Ajay Kumar Chaturvedi

अध्यापक, लेखक , कवी , गीतकार , अवं शोधकर्ता

Chhattisgarh, 2019

तोर पीछवारे में एक पेड़ महुआ,
आवा ला लटा छोरी हारे सुन्दरी बाजो हो ललना।
जब तोरे आवा ला लटा छोरी हारे।
टपकी-टपकी चुवे लागे सुन्दरी बाजो हो ललना रे- 2
राती के महुआ भलनी बिछी खाये।
दिने बिछल जोडी हा रे सुन्दरी बाजो हो ललना रे - 2
कोन हर बिछे एक मोरा दूई,
कोने बिछल मोरा चारे सुन्दरी बाजो हो ललना रे - 2
बूढरा हर बिछे एक मोरा दूई,
बूढ़िया बिछल मोरा चारे सुन्दरी बाजो हो ललना रे - 2
कान्हा खोचर ला बिछी के ठुरावे।
दे देले कालारिन हाथे सुन्दरी बाजो हो ललना रे - 2
कोन माधा पोते केंवटा कुम्हारे।
कोन माधा पोते कलवारे सुन्दरी बाजो हो ललना रे - 2
हाड़ी माधा पोते केंवटा कुम्हारे।
फूली माधा पोते कलवारे सुन्दरी बाजो हो ललना रे - 2
हर जोती आवे, कुदारी भांजी आवे
रोंगसी बैठल भट्ठीसारे सुन्दरी बाजो हो ललना रे - 2
लोटा- लोटा ढारे,फांदी-फांदी पीये।
माती गइल मतवारे सुन्दरी बाजो हो ललना रे - 2
मारों कलारिन धिया, टोरों भट्ठीसारेे।
मोरो पिहा काहे मतुआये सुन्दरी बाजो हो ललना रे - 2

भावार्थ- तुम्हारे घर के पीछे महुआ का एक पेड़ है। जिसमें फूल-फल के लद चुके हंै। जो काफी मनमोहक लग रहा है। जब इसके बंधे हुए लच्छी खुलते हैं तो महुआ टपकने लगता है। जो मनोहरी लगता है। रात की महुआ को मादा भालू बीन कर खा जाती है। और दिन की  गीरे हुए महुए को दोनों जोड़ी बीनते हैं।  कौन एक दो मोरा (बांस का बर्तन) और कौन चार मोरा बिछता है। बुढ़ा व्यक्ति एक दो मोरा और बूढ़ी औरत चार मोरा बिछती है। कोने-कोने की महुआ को बीनकर इक्ट्ठा कर कलारिन के हाथो दे देते हैं। कहाँ की लिपाई केंवटा-कुम्हार और कहां की लिपाई कलवार करता है। हांडी को केंवटा कुम्हार और फूली को कलवारिन लिपाई करती है। खेत से हल और फावडा चलाकर किसान घर आता है। तब रोंगसी भट्ठी सार में बैठ रहती है। लोटा-लोटा दारु (षराब)  फांदी-फांदी पी कर लोग मतवार बनकर गली-गली घूमते हैं। इस पर स्त्री कहती है कि मैं कलारिन की धिया को मारुंगी और उसकी भट्ठी तोड़ दूंगी। वह मेरे पति को मतवार बना दी है।

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.