अजय कुमार चतुर्वेदी

अध्यापक, लेखक, कवि, गीतकार एवं शोधकर्ता

भारत के हृदय स्थल मध्यप्रदेश के दक्षिणपूर्व भाग में ‘धान का कटोरा’ छत्तीसगढ़ राज्य स्थित है। छत्तीसगढ़ के उत्तरांचल में आदिवासी बहुल संभाग सरगुजा है।

सरगुजा की लोक संस्कृति के नाम से संपूर्ण छत्तीसगढ़ की एक अलग पहचान है। अंचल सरगुजा की बात की जाये तो यह पांच जिलों का प्रतिनिधित्व करता है। सरगुजा सम्भाग के अंतर्गत जशपुर, कोरिया, सूरजपुर, बलरामपुर-रामानुजगंज एवं सरगुजा जिले शामिल हैं। सरगुजा के लोक वाद्यों को देखने और सुनने से ऐसा लगता है कि इसका प्राचीन नाम ‘‘सुरगुंजा” यहाँ की पारंपरिक और सुरीली आवाजों की ही देन है। यहां के लोग अपने पारंपरिक लोक वाद्यों से लैस होकर मनोहारी सुरों का गुंजन करते हैं। इन्हीं सुरों की गुंजन से (सुरगुंजा) सुरगुंजा बना। इसी का अपभ्रंश वर्तमान में ‘‘सरगुजा” प्रचलित है।

छत्तीसगढ़ में लोक वाद्यों की एक अनोखी परंपरा रही है। यहाँ मिट्टी, लोहा, लकड़ी, बाँस, जंगली जानवरों के चमड़े, तार, तांत, तुम्मा (लौकी) और घोड़े की पूंछ के बाल से अनोखे वाद्य यंत्र बनाये जाते थे। वर्तमान में भी कुछ वाद्य बनाये जा रहे हैं। प्राचीन समय में ऐसे दुर्लभ वाद्य यंत्रों का निर्माण किया गया था जिन्हें, हाथ, पैर, मुँह, नाक तथा पेट से बजाया जाता था। सरगुजांचल में जिन पारंपरिक लोक वाद्यों का प्रचलन था, वे प्रायः विलुप्त हो चुके हैं या फिर विलुप्त होने की कगार पर हैं। आज इन वाद्य-यंत्रों के बनाने और बजाने वाले नहीं के बराबर हैं।

Vady Sangrah

सरगुजा जिले में संगीत का प्रयोग प्राचीन काल से होता आ रहा है। यहां ऐसे लोक वाद्यों का प्रयोग किया जाता था जिससे कहा जाता है कि देवी-देवताओं और मनुष्य के अलावा शेर जैसे जानवर भी रीझा करते थे। कुछ वाद्यों से बाघ के गरजने जैसी आवाजें भी निकलती थीं। सरगुजावासी अपने अनोखे वाद्य-यंत्रों से लैस होकर राजाओं के साथ शिकार पर जाया करते थे। शिकारी बाजे के साथ झुमका खेलकर जंगली जानवरों को रिझाया करते थे। सरगुजा में शेर जैसे जंगली जानवरों को रिझाने वाला वाद्य यंत्र शिकारी बाजा (झुन्का) है तथा घुमरा बाजे की आवाज से शेर जैसे जंगली जानवरों को भगाया जाता था। इस वाद्य यत्रं का प्रयोग कर किसान लोग अपने खेत की रखवाली करते थे। 

सरगुजांचल में प्रचलित लोक वाद्यों के अध्ययन से पता चलता है कि  यहाँ के लोग प्रारंभ से ही अपने हाथों से निर्मित वाद्य-यंत्रों का प्रयोग करते रहे हैं। आधुनिकता एवं इलेक्ट्रानिक वाद्यों की प्रचलन से पुरखों की दुर्लभ निशानी विलुप्त होती जा रही है। ये लोग लोक वाद्यों का प्रयोग देवी-देवताओं, मनुष्यों एवं शेर जैसे जानवरों को रिझाने के साथ-साथ विवाह एवं मनोरंजन के लिए करते थे। इन वाद्य यंत्रों को विभिन्न मौकों पर बजाया जाता है विशेषकर- जन्म, विवाह एवं मृत्यु संस्कार, त्यौहार, खेल, कृषि, मनोरंजन, गंवसज्जी, शिकार, पूजा-पाठ, देवारी, जागरूकता, प्रचार-प्रसार और फसल होने पर। छत्तीसगढ़ अंचल का एक अनोखा दुर्लभ लोक वाद्य पंचमुखी बाजा है। जो खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय में रखा हुआ है। ऐसा ही विलुप्त दुर्लभ लोक वाद्य ढ़ोंक है, जो सरगुजा अंचल में प्रचलित था। इसे पेट के सहारे बजाया जाता था।

छत्तीसगढ़ राज्य के विलुप्त और वर्तमान में बजाये जाने वाले वाद्यों को चार श्रेणियों में रखा जा सकता है-

  (अ) ताल वाद्य।

  (ब) तार वाद्य।

  (स) फूँक वाद्य।

  (द) झंकार वाद्य।

 

(अ) ताल वाद्य- लोहा, लकड़ी या मिट्टी के ढांचे को चमड़े से मढ़कर ताल बाजा बनाया जाता है। इसकी आवाज़ गंभीरता भरी होती है। यहां के प्रमुख ताल वाद्य निम्नलिखित हैं-

(1) डम्फा            

(2) ढाँक    

(3) ढोल         

(4) ठडप

(5) तेलाई बाजा   

(6) डंका    

(7) मोर बाजा 

(8) डुगी

(9) मुड़ी (लोहाटी नगेड़ा)

(10) मृदंग  

(11) लोहाटी खूंती 

(12) सिंघाटी

(13) गागर बाजा   

(14) मांदर    

(15) नगाड़ा   

(16) डफली       

(17) डफला   

(18) डमरू   

(19) राम ढोलक  

(20) हुडका        

(21) खंजड़ी      

(22) तरसा  

(23) ढोलक   

(24) नाल

(25) ठिरकी       

(26) तबला    

(27) कांगों      

(28)  मेसांग

(29) पंचमुखी बाजा

 

(ब) तार वाद्य- जिन वाद्यों में तार या तन्तु लगा रहता है उसे तार बाजा कहते हैं। यहां के प्रमुख तार वाद्य निम्नलिखित हैं-

(1) ढोंक          

(2) रवनी      

(3) किन्दरा       

(4) टोहिला

(5) गुबगुबी (घुड़का) 

(6) तमुर्रा      

(7) भरथरी बाजा  

(8) सारंगी

(9) वीणा          

(10) बेंजो     

(11) गिटार       

(12) रिंजो

(13) चिकारा

 

(स) फूँक वाद्य- मुंह से फूँक कर बजाये जाने वाले वाद्यों को फूंक वाद्य कहते हैं, जो कि बाँस और धातु के बनते हैं। यहां के प्रमुख फूँक वाद्य निम्नलिखित हैं-

(1) महुवेर           

(2) मोहरी (तुतरू)   

(3) भेड़बाजा     

(4) तुमड़ा

(5) तुरही           

(6) नरसिंघा         

(7) नगदावन    

(8) बाँसुरी

(9) मुरली           

(10) बीन

 

(द) झंकार वाद्य- धातु और लकड़ी का झंकार बाजा होता है। इसे ही घन वाद्य कहते हैं। यहां के प्रमुख झंकार वाद्य निम्नलिखित हैं-

(1) शिकारी बाजा (झुन्का)     

(2) केरचों     

(3) पंडुरी   

(4) चैरासी (डड़खर)    

(5) घुँघरू                  

(6) झाँझ      

(7) मंजीरा  

(8) किनी

(9) झाल                  

(10) करताल   

(11) जमुर्रा 

(12) पैरी   

(13) ठिस्की              

(14) घंटी

 

अन्य वाद्य- छत्तीसगढ में कुछ और विशेष प्रकार के वाद्य-यंत्रों का प्रयोग किया जाता था जो   निम्नलिखित हैं-    

(1) ठर्की            

(2) घुमरा      

(3) दपुड़ा        

(4) निसान

(5) फड़ा           

(6)  रिमजी      

(7) खलारन       

(8) नजीरा

(9) सरांजी         

(10) चटकोला  

(11) निंसार

 

आज के समय में संपूर्ण छत्तीसगढ़ में मांदर ताल वाद्य का प्रचलन देखने को मिलता है। सरगुजा हो या फिर बस्तर। यहां देवी अनुष्ठानों, विवाह-समारोहों, कृषि, त्यौहार व उत्सवों, गीतों और किसी भी प्रकार के शुभ अवसरों में मांदर का भरपूर प्रयोग किया जाता है।

छत्तीसगढ़ के कुछ वर्गों के लिये ये वाद्य-यंत्र जीविका के साधन भी बने हुए हैं। जो वाद्य-यंत्र आज प्रचलन में हैं, ये वर्ग उनको बनाकर इनके खरीददारों को मुहैया करा रहा है। इसके अलावा  विभिन्न अवसरों में इन वाद्यों को बजाकर कुछ आमदनी भी प्राप्त कर लेते हैं। वाद्यों का प्रचलन निरंतर कम होने से रोज़गार पर काफ़ी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

वर्तमान छत्तीसगढ़ के ढेर सारे वाद्य-यंत्र विलुप्त हो चुके हैं। इसके अलावा कुछ वाद्य-यंत्रों के बनाने और बजाने वाले भी अब हमारे बीच नहीं रहे। यही कारण है कि इनका प्रचलन लगातार कम होता जा रहा है।

 

वाद्य यंत्र की खोज की कहानी

10 जनवरी 1989 में मेरी मुलकात ग्राम सौंतारा वि.ख. प्रतापपुर निवासी स्व. श्री धनसाय आयम से हुई। तब उनकी आयु 110 वर्ष थी। उन्होने कहा कि पहले यह क्षेत्र (जहां उनका घर है) घनघोर जंगलों से घिरा हुआ होता था। हमारे घर के आस-पास बाघ, शेर, जीता जैसे जानवरों का आना-जाना आम बात था। मैंने उनकी बातों को सुनकर आश्चर्य से पूछा, कि आप लोगों को डर नहीं लगता था। उन्होंने बताया कि उनके पुरखा पुरनिया लोग ऐसे-ऐसे बाजे का निर्माण किये थे जिनकी आवाज सुनकर जंगली जानवर दूर भागते थे और ऐसे भी वाद्य यंत्रों का निर्माण किया गया था, जिनकी आवाज से रीझकर जंगली जानवर करीब आते थे और राजा उनका शिकार करते थे। तत्कालीन सरगुजा महाराज रामनुजशरण सिंह सिंह देव के द्वारा 1493 बाघ मारने का विश्व रिकार्ड भी दर्ज है। शिकार करते समय ग्रामीणों के द्वारा बाघ जैसे जंगली जानवर को रिझाने के लिये झुनका बाजा (शिकारी बाजा) बजाया जाता था। और दूर भगाने के लिए घुमरा बाजा बजाया जाता था।

यह पूछने पर कि, यह बाजे कैसे होते थे? क्या अब इन्हें बनाया जा सकता है? उन्होंने कहा कि हमारे बाबा-दादा के बनाये हुए कुछ टूटे-फूटे बाजे अभी भी छत के उपर रखे हुए हैं। और तभी टूटे वाद्यों को बनवाने और विलुप्त हो रहे वाद्य यंत्रों को खोजने और सहेजने का काम प्रारंभ कर दिया गया।

 

मेरे खोजे हुए वाद्यों की जानकारियां निम्नलिखित हैं- 

1) ढोंक बाजा

Dhonk Baja

  • वाद्य यंत्र- ढोंक
  • वाद्य का प्रकार- तार वाद्य
  • निर्माण सामग्री- तुम्मा (लौकी) तात, तार, और बाँस
  • आवाज- मीठी झंकारमय एवं गम्भीरता भरी
  • उपयोग के अवसर- देवारी, गंवसज्जी, चांगमादर और मनोरंजन आदि
  • उपयोग के क्षेत्र- प्रतापपुर, बलरामपुर, राजपुर
  • प्रचलन- विलुप्त
  • उपलब्धता- हां

2. टोहिला बाजा

  • वाद्य यंत्र- टोहिला
  • वाद्य का प्रकार- तार वाद्य
  • निर्माण सामग्री- दो तुम्मा, तार, और बाँस
  • आवाज- काफी तीव्र, मधुर व गुंजयमान
  • उपयोग के अवसर- सूचना देने के लिए, देवारी सिखाने के समय
  • उपयोग के क्षेत्र- प्रतापपुर, बलरामपुर, राजपुर
  • प्रचलन- विलुप्त
  • उपलब्धता- नहीं

3. रवनी बाजा

Ravani Baja

  • वाद्य यंत्र- रवनी
  • वाद्य का प्रकार- तार वाद्य
  • निर्माण सामग्री- दुर्लभ जानवर गोह का चमड़ा, लकड़ी व घोड़े की पूंछ का बाल
  • आवाज- मधुर, सारंगी की तरह
  • उपयोग के अवसर- भक्ति भजन के समय, मनोरंजन आदि
  • उपयोग के क्षेत्र- प्रतापपपुर, बलरामपुर, राजपुर, वाड्रफनगर आदि
  • प्रचलन- विलुप्त
  • उपलब्धता- हां

4. शिकारी बाजा या झुन्का

  • वाद्य यंत्र- शिकारी बाजा या झुन्का
  • वाद्य का प्रकार- झंकार बाजा
  • निर्माण सामग्री- लोहे का छड़, रिंग
  • आवाज- मधुर, मनमोहक
  • उपयोग के अवसर- शिकार के समय, हाँका करते समय
  • उपयोग के क्षेत्र- प्रतापपपुर, बलरामपुर, राजपुर, वाड्रफनगर आदि
  • प्रचलन- विलुप्त
  • उपलब्धता- हां      

5. घुमरा बाजा

  • वाद्य यंत्र- घुमरा
  • वाद्य का प्रकार- अन्य वाद्य
  • आवाज- शेर की गर्जन जैसी
  • निर्माण सामग्री- मिट्टी का घड़ा, चमड़ा और मोर पंख
  • उपयोग के अवसर- जंगली जानवरों के भगाने के लिए, खेती की सुरक्षा के लिए
  • उपयोग के क्षेत्र- प्रतापपुर, बलरामपुर, राजपुर, वाड्रफनगर आदि
  • प्रचलन- विलुप्त
  • उपलब्धता- नहीं

6. गुबगुबी या घुड़का

Gubgubi Baja

  • वाद्य यंत्र- गुबगुबी या घुड़का
  • वाद्य का प्रकार- तार वाद्य
  • आवाज- ढोलक जैसी गम्भीरता भरी
  • निर्माण सामग्री- टीन का डब्बा, चमड़ा, तांत और लकड़ी
  • उपयोग के अवसर- भीख मांगने के लिए, करमा, डोमकच, उधवा और भजन

गाने के लिए

  • उपयोग के क्षेत्र- प्रतापपुर, बलरामपुर, राजपुर सहित सरगुजा के विभिन्न विकास खण्डों में
  • प्रचलन- कभी-कभी भिखारियों द्वारा
  • उपलब्धता- हां

7. डम्फा बाजा

  • वाद्य यंत्र- डम्फा बाजा
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • आवाज- मीठी, गम्भीरता भरी
  • निर्माण सामग्री- चन्दन की लकड़ी और बन्दर का चमड़ा
  • उपयोग के अवसर- देवी भजन, देवारी आदि
  • उपयोग के क्षेत्र- ओडगी, प्रतापपुर, वाड्रफनगर विकास खण्ड में
  • प्रचलन- बहुत कम
  • उपलब्धता- हां

8. डांक बाजा

  • वाद्य यंत्र- डांक
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • आवाज- काफी तीव्र किन्तु मधुर
  • निर्माण सामग्री- लकड़ी और चमड़ा
  • उपयोग के अवसर- देवी भजन, विवाह के समय
  • उपयोग के क्षेत्र- कुसमी, शंकरगढ़, राजपुर आदि
  • प्रचलन- विलुप्त
  • उपलब्धता- नहीं

9. महुवेर बाजा

  • वाद्य यंत्र-महुवेर बाजा
  • वाद्य का प्रकार- फूँक वाद्य
  • निर्माण सामग्री- दो फीट का चार गठान वाला बांस और साल की पत्ती
  • आवाज- सुरीली, मधुर, बांसुरी की तरह
  • उपयोग के अवसर- गीतों में स्वर देने के लिए
  • उपयोग के क्षेत्र- सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- विलुप्त
  • उपलब्धता- हां

10. ठंड़प बाजा

  • वाद्य यंत्र- ठंड़प
  • वाद्य का प्रकार- अन्य
  • निर्माण सामग्री- लकड़ी
  • आवाज- नाम के अनुरुप- ठंड़प-ठंड़प
  • उपयोग के अवसर- मनोरंजन के लिए
  • उपयोग के क्षेत्र- लखनपुर, उदयपुर, आदि
  • प्रचलन- विलुप्त
  • उपलब्धता- नहीं

11. केरचों बाजा

  • वाद्य यंत्र- केरचों
  • वाद्य का प्रकार- झंकार
  • निर्माण सामग्री- लकडी, बाँस
  • आवाज- खर्र-खर्र, झर-झर
  • उपयोग के अवसर- सोंदो, करमा, डोमकच, गाना, नृत्य में
  • उपयोग के क्षेत्र- प्रतापपुर, वाड्रफनगर, सूरजपुर, आदि
  • प्रचलन- लगभग विलुप्त
  • उपलब्धता- हां

12.  भरथरी बाजा

Bharthari Baja

  • वाद्य यंत्र- भरथरी बाजा
  • वाद्य का प्रकार- तार वाद्य
  • निर्माण सामग्री- लकड़ी, चमड़ा, तांत और तार
  • आवाज- सारंगी जैसी मधुर
  • उपयोग के अवसर- निर्गुण गीतों का गायन, भजन आदि
  • उपयोग के क्षेत्र- सम्पूर्ण सरगुजा
  • प्रचलन- लगभग विलुप्त
  • उपलब्धता- हां

13. ठर्की बाजा

  • वाद्य यंत्र- ठर्की
  • वाद्य का प्रकार- अन्य
  • निर्माण सामग्री- लकड़ी, रस्सी एवं बांस
  • आवाज- मधुर आवाज
  • उपयोग के अवसर- पशुओं के गले में बांधने के लिए एवं मनोरंजन के लिए
  • उपयोग के क्षेत्र- सम्पूर्ण सरगुजा
  • प्रचलन- कम
  • उपलब्धता- हां

14. घाटी बाजा

Ghanti Baja

  • वाद्य का नाम- घाटी बाजा
  • वाद्य का प्रकार- झंकार वाद्य
  • आवाज- टनन-टनन, मधुर
  • निर्माण सामग्री- लोहा एवं मोटा टीना
  • उपयोग के अवसर- पशुओं के गले में बांधने के लिये एवं मनोरंजन के लिये
  • उपयोग क्षेत्र- सम्पूर्ण सरगुजा
  • प्रचलन- कम
  • उपलब्धता- हां

15. किन्दरा बाजा

kindra baja

  • वाद्य यंत्र- किन्दरा
  • वाद्य का प्रकार- तार वाद्य
  • निर्माण सामग्री- लकड़ी, बांस, तार और तुम्मा
  • आवाज- मधुर
  • उपयोग के अवसर- देवी भजन, करमा, डोमकच गायन
  • उपयोग के क्षेत्र- सम्पूर्ण सरगुजा
  • प्रचलन- कम
  • उपलब्धता- हां

16. तेलाई बाजा

  • वाद्य यंत्र- तेलाई बाजा
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • निर्माण सामग्री- मिट्टी का बर्तन और चमड़ा
  • आवाज- गम्भीरता भरी
  • उपयोग के अवसर- भजन-कीर्तन आदि
  • उपयोग के क्षेत्र- राजपुर, उदयपुर, वाड्रफनगर आदि
  • प्रचलन- कम
  • उपलब्धता- हां

17. गागर बाजा

  • वाद्य यंत्र- गागर बाजा
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • निर्माण सामग्री- मिट्टी का घड़ा, एवं चमड़ा
  • आवाज- मधुर व गम्भीर
  • उपयोग के अवसर- भजन-कीर्तन आदि
  • उपयोग के क्षेत्र- राजपुर, प्रतापपुर, वाड्रफनगर आदि
  • प्रचलन- नहीं
  • उपलब्धता- हां

18. मोर बाजा

  • वाद्य यंत्र- मोर बाजा
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • निर्माण सामग्री- लकड़ी का खोल, चमड़ा एवं मोर पंख
  • आवाज- काफी तीव्र एवं मधुर
  • उपयोग के अवसर- शादी-विवाह एवं मनोरंजन
  • उपयोग के क्षेत्र- बलरामपुर, वाड्रफनगर, रामचंदरपुर
  • प्रचलन- कम
  • उपलब्धता- हां

19. हुड़का बाजा

Hudka baja

  • वाद्य यंत्र- हुड़का
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • आवाज- मधुर, गम्भीरता भरी
  • निर्माण सामग्री- लकड़ी, चमड़ा
  • उपयोग के अवसर- भोजपुरी होली गीतों में
  • उपयोग के क्षेत्र- प्रतापपुर, लखनपुर, अम्बिकापुर, राजपुर आदि
  • प्रचलन- कम
  • उपलब्धता- हां

20. मेसांग बाजा

Mesang baja

  • वाद्य यंत्र- मेसांग
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • आवाज- काफी तीव्र एवं गम्भीरता भरी
  • निर्माण सामग्री- लोहे का खोल, चमड़ा एवं गद
  • उपयोग के अवसर- सैला नृत्य, मनोरंजन आदि
  • उपयोग के क्षेत्र- लखनपुर, उदयपुर, सीतापुर आदि
  • प्रचलन- कम
  • उपलब्धता- हां

21. तुरही बाजा

Turhi

  • वाद्य यंत्र- तुरही
  • वाद्य का प्रकार- फूँक वाद्य
  • आवाज- तीव्र, मधुर एवं शंख की तरह
  • निर्माण सामग्री- कांसा धातु
  • उपयोग के अवसर- विवाह के अवसर पर घसिया बाजा समूह के साथ और पहले रण क्षेत्र में
  • उपयोग के क्षेत्र- सम्पूर्ण सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- कम
  • उपलब्धता- हां

22. नरसिंघा

  • वाद्य यंत्र- नरसिंघा
  • वाद्य का प्रकार- फूंक वाद्य
  • आवाज- तुरही वाद्य की तरह
  • निर्माण सामग्री- तांबा धातु
  • उपयोग के अवसर- प्राचीन काल में रणक्षेत्र में होता था। ग्रामीण अंचल में विवाह आदि के अवसर पर यह बजाया जाता है। यह घसिया बाजा समूह का फूंक वाद्य है।
  • उपयोग के क्षेत्र- पहले सम्पूर्ण सरगुजा अंचल में घसिया बाजा समूह के साथ बजाया जाता था।
  • प्रचलन- कम
  • उपलब्धता- कहीं-कहीं
  • बजाने वाली जाति- घसिया

23. नगदावन

  • वाद्य यंत्र- नगदावन
  • वाद्य का प्रकार- फूंक वाद्य
  • आवाज- मधुर, ‘बीन’ फूंक वाद्य की तरह
  • निर्माण सामग्री- बेल और बांस
  • उपयोग के अवसर- सर्प पकड़ने के लिए
  • उपयोग के क्षेत्र- सरगुजा अंचल
  • प्रचलन-अब बिल्कुल नहीं
  • उपलब्धता- नहीं

24. तुमड़ा

  • वाद्य यंत्र- तुमड़ा/ तूँबी/ तूँबड़ी/ तूँमड़ी/ तूमरी
  • वाद्य का प्रकार- फूंक वाद्य, सुशिर वाद्य
  • आवाज- मधुर, बीन की तरह
  • निर्माण सामग्री- तुमगा (लौकी), बांस
  • उपयोग के अवसर- सर्प पकडने के लिए
  • उपयोग के क्षेत्र- सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- नहीं
  • उपलब्धता- नहीं

25. मोहरी (तुतरू)

Mohari

  • वाद्य यंत्र- मोहरी
  • वाद्य का प्रकार- फूंक वाद्य
  • आवाज- मधुर, शहनाई की तरह
  • निर्माण सामग्री- कांसा धातु
  • उपयोग के अवसर- विवाह के अवसर पर घसिया बाजा समूह के साथ ताड़ की पत्ती के सहारे फूंक कर बजाया जाता है।
  • उपयोग के क्षेत्र- सम्पूर्ण सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- वर्तमान में है
  • उपलब्धता- हां

26. घसिया बाजा

Ghasiya baja

 

लोहाटी घसिया बाजा समूह का प्रमुख ताल वाद्य है। यह वाद्य यंत्र घसिया बाजा समूह को गम्भीरता प्रदान करता है। इसमें तीन तरह के वाद्य हैं। लोहाटी सिंघाटी, लोहाटी खूँती और मुड़ी लोहाटी है। लोहे से बने ढाँचे में जब तलवार लगायी जाती है तो उसे लोहाटी खूंती और जिसमें बारहसिंघा का सींग लगाई जाती है उसे सिंघाटी कहते हैं और जिसमें कुछ नही लगाते हैं उसे मुड़ी लोहाटी कहते हैं। इस वाद्य यंत्र समूह को घसिया जाति के लोग बजाते हैं। यह उनकी जीविका का साधन है।

 

26(अ). लोहाटी सिंघाटी

lohati

  • वाद्य यंत्र- लोहाटी सिंघाटी
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • आवाज- गम्भीरता भरी
  • निर्माण सामग्री- लोहा, चमड़ा, और बारहसिंघा जानवर की सींग
  • उपयोग के अवसर- विवाह देवी सेवा और मनोरंजन के लिए
  • उपयोग के क्षेत्र- सम्पूर्ण सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- वर्तमान में प्रचलन में है
  • उपलब्धता- हाँ
  • बजाने वाली जाति- घसिया

26(ब). लोहाटी खूंती

  • वाद्य यंत्र- लोहाटी खूंती
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • आवाज- गम्भीरता भरी
  • निर्माण सामग्री- लोहा, चमड़ा और तलवार
  • उपयोग के अवसर- विवाह, देवी-सेवा और मनोरंजन के लिए
  • उपयोग के क्षेत्र- सम्पूर्ण सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- वर्तमान में प्रचलन में है
  • उपलब्धता- हाँ
  • बजाने वाली जाति- घसिया

26(स). मूड़ी लोहाटी

  • वाद्य यंत्र- मूड़ी लोहाटी
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • आवाज- गम्भीरता भरी
  • निर्माण सामग्री- लोहा, चमड़ा
  • उपयोग के अवसर- विवाह, देवी-सेवा और मनोरंजन के लिए
  • उपयोग के क्षेत्र- सम्पूर्ण सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- वर्तमान में प्रचलन में है
  • उपलब्धता- हाँ
  • बजाने वाली जाति- घसिया

27. डफला

  • वाद्य यंत्र- डफला
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • आवाज- मधुर तीव्र आवाज
  • निर्माण सामग्री- चमड़ा, लकड़ी
  • उपयोग के अवसर- विवाह, देवी-सेवा और मनोरंजन के लिए
  • उपयोग के क्षेत्र-  सम्पूर्ण सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- प्रचलन में है
  • उपलब्धता- हाँ
  • बजाने वाली जाति- घसिया

28.  ठिरकी

  • वाद्य यंत्र- ठिरकी, इसे घसिया बाजा का गुरु कहते हैं।
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • आवाज- घसिया बाजा समूह का सबसे छोटा ताल वाद्य है। इसकी आवाज टंकार भरी व तेज है, उंचे अफ्रीकी ड्रमों की याद दिलाती है।
  • निर्माण सामग्री- कठौती आकार का मिट्टी का बर्तन, चमड़ा व लकड़ी
  • उपयोग के अवसर- विवाह, देवी-सेवा और मनोरंजन के लिए
  • उपयोग के क्षेत्र- सम्पूर्ण सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- वर्तमान में प्रचलन में है
  • उपलब्धता- हाँ
  • बजाने वाली जाति- घसिया

29. ढोल

  • वाद्य यंत्र- ढोल
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • आवाज- गम्भीरता भरी
  • निर्माण सामग्री- लकड़ी का खोल और चमड़ा
  • उपयोग के अवसर- विवाह और देवी-सेवा
  • उपयोग के क्षेत्र- सम्पूर्ण सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- वर्तमान में प्रचलन में है
  • उपलब्धता- हाँ
  • बजाने वाली जाति- हरिजन

30. नगाड़ा

  • वाद्य यंत्र- नगाड़ा
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • आवाज- गम्भीरता भरी
  • निर्माण सामग्री- लोहा का खोल और चमड़ा
  • उपयोग के अवसर- मंदिरों में आरती के समय, पहले रण क्षेत्र में बजाया जाता था।
  • उपयोग के क्षेत्र- सम्पूर्ण सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- वर्तमान में प्रचलन में है
  • उपलब्धता- हाँ

31. डुगी

  • वाद्य यंत्र- डुगी
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • आवाज- गम्भीरता भरी
  • निर्माण सामग्री- लकड़ी, लोहा, चमड़ा,
  • उपयोग के अवसर- विवाह
  • उपयोग के क्षेत्र- सम्पूर्ण सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- यह वाद्य यंत्र प्रचलन में नहीं है। इसे पहले घसिया बाजा समूह के साथ बजाया जाता था।
  • उपलब्धता- नहीं
  • बजाने वाली जाति- घसिया

32. डड़खर (चौरासी)

Chaurasi

  • वाद्य यंत्र- डड़खर (चौरासी)
  • वाद्य का प्रकार- झंकार वाद्य
  • आवाज- घुंघरु की तरह तीव्र आवाज
  • उपयोग के अंग- इसे कमर में पहनकर नृत्य करते हैं।
  • निर्माण सामग्री- चमड़ा, बड़ी घुँघरु, चौरासी (छोटी घंटी)
  • उपयोग के अवसर- सोन्दो नृत्य के समय
  • उपयोग के क्षेत्र- सूरजपुर जिला और बलरामपुर जिला
  • प्रचलन- प्रचलन में है
  • उपलब्धता- हाँ

33. झांझ

Jhanjh

  • वाद्य यंत्र- झांझ
  • वाद्य का प्रकार- झंकार वाद्य
  • आवाज- झंकार भरी झांय झांय
  • निर्माण सामग्री- कांसा धातु
  • उपयोग के अवसर- सैला, करमा, डोमकच नृत्य के समय
  • उपयोग के क्षेत्र- सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- प्रचलन में है
  • उपलब्धता- हां

34. मंजीरा

Manjira

  • वाद्य यंत्र- मंजीरा
  • वाद्य का प्रकार- झंकार वाद्य
  • आवाज- झंकार भरी झांय-झांय
  • निर्माण सामग्री- कांसा धातु
  • उपयोग के अवसर- सैला, करमा, डोमकच नृत्य के समय
  • उपयोग के क्षेत्र- सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- प्रचलन में है
  • उपलब्धता- हां

35. पंडुरी

penj

  • वाद्य यंत- पंडुरी
  • वाद्य का प्रकार- झंकार वाद्य
  • आवाज- झंकार भरी कर्कश आवाज
  • उपयोग के अंग- पैरों में पहन कर नृत्य किया जाता है।
  • निर्माण सामग्री- लोहा धातु
  • उपयोग के अवसर- सोन्दो, करमा और सैला नृत्य के समय
  • उपयोग के क्षेत्र- सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- प्रचलन में है
  • उपलब्धता- हाँ

36. किनी

Kini

  • वाद्य यंत्र- किनी
  • वाद्य का प्रकार- झंकार वाद्य
  • आवाज- झंकार भरी
  • निर्माण सामग्री- कांसा धातु
  • उपयोग के अवसर- सैला, करमा, डमकच, सोन्दो नृत्य के समय
  • उपयोग के क्षेत्र- सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- प्रचलन में है
  • उपलब्धता- हाँ

37. मृदंग

Mridang

  • वाद्य यंत्र- मृदंग
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • आवाज- गम्भीरता भरी
  • निर्माण सामग्री- मिट्टी या लकड़ी का खोल और चमड़ा
  • उपयोग के अवसर- गाना, नृत्य और देवी-सेवा के समय
  • उपयोग के क्षेत्र- सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- प्रचलन में है
  • उपलब्धता- हां

38. मांदर

Mandar

  • वाद्य यंत्र- मांदर
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • आवाज- तीव्र, गम्भीरता भरी
  • निर्माण सामग्री- मिट्टी या लकड़ी का खोल, चमड़ा
  • उपयोग के अवसर- सैला, करमा, डोमकच, नृत्य के समय और देवी-सेवा के समय
  • उपयोग के क्षेत्र- सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- प्रचलन में है
  • उपलब्धता- हाँ

39. राम ढोलक

Dholak

  • वाद्य यंत्र- रामढोलक
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • आवाज- मृदंग की तरह गम्भीरता भरी 
  • निर्माण सामग्री- मिट्टी या लकड़ी का खोल और चमड़ा
  • उपयोग के अवसर- भजन गायन में
  • उपयोग के क्षेत्र- सरगुजा अंचल  

40. पंचमुखी बाजा

Panchmukhi

  • वाद्य यंत्र- पंचमुखी बाजा
  • वाद्य का प्रकार- ताल वाद्य
  • आवाज- गम्भीरता भरी 
  • निर्माण सामग्री- मिट्टी या लकड़ी का खोल और चमड़ा
  • उपयोग के अवसर- मनोरंजन के लिए
  • उपयोग के क्षेत्र- खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय में रखा हुआ है।
  • प्रचलन- कम हो रहा है
  • उपलब्धता- हां

41. जमुर्रा बाजा

  • वाद्य यंत्र- जमुर्रा
  • वाद्य का प्रकार- झंकार वाद्य
  • आवाज- झंकार भरी
  • निर्माण सामग्री- लोहा धातु
  • उपयोग के अवसर- सैला, करमा, डोमकच नृत्य के समय
  • उपयोग के क्षेत्र- सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- प्रचलन में है
  • उपलब्धता- हां              

42. ठिस्की बाजा

  • वाद्य यंत्र- ठिस्की
  • वाद्य का प्रकार- झंकार वाद्य
  • आवाज- झंकार भरी, खर्र-खर्र, झर-झर
  • निर्माण सामग्री- लोहा धातु
  • उपयोग के अवसर- सैला, करमा, डोमकच नृत्य के समय
  • उपयोग के क्षेत्र- सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- प्रचलन में है
  • उपलब्धता- हां

43. रिंजो बाजा

  • वाद्य यंत्र- रिंजो
  • वाद्य का प्रकार- झंकार वाद्य
  • निर्माण सामग्री- तुम्मा, तार, और बाँस
  • आवाज- मधुर, रवनी की तरह
  • उपयोग के अवसर- निर्गुण गीतों का गायन, भजन आदि
  • उपयोग के क्षेत्र- सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- विलुप्त
  • उपलब्धता- नहीं

44. घंटी बाजा

  • वाद्य यंत्र- घंटी
  • वाद्य का प्रकार- झंकार वाद्य
  • निर्माण सामग्री-  कांसा धातु
  • आवाज- टन-टन
  • उपयोग के अवसर- मंदिरों में आरती के समय, स्कूलों में और सैला, करमा, 

डोमकच नृत्य के समय

  • उपयोग के क्षेत्र- सरगुजा अंचल
  • प्रचलन- हां
  • उपलब्धता- हां

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.