छत्तीसगढ़ के किसी भी ग्रामीण क्षेत्र में जाएँ अथवा नगरीय सीमा के बाहर किसी भी सड़क पर निकल जाएं महुआ का वृक्ष आपको हर तरफ मिल ही जायेगा। यदि आप यहाँ फरवरी से मई माह के बीच गए हैं तो हर तरफ आपको एक विशेष गंध का आभास होगा, जो महुआ वृक्ष के फूलों की महक के कारण चारों ओर फैलती है। इस समय प्रत्येक गांव में भोर के समय में महिलाओं और बच्चों को केवल एक ही काम होता है, महुआ वृक्षों से झड़े हुए फूलों को चुनना। वे धूप में गर्मी बढ़ने से पहले ही फूलों को चुन लेने चाहते हैं। जगह जगह महुआ फूलों के ढेर और उनसे भरी बांस की टोकरियां नजर आती हैं। झोपड़ियों के छप्परों और आंगनों में लोग महुआ फूलों को सूखने के लिए रखते हैं। प्रत्येक ग्रामीण परिवार इस समय अधिक से अधिक महुआ फूल एकत्रित कर लेना चाहता है ताकि वह उसे बाद में अनेक प्रकार से उपयोग में ला सके।
Image: Mahua Tree, Chhattisgarh. Photo Credit : Anzaar Nabi
Image: Women Collecting Mahua Flower, Photo Credit: Anzaar Nabi
Image: Women Carrying their Mahua Home, Photo Credit : Anzaar Nabi .
Image: A Man Drying Mahua Flower on his Roof., Photo Credit : Anzaar Nabi
महुआ छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवन का सांस्कृतिक एवं आर्थिक आधार है। यह न केवल दैनिक जीवन में भोजन और पेय के लिए उपयोग में लाया जाता है बल्कि इसे बेचकर नकद पैसा भी प्राप्त किया जाता है। घर में रखा हुआ महुआ एक संपत्ति के समान होता है जिसे कभी भी नकदी में बदला जा सकता है।
बस्तर में यह एक आम कहावत है कि 'बस्तर के आदिवासी और उनके देवी-देवताओं को समाप्त करना हो तो यहाँ से महुआ का पेड़ समाप्त करदो, वे अपने आप खत्म हो जायेंगे।'
महुआ छत्तीसगढ़ के ग्रामीणों के लिए इस लोक एवं परलोक दौनों में महत्वपूर्ण है, वह मनुष्य और देवी-देवताओं सभी का प्रिय है। यह मानवों के लिए मदमस्त कर देने वाला पेय और देवों के लिए सर्वश्रेष्ठ अर्पण है। मृत पितरों एवं सोए देवताओं को जाग्रत करने वाला अनुष्ठानिक द्रव्य है। आदिवासी समुदायों के सामाजिक समारोहों का आवश्यक अंग और प्रत्येक हर्षोल्हास के अवसर का साथी है।
Image: A Woman Selling Mahua in the Local Market<, Photo Credit, Anzaar Nabi
बस्तर क्षेत्र के निवासियों के लिये महुआ वृक्ष इतना महत्वपूर्ण होते हुए भी यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि इसका पौध कोई भी रोपता नहीं है, जो पौधे अपने आप उगते हैं उन्हें ही रहने दिया जाता है। इनके उगने में पक्षी मत्वपूर्ण भूमिका निबाहते हैं, वे इसके फल-फूल खाते हैं और उनके बीज इधर-उधर छोड़ देते हैं, वही बीज उगते हैं और महुआ वंश का विस्तार करते हैं। हल्बी बोली में महुआ को महु कहते हैं।
महुआ वृक्ष बस्तर की आदिवासी संस्कृति और उनके आर्थिक जीवन का एक अहम् अंग है। इसके तने की छाल, इसके फूल और फल सभी काम आते हैं। जिसके पास दस महुआ वृक्ष हों उसे गांव में संपन्न व्यक्ति माना जाता है। एक महुआ वृक्ष साल भर में दो से पांच क्विण्टल फूल और पचास-साठ किलो फल देता है। इसके तने की छाल का उपयोग पेट सम्बन्धी बीमारियों में औषधि के रूप में किया जाता है। इसकी छाल को रात भर पानी में भिगोकर रखा जाता है और सुबह उस पानी को रोगी को पिलाया जाता है। महुआ का फल टोरी कहलता है ,इसके अंदर से निकलने वाले बीज को सुखाकर उससे तेल निकाला जाता है। महुआ बीज का तेल, ठंडक पाकर नारियल के तेल के समान जम जाता है। इसे खाने के काम में लिया जाता है, सब्जी-भाजी छोंकने में इसे प्रयोग किया जाता है। यह तेल त्वचा के लिए उत्तम माना जाता है, ठण्ड के मौसम में त्वचा को फटने से बचाने के लिए इसे शरीर पर लगाया जाता है। पहले मुरिया-माड़िआ आदिवासी सरई और खुरसा के साथ महुआ फूल की सब्जी बनकर भी खाते थे।
महुआ का वृक्ष वर्ष में एक बार फूलता है, फूल फरवरी माह से जून माह तक झड़ते हैं। अलग-अलग वृक्षों में आगे-पीछे फूल आते हैं। इसके फूल बीनकर जमा कर लिए जाते हैं और उन्हें सुखाकर उनसे मंद बनाई जाती है। पहले फूलों से बनाई गयी मंद, सर्वप्रथम घर के देवी-दवताओं को अर्पित की जायेगी उसके बाद लोग उसका पीना आरम्भ करते हैं। बस्तर में देव-धामी में महुआ मंद सर्वोपरि है, इसे अर्पित किये बिना किसी भी देवी-देवता को प्रसन्न करना संभव नहीं है।
विवाह मंडप में महुआ डार गाढ़ना एक आवश्यक रिवाज है, इसको स्थापित किये बिना विवाह संपन्न नहीं हो सकता।
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में महुआ से शराब बनाना एक साधारण कार्य है। सामान्यतः अधिकांश लोग अपने लिए और कुछ लोग बेचने के लिए देशी तरीके से शराब घर ही में बना लेते हैं। यहाँ के कुम्हार इस कार्य हेतु एक विशेष प्रकार की मिट्टी की हांड़ी बनाते हैं। यहाँ के लगभग प्रत्येक साप्ताहिक हाट बाजार में यह हंडियां बिकती हैं। प्रत्येक हाट बाजार में नशीले पेय बेचने हेतु एक अलग खंड होता है, जहाँ स्त्रियां महुआ, सल्फी, लांदा आदि लिए बैठी रहती हैं।
Image: Making Alcohol (local spirit) from Mahua., Photo Credit Anzaar Nabi
Image: Earthen Vessel Used in Making Alcohol from Mahua., Photo Credit Anzaar Nabi
This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.