Ajay Kumar Chaturvedi

लेखक, कवी ,गीतकार , शोधकर्ता , शिक्षक

छत्तीसगढ़ राज्य का बस्तर और सरगुजा आदिवासी बहुल अंचल है। बस्तर में जो महत्व मादक पेय सल्फी का है, वही महत्व सरगुजा में महुआ का है। महुआ सरगुजा अंचल में आदिवासियों के जीवन ये सीधा जुडा हुआ है। इनके सभी कार्यक्रमों में महुआ या इससे बने दारु (शराब) मुख्यतः रहता है।

भारतीय उष्ण कटिबंधीय वृक्ष महुआ उत्तर भारत के मैदानी इलाकों और जंगलों में अधिक पाया जाता है। इस का वैज्ञानिक नाम ’’मधुका लोंगफोलिया’’ है। पादपों के सपोटेसी परिवार से संबंध रखने वाला महुआ शुद्व पर्यावरण के अनुकूल पर्णपाती वन का एक प्रमुख पेड़ है। इसकी खेती बीजों, फूलों और लकड़ी के लिए की जाती है।

Mahua Tree

Image: A Mahua Tree/महुआ का पेड़. Photo Credit: Rohit Rajak (All pictures in this essay belong to Rohit Rajak unless otherwise specified.) 

बस्तर अंचल में महुआ का महत्व 
बस्तर अंचल के आदिवासी लोग महुआ वृक्ष की पूजा अपने ईस्ट देव के समतुल्य मानकर करते हैं। यहां के आदिवासियों के लिए यह काफी महत्व का वृक्ष है। महुए के फूल से बने शराब इनके सभी संस्कारों में उपयोग किया जाता है।

Offering Mahua to village deity

Image: Offering Mahua to Kula Devata/कुला देवता को महुआ अर्पित करते हुए

सरगुजा अंचल में महुआ का महत्व 
आदिवासी बहुल अंचल सरगुजा में महुए का महत्व अत्यधिक है। ये लोग इसके पत्ते, फूल, फल, और इसकी लकड़ी का उपयोग करते हैं। इनके जन्म से मृत्यु तक की सभी संस्कारों में महुए से बने दारु (देषी शराब) का उपयोग किया जाता है। जनमोत्सव से मृत्युत्सव तक अतिथियों का सतकार महुआ रसपान से करा करते हैं। ये लोग महुआ रसपान करने से पहले धरती पर छींटे मारकर अपने पितरों को चढाते हैं। पितरों और देवताओं को दारु (महुआ रस)  अर्पित करने की परम्परा है। ग्राम पूजा और अपने घर में ईस्ट देव की पूजा में भी दारु (महुआ रस) प्रमुख्यतः रहता है। 

महुआ फूल की पूजन विधि 
सरगुजा अंचल में महुए के उपयोग से पहले इसकी पूजा करने की रिवाज आदिवासियों में पारंपरिक है। ये लोग वैषाख शुक्ल पक्ष अक्षय तृतीया को विधि विधान से पूजा करते हैं। पूजन कार्य घर का मुखिया घर के आंगन और घर के अन्दर देव स्थल पर करता है। इसे ये लोग महुआ तिहार या वैषाखी तिहार कहते हैं। पूजन से पहले महुए को तेल में भूना जाता है। महुए को भूनने के बाद धूप, दीप, नारियल, जल, रोटी-चावल, उड़द दाल और भूना महुआ को अलग-अलग साल वृक्ष की पत्ति से बने दोना में रखकर ईस्ट देव की पूजा अर्चना की जाती है। दोना में रखे सामग्री को कगोरी कहते हैं। जैसे- कगोरी रोटी, कगोरी भात, कगोरी दाल इत्यादि। महुआ फूल की पूजा के बाद ही इसका सेवन प्रारंभ करते हैं। बिना पूजा किये नये महुए का सेवन किसी भी रुप में वर्जित रहता है। सरगुजा अंचल में महुआ से दारु (देषी शराब) और लाटा बनाए जाते हैं। यह इनका प्रमुख मादक पेय और व्यंजन है।

Rituals before consuming Mahua

Image: Rituals performed before consuming the new Mahua

ग्रामीण अर्थवयवस्था में महुआ का महत्व 
ग्रामीण अंचलों में महुआ बीनने के बाद अच्छी तरह सुखाकर इसे स्थानीय हाट बाजारों में बेचते हैं। इससे इन्हें अच्छी आय मिलती है। महुआ दारु (देषी शराब) बनाकर इसे भी बेचकर अपनी आर्थिक स्थिति सुधारते हैं। ग्रामीण अंचलों में इसके पत्ते, फूल, फल और लकडियां बेची भी जाती है। महुआ के फल को सरगुजा अंचल में डोरी कहते हैं। इससे तेल निकाले जाते हैं। कच्चे फलों की सब्जी बनाई जाती है। पके हुए फल को खाया जाात है। यह स्वादिष्ट और मीठा होता है। डोरी तेल त्वचा की देख-भाल और ईंधन तेल के रुप में उपयोग किया जाता है। इससे साबुन भी बनाया जाते हैं। तेल निकालने के बाद बचे हुए खल्ली को जानवरों के खाने और उर्वरक के रुप में उपयोग किया जाता है। महुए की छाल को औषधि के रुप में भी उपयोग किया जाात है। सुखे हुए महुए के फूलों को मेवे के रुप में भी उपयोग किया जा सकता है। इस तरह महुआ बहुपयोगी होने के कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान बनाया हुआ है।

Mahua

Image: Dried Mahua/सूखा हुआ महुआ 

 

Mahua in the local Market

Image: Mahua in the local market/स्थानीय बाजार में महुआ

सरगुजिहा लोक गीत और महुआ  
सरगुजिहा लोक गीतों में महुए का उल्लेख मिलता हैै। यहां की प्रमुख लोक गीत सैला, करमा, डोमकच, सुआ, उधुवा, होली और बायर गीत है। इन सभी गीतों में महुए का प्रयोग काफी अलंकारिक ढ़ग से हुआ है। आदिवासी लोग जब महुआ रसपान (दारु) कर अपनी पारंपरिक लोक गीतों का गायन करते हैं तो इनकी उत्साह दुगुनी हो जाती है। मैंने इनके बीच लोक गीत सुनने गया तो इन्होनेें कहा किए ’’एक बोतल पियाबो तबे तो गाबो’’ए इसका अर्थ यह है कि ’’एक बोतल शराब पिलाओगे तभी गीतों का गायन करेंगे’’। सरगुजिहा लोक गीतों में महुए का चित्रण काफी मनमोहक ढ़ग से किया गया है। जो इस प्रकार है-

A singer singing Mahua songs

Image: A singer singing Mahua songs/महुआ गीत गाता हुआ एक गायक

सरगुजा अंचल का प्रमुख लोक गीत करमा है। यहां सोलह प्रकार के करमा गीत गाये जाते हैं। करमा लोक गीतों में महुए का वर्णन इस प्रकार हुआ है -
           
भुइंहारी करमा गीत- कटकोना में महुआ परे

महुआ परे असमान कटकोना में, महुआ परे।
कोन हर बिछे एक मोरा ढुई मोरा।
कोन हर बिछे मोरा चार, कटकोना मा महुआ परे।
बूढ़रा हर बिछे एक मोरा दुई मोरा।
बुढिया हर बिछे मोरा चार, कटकोना मा महुआ परे।
महुआ बिछाई के भयले तइयार।
लेजाके मढ़ावे भट्ठीसार। कटकोना में महुआ परे।

भावार्थ- कटकोना गांव में आकाष से महुआ गिर रहा है। बताया जा रहा है कि कौन एक   मोरा (बांस का बर्तन), कौन दो मोरा और कौन चार मोरा महुआ बीनता है। बूढ़ा व्यक्ति एक-दो मोरा बीनता बूढ़ी औरत चार मोर महुआ उठाती है। महुआ बीनकर तैयार होने के बाद सुखाकर इसे भट्ठीसार में ले जाते हैं। कटकोना गांव में अत्याधिक महुआ गीर रहा है।
               
राम चर्चा करमा गीत 

कहां कर महुआ ला कहां जी लगाए,
हां गोई रे कहां ला सोहरी गाये डार।
पूरबे कर महुआ ला पष्चिमे लगाये
हां गोई रे धरती में सोहरी गये डार,
जबकी तो धरती में सोहरी गये डार।
हां गोई रे पन फूले बतिया धराये।
बरजबे दसोमति तोर सुगना ला ,
हां गोई रे तोर पंछी बरज नहीं जाये।
तोर सुआ ला रखबे जोगाये,
आखिर मार देबे धनही चढ़ाये।
कहां कर महुआ ला कहां लगाये।

भावार्थ- इस गीत में पूछा जा रहा है कि कहा कि महुआ को कहां लगाया गया है। इसकी डगाली धरती में झूल रही है। पूर्व दिषा की महुआ को पष्चिम दिषा में लगाने के बाद धरती में उसकी डगाली झूलने लगती  है। महुआ का वृक्ष तैयार हो गया है। इसमें फूल और छोटे फल लगने लगे हैं। इस फूल  और फल को पालतू तोता पंछी द्वारा खा लिया जाात है। तोते के मालिक को कहा जा रहा है कि इसे खाने से मना करे नही तो तीर धनुष से मार दिया जायेगा।
              

टपकी-टपकी संगी महुआ गीरे

धरती में फूल बरसे, सररर बहे पवन पुरवइया।
कोईली कूहू-कूहू, पपिहा के पिहू-पिहू।
सुनी-सुनी जीवा लहसे।
महुआ के रस टपके धरती में फूल बरसे।
फागून के जाती, चैती के आती।
साँझ बिहनिया आधी राती।
रस बरसे हाय मन लहसे महुआ के रस टपके।

भावार्थ- हे संगी टप-टप महुआ गीर रहा है। ऐसा लग रहा है कि धरती में फूल बरस रहा है। सररर पुरवइया बयार भी बह रही है। चारों तरफ कोयल की कुहू-कुहू और पपिहा की पिहू-पिहू मीठी आवाज सुनकर जीव ललचने लगा है। महुआ का रस टपक रहा है। चारों तरफ धरती में फूल बरस रहा है। फागून माह बीतने और चैत्र माह के आते ही सुबह-शाम और आधी रात को महुआ रस टपकने से मन ललचाने लगता है।
                      

सरगुजिहा करमा गीत 

ये दे गोई मोर महुआरे, आवा ला लाटा छरिहारे, मोर महुआर।
डगर कर महुआ सूरन फेंके डारें, मोर महुआरे।
टपकी-टपकी चुये लागे मोर महुआरे।
राती कर महुआ भलनी बिछी खाये, मोर महुआरे।
दिने बिनल जोड़ी हारे मोर महुआरे।
कोन हर बीने एक मोर दुई,
कोन हर  बीने मोरा चारे।
बुढ़िया हर बीने एक मोरा दुई,
छौड़ी बिनल मोरा चारे।
बिनी बुना के भइले तइयार।
दे दे कलारिन हाथे।
 

भावार्थ- मेरे महुआ के पेड़ में फूल लग चुके हैं। रास्ते के महुआ में चारों तरफ डगाल फैल चुका है। बंधे हुए लच्छी खुलते ही महुआ टपकने लगता है। रात की महुआ को मादा भालू बीन कर खा जाती है। और दिन की गीरे हुए महुआ को दोनों जोड़ी बीनते हैं। कौन एक दो मोरा (बांस का बर्तन) और कौन चार मोरा बिछता है। बूढ़ी औरत एक दो मोरा और लडकी चार मोरा बिछती है। महुआ को बीनकर इक्ट्ठा कर कलारिन के हाथो दे देते हैं।
                               
सरगुजिहा सुआ गीत

फूल उपर डोंहडी, डोंहडी उपर फूल।
ये मोर सुगना मात गये हे फागून महीना।
ये मोर सुगना झर-झर झरे महुआ।
कोन हर बीछे महुआ निहुरी-निहुरी।
कोन हर गाये दादर झूमरी-झुमरी।
ये मोर सुगना कोन गोदावे गोदना।
ये मोर सुगना मात गये हे फागून महीना।
भौजी बिछे महुआ निहुरी-निहुरी।
दादा गावे दादर झूमरी-झूमरी।
ये मोर सुगना ननद गोदावे गोदना।
झर-झर झरे महुआ।
ये मोर सुगना मातगे है फागून महीना।

भावाथ- महुआ में फूल और डोंहडीं लग चुके हैं। ये मेरे सुआ फागून महीना महुए के नषे में मस्त हो गया है। चारों तरफ महुआ झर रहा है। कौन झुक-झुक कर महुआ उठा रहा है और कौन झूम-झूम कर दादर गा रहा है। ये मेरे सुआ कौन गोदना गुदवा रही है। पूरा फागून महीना महुए के रस में सन चुका है। बताया जा रहा है कि भौजी (भाभी) झूक-झूक कर महुआ बीनती है। और दादा (भाई) झूमकर दादर गा रहा है। तथा ननद अपने शरीर में गोदना गुदवा रही है। महुआ के झरने से फागुन महीना नषे में चूर हो गया है।               
          

सरगुजिहा बायर गीत-उगरे लेइहो ना, उगरे लेइहो ना

महुआ बिछे जइहो होले उगरे लेईहो ना।
महुआ बिछे जाबो होले कइसे बुलाबो संगी।
आधा राती जईहो होले सीटी ला बजइहो।
बिहान बेरा जईहो होले थपोरी ला बजइहो
उगरे लेइहो ना, उगरे लेइहो ना।

भावार्थ- इस गीत में बताया जा रहा है कि महुआ बीनने जाते समय इंतजार कर लेना। लड़का कहता है कि महुआ बीनने जाते समय कैसे बुलाऊंगा। लड़की कहती है कि आधी रात को जाते समय सीटी बजाना और सुबह जाते समय ताली बजाना तो मैं समझ जाऊंगी। मेरा भी इंतजार करना मैं भी महुआ बीनने साथ चलूंगी।

 

सरगुजिहा सैला गीत 
     
तोर पीछवारे में एक पेड़ महुआ,
आवा ला लटा छोरी हारे सुन्दरी बाजो हो ललना।
जब तोरे आवा ला लटा छोरी हारे।
टपकी-टपकी चुवे लागे सुन्दरी बाजो हो ललना रे- 2
राती के महुआ भलनी बिछी खाये।
दिने बिछल जोडी हा रे सुन्दरी बाजो हो ललना रे - 2
कोन हर बिछे एक मोरा दूई,
कोने बिछल मोरा चारे सुन्दरी बाजो हो ललना रे - 2
बूढरा हर बिछे एक मोरा दूई,
बूढ़िया बिछल मोरा चारे सुन्दरी बाजो हो ललना रे - 2
कान्हा खोचर ला बिछी के ठुरावे।
दे देले कालारिन हाथे सुन्दरी बाजो हो ललना रे - 2
कोन माधा पोते केंवटा कुम्हारे।
कोन माधा पोते कलवारे सुन्दरी बाजो हो ललना रे - 2
हाड़ी माधा पोते केंवटा कुम्हारे।
फूली माधा पोते कलवारे सुन्दरी बाजो हो ललना रे - 2
हर जोती आवे, कुदारी भांजी आवे
रोंगसी बैठल भट्ठीसारे सुन्दरी बाजो हो ललना रे - 2
लोटा- लोटा ढारे,फांदी-फांदी पीये।
माती गइल मतवारे सुन्दरी बाजो हो ललना रे - 2
मारों कलारिन धिया, टोरों भट्ठीसारेे।
मोरो पिहा काहे मतुआये सुन्दरी बाजो हो ललना रे - 2

भावार्थ- तुम्हारे घर के पीछे महुआ का एक पेड़ है। जिसमें फूल-फल के लद चुके हंै। जो काफी मनमोहक लग रहा है। जब इसके बंधे हुए लच्छी खुलते हैं तो महुआ टपकने लगता है। जो मनोहरी लगता है। रात की महुआ को मादा भालू बीन कर खा जाती है। और दिन की  गीरे हुए महुए को दोनों जोड़ी बीनते हैं।  कौन एक दो मोरा (बांस का बर्तन) और कौन चार मोरा बिछता है। बुढ़ा व्यक्ति एक दो मोरा और बूढ़ी औरत चार मोरा बिछती है। कोने-कोने की महुआ को बीनकर इक्ट्ठा कर कलारिन के हाथो दे देते हैं। कहाँ की लिपाई केंवटा-कुम्हार और कहां की लिपाई कलवार करता है। हांडी को केंवटा कुम्हार और फूली को कलवारिन लिपाई करती है। खेत से हल और फावडा चलाकर किसान घर आता है। तब रोंगसी भट्ठी सार में बैठ रहती है। लोटा-लोटा दारु (षराब)  फांदी-फांदी पी कर लोग मतवार बनकर गली-गली घूमते हैं। इस पर स्त्री कहती है कि मैं कलारिन की धिया को मारुंगी और उसकी भट्ठी तोड़ दूंगी। वह मेरे पति को मतवार बना दी है।
                    

सरगुजिहा गाना लोक गीत 

झिरी-झिरी पानी बहे। संग मा बहे बालू,
महुआ बिछे गयेन मोला छेंक देहिस भालू।

भावार्थ- धीर-धीरे पानी के साथ बालू भी बहती है। मैं महुआ बिछने गया था। मुझे रास्ते में भालू पकड़ लिया। महुआ भालू का काफी प्रिय भोजन है। इसलिए महुआ के जंगलों में भालू का आना-जाना आम बात है।
                         

सरगुजिहा गाना लोक गीत

झइन पिहा महुआ दारु,झइन जइहा लड़े।
नाव ला लिखा दे दारु महूं जाहूं पढूं।।

भावार्थ- इस गीत में नषे का विरोध और पढ़ाई के प्रति जागरुकता फैलाने की बात कही गयी है। बताया जा रहा है कि महुआ दारु (षराब) पीकर लडाई झगडा मत करो। आगे लड़का कहता है कि मेरा भी नाम स्कूल में लिखवादो। मैं भी पढ़ने जाऊंगा।
           
सरगुजिहा डोमकच गीत 

कुचाइस महुआ के झर गिरे पान।
देख तो ददा आमा डार में कतेक सुघर है कोयली के तान।
कोयली के मीठ बोली जीवा के लुभाय।
सुनी-सुनी भौजी कर मन लहुस जाये।
देख तो ददा भौजी के धरा गे हे महुआ बिछान।
आमा डारे कतेक सुघर है कोयली के तान।
बिहनिया के सूरज उपर चढ़ जाये।
फूल उपर फूल गिरे महुआ मताय।
देख तो ददा भौजी के घूमर-घूमर महुआ बिछान।
कुचाइस महुआ के झर गे पान।
भावार्थ- फूले महुआ की पत्तियां झड़ चुकी हैं। देखो भाई आम के डगाल में कोयली की तान काफी मीठी सुनाई दे रही है जिससे जीव ललचा रहा है। देखो भाई, भौजी का महुआ बिछना अच्छा लग रहा है। आम के डगाल में कोयली की तान सुनाई दे रही है। सुबह सूर्य उपर चढ़ने पर महुआ के फूल उपर फूल गिरने से काफी अच्छा लग रहा है। देखो भाई, भौजी  घूम-घूम कर महुआ बीन रही है। फूले महुआ की पत्तियां झड़ चुकी हैं।

 

उपसंहार

सरगुजा अंचल का प्रमुख मादक पेय महुआ दारु है जो यहां की आदिवासी जनजीवन और उनकी लोक संस्कृति से जुड़ी हुई है। यही कारण है कि आज महुआ इनके आय का महत्वपुर्ण साधन बन चुका है। जो इनके लोक गीतों को सुनकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। महुआ के बीना सरगुजा अंचल के आदिवासियों के संस्कारों की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.