक ही पुजारी दोनों की पूजा भी कर सकता है।

 

 

4. ग्राम कोंदकेरा, द्वारूराम के घर का फूल कुंवर पाट का आंगा

 

उनके परिवार में इस पाट की स्थापना के सम्बन्ध में द्वारूराम गोण्ड कहते हैं कि इस पाट ने उनके परिवार को बहुत दुःख दिया। बाल बच्चों और मवेशी को बहुत तकलीफ दिया तो सिरहा को बुलाकर सिरजवाया गया। सिरहा ने बताया कि यह फूलकुंवर पाट तुम्हें सता रहा है, इसलिए उसका आंगा बनाओ। तब बोरई के रानी डोंगरी पहाड़ से तेन्दू झाड़ की लकड़ी लाई गई। आंगा बनाने के लिए लकड़ी लाने के लिए कुटुम्ब के लोग, बढई और गांव के प्रमुख लोग जाते हैं। लकड़ी बढ़ई काट लाता है और स्वयं ही आंगा तैयार करता है। इसका माप आदि बढई स्वयं ही तय कर लेता है। इस काम के बदले में बढ़ई पैसा नही लेता। केवल कपड़ा, नारियल और सुपारी लेता है। पाट के आंगा की स्थापना केवल रविवार को करते हैं। स्थापना के बाद पाट की शादी की गई। शादी करना है और किससे करना है यह देव स्वयं बताता है। जब देव अपनी पत्नी के गांव का नाम बताता है तो कुटुम्ब और गांव के लोग उस गांव जाते हैं। समधी जाते हैं और बात तय करते हैं। फिर खाना-पीना होता है। जितना खर्चा वहां होता है उतना ही खर्च घर लौटने पर अपने गांव में भोज करने पर करना पडता है। फिर इस पाट की शादी की और सारा नेग-नत्ता पटा लिया। पतोड़ा गांव से देवी आई बोरई में अपने लड़के फुलकुंवर के लिए लड़की मांगने। जब बोरई वाले तैयार हो गए, तब शादी कर सारा कपड़ा-लत्ता, गहना ओर खाना, नेग-नत्ता दिया। शादी उसी तरह की जाती है, जैसे वास्तविक लडके-लड़की की होती है।

 

 

5. ग्राम गढ़बेगांल त. नारायणपुर में सोनकुंवर पाट का आंगा

मढ़ई मेले में आंगा को परिक्रमा हेतु ले जाते हुए।  (फोटो: २०१८)

 

यहां के मुरिया आदिवासी बताते हैं कि यहां गढ़ बंगाल में सोनकुंवर पाट का स्थान और आंगा है। आरम्भ में यहां आंगा नहीं था। केवल एक पत्थर और गुलगुली (घुंघरू) थे। हमारे इस पाट देव के पिता देव घनोरा गांव में हैं। यह वहां से यहां अपने आप आया था। यह पाट देव यहां घुंघरू के रूप में आए थे। घुंघरू के रूप यह हमारे एक सियान (पूर्वज) को आदन झाड़ के पास मिले। उसने उठा लिया और गांव वालों को बताया। गांव वाले बोले इसे फेंको मत, परीक्षा करके देखते हैं कि कहीं यह कोई देव न हो। तब गांव वालों ने घुंघरू को आदन झाड़ के एक खोखल में रख दिया और वृक्ष के नीचे तीन पत्तियां रख दी और बोले यदि तुम देवता हो तो अपने आप उतर कर पत्तों पर बैठ जाओ। दूसरे दिन सुबह जब उन्होने वापस आकर देखा तो घुंघरू पेड़ से उतर कर पत्तों पर आ गए थे। तब सब गांव वालों ने उसी आदन झाड़ के नीचे फूलपाट का एक पत्थर स्थापित किया ओर उसमें एक खोखला बनाकर घुंघरू रख दिया। वहीं, उसके लिए एक राउड़ (मन्दिर) बना दिया गया। यह घटना मंधर मुरिया के पिताजी के समय की है। मंधर का देहांन्त 1998 के लगभग 60 वर्ष से अधिक आयु में हुआ। पहले यहां आंगा नहीं था, फिर पाटदेव एक बार सिरहा पर आया और बोला मेरे लिए आंगा बनाओ। वही आंगा आज तक है।

 

आंगा के मध्य वाले भाग को कोका कहते हैं। इसमें चांदी की नागफणी (नाग का फन) लगाई जाती है। दोनो ओर की भुजाओं को 'कॉक' कहते हैं। आंगा को लटकाने के लिए काम में लाई जाने वाली रस्सी या जंजीर, संकरी कहलाती है। आंगा पर लगे चांदी के पट्टे, नागफणी आदि लोगों द्वारा मन्नत पूरी होने पर चढ़ाई जाती है।

 

आंगा गोण्डी बोली का शब्द है। हल्बी  बोली में भी इसे आंगा ही कहते हैं। आंगा स्वयं कोई देवी प्रतिमा नहीं है। यह पाट देव का आसन है, वाहन है। वह इस पर बैठता है। वह मड़ई यात्रा में भी इसी पर जाता है। पर मुख्य बात यह है कि देव चढ़ने पर जैसे सिरहा कुर्सी, विमान, झूला आदि पर बैठता है, वैसे आंगा पर कभी नहीं बैठता। डोली भी गोण्डी बोली का शब्द है। इसे हल्बी में भी डोली कहते हैं। जिस प्रकार आंगा पाट देव का रहने का स्थान है, वैसे ही डोली माता के रहने बैठने का स्थान है। 

 

वर्ष में दो बार माता का जात्रा होता है, जबकि पाटदेव का जात्रा नहीं होता। पाटदेव का मेला शेसा कहलाता है, जो वर्ष में एक बार होता है। माता की जात्रा एक बार दीपावली से पहले होती है। तब उसे नयी फसल का चावल अर्पित किया जाता है। इसके बाद ही लोग नया चावल और आम खाना आरम्भ करते हैं। शेसा मार्च के पहले सप्ताह मे होता है। दो वर्ष शेसा स्थानीय स्तर पर होता है। तीसरे वर्ष क्षेत्र के सभी आंगा यहां आमंत्रित किए जाते हैं। अन्य देवी-देवता भी आते हैं। जब नई धान की फसल कटती है, तब आंगा का पुजारी प्रत्येक परिवार के खेत से धान काटकर उसे आदन के पत्तों में लपेट कर आदन के वृक्ष से लटका देता है। शेसा के दिन इन्हीं धान की बालियों को लोग उतार लाते हैं और आंगा को चावल और नई फसल का मढ़िया चढ़ाते हैं। इसी दिन से लोग मढ़िया पीना आरम्भ करते हैं। प्रत्येक तीसरे वर्ष शेसा के अवसर पर आंगा से बांधा गया बांस, मोरपंख आदि निकाल एक नदी के बीच धार में गाड़ देते हैं, और नया बांस एवं मोर पंख लगाए जाते हैं। इस अवसर पर पाट देव के सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया जाता है।

 

 

 

डोली

 

लकड़ी की बनाई गई छोटी चारों ओर से बंद पालकी ही डोली कहलाती है। यह देवी का चलायमान देवस्थान है। डोली चौकोर बनाई जाती है। कभी इसे चारों ओर से बंद तो कभी तीन ओर से बंद और सामने से खुला बनाया जाता है। इसकी छत पिरामिड जैसी बनाई जाती है तथा सामने एक दरवाजा रखा जाता है, जो बन्द किया और खोला जा सकता है। डोली केवल माता देवियों के लिए ही बनाई जाती है। आमतौर पर सभी आदिवासी इसे बना सकते हैं। जब कोई व्यक्ति इसके लिए विशेष मन्नत करता है, तब वह मनौती पूर्ण होने पर माता के लिए डोली बनवाता है। कभी-कभी माता स्वयं ही गांव के पुजारी या किसी अन्य प्रमुख व्यक्ति से सपने या अन्य प्रकार से मांग करती है कि गांव के लोग मिलकर उसके लिए डोली बनवाएं।

        

         डोली,बस्तर।  (फोटो: २०१८)                                                                                                                                                                   डोली, बस्तर। (फोटो:१९८९)

 

फरसगांव की मढ़ई में माता देवी की डोली को परिक्रमा कराते हुए। (फोटो: २०१८)

 

डोली को माता गुढ़ी में कपड़े से ढ़क कर लटका कर रखा जाता है। इसे केवल जात्रा या मड़ई के समय माता के प्रतिनिधि के रूप में बाहर निकाला जाता है, ताकि माता को अन्य देवी-देवताओ से भेंट कराने हेतु अन्यत्र ले जाया जा सके। डोली, साग या हल्दू की लकड़ी से बनाई जाती है तथा इस पर कुछ ज्यामितिक अलंकरण भी किया जाता है। बेल वृक्ष की लकड़ी से बनाई गई डोली सबसे अच्छी मानी जाती है। आमतौर पर चढ़ावे के रूप में प्राप्त चांदी के सिक्कों को डोली पर कीलों से जढ़ दिया जाता है। डोली बढ़ई द्वारा बनवाई जाती है। वे ही इस पर नक्काशी भी करते हैं। कभी-कभी लोग स्वयं भी डोली बना लेते हैं या डोली का मूल ढ़ांचा बढई से बनवा कर उस पर नक्काशी स्वयं करते हैं। डोली की लकड़ी में दीमक लग जाने पर उसे नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। आमतौर पर डोली में कोई मूर्ति नहीं रखी जाती, लेकिन कई माता गुढ़ियों में चढ़ाई हुई पीतल की मूर्तियां भी इनमें रख दी जाती हैं।

 

मैने अपने शोधकार्य के दौरान कुछ डोलियां देखीं जिनका विवरण निम्न प्रकार हैः

 

 

1. ग्राम बोरई (विश्रामपुरी) गुनेर नेताम गोण्ड के घर स्थित कालीकंकालीन, दंतेश्वरी एवं मावली देवी की डोली

ग्राम बोरई (विश्रामपुरी) गुनेर नेताम गोण्ड के घर स्थित कालीकंकालीन, दंतेश्वरी एवं मावली देवी की डोली।  (फोटो: १९९८)

 

गुनेर नेताम बताते हैं कि आमतौर पर देवी-देवताओं की मूर्तियां डोली या झांपी (बांस से बनी टोकरी) में रखी रहती हैं। डोली पूजा, दशहरे और मढ़ई जात्रा के अवस पर बाहर निकाली जाती है। डोली, खमार या बेल की लकड़ी से बनाई जाती है, जिसे गांव का बढ़ई बनाता है। डोली बनाने के लिए पहले वांछित पेड़ खोजा जाता है। फिर परिवार के लोग नहा धोकर पूरे गांव के प्रमुख लोगों के साथ लकड़ी काटने जाते हैं। पहले वृक्ष की पूजा करते हैं, फिर लकड़ी काटते हैं। लकड़ी काटने का काम पूरी तरह उपवास के दौरान होता है। जब लकड़ी घर पर ले आते हैं तो सारा परिवार स्नान कर देवी की पूजा करता है। मुर्गी की बलि दी जाती है। सिरहा पर देवी आ जाती है, जो डोली बनाने के लिए निर्देश देती है। सिरहा पर आई देवी की परीक्षा के लिए लोग डोली बनाने के लिए लाई गई लकड़ी का टुकड़ा कहीं छिपा देते हैं। यदि सिरहा पर आई देवी उसे तुरन्त खोज निकाले, तो उसे सच्चा माना जाता है। यदि देवी लकड़ी नही खोज पाती है, तो वह देवी झूठी मानी जाती है और लोग बनाई गई डोली फेंक देत हैं। यदि देवी सच्ची हुई तो डोली स्वीकृत हो जाती है। उसे मन्दिर में लाकर रख देते हैं और पूजा करते हैं। डोली पर उकेरे जाने वाले डिजाइन बढ़ई अपने मन से बना देता है। डोली के चारों ऊपरी कोनों पर मोर पंख के गुच्छे लगाते हैं। ये देवी के श्रृंगार है। देवी को मोर पंख बहुत अच्छे लगते हैं। यदि कोई डोली पुरानी हो गई, सड़-गल गई तो उसे सारा गांव मिलकर समारोहपूर्वक नदी-नाले में ठंडा कर देता है और नई डोली बना ली जाती है। कभी-कभी कोई भूत-प्रेत, या अन्य देवी-देवता भी किसी डोली में घुस जाते हैं तो वह घर के लोगों को परेशान करते हैं। इसकी जांच सिरहा करता है और बताता है कि कौन इस डोली में घुस आया है। यदि वह उस डोली को घुस आई देवी से मुक्त नहीं करा पाता तो डोली को फेंक दिया जाता है और नई डोली बना ली जाती है।

 

2. घुटकेल गांव (विश्रामपुरी) के मुखिया भीखराय समरत गोन्ड के घर गोबराइन माता की डोली

घुटकेल गांव (विश्रामपुरी) के मुखिया भीखराय समरत गोन्ड के घर गोबराइन माता की डोली। (फोटो: १९८९)

भीखराय समरत गोन्ड के घर गोबराइन माता की डोली बनाने की घटना 100 वर्ष से भी पुरानी है। देवी की स्थापना के लिए जो डोली बनाई गई, इसके लिए लकड़ी उड़ीसा के कोरापुट जिले के सिमोड़ा गांव से लाई गई, क्योंकि वह व्यक्ति जिस पर देवी ने आकर डोली बनाने की मांग की थी, वह सिमोड़ा गांव का रहने वाला था। आज भी सिमोड़ा गांव के लोगों से गोंड परिवार का सम्पर्क बना हुआ है।

 

 

किसी भी जात्रा-मढई में कभी भी कोई मूर्ति नहीं ले जाते, केवल देवी की डोली ले जाते हैं, क्योंकि मढ़ई के खेल-नाच में मूर्ति गिर गई तो देवी का निरादर होगा। वर्ष में केवल एक बार इस देवी की डोली बाहर लाई जाती है। बोरई मढ़ई के अवसर पर, जो जनवरी के पहले सप्ताह में मनाई जाती है। बाहर निकालने के समय डोली को साफ करके उस पर घी लगाते हैं। अब महुए का तेल भी लगाने लगे हैं। घी केवल गाय का होना चाहिए।

 

     

ग्राम बीरापारा (कौन्डागांव) मावली देवी के पुजारी नाथूराम का कहना है कि जगदलपुर में दशहरे का सारा कार्यक्रम सात दिन का होता है। पहले दिन निशा जात्रा होता है। दूसरे दिन मावली पड़घाव होता है।  इस दिन दन्तेवाड़ा से दन्तेश्वरी आती हैं। जगदलपुर में एकत्रित हुए सारे देवी-देवता उनका स्वागत (पड़घाव) करने जाते हैं। सारी देवियों की डोलियां वहां जाती हैं। दन्तेश्वरी को लाकर जगदलपुर के दन्तेश्वरी मन्दिर में सामने रखते हैं, जहां पूजा होती है। गांव से अधिकांश देवी-देवताओं की मूर्तिया जगदलपुर नहीं जातीं, केवल उनके डांग, छत्र, डोली आदि जाते हैं। विभिन्न गावों से आई डोलियां यहां दन्तेश्वरी से भेंट कराने लाई जाती हैं।

 

 

 

विमन (कुर्सी, मंदिर)

 

विमन या विमान भी एक प्रकार का चलायमान देवस्थान है। यह देव एवं देवी दोनों के लिए बनाया जा सकता है। यह दो प्रकार के होते हैं, कुर्सी एवं मंदिरनुमा। कुर्सी की सीट पर मोटी नुकीली कीले जड़ीं होती हैं। सामान्य तौर पर विमन घर या गांव की देवगुढ़ी में रखे रहते हैं, लेकिन जात्रा के समय या किसी विपदाग्रस्त व्यक्ति द्वारा अपने घर आंमत्रित करने पर इन्हें सजाकर निकाला जाता है। माना जाता है इनमें सवार होकर देवी-देवता यात्रा करते हैं। यह एक प्रकार का वाहन है।

   

बरकई गांव की मढ़ई में माता देवी की कुर्सी, विमन को परिक्रमा कराते हुए। (फोटो: २०१८)                                                                कुर्सी/विमन, बस्तर (फोटो: १९९८)             

 

कौन्दकेरा गांव के घसिया राम अपने घर में स्थित विमन के बारे में कहते हैं कि ये कुर्सी जैसे छोटे मंदिर हैं, जो लकड़ी से बनाए जाते हैं और उठाकर ले जाए जा सकते हैं। उन्हे विमन (विमान का अपभ्रंश) कहते हैं। इसके शीर्ष व ऊपरी चारों कोनों पर पीतल के कलश लगाए जाते हैं।

  

                                जात्रा हेतु सजाया गया मंदिर/विमन, बस्तर (फोटो: १९९८)                                                                    जात्रा हेतु सजाई गयी कुर्सी/विमन , बस्तर (फोटो: १९९८) 

 

विमन या कुर्सी पर डाला जाने वाला कौड़ियों व शीशों से अलंकृत कपड़े का कवर चोली कहलाता है। इसे नाइक या बंजारा लोग बनाते हैं। यहां मोरीगांव में अनेक बंजारा परिवार हैं। चोली बनवाने का सारा खर्चा पुजारी को करना पड़ता है। इस पर लगभग 400 रुपए खर्च आता है। इसी प्रकार के लाल कपड़े से बनी एवं शीशे तथा कौड़ियों से सजी चोली सिरहा के लिए होती है। इस चोली को गप्पा (छोटी टोकरी जिसे देवी बगल में दबाए रहती है) में रखते हैं। इस विमन को वर्ष में एक बार गांव की मढ़ई के समय निकालते हैं। सलना गांव की मढई फरवरी में होती है। विमन को चार लोग उठाते हैं, जो कोई भी हो सकते हैं। इस मंदिर मे दो कुर्सियां रखी हैं, जिनमें बड़ी-बड़ी कीलें लगी हैं। इन पर देवी चढ़ने पर सिरहा बैठता है। जब एक कुर्सी पुरानी हो गई, टूट गई तब दूसरी नई कुर्सी बनाई जाती है। कुर्सी या विमन को महिलाएं भी उठा सकती हैं।

 

 

 

गुटाल/कोल्हा

 

गुटाल जिसे कोल्हा भी कहा जाता है, एक अत्यन्त साधारण एवं आदिम किस्म का चलायमान देवस्थान है, जिसकी स्थापना भी आंगा के समान ही होती है। यह केवल पुरुष-देवों के लिए ही बनाया जाता है। इसे देव का आसन या निवास स्थान माना जाता है। लकड़ी का एक मोटा सोंटा, जिसमें शीर्ष पर मोर पखों का गुच्छा बांघा जाता है, गुटाल कहलाता है। इसे किसी वृक्ष के नीचे या देवगुढ़ी में स्थापित किया जाता है।

  

जात्रा हेतु निकला गया कोल्हा/गुटाल, बस्तर (फोटो: २०१८)

 

देवगुड़ी में सुलाकर रखा गया कोल्हा/गुटाल, बस्तर (फोटो: २०१८)

 

गुटाल को साग की लकड़ी से बनाया जाता है। जब सिरहा पर वह देव, जिसके लिए यह गुटाल बनाया गया है, आता है, तब वह सिरहा गुटाल उठाकर नाचने लगता है। आमतौर पर गुटाल के र्शीष पर बंघा मोर पंख का गुच्छा मुरझाया हुआ रहता है, जिसे लाल कपड़े से लपेटकर रखा जाता है,  लेकिन देव आने पर यह गुच्छा खुल कर फूल की तरह खिल जाता है। जब कोई देव यह मांग करता है कि उसके लिए कोल्हा बनाया जाए, तब ही इसे बनाकर स्थापित किया जाता है। इसे बनाने में गांव भर के लोग चंदा देते हैं।

 

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.