मुश्ताक खान

चित्रकला एवं रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर।
भारत भवन, भोपाल एवं क्राफ्ट्स म्यूजियम, नई दिल्ली में कार्यानुभव।
हस्तशिल्प, आदिवासी एवं लोक कला पर शोध एवं लेखन।

भारतीय समाज एक धर्मभीरु समाज है। यहाँ का सामाजिक जीवन पाप-पुण्य की धारणाओं से संचालित होता है। यहाँ सामान्य मान्यता यह है कि इस जन्म में हम  जो आनंद ले रहे हैं, वह पिछले जन्म में  जो हमने दिया है, उसका परिणाम है। इस जन्म में जो हम देंगे, उसका फल हमको अगले जन्म में मिलेगा। हमने जो भी पिछले जन्म में दिया, उसका फल हम इस जन्म में भोग रहे हैं। आपके पास जो भी हैं वह आपकी बुद्धि बल के कारण नहीं, बल्कि आपके पुण्य के कारण  है। आपने जैसा बोया, वैसा ही फल आपको मिलेगा।

 

इस जीवन दर्शन के चलते परोपकार सर्वोपरि गुण बन गया। परोपकार का मूल है सहभागिता अर्थात अपने संसाधनों को  वंचितों के साथ बाँटना। इस प्रकार दान करना एक महत्वपूर्ण व्यक्तिगत और सामाजिक दायित्व बन गया। कालांतर में दान के तीन रूप उभरे-दान, दक्षिणा और भिक्षा। यद्यपि इन तीनों रूपों का उद्देश्य परोपकार ही है परन्तु इनमे छिपी भावनाएं भिन्न हैं। उत्तम कोटि के व्यक्ति अपने द्रव्य का उपयोग दान में करते हैं। मध्यम पुरुष अपने द्रव्य का व्यय उपभोग में करते हैं। इन दोनों से अतिरिक्त व्यक्ति अपने द्रव्य का उपयोग न दान में ही करते हैं न उपभोग में। उनका द्रव्य नाश को प्राप्त होता है। इस प्रकार के व्यक्तियों की गणना अधम कोटि में होती है।

ब्राह्मण को दिया हुआ दान षड्गुणित, क्षत्रिय को त्रिगुणित, वैश्य का द्विगुणित एवं शूद्र को जो दान दिया जाता है वह सामान्य फल को देनेवाला कहा गया है।

विशेषतः बौद्ध एवं जैन धर्म में भिक्षा को वैराग्य से जोड़ा गया। बुद्ध और महावीर स्वयं भिक्षाटन हेतु जाते थे। बौद्ध साधकों को भिक्षु कहा जाने लगा। उनकी आजीविका भिक्षा पर आधारित थी। भिक्षावृति के उल्लेख रामायण और महाभारत में भी मिलते हैं। प्राचीन ऋषि-मुनियों की आजीविका भिक्षा पर ही निर्भर थी। लेकिन उस समय भिक्षुओं के उच्च चारित्रिक आदर्श एवं जीवन सिद्धांत भी थे। भिक्षा उनका व्यवसाय नहीं उदरपूर्ति का निमित्त मात्र था। वे इस मध्यम से घूम-घूम कर अपने धर्म के सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार करते थे। प्रतीत यह होता है कि प्राचीन एवं मध्य युगीन भारत में धर्म सिद्धांतों का प्रसार गीत-संगीत की सहायता से इन भिक्षुक समुदायों ने किया होगा।

भिक्षा मांगने वालों को  समाज में आदर-सम्मान से देखा जाता था। सामान्यजन भिक्षावृति करनेवालों को सन्यासी-वैरागी मानने लगे। कालांतर में इस प्रकार के अनेक समुदाय अस्तित्व में आ गए जिनका जीवनयापन भिक्षवृति पर ही केंद्रित है। जोगी, बैरागी ,फ़क़ीर ,बसदेवा (वासुदेवा), देवार आदि। छत्तीसगढ़ में भी इन समुदायों की अच्छी-खासी आबादी है। इन समुदायों के लोग गांव-गांव घूम कर अपने पारम्परिक वाद्यों की धुन पर पौराणिक एवं लोक कथाओं का गायन करके भिक्षा प्राप्त करते हैं। एक समय यह घुमक्कड़ भजनगायक समुदाय न केवल स्थानिय वाचिक परंपरा के भंडार, संरक्षक और प्रसारक थे बल्कि वे अपनी भावी पीढ़ियों को इसे हस्तगत कराकर इसके संवाहक की भूमिका भी निबाहते थे। वे इन क्षेत्रों में चलते फिरते नैतिक मूल्यों के ध्वजारोहि एवं उनके प्रचारकर्ता थे। वे भजनों, लोक कथाओं और आख्यानों के माध्यम से समाज में उच्च नैतिक मूल्यों की विजय गाथा गाकर लोगों के नैतिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान करते थे।

 

 

क्योंकि इन समुदायों की आर्थिक आय लोगों द्वारा दिए गए दान पर निर्भर है इसलिए यह लोग सदैव वे भजन एवं कथाएं गाते हैं जिनमें दान की महत्ता का वर्णन हो अथवा जो लोगों को दान देने के लिए प्रोत्साहित करें। इसके लिए उन्हें महाभारत कथा के लोकप्रिय चरित्र कर्ण की कथा सर्वथा उपयुक्त प्रतीत होती है। कर्ण को वीर महादानी कहा जाता है जिसने कभी किसी मांगने वाले को निराश नहीं किया। उसकी करुण कथाएं जन सामान्य को दान हेतु प्रेरित करती हैं। यही कारण है की सभी समुदायों के लोक गायक कर्ण कथा अवश्य गाते हैं।

छत्तीसगढ़ में, महाभारत में वर्णित महायोद्धा एवं विराट चरित्र के स्वामी कर्ण की कथाएं पंडवानी गायन के रूप में भी गायी जाती हैं और स्वतंत्र कथाओं के रूप में भी। भिक्षाटन करने वाले समुदाय जैसे वासुदेवा और देवार आदि इस कथा को जन सामान्य को दान देने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु एक स्वतंत्र कथा के रूप में गाते हैं।जबकि पंडवानी गायक इन्हें पंडवानी कथागायन के एक खंड के रूप में गाते हैं।  

कर्ण चरित्र से सम्बंधित यहाँ तीन प्रमुख कथानक लोकप्रिय हैं। कर्ण जन्म कथा, कर्ण वध तथा कर्ण द्वारा ऋषि आग्रह पर अपने इकलौते पुत्र का मांस पकाकर उसे भोजन हेतु  ऋषि के समक्ष परोसना। इन तीनों ही कथाओं में कर्ण के उदात्त चरित्र और दानवीरता का वर्णन कथा गायक विस्तार से तथा मार्मिक शब्दों में करते हैं। देवताओं द्वारा कर्ण की दान वीरता की बार-बार परीक्षा और कर्ण  द्वारा उनकी विकट मांगों को विपरीत परिस्थितियों में अपार कष्ट सह कर भी पूरा करना जन साधारण में दान की महत्ता और महिमा की स्थापना तथा उनके मन में दान करने हेतु  उत्साह के भाव का संचार करता है। 

 

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.