Mushtak Khan

चित्रकला एवं रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर।
भारत भवन, भोपाल एवं क्राफ्ट्स म्यूजियम, नई दिल्ली में कार्यानुभव।
हस्तशिल्प, आदिवासी एवं लोक कला पर शोध एवं लेखन।

वनवासियों का जीवन वन सम्पदा पर आधारित रहता है। खेती और शिकार उनकी बुनियादी गतिविधियां हैं जिनसे उन्हें प्रतिदिन का भोजन आदि प्राप्त होता है। नकद पैसा उन्हें मजदूरी अथवा वनोपज को एकत्रित कर उसे बाजार में बेचकर मिलते हैं। कई बार वे वनों से प्राप्त सामग्री से कोई उपयोगी उत्पाद बनाकर उसे वैकल्पिक आय का साधन बना लेते हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में ऐसी ही एक गतिविधि है सरगी वृक्ष के पत्तों से दोने-पत्तल बनाना।

Sargi Tree

Image: Sargi Tree/सरगी का पेड़. Photo Credit: Mushtak Khan.

पत्तों से खाना खाने हेतु प्लेट, प्यालियाँ आदि बनाना समूचे भारत में प्रचलन में है। हलवाइयों की दुकानों चाट एवं मिठाइयां पत्तों से बने दोनों में ही ग्राहकों को बेची जाती रही हैं। गांवों में विवाह एवं सामूहिक भोज दोना-पत्तलों में ही परोसे जाते रहे हैं। इस प्रकार के बर्तनों के प्रयोग में छुआछूत प्रथा एवं जाति प्रथा का भी योगदान रहा है। इनके उपयोग में सबसे सुविधाजनक बात तो यह है कि उपयोग के बाद इन्हें फेंका जा सकता है। यह आसानी से स्वतः नष्ट हो जाते हैं। इनसे पर्यावरण की भी हानि नहीं होती।

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में दोने-पत्तल बनाने का काम किसी समुदाय विशेष से नहीं जुड़ा है परन्तु भतरा आदिवासी इस काम में बहुत लगे हुए हैं। दोने-पत्तल बनाने में सरगी वृक्ष के पत्ते और बांस की महीन तीलियों का प्रयोग किया जाता है। अनेक ग्रामीण केवल सरगी झाड़ के पत्ते तोड़ने और उन्हें हाट बाज़ारों में बेचने का ही कार्य करते हैं।

Woman plucking leaves from Sargi Tree

Image: Woman Plucking Leaves from Sargi Tree/सरगी के पेड़ से पत्तियां तोड़ती महिला. Photo Credit: Mushtak Khan.

 

Women with their leaf Collection

Image: Women with their Leaf Collection. Photo Credit: Mushtak Khan.

 

Woman carrying leaves in a basket

Image: Woman carrying leaves in a basket/एक टोकरी में पत्तियों को ले जाती महिला. Photo Credit: Mushtak Khan.

 

Women Stitching Dona-Pattal

Image: Women stitching dona-pattal/डोना-पातल बनाती महिलाएँ. Photo Credit: Mushtak Khan.

यूं तो दोने-पत्तल बनाने और बेचने का कार्य सालभर चलता है परन्तु दशहरा त्यौहार के आस-पास अक्टूबर-नवम्बर माह में यह काम बहुत चलता है। इस समय नवरात्री और दशहरा के अवसर पर यहाँ व्यापक पैमाने पर भंडारे आयोजत किये जाते हैं जिनमे लाखों लोग खाना खाते हैं। इस कारण बड़ी मात्रा में दोने-पत्तल की आवश्यकता पड़ती है। इसके अतिरिक्त चैत्र नवरात्रों, मृत्यु भोज तथा शादियों के मौसम में भी इनकी अच्छी खासी बिक्री होती है।

Woman selling dona pattal in a local market

Image: Woman selling dona-pattal in a local market/स्थानीय बाजार में दोना-पत्तल बेचती महिला. Photo Credit: Mushtak Khan.

एक दोना बनाने में तीन और पत्तल बनाने में सात पत्तों की आवश्यकता होती है। एक सौ दोनों की गड्डी चालीस रुपये और एक सौ पत्तलों की गड्डी की कीमत अस्सी रूपये तक होती है।

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.