डॉ. राम कुमार बेहार

एम. ए. इतिहास , पी. एच. डी.
लेखक एवं इतिहासकार

 

 

 दसमत मंदिर, ओढ़ार गांव, दुर्ग जिला, छत्तीसगढ़

 

 

लोक संस्कृति व लोक साहित्य लोक अभिव्यक्ति के महत्वपूर्ण साधन होते हैं। छत्तीसगढ़ प्राँत, मुख्यतः अदिवासी व ग्रामीण पृष्ठभूमि वाला है ये दोनों तत्व लोक संस्कृति के संवर्धन के लिए महत्वपूर्ण तत्व माने गए हैं। छत्तीसगढ़ प्राँत में अनेक जनजातियाँ हैं उनकी लोक गाथाएँ, लोकगीत हैं, जो सदियों से वे सहेजे हुए हैं। दसमत कैना भी ऐसी ही एक लोकगाथा है।

 

लोकगाथा दसमत कैना :

छत्तीसगढ़ की दसमत कैना, एकांगी (एकतरफ़ा) प्रेम की गाथा है। दसमत नामक कन्या की गाथा दसमत कैना है जो जीवन में अनेक मोड़, अनेक उतार-चढ़ाव, प्रलोभन भय के बावजूद सिंद्धात पर अड़ी रही, कष्ट सहा पर झुकी नहीं, टूटी नहीं, शरणागत नहीं हुई। देवार जाति के गायक इस लोक गाथा को गाते हैं। उड़ीसा की नारी अद्वितीय सुन्दरी, मेहनत कर गुजर बसर करने वाली दसमत की गाथा अनेक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। राजनांदगाँव जिले में ओडार बाँध के पास दसमत की समाधि (मंदिर) छत्तीसगढ़ी लोकजीवन में इस गाथा की महत्ता को रेखांकित करती है।

 

लोकगाथा के अनुसार दुर्ग का राजा माहन देव, ब्राह्मण राजा था। वह दसमत से एकतरफ़ा प्यार करता था मगर दसमत की ओर से समर्पण भाव न मिलने पर उसे विवाह हेतु तैयार करने में लगा रहा। गाथा दुखांत है, दसमत का पति मारा गया, दसमत उसकी चिता में जल मरी, राजा महान देव, दसमत को बचाने का प्रयास करते जल मरा। नायिका प्रधान गाथा में नायिका स्वयं, उसका पति और उसे चाहने वाला प्रेमी राजा, सभी मर जाते हैं।

 

देवार जाति- दसमत गाथा गायक

अनेक मोड़ों वाली यह कथा देवार जाति के गायक झूम-झूम कर सुनाते हैं। दसमत कैना का गायन, देवार जाति के लोग ही करते हैं। देवार जाति एक यायावर जाति है। वे कला प्रवीण लोग हैं जो रायपुर व बिलासपुर क्षेत्र में निवास करते हैं । रायपुरिया व रतनपुरिया देवार के नाम से भेद मिलता है। इनके रहन-सहन व गायन-वादन पद्धति में भी कुछ भेद है।

 

विद्वानों के एक वर्ग के अनुसार देवार, गोंड की उपजाति है पर गोंड उसे स्वीकार नहीं करते। नृतत्वशास्त्री (एंथ्रोपोलॉजिस्ट) इन्हे ‘भूमिया’, बैगा की एक उपजाति, से जोड़ते हैं । कुछ कँवर से भी विकसित मानते हैं। निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता। चारण-भाटों की तरह ये प्रशस्ति गान भी करते हैं। गोंड गाथाओं को भी गा-गा कर प्रचारित प्रसारित करते हैं।

 

शौर्य एवं इतिहास के अलावा देवार कुछ अलग प्रकार की प्रेम गाथाऐं गाते हैं। फसल कटने के बाद मनोरंजन करने देवार गाँव में पहुँचते हैं, वहाँ रोज़ी-रोटी पाते हैं और ग्रामीण सांस्कृतिक रिक्तता को भरने का प्रयास करते हैं। देवारों को आदिवासी अपने समाज से अलग मानते हैं।

 

रायपुरिया देवार सारंगी के संगत में गाते हैं। रतनपुरिया देवार ढुँगरू वाद्य के साथ झूम कर गाते हैं, छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अँचल मे देवार लोग गाते हैं, बजाते हैं, नाचते हैं। देवार यायावर जाति है। यह घूम-फिर कर अस्थाई निवास बनाते रहे हैं। जहाँ जाते है दसमत कैना का गान करते हैं।

 

लेकिन अब देवार जाति स्थाई मकान बनाकर रहने लगी है, इसका असर गाथा गायन पर भी पड़ रहा है, उनके रूंझु (सारंगी) की धुन और सधा हुआ कंठ कम सुनाई पड़ रहा है, गाथा-गायक अब ऊँगली पर गणना करने लायक रह गए हैं।

 

दसमत कैना : गाथा

गाथा की विषयवस्तु छोटी है। दसमत एक राजा की बेटी थी उसकी छः और बहनें थीं। एक दिन राजा ने बेटियों से पूछा कि वे किसका खाते हैं। छः बेटियों ने उत्तर दिया वे राजा का खाते हैं। राजा उनका अन्नदाता है लेकिन सातवीं बेटी दसमत ने उत्तर दिया-

कर्म का मैं खाती हूँ,

कर्म का गुण गाती हूँ।

राजा को यह उत्तर पसंद नहीं आया वह, ‘आप ही अन्नदाता हैं’ ऐसा सुनने का आदी था। गुस्से में उसने दसमत का विवाह मजदूर, असुन्दर उड़िया, सदा बिहइया के साथ कर दिया।

 

दसमत अपने पति, देवर व सास के साथ रहने लगी। दिन भर पत्थर तोड़ उसका पति सदा जो भी लाता, उसकी माँ उसे साहूकार को बेचती और खाने-पीने का सामान लाती। एक दिन दसमत ने एक पत्थर का टुकड़ा देखा तो अवाक रह गई। वह पत्थर का टुकड़ा नहीं हीरे का टुकड़ा था। दसमत साहूकार से लड़-झगड़ कर सारे हीरे लाती है उन्हें महँगे दामों में बेच अपने लिए बड़ा मकान बनाती है और उड़िया समाज में मुखिया के रूप में स्थापित हो जाती है।

 

मोड़ पर मोड़ आने वाली इस गाथा में फिर मोड़ आया। देवभोग क्षेत्र में अकाल पड़ा, लोगों को भोजन के लाले पड़ गये, उड़िया समाज अपनी मुखिया दसमत पर निर्भर था। इधर दुर्ग के राजा महानदेव को तालाब खुदवाना था और उड़िया इस कार्य में माहिर थे। बड़ी सँख्या में वे दुर्ग क्षेत्र में आये और तालाब-बाँध बनाना प्रारंभ किया। यह किस सन् की बात है ज्ञात नहीं हैं। कथा के अनुसार माहम देव के 42 गांव थे। इससे स्पष्ट होता है कि वह कोई बड़ा राजा नहीं था-

सुन रे ओड़निन कैना बात

बेटी ल छोड़त हवं बहुरिया

अउ छोड़ंव 42 गांव

 

राजा की नजर दसमत पर पड़ी और वह उसकी सुन्दरता का कायल हो, उसे पाने के लिए उद्यत हुआ। प्यार एकांगी था, दसमत को राजा में रूचि न थी। दसमत की सुन्दरता का वर्णन संक्षेप में करते हुए गायक गाता है-

मनखे म सुन्दर तोला दसमत ओड़निन, जग ल मोहे ग सवासार या

सुन्दर के देखे भला, ब्राहमण लुभाया जिया

दसमत ने अपने को राजा भोज की बेटी बताया और महानदेव को रिश्‍ते में चाचा बताया मगर मोहित राजा नहीं माना।

करम के लेखा कोन टारे दाई, करम देवय भगवान

मेंटन वाला गंवार

 

राजा महान देव काम कर रही दसमत को एक ढेला मार उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है, फिर दूसरा ढेला मारता है। दसमत सहन नहीं करती और गरजती है-

            तीसरे ढेलवा तन पर लागे

                मारंव कुदारी के घाव

 

वह कहती है कि यदि तुमने तीसरा ढेला मारा तो मैं सहन नहीं करुंगी, तुम पर कुदाली (कुदारी) मार कर घाव दे दूंगी। यह राजकीय प्रभुता को इंकार करना ही नहीं था। वरन संघर्ष की ललकार थी। कामुक लोगों को सबक थी यही संघर्ष गाथा के अंतिम भाग में दृष्टिगोचर होता है। यह चुनौती वह स्वयं के बल पर नहीं वरन जन-बल के साथ रहने पर देती है। स्त्री के साहस की यह अद्भुत गाथा है। दसमत, विवाह के लिए सभी शर्ते मान लेने वाले राजा महानदेव को समझाती है -

अपन जात सही जात नही, अऊ पर के जात कुजात

कतक चंदा निरमल रही, दिन के होवय न रात

अर्थात् राजा से ओड़निन मजदूर की शादी नहीं हो पाएगी। दसमत ने राजा को हैसियत, जाति, ओहदे सब में अंतर बतलाया मगर प्रेमांध राजा नहीं माना। राजा ने उसे पाने शराब पी, सूअर का माँस खाया। फिर भी जब दसमत तैयार नहीं हुई तब राजा ने ताकत दिखाई- गोलियाँ चलवाईं, तलवार-भाले चलवाये। दसमत का पति सुख बिहइया राजा द्वारा गोली चलवाने पर मारा जाता है उसका अंतिम संस्कार हो रहा था, चिता पर लेटे बिहइया को पँच लकड़ी देने के बहाने दसमत भी चिता के पास जाती है और चिता में लेट जाती है, जलने लगती है। राजा महानदेव उसे बचाने आता है और हपट कर चिता में गिर जाता है और जलने लगता है। पति, उसके ऊपर दसमत और सबसे ऊपर राजा, एक ही चिता पर तीन लाशें जल गईं।

 

दसमत लोक गाथा  की स्थानियता 

गाथा में हीरे का उल्लेख मिलने से क्षेत्र, देवभोग का प्रतीत होता है। दसमत कैना की समाधि ओडार बाँध के पास है इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि दसमत कैना का अंतिम जीवनकाल इसी क्षेत्र अर्थात् दुर्ग क्षेत्र से संबंधित है। अतः यह गाथा इस क्षेत्र से संबंधित है ।

 

 

              प्रेत राज, ओढ़ार  गाँव, दुर्ग जिला, छत्तीसगढ़

 

 

             ओढ़ार बांध, ओढ़ार गाँव, दुर्ग जिला, छत्तीसगढ़

 

 

                                                                       दसमत का सती रूप,  दसमत मंदिर, ओढ़ार गांव, दुर्ग जिला, छत्तीसगढ़ 

 

 

अकाल के कारण देवभोग क्षेत्र से लोगों का पलायन और धवराँ नगर- वर्तमान दुर्ग का उल्लेख मिलता है। क्षेत्रीय इतिहास में राजा भोज या दुर्ग क्षेत्र में महानदेव वगैरह का उल्लेख नहीं मिलता। दुर्ग के निकट एक गांव कुरेटा खपरी है जहाँ लगभग चार सौ की जनसँख्या है, जो अपने को ओड़िया जाति की बताती है। तथा अपना संबंध दसमत कैना से जोड़ती हैं। वे अपना संबंध उड़ीसा से नहीं मानती।

 

धानूलाल श्रीवास्तव की पुस्तक अष्टराज अम्भोज में वर्णन मिलता है -

ओडार बाँध- इस स्टेट में एक गांव है जो शहर (राजनांदगाँव) से पश्चिम की ओर 14 मील दूर है। यहाँ एक वृहदाकार एवं अत्यंत मनोहर तालाब है जो तीन ओर पहाड़ियों से घिरा हुआ है। इस तालाब के बनने के विषय में यह कहावत प्रसिद्ध है कि दुर्ग के राजा महानदेव यहाँ की उड़िया जाति की रानी असमत (दसमत नहीं लिखा है) ओड़नी के रूप अनूप पर मुग्ध हो गए और हथियार के जोर पर उक्त रानी को छिन लेना चाहते थे। इस साधवी रानी ने अपने सतीत्व रक्षा का कोई उपाय न देख एक ही रात में एक लाख उड़ियों के द्वारा इस तालाब को खुदवाया और वह सब स्त्री पुरुषों समेत उसी में डुब गई। इस प्रकार अपने सतीत्व की रक्षा कर उड़िया जाति का मुखोज्जवल कर गई) इसमें राजा महानदेव, दुर्ग का राजा, रानी असमत ओड़नी व तालाब ओडार का उल्लेख है यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रमाण है। शोध के लिए प्रोत्साहन देने वाला है। इस राजा का काल निर्धारण होता है, वंश निर्धारण होता है।

 

 प्रकाशित दुर्ग दर्पण के लेखक गोकुल प्रसाद ने लिखा है-

यहाँ (दुर्ग में) एक प्रख्यात तालाब है जो कि औड़ों का खुदवाया हुआ है। उसी से उसका नाम पड़ा है। किंवदंति कि एक बार कोई राजा एक ओड़िन पर आसक्त हो उसे छलने का प्रयत्न किया इस पर इसी ओडार बांध को भाग गई थी। पर जब राजा ने वहाँ जाकर पीछा न छोड़ा तो तब वह जल कर मर गई ओड्रो ने उसके स्मरणार्थ एक तालाब एक रात में बना डाला फिर उस गाँव को छोड़कर चले गए। (सप्तम पट दर्पणी)

 

दसमत कैना गाथा- पठनीय, देवार जाति के गायकों से श्रवणीय है व छत्तीसगढ़ी लोकमानस में रची-बसी है।यह एक रोचक गाथा है।

 

सन्दर्भ :

श्रीवास्तव, धानूलाल अष्टराज अम्भोज,  1925

प्रसाद ,  गोकुल,  दुर्ग दर्पण , 1921. 

 

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.