मुश्ताक खान

चित्रकला एवं रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर।
भारत भवन ,भोपाल एवं क्राफ्ट्स म्यूजियम ,नई दिल्ली में कार्यानुभव।
हस्तशिल्प,आदिवासी एवं लोक कला पर शोध एवं लेखन।

 

विश्व के  लगभग सभी घुमक्कड़ बंजारा समुदायों में कपड़ों पर अनेक प्रकार की कशीदाकारी और अप्लीक काम की समृद्ध परम्पराएं हैं। भारत के गुजरात और राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों में रहने वाली घुमक्कड़ जातियों में यह कला अत्यंत समृद्ध है। इन समुदायों की स्त्रियां सामान्य घरेलु सुई -धागे और रंग -बिरंगे कपड़ों के टुकड़ों से अति सुन्दर कशीदा एवं अप्लीक काम से सजे उपयोगी वस्त्र बनाती हैं। छत्तीसगढ़ और विशेषरूप से बस्तर क्षेत्र के बंजारा भी साधारण सुई -धागे से यहाँ के आदिवासियों के देवी -देवताओं के लिए  कौड़ी और अप्लीक काम से सजे वस्त्र तैयार करते हैं।प्रमुख रूप से चोली और लहंगा बनाये जाते हैं। यह दौनों ही वस्त्र राजस्थानी लहंगा -चोली जैसे होते हैं। पारम्परिक  तौर पर बस्तर के आदिवासी महिलाएं काम चौड़ाई की साड़ी पहनती थीं जो घुटनों तक आती थीं , शरीर के ऊपरी भाग में ब्लाउज़ या कुर्ती पहनने की परंपरा यहाँ थी ही नहीं। पेटीकोट या लहंगा यहाँ प्रचलन में कभी भी नहीं रहा। बंजारों द्वारा लहंगा -चोली का प्रचलन किस प्रकार देवी -देवताओं के लिए आरम्भ किया गया होगा इसकी कल्पना करना भी कठिन है। 

 

 

बंजारा लोग आदिवासियों के लिए लहंगा -चोली एवं अन्य उपादान बनाने हेतु लाल , नीले , पीले ,काले , सफ़ेद सदा सूती कपड़े  और छींट के कपड़े का प्रयोग करते हैं। यह कपड़ा वे जगदलपुर और कोंडागांव के बाजार की एक विशिष्ट दुकान से खरीदते हैं ,जो वर्षों से उनके लिए ये कपड़े मंगाकर रखते हैं। यह कपड़ा अब मिल का बना हुआ होता है और सामान्य कपड़े से रंग और प्रिंट में थोड़ा भिन्न होता है।  

 

 

 

बंजारा शिल्प की अन्य महत्वपूर्ण सामग्रियां हैं मोटा सूती धागा , शीशे के गोल और चौकोर टुकड़े एवं कौड़ियां। यह भी  वे जगदलपुर और कोंडागांव के बाजार की एक विशिष्ट दुकान से खरीदते हैं । 

 

 

बंजारों द्वारा तैयार किये जाने वाले वस्त्रों को सिलने के लिए मोटी सुई और डी. एम्. सी. का मोटा धागा काम में लाया जाता है। 

 

 

वस्त्रों की सिलाई होने के बाद उन पर कौड़ियां लगाईं जाती हैं।  इसके लिए पहले कौड़ियों में दो छिद्र किये जाते हैं। इन छिद्रों से ही धागा घुसकर कौड़ी को कपड़े  के साथ सिल दिया जाता है। 

 

 

वस्त्रों की सिलाई होने के बाद अथवा पहले जहाँ आवश्यक वहां शीशे जड़े जाते हैं। इसके लिए एक विशेष प्रकार के टांके का प्रयोग किया जाता है। पहले शीशे को कपड़े  पर स्थिर किया जाता है । 

 

 

पहले इकहरे धागे के टांके से शीशे को कपड़े पर स्थिर किया जाता है , इसके बाद उसे दोहरे धागे से पक्का करते हैं। अंत में ऊन  के धागे से उसमे उभार लाते  हैं। 

 

 

बंजारों द्वारा बनाये जाने वाले वस्त्रों पूरी तरह हाथ की सिलाई स्व तैयार किये जाते हैं। आजकल सिलाई मशीन का भी प्रयोग करने लगे हैं। 

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.