डॉ. भरत पटेल

सेवानिवृत्त प्रोफेसर
भूतपूर्व संकायाध्यक्ष
लोकसंगीत एवं कला संकाय
इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय , खैरागढ़

 

 

छत्तीसगढ़ की संपन्न लोक संस्कृति में अनेक लोकनृत्य प्रचलित हैं। इन्हीं प्रचलित लोकनृत्यों में से एक है ‘करमा’ लोकनृत्य। छत्तीसगढ़ के बिलासुपर, रायपुर, दुर्ग, राजनांदगाँव, रायगढ़, सरगुजा, जशपुर तथा कोरिया, कवर्धा जैसे जिले में निवास करने वाली जनजातियों द्वारा करमा नृत्य किया जाता है।

 

जनजातियाँ अपने देवी-देवताओं का वास पेड़-पौधों पर मानती हैं। प्राचीन काल से ही पेड़-पौधों एवं पशुओं के साथ-साथ पितरों की पूजा की परंपरा इनमें रही है। ये देवी-देवता एवं पेड़-पौधों की पूजा कर, अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। पूजित वृक्षों में सरई एवं करम वृक्ष प्रमुख है। जनजाति समूह वर्ष में एक बार वृक्ष के नीचे एकत्रित होकर पूजा-अर्चना कर उत्सव मनाते हैं। करमा नृत्य-गीत में इनका विशेष महत्व है।

 

इस पर्व की मूल भावना को कालांतर में कर्म एवं भाग्य से जोड़कर इसका एक दूसरा पहलू सामने लाया गया है। करमा नृत्य-गीत कर्म का परिचायक है जो  हमें कर्म का संदेश देता है।

 

करमाअनुष्ठान

 

करमा की  उत्पत्ति के  संबंध में कई कथाएँ हैं  जैसे- राजा कर्मसेन की कथा,  कर्मा रानी की कथा एवं सात भाइयों की कथा में कर्म देव  का उल्लेख आदि का विवरण प्राप्त होता है जो कर्मा पूजा  के इर्द-गिर्द करमा नृत्य की उत्पत्ति से संबंधित जान पड़ते  हैं। इनमें से कथा इस प्रकार है-

 

करमा कथा सुनती युवतियां , पास ही करमा डार के नीचे जईं  राखी हैं। गांव बिनकरा , सरगुजा।  

 

 

कर्म  चंद नामक  राजा का राज्य  अत्यंत खुशहाल और  धर्म वैभव से परिपूर्ण  था। जिसके कारण पड़ोसी राजाओं  को बड़ी ईर्ष्या होती थी। ईर्ष्यावश पड़ोसी  राजा द्वारा आक्रमण किया जाता है तदोपरांत  उसके राज्य का पतन हो जाता है।

 

इन  घटनाओं  से चिंताग्रस्त  राजा को जंगल में  कुछ दूरी पर कुछ दीये  जलते दिखे और देवता के दर्शन  हुए। यह देखकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ।  उसने दौड़कर देवता के पाँव पकड़ लिये और अपनी विपदा  की कथा देवता के सामने रो-रोकर सुनाई। देवता ने उसके  कष्टों का निवारण कर कुछ दिशा निर्देश दिए। देवता के बताये  अनुसार उसने डेरे के बीच की जगह को कुँवारी लड़कियों द्वारा गोबर  से लिपवाया। लड़कों ने कदम वृक्ष का डाल लाकर आँगन के बीच में खोदकर  गाड़ दिया। लड़कियों ने व्रत रखा और रात में कर्म देव का पूजन किया। रात  भर नृत्य चला, प्रातः काल जलाशय में डाल का विसर्जन किया गया। राजा को उसका  राज्य वापस मिल गया और वह अपनी राज्य के राजधानी में प्रतिवर्ष बड़ी धूमधाम से  कदम वृक्ष की पूजा उक्त विधि से करने लगा।

 

यह  उत्सव  कर्म पूजा  के नाम से राज्य  में फैल गया। यही  कर्म पूजा व नृत्य करमा  नृत्य के नाम से प्रसि़द्ध  हुआ जो प्रतिवर्ष क्वार के महीने में आदिवासी  क्षेत्रों में मनाया जाता है।  

 

करमा नृत्य

करम  वृक्ष की  टहनी को भूमि  पर गाड़कर चारों  ओर घूम-घूम कर, करमा नृत्य किया जाता है। करमा  नृत्य में पंक्तिबद्धता ही करमा नृत्य का परिचायक  है। स्त्री-पुरूष पंक्तिबद्ध होकर नाचते हैं और एक दूसरे  का हाथ पकड़कर सीधी पंक्ति में अथवा अर्द्ध घेरे में आमने  सामने अथवा दायें-बाँयें चलते हुए नाचते हैं। महिलाओं का दल अलग  होता है और पुरूषों का दल अलग होता है। नाचने व गाने वालों की  सँख्या निश्चित नहीं होती है कितने भी नर्तक इस नृत्य में शामिल हो सकते हैं  बशर्ते नाचने के लिये पर्याप्त जगह हो।

 

करमा  नृत्य में  माँदर और टिमकी  दो प्रमुख वाद्य होते  हैं जो एक से अधिक तादाद  में बजाये जाते हैं। वादक नाचने  वालों के बीच में आकर वाद्य बजाते  हैं और नाचते हैं। बजाने वालों का मुख  हमेशा नाचने वालों की तरफ होता है। माँदर और  टिमकी के अलावा कहीं-कहीं मंजीरा, झाँझ व बाँसुरी  भी बजाये जाते हैं। किसी स्थान में नर्तक पैरों में  घुँघरू भी पहनते हैं।

 

करमा डार के चरों ओर घूम -घूम कर नृत्य करते युवक - युवतियां , गांव बिनकरा , सरगुजा।  

 

 

करमा  नर्तकों  की वेशभूषा  सादी दैनिक पहनावे  की होती है। जिस क्षेत्र  में जिस प्रकार के कपड़े और गहने-ज़ेवर  पहनने का रिवाज़ होता है, उसी तरह करमा  नर्तक भी पहनते हैं। इसके लिये कोई अलग पहनावा  नहीं है। जैसे भील इलाके में धोती, कमीज, जैकेट  और साफ़ा पुरूष नर्तक पहनते हैं। उराँव क्षेत्र में  पुरूष नर्तक धोती, बंडी व साफ़ा और महिला नर्तक परंपरागत  तरीके से साड़ी पहनती हैं। श्रृँगार के साधन में मुख्य रूप से  परंपरागत कलगी ही लगाते हैं तथा गहना-ज़ेवर रोज़मर्रा के ही पहनते हैं। इस तरह  करमा नृत्य में कोई अलग से वेषभूषा तथा सजावट के सामग्री की आवश्यकता नहीं होती  है। खेतों में काम करने वाला मजदूर तथा स्थानीय सरकारी नौकर व लड़के भी अपने दैनिक  वेषभूषा में किसी प्रकार का श्रृंगार किये बिना नृत्य में शामिल हो जाते हैं। नृत्य अधिकतर  रात्रि के समय ही चलता है इसीलिये किसी भी प्रकार के रूपसज्जा की आवश्यकता नहीं होती।

 

छत्तीसग़ढी करमा लोक नृत्य-गीत

 

छत्तीसगढ़  में करमा नृत्य  की विभिन्न शैलियां  प्रचलित हैं, छत्तीसगढ़  एवं सीमावर्ती मंडला जिले  में भी करमा की परंपरा विद्यमान  है। यहाँ के करमा लोक नृत्य-गीतों के  कुछ उदाहरण अधोलिखित हैं :-

 

माड़ी करमा : बस्तर

 

बस्तर  जिले के  अबूझमाड़ क्षेत्र  में दण्डामी माड़िया  जनजाति निवास करती है,  जिनके द्वारा माड़ी करमा  लोक नृत्य किया जाता है।  माड़ी करमा नृत्य विशेष रूप  से महिलाओं द्वारा किया जाता है।  माड़ी करमा में वाद्यों का प्रयोग नहीं  किया जाता। इसे माड़ी पाटा अर्थात् माड़ी करमा  गीत के साथ प्रस्तुत किया जाता है। यह नृत्य  किसी सामाजिक उत्सव व शुभ कार्य के अवसर पर करते  हैं।

 

माड़ी  करमा बस्तर  के अलावा अन्यत्र  दूसरे जिलों में प्रचलित  नहीं है। यह एक विलुप्त प्राय  नृत्य गीत है जिसे बस्तर संभाग  के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र  में किया जाता है। इसके गीत में नायिका  द्वारा अपने नायक से बाजार जाकर अपने साज-सिंगार  एवं अन्य सामग्री लाने का अनुरोध करती है।

 

भुँइहारी करमा : बिलासपुर'

 

यह  विशेष  रूप से  छत्तीसगढ़ के  बिलासपुर जिले  में निवासरत भुँइहार जनजाति  द्वारा किया जाता है। चूँकि  यह जाति बिलासपुर जिले में निवास  करती है इस कारण इसे बिलासपुरी करमा  के नाम से भी जाना जाता है। भुँइहार  को भुँइया या भूमिया जाति के नाम से भी  जाना जाता है। कार्तिक के महीने में भुँइहार  जाति ‘धरम देवता’ का पूजा उत्सव मनाते हैं। उनकी  ऐसी मान्यता है कि धरम देवता का निवास स्थान करम वृक्ष  है एवं उनकी पूजा अर्चना से उनका जीवन धन-धान्य, फल-फूल आदि से  परिपूर्ण होकर सुखमय हो जाता है।

 

भुँइहार  जाति अपने  किसी कार्य के  अतिरिक्त फसल के  पकने पर अन्न प्राप्ति  के खुशी में अपने धरम देवता  को प्रसन्न करने के लिये पूजा  अर्चना कर नृत्य करते हैं। भुँइहारी  करमा में माँदर वादक के ताल व लय में  नाच कर गीत गाते हुए आकर्षक भंगिमा निर्मित  कर नृत्य को गति प्रदान करते हैं।

 

देवार करमा:

 

देवार  गोंड जाति  की उपजाति मानी  जाती है। देवार एक  घुमन्तु जाति है जो किसी  नगर, कस्बे अथवा गांव के बाहर  तंबू लगाकर डेरे में अस्थायी रूप से  निवास करती है फिर उस स्थान से प्रस्थान  कर लेती है। इनकी अपनी विषेष संस्कृति है जिसमें  लोक संगीत एवं नृत्य का प्रमुख स्थान है। छत्तीसगढ़  में मनाये जाने वाले त्यौहार हरेली, पितर, जंवारा और होली  त्यौहारों के समान ही देवार जाति का करमा त्यौहार भी होता है।  करमा नृत्य को प्रमुख रूप से इसी उक्त अवसर पर किया जाता है। देवार  जाति बैसाख के महीने में ‘अक्ती’ (अक्षय तृतीया) दिन को शुभ मानती है अतः  इस अवसर पर भी नृत्य करते हैं।

 

देवार  नर्तक शरीर  पर आकर्षक साड़ी  कान में खिनवा, नाक  में फुल्ली, माथे में टिकली,  गले में हमेल, सुर्रा, मोती माला,  बाह में नागमोरी, हाथ हरैया, चूड़ी, कमर  में करधन पांव में बिछिया आदि। पुरूष नर्तक  धोती, कुरता, साफा, हाथ में चूड़ा पहनते हैं।

 

देवार  जाति अपने  संगीत के लिये  छत्तीसगढ़ में अत्यन्त  प्रसिद्ध पेषेवर जातियों  में से एक हैं जो उक्त  कला में माहिर मानी जाती है।  ये अपने नृत्य गीत के माध्यम से  अपनी ओर लोगों को आकर्षित करने की  क्षमता रखते हैं। इनके नृत्य गीत को सुनकर  लोग बरबस ही इनके ओर खिंचे चले आते हैं।

 

कुछ  अन्य प्रचलित  करमा लोक नृत्य-गीत-

 

करमा नृत्य करते मांदल वादक  , गांव बिनकरा , सरगुजा।  

 

छत्तीसगढ़   में करमा  लोक नृत्य-गीतों   का विस्तार अत्यंत   व्यापक है। उपरोक्त करमा  नृत्यों के अलावा यहाँ के  विविध क्षेत्रों में निम्नलिखित  नृत्य-गीतों का प्रचलन है-

 

1. करमसेनी-  करमसेनी करमा लोक  नृत्य में राजा करमसेन  के जीवन चरित्र का वर्णन मिलता है।

 

2. गोंडी करमा-  यह छत्तीसगढ़ की  गोंड जनजाति के  द्वारा किया जाने  वालालोकनृत्य है।

 

3. पहाड़ी करमा-  पहाड़ी करमा छत्तीसगढ़  के उच्च भूमि स्थलों  में निवासरत जनजातियों के  द्वारा किया जाने वाला लोकनृत्य  है।

 

4. बीरम करमा-  पाँच भाईयों की  एक लाडली बहन के  विरह तथा वेदना से प्रेरित  होकर देवार जाति के द्वारा यह  लोकगीत गाया जाता है।

 

5. तलवार करमा-  कलगी  की विषेषताओं  तथा खूबसूरती को  रेखांकित करते हुये  उसकी तुलना तलवार से  कर गाया जाने वाला लोकगीत  तलवार करमा के नाम से जाना जाता  है।

 

6. कलसा करमा-  कलसा करमा में सिर  पर कलश रखकर नृत्य  करते हैं उसे कलसा करमा  कहते हैं।

 

समकालीन प्रसिद्द करमा गायक

 

कलाकारों की निम्न सूचि यह दर्शाती है कि करमा किसी एक समुदाय से जुड़ा हुआ त्यौहार नहीं है. बल्कि यह समूचे क्षेत्र में लोकप्रिय है. करमा  गीत मूलतः सामूहिक और अनुष्ठानिक थे , जिनमें नृत्य एवं गीत एक दूसरे से अभिन्न थे। धीरे धीरे करमा की लोकप्रियता बढ़ने और उसके व्यावसायिक प्रदर्शनों की मांग होने से अनेक करमा मंडलियां अस्तित्व में आ गईं और करमा का मंचन किया जाने लगा।क्यूंकि करमा कथा और गीतों में कोई सीधा संबंध नहीं था , अतः उसे अनुष्ठान से पृथक रूप में कल्पित करने में की कठिनाईं नहीं हुई।  करमा गीतों की लोकप्रियता ने व्यावसायिक स्तर पर समसामयिक कर्मा गीतों के लेखन और गायन को प्रोत्साहित किया, जिसके फलस्वरूप अनेक करमा गायक सामने आ गए.

 

 1.  श्री  मांझीराम  उरांव, 2.  श्रीमती किसमत  बाई, 3. श्रीमती बरतनीन  बाई, 4. श्रीमती फिदा बाई,  5. श्रीमती जयंती यादव 6. श्रीमती  रेखा देवार, 7. श्री गणेष राम मरकाम,  8. श्री कोदू राम वर्मा, 9. श्रीमती पूनम  तिवारी, 10. स्व0 प्रहलाद सिंह कष्यप, 11. श्री  घनष्याम सिंह, 12. श्री खुमान साव, 13. श्री कुलेष्वर ताम्रकार   14. श्री दीपक चंद्राकर, 15. श्री मिथलेष साहू, 16. पद्मश्री   गोविंदराम निर्मलकर, 17. पद्मश्री ममता चंद्राकर, 18. श्रीमती कविता वासनिक,  19. श्री गोपीराम निषाद, 20. श्री कलिराम ढीमर, 21. श्री श्याम लाल रावत, 22. श्री  नान दाऊ गोंड, 23. श्री प्रीत राम उमरे, 24. श्री पंडितराम, 25. श्री सेहुन मिंज, 26. श्रीमती  माला बाई।


 

संदर्भ  सूची-

 

1. मध्यप्रदेश का लोक  संगीत, प्रो. शरीफ़ मोहम्मद,  मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी,  भोपाल।

2.    छत्तीसगढ़ी  लोक साहित्य  का अध्ययन, डाॅ0  दयाषंकर शुक्ल, वैभव  प्रकाषन, रायपुर छ0ग0।

3.    नागवंश,  लाल प्रद्युमन  सिंह, भाग-1

4.    अप्रकाशित  शोधप्रबंध, छत्तीसगढ़  के लोकनृत्यों के अंगराग  का विवेचनात्मक अध्ययन, डॉ. दीपशिखा पटेल।

5.    ‘देवार’  मोनोग्राफ,  आलेख, निरंजन  महावर, प्रकाशन-मध्यप्रदेष  आदिवासी कला परिषद, भोपाल।

7.    उराँव जनजाति का सरहुल नृत्य, मड़ई पत्रिका, प्रो. शरीफ मोहम्मद, संपादक-डॉ. कालीचरण यादव।

 

 




This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.