प्रो.आभा रूपेन्द्र पाल

विभागाध्यक्ष इतिहास अध्ययनशाला
पं.रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय
रायपुर (छ.ग.)

 

 

छत्तीसगढ़ में गांधीवादी आन्दोलन और महिलाएँ

 

भारत का स्वाधीनता आन्दोलन बीसवीं शताब्दी की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। महात्मा गांधी के भारत आगमन के पश्चात् राष्ट्रीय आन्दोलन ने एक नया मोड़ लिया और उनके नेतृत्व में होने वाले आन्दोलनों ने भारतीय समाज सुधारकों के सपनों को साकार किया। नारी उत्थान के प्रयास जो उन्नीसवीं सदी में प्रारंभ हुए थे, वे एक पायदान और ऊपर चढ़े। महात्मा गांधी ने अहिंसात्मक आन्दोलन के लिए महिलाओं को पुरूषों से बेहतर माना था।(1) उन्होंने महिलाओं का आव्हान किया कि वे देश के लिए अपनी जिम्मेदारी निभाने आगे आएं। उनका विश्वास था कि जब तक महिलाएं सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रूप से भाग नहीं लेंगी आजादी की लड़ाई सफलतापूर्वक संचालित नहीं की जा सकती और ना ही स्वराज की प्राप्ति हो सकती है।(2) महात्मा गांधी ने महिलाओं को शारीरिक अथवा मानसिक रूप से कमजोर कहे जाने का जबरदस्त विरोध किया(3) और उन्हें हर स्तर पर सक्रिय रचनात्मक कार्यक्रमों, आन्दोलनों और संगठनात्मक कार्यों से जोड़कर राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्य धारा में इस प्रकार मिला दिया कि मानो उनके बिना कोई आन्दोलन पूरा होना संभव ही ना था।

महात्मा गांधी की ‘जन-अपील‘ राष्ट्रव्यापी थी। तत्कालीन छत्तीसगढ़ मध्यप्रांत का अंग था। आन्दोलन की गतिविधियां यहां भी संचालित थीं और पहला सत्याग्रह आंदोलन कंडेल नहर सत्याग्रह जुलाई 1920 में पंडित सुन्दरलाल, नारायण मेधावाले और बाबू छोटेलाल के नेतृत्व में धमतरी तहसील के कंडेल नामक ग्राम में प्रारंभ हुआ था। इस सत्याग्रह की सूचना जब महात्मा गांधी को भेजी गई थी तब वह बंगाल का दौरा कर रहे थे। उन्हें लाने छत्तीसगढ़ से पंडित सुन्दरलाल शर्मा गए थे। 20 दिसम्बर, 1920 को महात्मा गांधी का प्रथम रायपुर आगमन हुआ। उन्होंने यहां एक विशाल आमसभा को संबोधित किया। वह स्थान आज गांधी चैक के नाम से विख्यात है। तत्पश्चात् उन्होंने धमतरी के लिए प्रस्थान किया। वे धमतरी और कुरूद होकर वापस लौटे और रायपुर में पुनः रूके। यहां महात्मा गांधी ने महिलाओं की एक विशाल सभा को संबोधित किया और उनसे तिलक स्वराज फंड के लिए सहयोग मांगा। महिलाओं ने उन्हें दो हजार रूपए के मूल्य के गहने भेंट किए।(4)

 

असहयोग आंदोलन और महिलाएं-

निस्संदेह महात्मा गांधी का प्रभाव छत्तीसगढ़ की स्त्रियों में भी राजनैतिक चेतना जगा रहा था। सन् 1920 में धमतरी नगर के इमामबाड़े में भी महिलाओं की एक सभा को महात्मा गांधी ने संबोधित किया और उनसे तिलक स्वराज फंड के लिए दान की अपील की। इन महिलाओं ने मुक्तहस्त से फंड को दान दिया। पुरूषों की भांति महिलाएं भी घर-घर जाकर खादी व स्वदेशी का प्रचार कर रही थीं और घर पर सूत कातती थीं। बाबू छोटेलाल का घर इन महिलाओं की गतिविधियों का केन्द्र बना।(5) धमतरी नगर और समीपवर्ती गांव की वृद्ध स्त्रियों ने बाल्यावस्था में सूत कातना सीखा था, वे अब प्रशिक्षिका का कार्य कर रही थीं और इस व्यवसाय के पुनर्जीवित एवं पुनः प्रचलित होने से अत्यंत प्रसन्न थीं। मध्यम वर्गीय स्त्रियां गृहकार्य संपन्न करने के बाद शेष समय में असहयोग आंदोलन के इस कार्यक्रम में भरपूर हिस्सेदारी दे रही थीं। सूत कातना अब घर-घर लोकप्रिय हो गया।(6)

 दूसरा कार्यक्रम जिसमें महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया वह था हरिजनोद्धार। रायपुर नगर में यह कार्यक्रम राधाबाई के द्वारा चलाया गया। राधाबाई एक मिडवाइफ थीं किन्तु वे 1920-30 के दशक में समाज सेविका के रूप में इतनी सफल हुई, इतनी लोकप्रियता उन्होंने प्राप्त की कि लोग उन्हें प्यार और आदर से डा. राधाबाई पुकारने लगे। हरिजन उद्धार के इस काम में उनका सहयोग देने वाली डा. खूबचंद बघेल की मां केतकी बाई थीं। महिलाएं प्रायः हर मोहल्ले में जाकर वहां की महिलाओं की बैठक बुलाकर जनजागरण का कार्य करती थी।(7)

 असहयोग आंदोलन के तहत स्वदेशी और बहिष्कार को प्रमुखता दी गई और 8 अक्टूबर से 15 अक्टूबर रायपुर खादी सप्ताह मनाया गया। रावण भाठा रायपुर में विशाल खादी प्रदर्शनी का आयोजन 13 अक्टूबर को श्रीमती अंजुमन के नेतृत्व में 200 महिला स्वयं सेविकाओं के संगठन द्वारा किया गया। संभवतः यह पहला अवसर था जब घर की चारदीवारी में रहने वाली महिलाएं इतनी बड़ी संख्या में राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेने पर्दे का परित्याग कर बाहर निकलीं।(8) प्रदर्शनी स्थल पर सूत कातने की प्रतियोगिता भी हुई। इसमें भी महिलाओं ने बढ़-चढ़कर भाग किया। प्रदर्शनी में भाग लेने वाली महिलाएं हिंदू और मुसलमान दोनों थीं। छत्तीसगढ़ की शहरी महिलाएं जहां प्रदर्शन और धरना, खादी तथा चरखा कार्यक्रम में भाग लेकर असहयोग आंदोलन को सफल बनाने में जुटी थीं वहीं ग्रामीण और आदिवासी महिलाएं जंगल सत्याग्रह और कृषक आंदोलनों में पुरूषों के साथ बराबरी से भाग ले रही थीं। इस प्रकार असहयोग आंदोलन में छत्तीसगढ़ की महिलाओं ने आंदोलन को सफल बनाने के लिए अपना हर संभव योगदान दिया और स्वयं बलिदान देने के लिए तत्पर हो उठी थीं।

 

सविनय अवज्ञा आंदोलन और महिलाएं

महिलाओं में  बढ़ती हुई जागृति का ही यह परिणाम था कि 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी उन्होंने बड़ी संख्या में भाग लिया। लगभग सभी प्रांतों में उन्होंने जुलूसों से लेकर कानून तोड़े तथा विदेशी वस्तुओं की दुकानों के सम्मुख धरने दिए। गांधी जी की योजना थी कि स्त्रियां दांडी यात्रा में भाग न लेकर स्थानीय स्तर पर हड़ताल, धरना तथा प्रदर्शनी करें तो उनकी शक्ति का ही सही उपयोग हो सकता था। उनका विश्वास था कि ब्रिटिश सरकार स्त्रियों पर हमला करने में हिचकिचाएगी। उनके शब्दों में जैसे एक हिन्दू गाय को प्रताड़ित नहीं कर सकता जैसे ही अंग्रेज जहां तक हो सकेगा महिला पर प्रहार नहीं करेगा।(9)

गांधी जी के निर्देशानुसार समूचे भारत में स्त्रियों ने विदेशी कपड़ों और शराब की दुकानों के समक्ष धरना देने का कार्यक्रम चलाया। स्त्रियों का धरना कार्यक्रम बड़ा प्रभावी होता था। वे विदेशी वस्तुओं तथा शराब की दुकानों के सामने दो या तीन के समूह में सुबह से शाम तक बैठती थीं। अनेक व्यापारियों को उन्होंने विदेशी वस्तुएं बेचने से मना किया। यदि कोई ग्राहक इन दुकानों में आता था, तो उसे वे विदेशी वस्तुएं न खरीदनें का आग्रह करतीं। यदि उनके आग्रह पर भी ग्राहक न मानते और दुकानों में जाने का प्रयास करते तो सामने लेट जाती थीं। इस प्रकार नाटकीय शैली से विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को सफल बनाने का प्रयास करती थीं।

गांधी जी के द्वारा महिलाओं को धरना देने के लिए प्रोत्साहित करने की दूसरे कांग्रेसजनों में आलोचना हुई थी। उनके विचारों में इस कार्यक्रम से पुरूषों में स्त्रियों के प्रति दुर्भावना उत्पन्न होती है साथ ही स्त्रियों को उन क्षेत्रों में धरना देना पड़ा जो शराबियों और असामाजिक तत्वों के अड्डे थे। उनके अनुसार - इससे संभ्रांत घरों की महिलाओं को परेशानी होगी। गांधी जी ने अपने कार्यक्रमों को औचित्य प्रतिपादित करते हुए लिखा था कि स्त्रियों के धरना देने और उनके द्वारा आग्रह किये जाने से लोगों की विदेशी वस्तुओं और विदेशी शराब की आदत्तें कम होगीं।(10) पुरूषों को उन दुकानों में जाने से रोकने का और उनके विदेशी वस्तुओं के प्रयोग की आदत समाप्त करने का इससे अच्छा उपाय हो ही नहीं सकता था।

इस संविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान छत्तीसगढ़ की महिलाओं ने अत्यधिक सूझ-बूझ का परिचय दिया। शासकीय रिपोर्ट से भी इस बात की पुष्टि होती है कि आंदोलन के धरना कार्यक्रम में रायपुर की महिला स्वयं सेविकाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।(11) रायपुर नगर की महिलाओं द्वारा भी इस आंदोलन में अभूतपूर्व उत्साह के साथ भाग लिया गया। उच्च वर्गीय व सम्पन्न परिवार की महिलाओं के साथ-साथ मध्यम वर्गीय एवं मजदूर वर्ग की महिलाओं ने भी संविनय अवज्ञा आंदोलन सक्रिय योगदान दिया। पं.रविशंकर शुक्ल की पत्नि भवानी बाई शुक्ल ने स्त्रियों की प्रोत्साहित किया कि वे राजनीति में सक्रिय भाग ले। इस प्रोत्साहन के फलस्वरूप रायपुर की महिलाओं ने आंदोलन को अपना सहयोग दिया। प्रभात फेरियां निकाली गई, विदेशी कपड़ों का त्याग एवं शराब की दुकानों पर धरना देने का कार्य किया। आरंग की कई महिलाएं कार्यक्रमों में शामिल हुईं।(12)

सन् 1930 में रायपुर में आंदोलन के दौरान हुए खादी प्रचार एवं महिलाओं के योगदान पर आल्हाकार ने लिखा है-

               बहू बेटियां हमारी कहिए, रणचण्डी की ही है अवतार,

             खादी आज देश में विपत पड़ी है, तुम सब हो तैयार।

             कपड़ा पहनों तुम खादी का, घर चरखा देखों चलाय,

             कत कत सूत ढेर जो लागे, मील विलायत जाये ने पाये।(13)

 

रायपुर जिले में महिला कार्यकर्ताओं के चार केन्द्र कार्यरत थे जहां सत्याग्रही महिलाओं को प्रशिक्षण दिया जाता था। साथ ही प्रभात फेरी, धरना और बहिष्कार प्रदर्शन के जनजागरण के भावी कार्यक्रमों की रूप रेखा में निर्धारित होती थी। उल्लेखनीय है कि ये सारे कार्य महिलाएं स्वयं करती थीं। अधिकांशतः नेतृत्व क्षेत्र के प्रमुख नेताओं और सत्याग्रहियों की पत्नियां या माताएं करती थीं किन्तु राधाबाई एक ऐसी महिला सत्याग्रही थीं जिन्होंने अकेली ही अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई।

  रायपुर की प्रसिद्ध समाज सेविका डाॅ. राधाबाई यह महसूस करने लगीं कि रायपुर वासियों को तभी सुख और शांति का अनुभव हो सकता है जब भारत को ब्रिटिश प्रशासन के चंगुल से मुक्ति मिलेगी। डाॅ.राधाबाई के प्रयासों से सत्याग्रही बहनों का एक जत्था तैयार हुआ, जिसमें सुप्रसिद्ध समाज सेवी डाॅ. खूबचंद बघेल की वृद्धा मां केतकी बाई, फुलकुंवार बाई, कांग्रेस वालंटियर मनोहर लाली की मां रूखमणी बाई, पार्वती बाई (शंकर राव गनौदवाले की पत्नि), श्रीमती रोहिणी बाई परगानिहा एवं जमुना बाई थीं। राधाबाई पिकेंटिंग करते हुए गिरफ्तार कर ली गईं। केतकी बाई को वृद्ध देखकर छोड़ दिया गया इससे उन्हें अत्यंत ग्लानि हुई। उन्होंने तब तक अन्न व जल ग्रहण नहीं किया जब तक उनकी गिरफ्तारी नहीं की गई। रायपुर के मठ एवं मंदिर सत्याग्रहियों के प्रशिक्षण स्थल के रूप में परिवर्तित हो गए। पुरानी बस्ती स्थित मंहत लक्ष्मी नारायण दास का और जैतूसव मठ सत्याग्रहियों का सबसे बड़ा प्रशिक्षण केन्द्र था। इस केन्द्र का नेतृत्व अंजनी बाई (नंदकुमार दानी की पत्नी), रजनीबाई, फुलकुंवार बाई श्रीवास्तव एवं जानकी बाई के हाथ में था।(14) मंहत लक्ष्मी नारायण दास की वृद्धा मां श्रीमती पार्वती बाई सत्याग्रही महिलाओं के जत्थे को आशीर्वाद देकर जुलूस में भेजती थी। यहां एकादशी महात्म्य सुनने आई महिलाएं देश की स्थिति पर चर्चा करती थीं। यह महिलाओं में आने वाला एक बड़ा भारी परिवर्तन था।

सत्याग्रह का दूसरा प्रमुख केन्द्र बूढ़ापारा स्थित वामन राव लाखे का बाड़ा था। इस केन्द्र का नेतृत्व पं.रविशंकर शुक्ल की पत्नि भवानी बाई ने किया। जुलूस का नेतृत्व श्रीमती इंदिरा बाई लाखे, उमा बाई व काशी बाई द्वारा किया जाता था। कामासीपारा स्थित लक्ष्मीनारायण का मंदिर सत्याग्रह का तीसरा स्थान था इसकी प्रमुख रूखमणी बाई तिवारी थी। आंदोलन को नेतृत्व प्रदान करने में थीं- श्रीमती अन्नपूर्णा देवी शुक्ला, सुशीला बाई गुजरातिन, गोमती बाई मारवाड़िन, अंबिका पटेरिया, यशोदा बाई गंगेल। चैथां स्थान था तात्यापारा स्थित डाॅ. राधाबाई का मकान। इसका नेतृत्व करती थीं श्रीमती राधाबाई, पार्वती बाई गनौदवाले, रोहिणी बाई, कृष्णाबाई, सीताबाई, राजकुंवार बाई बघेल (डाॅ.खूबचंद बघेल की पत्नी), केतकी बाई बघेल, गंगाबाई, यशोदा बाई परगानिहा।(15) पिकेटिंग के दौरान खूबचंद बघेल की मां एवं पत्नि तथा प्रकाशवती मिश्र सभी महिलाओं को पिकेटिंग के लिए प्रेरित करती थी।

ये महिलाएं घर-घर जाकर खादी के वस्त्र बेचती थी और लोगों को चरखा चलाना सिखाती थीं। साथ ही उनसे विदेशी वस्त्र और आभूषण न पहनने का आग्रह करती थीं। उल्लेखनीय है कि पर्दा प्रथा इस राष्ट्रीय कार्य के आड़े आती थी अतः पर्दा प्रथा पर भी प्रहार किया गया। छत्तीसगढ़ की ग्रामीण महिलाओं में उस समय ब्लाउज पहनने का चलन नहीं था। पं. सुन्दर लाल की पत्नि ने सबसे पहले साड़ी के साथ ब्लाउज पहना।(16)  मोती लाल कोठारी का बाड़ा महिलाओं का सभा स्थल था। सदर बाजार का जगन्नाथ मंदिर तो राजनीतिक सत्याग्रह का एक प्रमुख स्थल बन गया था।(17)

महिलाओं के इस बढ़ते हुए उत्साह एवं महिला सत्याग्रहियों को रोकने के प्रयास शासन द्वारा किए गए। कुछ नए साधन अपनाए जाने थे क्योंकि शासन द्वारा बल प्रयोग व सीधे दमन से महिलाओं को सबकी सहानुभूति मिलती। उन्होंने तय किया कि कुछ संभ्रांत परिवार के लोग सत्याग्रही महिलाओं को समझाएं।(18) साथ ही उन्होंने महिलाओं का भी उपयोग करने का विचार किया।(19) गिरफ्तार की गई महिला सत्याग्रहियों को लेकर भी शासन चिंतित था। वे महिला वार्डरों की देख-रेख में थीं। फिर भी शासन को भय था कि किसी प्रकार का कोई विवाद अथवा शिकायत न हो।(20) प्रशासन पर यह एक मनोवैज्ञानिक दबाव था। पर कालांतर में प्रशासन ने कठोर नीति अपनाई। 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में रायपुर जिला की कुल 23 महिलाओं ने हिस्सा लिया, जिनमें से 11 महिला सत्याग्रहियों को जेल की सजा हुई। केतकी बाई, रूखमणीबाई और रामबती ने दो-दो पिकेटिंग में भाग लिया। 23 मार्च, 1932 को कीका भाई की दुकान के सामने धरना दे रही श्रीमती फुटेनियाबाई, मनटोराबाई, मटोलिन, मुटकीबाई तथा केजाबाई को पुलिस घसीटकर कोतवाली तक ले गई। ऐसी ही दूसरी घटना अपै्रल में कीका भाई की दुकान के सामने घटी। श्रीमती रामबतीबाई, कंुवरबाई, अमृतबाई को गिरफ्तार किया गया तथा रामबतीबाई को घसीटते हुए तथा अन्य महिलाओं को धक्का देते हुए कोतवाली लाया गया। कोतवाली में उनसे अभद्रतापूर्ण व्यवहार किया गया। उनको माफी मांगने के लिए दबाव डाला गया एवं रात तक रोककर रखा गया। रात में उन्हें छोड़ दिया गया। वे स्टेशन के पास धर्मशाला में रूकीं जहां पुलिस द्वारा अभद्र व्यवहार किया गया। इसकी शिकायत उन्होंने डाॅ. राधाबाई से की। 13 अप्रैल को एक आम सभा डाॅ. राधाबाई की अध्यक्षता में आयोजित की गई जिसमें डाॅ. राधाबाई ने महिला सत्याग्रहियों के प्रति दुव्र्यवहार की जानकारी जनता को दी। इस सभा में पुलिस के व्यवहार की तीव्र भत्र्सना की गई।(21) कीका भाई की दुकान के सामने पिकेटिंग करते हुए 22 महिला सत्याग्रहियों ने गिरफ्तारी दी।(22)

रायपुर नगर की प्रथम महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डाॅ. श्रीमती राधाबाई सन् 1930 से लेकर सन् 1942 सत्याग्रह में भाग लेती रहीं। उनकी प्रेरणा से छत्तीसगढ़ की अनेक महिलाओं ने सत्याग्रह में भाग लिया।(23) इसी तरह जंगल सत्याग्रह के दौरान रायपुर जिले के तमोरा गांव के जंगल सत्याग्रह में भी 13 सितंबर, 1930 को दयावती बाई नामक एक युवती ने सत्याग्रहियों के जत्थे का नेतृत्व किया था।(24)

 

छत्तीसगढ़ की महिलाओं का राष्ट्रीय आंदोलन में यह महत्वपूर्ण योगदान था। महात्मा गांधी का प्रभाव ही था कि जहां एक ओर छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी नेताओं के परिवार की महिलाएं जैसे पं. रविशंकर शुक्ल की पत्नी भवानी बाई शुक्ल, डाॅ. खूबचंद बघेल की माता जी केतकी बाई बघेल आदि थी तो दूसरी ओर एकदम सामान्य वर्ग से आई राधाबाई नेतृत्व दे रही थी और मनटोरा बाई, मुरकी बाई, आदि गिरफ्तारी दे रही थी। ये सभी महिलाएं सत्याग्रही थी। जो पिकेटिंग, धरना, प्रदर्शन करती थी। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ की महिलाओं को महात्मा गांधी के छत्तीसगढ़ आगमन पर उनके हरिजन कोष में मुक्त हस्त दान भी किए। तन मन धन से राष्ट्र की सेवा में, राष्ट्रीय आंदोलन में महात्मा गांधी के साथ उनके आव्हान पर महिलाओं ने अपनी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। छत्तीसगढ़ की मां और बहने किसी भी क्षेत्र से पीछे नही रही आजादी की लड़ाई में अपना योगदान देने में। मंदिर और मठ इनके मिलने के स्थान रहते थे जहां इनकी मीटिंग होती थी जिससे किसी को शक भी नही होता था। यह एक सामाजिक क्रांति थी, महिलाएं घर से बाहर निकली एकादशी व्रत के स्थान पर देश का व्रत धारण किया राजनैतिक चर्चाएं की ओर अपनी राष्ट्रीय जिम्मेदारी का अहसास कर अपनी सक्रिय भूमिका निभाई।

 

संदर्भ:-

1.            राजमोहन, वूमेन इन इनडियन नेशनल कांग्रेस 1921-1932, न्यू डेल्टी, 1999, पृ.70

2.            हिन्दी नवजीवन, 5/2/1925

3.            जे.बी.कृपलानी, गांधी हिज लाइफ एंड थाॅट:  पब्लिकेशन डिवीजन, नई दिल्ली, 1971, पृ. 305

4.            हरिठाकुर, छत्तीसगढ़ पर गांधी जी के व्यक्तित्व का प्रभाव, ठा.भा.नायक (संपा.) छत्तीसगढ़ में गांधी जी, 1970, पृ. 1-2

5.            शोभाराम देवांगन, धमतरी नगर एवं तहसील का स्वतंत्रता आंदोलन, पांडुलिपि, पृ. 14

6.            वही, पृ. 16

7.            केयूर भूषण, छत्तीसगढ़ के जनजीवन पर गांधी का प्रभाव, ठा.भा. नायक (सं.) पूर्वोक्त, पृ. 18

8.            नवभारत, रायपुर, 25 नवंबर 1983

9.            द कलेक्टेर्ड वकर््स आॅफ महात्मा गांधी, खंड 43, पृ. 12

10.          वही, पृ. 93

11.          एडमिनिस्ट्रेटिव रिपोर्ट आॅफ सी.पी. एंड बरार, 1930, पृ. 35

12.          बेकर, डी.ई.यु.चेंजिंग पोलीटिकल लीडरशिप इन एन इंडियन प्रोविंस, द सेंट्रल प्रोविसंेस एंड बरार 1914-1939, पृ. 133

13.          हरिठाकुर, पूर्वोक्त पृ. 93

14.          पाल, आभा आर., पार्टीसिपेशन आॅफ दि विमेन इन द सिविल डिसओबीडियंस मूवमेंट-ए केस स्टडी आॅफ दि सेंट्रल प्रोविसेंस एंड बरार, अध्ययन, पृ. 57

15.          वही, पृ. 58

16.          सहयोग दर्शन, स्वाधीनता रजत जयंती विशेषांक, 1972, पृ. 192-95

17.          वही

18.          फाइल क्रमांक 32/सी.डी.एम. 1932 सीक्रेट एक्सप्रेस क्रमांक 37/सी, दिनांक 14 जनवरी 1932

19.          वही

20.          फाइल क्रमांक 19, सी.डी.एम.

21.          नगर निगम रिपोर्ट, 1971-72, पृ. 40

22.          वही, हरि ठाकुर, पूर्वोक्त, पृ. 145

23.          सहयोग दर्शन, स्वाधीनता रजत जयंती विशेषांक, 1972, पृ. 195

24.          ठाकुर प्यारेलाल सिंह की रिपोर्ट, 14.4.1931