Dr. Madan Meena

Madan Meena is a visual artist and researcher. He has worked extensively with artists and craftspersons from local communities in Rajasthan. His doctoral dissertation from University of Rajasthan was on the subject 'Art of the Meena Tribe'. He continues to work as a researcher with the women of the Meena tribe and has documented and exhibited their Mandana wall paintings. He has published two books on the subject, 'Joy of Creativity' and 'Nurturing Walls'. As a curator, he has designed an exhibition on brooms for the ‘Arna Jharna: The Desert Museum of Rajasthan’ of Rupayan Sansthan in Jodhpur. He has been regularly recording oral traditions among the Gurjar, Meena, Jogi, Mali, Merati and Jat communities. Madan has received a grant from Cambridge University under the World Oral Literature Project to document Tejaji Ballad sung in south-eastern Rajasthan. His interest in languages has led him to start his work on the secret language of the nomadic and de-notified tribes. For this he received fellowship from the Firebird Foundation for Anthropological Research, USA. As a state coordinator for Bhasha Research and Publication Centre, Baroda, he edited the Hindi and English volumes of Rajasthani languages under the People’s Linguistic Survey of India project. Madan has received Senior Research Fellowship from CCRT-Department of Culture, to extend his work in folklore studies in Marwar region. He is an Executive Member of Kota Heritage Society.

 

राजा भरतहरी की कथा

 

जिस प्रकार हर लोक गाथा की शुरूआत देवी–देवता से होती है उसी प्रकार भरतहरी की कथा भी देवी दुर्गा की स्तुति से शुरू होती है। कथा को गद्य और पद्य दोनों में कड़ी दर कड़ी गाया जाता है। बीच–बीच में नैतिकता का संदेश देते दोहे बोले जाते हैं। कथा में मुख्य गायक कलाकार (मेडिया) कथा को आगे बढ़ाता है, बाकी सहयोगी गायक हुँकारा लगाते हैं और गीत की पंक्तियों को दोहराते हैं। साथी कलाकार; ढोलक, पूँगी और मंजीरे के संगीत पर गाते हैं। गायिकी को रुचिकर बनाने के लिए गति, ताल और राग में कई फेरबदल किये जाते हैं।

 

भरतहरी कथा का आयोजन मुख्यतः किसी भी देवता के थान या घर पर भी किया जा सकता है। इसे रात्रि जागरण में ही गाया जाता है। सामान्यतया किसी मनोकामना की पूर्ति या घरेलू संस्कारों के आयोजन के समय इसे गवाया जाता है। भरतहरी कथा का ज्ञान आम जन को होता है लेकिन इसे गाने वाले सिर्फ जोगी जाति के लोग ही होते हैं, जिन्हें निमंत्रण देकर निश्चित शुभ तिथि या विशेष अवसर पर बुलाया जाता है। बदले में भेंट स्वरूप निश्चित धन राशि व आने–जाने का किराया–भाड़ा दिया जाता है। वर्तमान में भरतहरी कथा गाने वाले जोगी राजस्थान के उतर, पूर्व व पूर्व–पश्चिमी जिलों के गाँवों में मिल जाते हैं। युवा पीढ़ी में इसके प्रति रूचि कम होती जा रही है। फिल्मी धुनों का प्रभाव गायिकी पर दिखाई देने लगा है और आधुनिक साउंड सिस्टम पर निर्भरता बढ़ती जा रही है।भरतहरी की इस संपूर्ण कथा की रिकार्डिंग के लिए जब कई जोगियों को संपर्क किया गया तो उनमें से कईयों ने बिना साउंड सिस्टम के गाने में असर्मथता ज़ाहिर की, सिर्फ बंदा गाँव के अंतर जोगी ने ही इस कथा को कड़ी दर कड़ी बिना किसी साउंड सिस्टम के गाने के दिखाई देने लगा है और आधुनिक साउंड सिस्टम पर निर्भरता बढ़ती जा रही है।

 

भरतहरी की इस संपूर्ण कथा की रिकार्डिंग के लिए जब कई जोगियों को संपर्क किया गया तो उनमें से कईयों ने बिना साउंड सिस्टम के गाने में असर्मथता ज़ाहिर की, सिर्फ बंदा गाँव के अंतर जोगी ने ही इस कथा को कड़ी दर कड़ी बिना किसी साउंड सिस्टम के गाने के लिए हामी भरी। अंतर जोगी की प्रतिबद्धता की वजह से ही यह काम संभव हो सका जिसके लिए वह प्रशंसा का पात्र है। अंतर को भरतहरी के अलावा शिव–पार्वती का ब्यावला, राजा गोपीचंद की कथा, रूप बसंत की कथा, दूल्हा दाहड़ी की कथा, नरसी जी की कथा (नैनी बाई को मायरो) कंठस्थ है, जिन्हें वह रात्रि जागरणों में आस–पास के गाँवों में गाता है। इन सभी कथाओं में प्रेम, आध्यात्म, वैराग्य, वीरता और कर्तव्यनिष्ठा के तत्व दिखाई देते हैं जो कि मनुष्य को प्रेरित करते हैं और मानव कल्याण के लिए सद्मार्ग पर चलने का संदेश देते हैं। उदाहरणस्वरुप भरतहरी कथा में एक ओर राजा प्रजा के प्रति अपने कर्तव्य के निर्वहन के लिए अपनी लड़की का विवाह कुम्हार की गधी के रेंगटे (बच्चे) से करने को राजी होता है वहीं दूसरी ओर दयालुता व उदारता का प्रतीक राजा भरतहरी बाबा गुरू गोरखनाथ का चेला बनने के लिए काले हिरण का शिकार कर उसकी खाल उनके लिए लाता है और अंत में वह अपना सारा राजपाट त्याग कर उनका शिष्य बन जोगी हो जाता है। कथा में जहाँ अमर फल का किस्सा प्रेम रस से भरा हुआ है तो दूसरी तरफ भरतहरी द्वारा हिरण के शिकार व वैराग्य धारण का किस्सा करूणा रस से सभी को रुला देने वाला है। भरतहरी कथा तीन खण्डों में विभाजित की जा सकती है। लेकिन वह इस प्रकार गायी जाती है कि यह एक कथा का ही आभास देती है। कथा एक रात में पूरी हो जाती है। कथा के अंत में देवी–देवताओं को भोग लगाया जाता है और प्रसादी बाँटी जाती है। कथा का सार इस प्रकार हैः एक समय था जब राजा इन्द्र की परियाँ पृथ्वी पर नृत्य किया करती थीं। सुबह के समय खुशबूदार पेड़ों से फूल गिरा करते थे। राजा इंद्र अपने बेटे गंधर्वसेन को वचनों में बाँधते हुए गधा बनने के लिए कहता है। गंधर्वसेन का जन्म लाखा कुम्हार की गधी से होता है। वह कुछ ही समय में बड़ा हो जाता है और रात के आधे पहर के समय लाखा कुम्हार को राजा भरतहरी की कथा (हिंदी अनुवाद) जिस प्रकार हर लोक गाथा की शुरूआत देवी–देवता से होती है उसी प्रकार भरतहरी की कथा भी देवी दुर्गा की स्तुति से शुरू होती है। कथा को गद्य और पद्य दोनों में कड़ी दर कड़ी गाया जाता है। बीच–बीच में नैतिकता का संदेश देते दोहे बोले जाते हैं। कथा में मुख्य गायक कलाकार (मेडिया) कथा को आगे बढ़ाता है, बाकी सहयोगी गायक हुँकारा लगाते हैं और गीत की पंक्तियों को दोहराते हैं। साथी कलाकार; ढोलक, पूँगी और मंजीरे के संगीत पर गाते हैं। गायिकी को रुचिकर बनाने के लिए गति, ताल और राग में कई फेरबदल किये जाते हैं। भरतहरी कथा का आयोजन मुख्यतः किसी भी देवता के थान या घर पर भी किया जा सकता है। इसे रात्रि जागरण में ही गाया जाता है। सामान्यतया किसी मनोकामना की पूर्ति या घरेलू संस्कारों के आयोजन के समय इसे गवाया जाता है। भरतहरी कथा का ज्ञान आम जन को होता है लेकिन इसे गाने वाले सिर्फ जोगी जाति के लोग ही होते हैं, जिन्हें निमंत्रण देकर निश्चित शुभ तिथि या विशेष अवसर पर बुलाया जाता है। बदले में भेंट स्वरूप निश्चित धन राशि व आने–जाने का किराया–भाड़ा दिया जाता है। वर्तमान में भरतहरी कथा गाने वाले जोगी राजस्थान के उतर, पूर्व व पूर्व–पश्चिमी जिलों के गाँवों में मिल जाते हैं। युवा पीढ़ी में इसके प्रति रूचि कम होती जा रही है। फिल्मी धुनों का प्रभाव गायिकी पर दिखाई देने लगा है और आधुनिक साउंड सिस्टम पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। भरतहरी की इस संपूर्ण कथा की रिकार्डिंग के लिए जब कई जोगियों को संपर्क किया गया तो उनमें से कईयों ने बिना साउंड सिस्टम के गाने में असर्मथता ज़ाहिर की, सिर्फ बंदा गाँव के अंतर जोगी ने ही इस कथा को कड़ी दर कड़ी बिना किसी साउंड सिस्टम के गाने के लिए हामी भरी। अंतर जोगी की प्रतिबद्धता की वजह से ही यह काम संभव हो सका जिसके लिए वह प्रशंसा का पात्र है। अंतर को भरतहरी के अलावा शिव–पार्वती का ब्यावला, राजा गोपीचंद की कथा, रूप बसंत की कथा, दूल्हा दाहड़ी की कथा, नरसी जी की कथा (नैनी बाई को मायरो) कंठस्थ है, जिन्हें वह रात्रि जागरणों में आस–पास के गाँवों में गाता है। इन सभी कथाओं में प्रेम, आध्यात्म, वैराग्य, वीरता और कर्तव्यनिष्ठा के तत्व दिखाई देते हैं जो कि मनुष्य को प्रेरित करते हैं और मानव कल्याण के लिए सद्मार्ग पर चलने का संदेश देते हैं। उदाहरणस्वरुप भरतहरी कथा में एक ओर राजा प्रजा के प्रति अपने कर्तव्य के निर्वहन के लिए अपनी लड़की का विवाह कुम्हार की गधी के रेंगटे (बच्चे) से करने को राजी होता है वहीं दूसरी ओर दयालुता व उदारता का प्रतीक राजा भरतहरी बाबा गुरू गोरखनाथ का चेला बनने के लिए काले हिरण का शिकार कर उसकी खाल उनके लिए लाता है और अंत में वह अपना सारा राजपाट त्याग कर उनका शिष्य बन जोगी हो जाता है। कथा में जहाँ अमर फल का किस्सा प्रेम रस से भरा हुआ है तो दूसरी तरफ भरतहरी द्वारा हिरण के शिकार व वैराग्य धारण का किस्सा करूणा रस से सभी को रुला देने वाला है। भरतहरी कथा तीन खण्डों में विभाजित की जा सकती है। लेकिन वह इस प्रकार गायी जाती है कि यह एक कथा का ही आभास देती है। कथा एक रात में पूरी हो जाती है। कथा के अंत में देवी–देवताओं को भोग लगाया जाता है और प्रसादी बाँटी जाती है। कथा का सार इस प्रकार हैः

 

एक समय था जब राजा इन्द्र की परियाँ पृथ्वी पर नृत्य किया करती थीं। सुबह के समय खुशबूदार पेड़ों से फूल गिरा करते थे। राजा इंद्र अपने बेटे गंधर्वसेन को वचनों में बाँधते हुए गधा बनने के लिए कहता है। गंधर्वसेन का जन्म लाखा कुम्हार की गधी से होता है। वह कुछ ही समय में बड़ा हो जाता है और रात के आधे पहर के समय लाखा कुम्हार को आवाज़ लगाता है कि वह अपनी पैपावती नगरी के राजा को जाकर कहे कि वह अपनी लड़की पानदे बाई का विवाह उससे कर दे। लाखा कुम्हार की गधी का रेंगटा हर रात अपनी इसी बात को दोहराते हुए रोज़ लाखा कुम्हार को जगाता है। लेकिन लाखा कुम्हार की हिम्मत नहीं होती कि वह यह बात जाकर अपने राजा से कहे कि वह अपनी बेटी पानदे बाई का विवाह उसकी गधी के रेंगटे से कर दें। ऐसी गलती करने पर निश्चय ही राजा उसे कड़ी से कड़ी सज़ा देगा व उसकी खाल उतरवा देगा। वह उसे नगर के बाहर भी निकाल देगा। अंततः परेशान होकर लाखा कुम्हार अपनी पत्नी से गाँव छोड़कर चलने को कहता है। लाखा अपने घर का सारा सामान गधों पर लाद कर घने जंगल को पार करते हुए निकल जाता है। रास्ते में उसे गाँव के लोग मिलते हैं। वे अचंभित हो उससे उसके गाँव छोड़कर जाने का कारण पूछते हैं। वे कहते हैं, ‘‘अरे लाखा! ऐसा क्या दुख पड़ गया, क्या विपदा आ गई, ऐसी क्या बात हो गई जो तू गाँव छोड़कर जा रहा है? अगर तू चला गया तो हम अकेले यहाँ रहकर क्या करेंगें? हम तेरे बिना किससे मटकी और मिट्टी के बर्तन लाएँगें?” वे उसे वापस गाँव लौटने के लिए कहते हैं। पंच–पटेलों का निवेदन सुनकर लाखा इस बात पर वापस गाँव चलने को राज़ी होता है कि उन्हें एक रात उसके घर बितानी पड़ेगी। जिसके लिए वे तुरंत तैयार हो जाते हैं। आधी रात का जब पहर होता है तो गधी का रेंगटा लाखा को वही आवाज़ लगाता है कि वह जाकर अपने राजा से कहे कि वह अपनी बेटी का विवाह उससे कर दे। पंच–पटेल रेंगटे की माँग को सुनकर स्तब्ध रह जाते हैं। उनकी हिम्मत नहीं होती की वे यह बात राजा को किसी तरह कह दें। इसलिए वे भी लाखा के साथ गाँव छोड़कर जाने का निर्णय करते हैं। सभी गाँव छोड़कर चल देते हैं। यह बात राजा पैपसिंह को उसके महल में मालूम हो जाती है तो वह अपने घोड़े पर बैठकर गाँव वालों के समक्ष आता है और उनके जाने का कारण पूछता है, ‘‘अरे बस्ती के लोगों! ऐसी क्या बात हो गई जो तुम गाँव छोड़कर जा रहे हो? तुम्हारे बिना मैं किस पर राज करूँगा? और कैसे इस नगर का राजा कहलाऊँगा?” गाँव वाले जवाब देते हैं कि वह इसका कारण लाखा से पूछें। राजा जब लाखा कि ओर देखता है तो वह ढळ–ढळ–ढळ रोने लगता है और कहता है कि कारण जानने के लिए राजा खुद उसके घर एक रात सो कर देखे। गाँव वाले भी कहते हैं कि अगर राजा एक रात बिताने के लिए राजी हो जाए तो वे भी वापस गाँव लौट जाएँगें। राजा उनकी बात मान लेता है। आधी रात होती है और गधी का रेंगटा लाखा को वही आवाज़ लगाता है कि वह महल में जाकर राजा को कहे कि वह उसकी बेटी पानदे का विवाह उससे कर दे। राजा पैपसिंह यह बात सुन लेता है। यह सुनकर वह अचंभित रह जाता है कि गधी के रेंगटे का विवाह वह अपनी बेटी पानदे से कैसे कर सकता है। इस संकट से बचने के लिए वह एक शर्त रखता है कि अगर गधी का रेंगटा उसकी नगरी का परकोटा एक रात में पीतल–ताँबे का खिंचवा दे तो वह उसका विवाह अपनी बेटी से कर देगा। यह कहकर राजा अपने महल को लौट जाता है। पीछे से लाखा का दिल घबराने लग जाता है। शर्त सुनकर रेंगटे के भी कान खड़े हो जाते हैं। वह लाखा से कहता है कि वह उसकी पीठ पर दोनों तरफ थैले लटका दे। एक में पीली मिट्टी भर दे और दूसरी में काली मिट्टी भर दे। इसके पश्चात वह उसे नगरी का फेरा लगवा दे। विवश हो लाखा उसकी बात मानते हुए नगरी का फेरा लगवा देता है। एक रात में परकोटा ताँबे–पीतल का हो जाता है।

 

सूरज उगते ही महल में राजा को जैसे ही यह खबर लगती है उसका दिल घबरा जाता है। वह अपनी रानी से कहता कि उसे अपने वचन को निभाने के लिए अपनी बेटी की शादी गधी के रेंगटे से करनी पड़ेगी। लेकिन शादी के बाद वह रेंगटे को महल में ही घरजंवाई बना कर रख लेगा। वह अपने नाई को बुलाकर उसके हाथ लाखा कुम्हार के यहाँ लग्न भिजवा देता है। लग्न आते देख लाखा गाँव वालों को आवाज़ लागाता है कि वे उसके घर आकर लग्न झिला जाएं। यह सब कार्य बड़ी शोभा से हो जाता है। लाखा बारात ले जाने की तैयारी में जुट जाता है। वह बिना किसी बैंड–बाजे के बारात को लेकर चल देता है। लाडा रेंगटा बारात में नाचते हुए लोगों पर रुपये लुटाता चलता है। बारात जब राजा के यहाँ पहुँचती है तो महल में से उतर कर घर की महिलायें तोरण द्वार पर मंगल गीत गाती हुई आती हैं और दूल्हे का स्वागत करती हैं। रानी आरती करती है। दोनों के गठजोड़ा जोड़कर पंडित उनके फेरे लगवाता है। पहले फेरे में राजा–रानी अन्न का दान करते हैं। दूसरे में छल्ला–अँगूठी, तीसरे में पाँच बर्तन, चौथे में पाँच कपड़े, पाँचवें में सोने का दान, छठे में गज–इष्ट्या (हाथी और घर के देवताओं) का दान और सातवें में गौ माता का दान करते हैं। फेरे लगने के बाद बारात लौटने की तैयारी करती है। विदाई में महिलायें गाली–गीत गाती हैं। मालिन फूलों के हार बना कर लाती है। पहली माला गणेश जी को अर्पण की जाती है, दूसरी लाखा ब्याई को और तीसरी अपने नए जंवाई साहब को पहनाई जाती है। बारात लौट जाती है लेकिन बेटी और जंवाई को महल में ही रोक लिया जाता है। उन्हें महल के तलघर में खर्चा–पानी देकर रहने के लिए अकेला छोड़ दिया जाता है। जब दिन ढलने के बाद रात होती है तो रेंगटा गंधर्वसेन बन जाता है। हर रात को वह मनुष्य देह में तब्दील हो जाता है और सुबह होते ही वापस गधा बन जाता है। कुछ समय पश्चात पानदे गर्भवती हो जाती है। वह एक के बाद एक चार बच्चों को जन्म देती है जिसमें सबसे बड़ा भरतहरी, उससे छोटा विक्रमादीत, उससे छोटी मेणावंती और चौथे स्थान पर सबसे छोटा भाई सलीमादीत जन्म लेता है। चारों बहन–भाई महल के तलघर में खेलते–कूदते हैं।

 

एक दिन राजा पैपसिंह की रानी को अपनी बेटी की याद आती है। उसके हाल–चाल जानने के लिए वह अपनी दासियों को तलघर में भेजती है। वे जाकर देखती हैं कि पानदे हाथ में क़िताब लिये पढ़ रही है और चारों बच्चे मस्ती में खेल रहे हैं। दासियों से मिलकर वह कहती है कि वे जाकर उसकी माँ से कह दें कि उसने तो अपनी बेटी का विवाह गधे से किया था लेकिन उसके चार बच्चों का जन्म हुआ है। इतने में रेंगटा भी घास चरकर वापस लौट आता है। रात का वक्त होता है, रेंगटा अपनी खाल उतार कर गंधर्वसेन बन जाता है। खाल को खूँटी पर टाँग देता है। यह राज़ जानने के बाद मौका देखकर रानी दासियों को तेल देकर भेजती है कि वे जाकर रेंगटे की खाल को जला दें। रानी सोचती है कि ऐसा करने से रेंगटा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा और बदले में मनुष्य रूपी गंधर्वसेन बच जाएगा। खाल को दासियाँ जैसे ही आग लगाती हैं गंघर्वसेन पानदे से कहता है, ‘‘अरे मेरी खाल में किसी ने आग लगा दी है, मेरा पूरा शरीर जल रहा है। तू तुरंत इस नगर को छोड़कर जंगल में चारों बच्चों को लेकर निकल जा। मैं बदला लेने के लिए आज इस नगर को तहस–नहस कर दूँगा।’’ पानदे चारों बच्चों को लेकर महल छोड़ जंगल में पहुँच जाती है। वहाँ घने जंगल का भयावह दृश्य देख ज़ोर–ज़ोर से रोने लगती है। उसे रोता देख चारों बच्चे भी रोने लगते हैं। सलीमादीत गोद में होता है। जंगल में खाने–पीने को कुछ नहीं मिलता। भूख के मारे आँचल में दूध आना भी बंद हो जाता है। छोटा बालक सलीमादीत भूखा मरने लगता है। इतने में सामने से नाहर और नाहरणी का जोड़ा आता दिखाई देता है। भरतहरी अपनी माँ से कहता है कि नाहर–नाहरणी उन सब का शिकार कर खा जाएँगे इसलिए वह छोटे भाई को वहाँ छोड़कर आगे चले जाएँ। पानदे सलीमादीत को नरसल पेड़ के नीचे रखकर बाकी तीनों बच्चों को लेकर वहाँ से चल देती है। घनी रात का समय होता है। आगे चलकर वे ढोबा प्याड़ पर पहुँचते हैं। रात का पहरा लगाने के लिए पहले पहर में विक्रमादीत जागता है। ढोबा प्याड़ के पास स्थित बावड़ी के बड़ में काले साँप का वास होता है। विक्रमादीत को बड़ के पेड़ में चकवा–चकवी दिखाई देते हैं। विक्रमादीत की मौजूदगी से अनभिज्ञ वे आपस में बतियाते हैं कि अगर उनमें से कोई चकवे को मार कर खा जाए तो वह धारा नगरी का राजा बन जाएगा और चकवी कहती है कि अगर कोई उसे मारकर खा जाए तो वह रोज़ एक सोने की मोहर उगलेगा। चकवे–चकवी की बात सुनकर विक्रमादीत सोचता है कि वह दोनों का शिकार कर खुद चकवी को खा जाए तो रोज़ एक सोने की मोहर मिलेगी और भाई भरतहरी को चकवा खिला देगा तो उसे धारा नगरी का राज मिल जाएगा। दोनों का शिकार कर वह भरतहरी को जगाता है। भरतहरी अपने भाई की बात सुन कर चकवे को खा लेता है और विक्रमादीत चकवी को खा जाता है। आधी रात का पहरा भी पूरा हो जाता है। इसके बाद पहरा देने की बारी भरतहरी की आती है, अब विक्रमादीत गहरी नींद सो जाता है। इतने में जिस बड़ के पेड़ में तीर से चकवा–चकवी का शिकार किया था उसमें से काला नाग नीचे उतरता है और विक्रमादीत को डस लेता है। विक्रमादीत की वहीं मृत्यु हो जाती है उसके मुँह पर चींटियाँ चढ़ने लगती हैं। सूरज उगता है तो पता चलता है कि उसकी मृत्यु हो चुकी है। पानदे अपने दूसरे बेटे को खोने के दुख में रोने लगती है। ज़िंदा बचे हुए भरतहरी और उसकी बहन भी ज़ोर–ज़ोर से रोने लगते हैं। माँ विलाप करती है कि भगवान ने उसके भाग्य में यह सब दुख क्यों लिखे हैं!

 

अपने भाई की अंत्येष्टि के लिए खप्पन (क़फ़न) लाने के लिये भरतहरी शहर की ओर निकल जाता है। घना जंगल पार करते हुए वह धारा नगरी पहुँचता है जिसके दरवाज़े उसे बंद मिलते हैं। दरवाज़े बंद देख भरतहरी दुखी होता है। उस समय धारा नगरी का कोई राजा नहीं होता क्योंकि जो भी राजगद्दी पर बैठता है उसे वहाँ का राक्षस व कामाख्या देवी खा जाते थे। भरतहरी को देख नगरवासी उसे राजा बनने का प्रस्ताव देते है। दुखी भरतहरी जवाब देता है कि वह तो अपने भाई की अंत्येष्टि के लिए खप्पन लेने आया है। लेकिन आखिर में उसे नगरवासियों का निवेदन स्वीकार करना पड़ता है। धारा नगरी का राजा बनने के पश्चात वह अपने भाई–बहन और माँ को भूल जाता है।

 

भरतहरी को जब राक्षस की बात पता चलती है तो वह उसे रिझाने के लिए नगर के गेट से महल की राजगद्दी तक फूल बिछवा देता है और ऊपर से सुगंधित इत्र का छिड़काव करवा देता है। जैसे ही राक्षस महल में प्रवेश करता है वह मादक महक से मोहित हो जाता है। कामाख्या देवी भी भरतहरी से खुश हो जाती हैं। दोनों खुश होकर भरतहरी को वरदान देते हैं कि धारा नगरी पर अब वही राज करेगा। जंगल में पानदे अपने दोनों बच्चों और विक्रमादीत की लाश के साथ भाई के लिए खप्पन लेने गए भरतहरी का इंतजार करती बैठी रहती है। पानदे के दुख को देख शंकर भोलेनाथ प्रकट होते हैं और अपना नाद बजाते हैं। काला नाग पेड़ से उतर कर विक्रमादीत के शरीर का सारा ज़हर चूस लेता है। शंकर द्वारा अमृत जल के छींटे देते ही वह उठ खड़ा होता है। विक्रमादीत को ज़िंदा कर शंकर अपनी धूनी पर वापस चले जाते हैं।

 

एक दिन धारा नगरी में चोरी हो जाती है। जिसमें डकैत गायों को चोरी कर के ले जाते हैं। बस्ती गायों को छुड़ाने के लिए भरतहरी से निवेदन करती है। भरतहरी अपने घोड़े पर सवार हो डैकतों के पास जाता है और देखता है कि डकैत हरी–पीली रंगीन जाजमों पर बैठे हुए हैं। उन हजार डकैतों का सरदार गणपतसिंह भी वहीं बैठा होता है। भरतहरी गणपतसिंह को ललकारते हुए गायों को छोड़ने के लिए कहता है। गणपतसिंह जवाब देता है कि अगर भरतहरी को जान बचानी है तो वह वहाँ से वापस लौट जाए। दोनों तरफ से युद्ध छिड़ जाता है। गणपतसिंह डकैत को हरा कर भरतहरी गायों को छुडा कर उसकी बेटी श्यामदे को ब्याह लाता है। भरतहरी श्यामदे को लेकर महल में आ जाता है। श्यामदे महल को देखकर पूछती है कि इतने बड़े महल में क्या वह अकेले ही रहते हैं। अगर उनकी छोटी बहन और भाई होते वह उनका लाड़ लड़ाती। और अगर उनकी सास होती तो वह उनके पाँव दबाती। यह सब सुनकर भरतहरी को अपनी माँ और भाई–बहन याद आ जाते हैं। उसे याद आता है कि वह साँप द्वारा डसे अपने भाई को वन में मृत छोड़ कर खप्पन लेने आया था। वह अपनी माता व छोटी बहन को जंगल में रोता छोड़ कर आया था। भरतहरी को उनकी याद सताने लगती है और वह उनसे मिलने के लिये व्याकुल हो जाता है। वह तुरंत जंगल की ओर लौट जाता है जहाँ उसने उन्हें आखिरी बार छोड़ा था। जंगल में पहुँच कर वह रोने लगता है। उसे रोता देख शंकर फिर से प्रकट होते हैं और उसके रोने का कारण पूछते हैं। भरतहरी का दुख सुनकर उसे आश्वस्त करते हैं कि उसे जल्द ही उसकी बिछड़ी माँ व बहन–भाई वापस मिल जाएंगे। शंकर के कहे अनुसार भरतहरी को अपनी माँ, भाई विक्रमादीत व बहन मेणावंती वापस एक ही जगह पर मिल जाते हैं। सब गले मिलते हैं। भरतहरी सभी को लेकर धारा नगरी के महल में लौट जाता है और फिर से वहाँ राज करने लगता है।  

 

कुछ समय पश्चात भरतहरी को याद आता है कि जब वह चूचक शहर में गायों को डकैतों से छुड़ाने के लिये गया था तब उसने शंकर को बारह बरस की भक्ति करने के लिए वचन दिया था। वह विक्रमादीत को अपना राज–पाट संभला कर धारा नगरी बारह बरस के लिए छोड़ देता है। राजा भरतहरी का राज इतना शांतिपूर्ण रहा होता है कि वहाँ नाहर और बकरी एक ही कुण्ड से पानी पीते थे। ऐसा ही राज करने के लिए वह विक्रमादीत को सीख देता है। छोटे भाई को राज–पाट संभला कर भरतहरी घने जंगल कि ओर प्रस्थान कर जाता है।

 

भरतहरी के जाने के पश्चात श्यामदे अपनी दासी को नौकर को बुलाने के लिए भेजती है। वह दासी को सिखाती है कि वह नौकर के पास जाकर यह बहाना बनाए कि महल में काला साँप आ गया है। नौकर के महल में आने के बाद रानी उसे अपने साथ प्रेम संबंध बनाने के लिए उकसाती है। एक दिन विक्रमादीत दोनों को महल में साथ–साथ देख लेता है। नौकर घबरा जाता है। नौकर को घबराते देख रानी कहती है कि उसे घबराने की ज़रूरत नहीं है। वह कहती है, ‘‘मैं ऐसा खेल रचूँगी कि अपने देवर को देश निकाला दिलवाऊँगी, उस पर काला दाग लगाऊँगी। थोड़े ही दिन में भरतहरी के बारह बरस पूरे होने वाले है। तुम्हें डरने की ज़रूरत नहीं है।”

 

कुछ समय पश्चात भरतहरी की भक्ति के बारह बरस पूरे हो जाते हैं। भरतहरी की भक्ति से खुश हो भगवान शंकर उसे अमर फल देकर भेजते हैं। भरतहरी धारा नगरी में प्रवेश कर घोड़े को अस्तबल में बाँध कर महल में प्रवेश करता है। रानी नाराज़ दिखाई देती है। गुस्से में वह भरतहरी का हाथी दाँत का चुड़ला मोड़ देती है। भरतहरी उसकी नाराज़ग़ी का कारण पूछता है। वह रानी से कहता है, ‘‘हे रानी! अगर तम्हें ठोकर लगी हो तो पहाड़ों को इस नगर से दूर करवा दूँ। अगर पैरों में काँटा लगा हो तो बबूलों को डूँडा करवा दूँ। और अगर किसी ने तुम्हारे ऊपर उँगली उठाई हो तो तो मैं उसकी उँगली कटवा दूँ। तेरे दिल में जो भी बात है वह तू मुझे बता।” रानी ज़वाब देती है, ‘‘हे मेरे राजन! मुझे तुम्हारे भाई विक्रमादीत का राज पंसद नहीं आया। तुम चाहो तो अपने नौकर व दासियों से पूछ लो।” भरतहरी रानी की बात सुनकर विक्रमादीत को बुलाने के लिए भेज देता है। विक्रमादीत बड़े भाई के बारह बरस बाद घर लौटने की खबर सुन कर खुश होता हुआ महल में आता है।

 

विक्रमादीत के महल में प्रवेश करते ही भरतहरी क्रोध में उसके ज़ोर से सोटा लगा देता है और कहता है, ‘‘तुमने कैसा राज किया? मैं ऐसा राज संभला कर गया था क्या तुम्हें?” भाई के क्रोध को देख विक्रमादीत रोने लगता है। क्रोधित भरतहरी अपने भाई को छत के कड़े से उल्टा लटका देता है। नौकर भरतहरी को सलाह देता है कि वो विक्रमादीत को देश निकाला दे दे। भरतहरी उसकी बात मानते हुए अपने भाई को महल छोड़कर जाने का आदेश दे देता है। विक्रमादीत नगर को छोड़कर वहाँ से चला जाता है।

 

भरतहरी अपनी रानी पानदे को अमर फल खाने के लिए देता है। कहता है, ‘‘इसको खाने से तुम्हारी काया अमर हो जाएगी। यह भगवान शिव का दिया हुआ अमर फल है।” रानी विचार करती है कि अगर वह अमर फल खाएगी तो जीवन भर उसे भरतहरी के बोल सुनने पड़ेंगे। रानी अमर फल को अपने नौकर को दे देती है। अमर फल लेकर नौकर सोचता है कि वह उसे खाकर कब तक राजा के घोड़े की लीद झाड़ता रहेगा। नौकर अमर फल राजा के चरवरदार को दे देता है। चरवरदार भी उसे यह सोचकर नहीं खाता कि वह हमेशा के लिये राजा के घोड़ों को घास खिलाता रहेगा। वह दासी को दे देता है। दासी अमर फल लेकर सोचती है कि अगर वह उसे खा लेगी तो जन्म तक वह रानी के कपड़े ही धोती रहेगी। वह भी उसे नहीं खाती और गाँव के पुजारी को जाकर दे देती है। वह पुजारी से कहती है कि मंदिर को दान स्वरूप बावन गढ़ों का गढ़पति राजा भरतहरी उसे आधा राज देगा। लेकिन पुजारी भी उसे यही सोचकर नहीं खाता कि उसे मंदिर में हमेशा के लिये सुबह–शाम आरती ही करते रहनी पड़ेगी। वह कब तक लोहे की झालर बजाता रहेगा। पुजारी अमर फल को राजा भरतहरी को देने का विचार करता है। जिसके बदले में वह सोचता है कि भरतहरी उसे अच्छा दान और इनाम देगा। अमर फल घूमता फिरता राजा भरतहरी के पास आ जाता है। भरतहरी अमर फल को देखकर रानी से पूछता है कि उसका दिया हुआ अमर फल कहाँ है। रानी कहती है कि उसने तो उसे तभी खा लिया था। भरतहरी पुजारी को महल में बुलाता है और पूछता है कि उसके पास अमर फल कहाँ से आया। घबरा कर पुजारी बताता है कि उसे वह अमर फल दासी ने दिया था। राजा दासी से पूछता है तो दासी कहती है कि उसे अमर फल चरवरदार ने दिया था। इसी प्रकार चरवरदार बताता है कि उसे नौकर ने दिया था। नौकर भी सारा राज़ खोलते हुए रानी का नाम बता देता है। यह अब सच्चाई जानकर भरतहरी महल में दुखी होता है कि रानी ने उसे धोखा दिया और उसकी ग़लत बातों में आकर भाई विक्रमादीत को दण्डित कर महल से निकाल दिया। उसे अपनी ग़लती का पश्चाताप होता है।

 

उधर विक्रमादीत देश निकाला मिलने के बाद एक बनिये के यहाँ नौकरी कर लेता है। बनिये का एक ही बेटा होता है जो एक आँख से लाचार होता है। उसका रिश्ता एक बनिये की लड़की से तय कर दिया जाता है। लड़की का पिता लड़के वालों को संदेशा भिजवा देता है कि बारात में आँख से लाचार एक भी जना ना आये। इस समस्या का हल निकालने के लिए सेठ तरक़ीब निकालता है कि वह अपने बेटे की जगह विक्रमादीत के साथ लड़की के फेरे लगवा देगा और बाद में दुल्हन को अपने लड़के के साथ रख लेगा। विक्रमादीत को दूल्हा बना दिया जाता है और सेठ की लड़की के साथ उसके फेरे हो जाते हैं। सेठ की लड़की का नाम पिंगला होता है। विवाह के समय विक्रमादीत उसकी ओढ़नी के पल्ले पर लिख देता है कि वह फेरे तो राजा के कंवर विक्रमादीत के साथ खा रही है लेकिन बाद में उसे सेठ के एक आँख से लाचार लड़के के साथ रहना पड़ेगा।

 

सेठ शादी कर पिंगला को अपने घर ले आता है। वह नई दुल्हन को तो अपने लड़के के पास रख देता है और विक्रमादीत से पूर्व की भाँति काम करवाने लग जाता है। सेठ–सेठानी नई दुल्हन को देवी–देवता ढुकाने के लिए ले जाते है। विक्रमादीत के लिखे शब्दों को पिंगला पढ़ लेती है। और सेठ के लड़के के साथ देवी–देवता ढोकने से मना कर देती है। वह हठ पकड़ लेती है कि वह तो विक्रमादीत के साथ ही रहेगी जिसके साथ उसने फेरे खाए हैं। सेठ–सेठानी राजा के पास जाकर विक्रमादीत की शिकायत करते हैं। राजा के सैनिक विक्रमादीत को पकड़ने के लिए आते हैं और कैद कर राजा भरतहरी के सामने पेश करते हैं। भाई को देख भरतहरी रोने लगता है और अपने गले लगा लेता है। सैनिकों को आदेश देता है कि उसे कैद से आज़ाद कर दें। दोनों भाई महल में मिलते हैं। भरतहरी अपनी ग़लती की माफ़ी माँगता है। भरतहरी अपनी ग़लती का पश्चताप करते हुए रानी श्यामदे को कड़े से उल्टा लटकवा देता है और देश निकाला दे देता है। विक्रमादीत मना करता है, लेकिन वह उसकी एक नहीं मानता।

 

भरतहरी विक्रमादीत की कुशलक्षेम पूछता है कि वह देश निकाला देने के बाद कैसे रहा, बारह साल कहाँ व्यतीत किये। विक्रमादीत बताता है कि वह एक बनिये के यहाँ रहा था व सेठ की लड़की पिंगला से उसने ब्याह किया था। दोनों भाई गले लगते हैं। कुछ समय बाद भरतहरी भी सींगल शहर के राजा प्रक्षित की बेटी पिंगला से शादी कर लेता है। धारा नगरी का नाम बदल कर उज्जैन शहर रख देता है। राजा भरतहरी धर्मावतारी राजा के रूप में प्रसिद्धि पाता है।

 

उसी समय गुरू गोरखनाथ के साढ़े चौदह सौ चेले होते थे। सभी धूणों पर तो चेले तपते थे लेकिन एक धूणा खाली पड़ा रहता था। एक दिन चेले गोरखनाथ से पूछते हैं, ‘‘महाराज यह एक धूणा खाली क्यों पड़ा रहता है?” गोरखनाथ जवाब देता है कि इस धूणे पर राजा भरतहरी आकर तपेगा। वह उसी के लिए खाली पड़ा है। चेले फिर से पूछते हैं, ‘‘राजा भरतहरी तो बावन गढ़ों का गढ़पति है, वह क्यों आकर धूणा तपेगा?” गोरखनाथ अपने दो महात्मा चेलों को आदेश देता है कि वे जाकर भरतहरी के द्वार अलख जगाएं और दान में हीरामृग की खाल माँगें। गोरखनाथ का आदेश पाकर महात्मा ऐसा ही करते हैं। भरतहरी उन्हें हीरामृग की खाल लाकर देने के लिए तीन दिन का समय माँगता है।

 

उधर सत्तर हिरणियों का स्वामी उनका एक ही पति हीरामृग होता है। एक दिन हिरणियों ने विचार किया कि वे धर्मावतारी राजा भरतहरी के राज में चली जायें जहाँ वे काले माळ में चरेंगी और शिप्रा नदी के घाट पर पानी पियेंगी। वहाँ उनके पतिदेव हीरामृग को कोई नहीं मारेगा। उन्हें नहीं मालूम होता कि राजा भरतहरी तो हीरामृग का दुश्मन बन गया है। इधर राजा भरतहरी शिकार में जाने के लिए अपने घुड़साल से नौलखा घोड़ा निकालता है। राजा भरतहरी की पत्नी पिंगला को आगे–पीछे छह महीने की सारी बातें मालूम होती हैं, वह शिकार पर जाने से भरतहरी को मना करती है। लेकिन राजा भरतहरी नहीं मानता, वह पिंगला से कहता है कि वह शिकार खेलने जाने के लिय तन के पाँच कपड़े और उसका भाला दे दे। पिंगला कई बार भरतहरी से हाथ जोड़ कर निवेदन करती है कि वह अशुभ घड़ी को टाल दे। लेकिन भरतहरी जवाब देता है कि एक बार घोड़ी पर सवार होने के बाद वह वापस नीचे नहीं उतरेगा।

 

भरतहरी काले हिरण का शिकार करने के लिये अपने सैनिकों को लेकर तैयार हो जाता है। रास्ते में कई अपशकुन होते हैं—बांयीं ओर उल्लू बोलता दिखाई देता है, दायीं तरफ सियार के रोने की आवाज़ आती है और पिंगला के हाथ का हाथी दाँत का चूड़ा मुड़ जाता है। रानी पिंगला कहती है कि वह विधवा हो जाएगी। लेकिन इस सब को नज़रअंदाज़ करते हुए भरतहरी काले हीरामृग का शिकार करने के लिये वन में शिप्रा घाट पर पहुँच जाता है। दिन थोड़ा सा बाकी रह जाता है। राजा भरतहरी शिप्रा नदी के घाट पर तम्बू–डेरे डाल देता है। इतने में काला हिरण व सत्तर हिरणियाँ नदी के घाट पर पानी पीने आ जाती हैं। आधी हिरणियाँ पानी पीने लगती हैं बाकी की आधी राजा भरतहरी की ओर झाँकती हुई पूछती हैं कि हैं, ‘‘हे बावन गढ़ों के गढ़पति! आज तुम कैसे अपनी फौज लिये शिप्रा नदी के घाट पर खड़े हो? हमने तो तुम्हारा नाम बड़े धर्मावतारी राजा होने का सुना है, फिर इस फौज की ज़रूरत कैसे पड़ गई? कहीं तुम घर से नाराज हो कर तो नहीं आये हो यहाँ? क्या तुम अपने माँ–बाप या पत्नी से नाराज़ हो गए हो? ऐसा है तो तुम जिस तरह यहाँ आए हो उस ही तरह वापस उज्जैन शहर लौट जाओ।” हिरणियों का सवाल सुन कर राजा भरतहरी जवाब देता है, ‘‘हे हिरणियों, मैंने सुना है कि तुम सत्तर हिरणियों का स्वामी एक हीरामृग है। मैं उसका जिसका शिकार करने यहाँ आया हूँ।” भरतहरी की बात सुन हिरणियाँ स्तब्ध रह जाती हैं और इस का कारण पूछती हैं। वे कहती हैं, ‘‘हे राजा हमारे पति को क्यूँ मारते हो? उसके बिना हम सत्तर हिरणियाँ वन में विधवा डोलेंगी। अरे राजा काले हिरण को फँसाने के लिये किसने घोड़े की हरी घास डाली है? तू चाहे तो हमारे में से दो की जगह चार मार ले लेकिन हमारे भरतार को छोड़ दे।” राजा भरतहरी कहता है कि वह काले हिरण को मारे बिना नही लौटेगा। वे आखरी बार उसके दर्शन कर अपने दिल की बातें उससे कर लें। सुबह होते ही वह हीरामृग का शिकार करेगा। यह सुन कर हिरणियाँ इधर–उधर भागने–दौड़ने लगती हैं। हिरणियों को भागते देख हीरामृग उन्हें रोकता है। कहता है कि वे डर कर अपनी माता का दूध न लजायें। हीरामृग भरतहरी से कहता है, ‘‘जिस प्रकार तुम पिंगला के पति हो उसी प्रकार मैं भी सत्तर हिरणियों का पति हूँ। तेरे जैसे कोई साढ़े तीन सौ लोग मुझे मारने की पहले कोशिश कर चुके हैं। उनकी कोशिश व्यर्थ गई।” यह सुन कर राजा भरतहरी क्रोधित हो जाता है और घोड़े पर चढ़ हीरामृग को मारने के लिए अपना भाला फेंकता है। हीरामृग अपने को बचाते हुए लपक कर ज़मीन पर चिपक जाता है। भरतहरी घोड़े से गिर जाता है, उसके सभी अस्त्र–शस्त्र भी नीचे गिर जाते हैं। वह घोड़े को दोषी ठहराते हुए कहता है कि उसकी ग़लती की वजह से हीरामृग ज़िंदा बच गया। घोड़ा भरतहरी को राय देता है कि वह धरती माता के तीन ढोक लगाकर फिर से उसकी पीठ पर सवार हो जाए। वह उसे आकाश में ले उड़ेगा। भरतहरी घोड़े की बात मानते हुए ऐसा ही करता है, वापस घोड़े की पीठ पर सवार हो एक और भाला हीरामृग पर छोड़ देता है। भाला हीरामृग का सीना चीरता हुआ उसके प्राण ले लेता है। मरते हुए काला मृग राजा भरतहरी से वचन लेता है। पहला यह कि उसके चारों पाँव वह किसी कायर चोर को दे दे जो उसकी जान बचा लेंगे। दूसरा वचन यह माँगता है कि वह उसका कलेजा किसी बनिया सेठ को दे दे जो हमेशा उसे छाँव में ही रखेगा। उसके सींग किसी नाथ–जोगी को दे दे जिससे उसकी आवाज घर–घर में गूँजेगी। उसकी आँखें किसी चंचल नारी को दे दे जो हमेशा उन्हें परदे में रखेगी। और पाँचवा वचन यह मांगता है कि उसकी खाल बाबा गुरू गोरखनाथ को दे दे जिससे उसको मोक्ष की प्राप्ति होगी। राजा भरतहरी से ये वचन लेकर हीरामृग शिप्रा नदी किनारे अपने प्राण त्याग देता है।

 

भरतहरी मृत हीरामृग को घोड़े की पीठ पर लाद कर उज्जैन शहर की ओर लौट जाता है। रास्ते में सत्तर हिरणियाँ उसे चारों ओर से घेर लेती हैं। जैसे सावन भादों में बादल गरजते हैं उसी प्रकार हिरणियों की आखों से आँसू नही थमते। वे भरतहरी से कहने लगती हैं, ‘‘राजा! तुम हमारे दुश्मन निकले, हम सब को तुमने विधवा बना दिया है। हमारे जीवन में अँधेरा कर दिया है।” बदले में मृग भरतहरी को श्राप देता है कि वह भी अब अपनी पत्नी का साथ छोड़ जोगी बन जाएगा। उधर बाबा गुरू गोरखनाथ की धूणी भी थर्रा जाती है। हिरणियों को रोता छोड़ कर भरतहरी उज्जैन शहर की ओर चल देता है।

 

रास्ते में बाबा गोरखनाथ धूणा लगाए बैठा मिलता है। गोरखनाथ को देख भरतहरी सोचता है कि वह काले हिरण की इच्छानुसार उसकी खाल गोरखनाथ को भेंट करने से उसके पापों का बोझ कम हो जाएगा। भरतहरी के घोड़े पर मृत हिरण देख गोरखनाथ उसे डाँटते हुए कहता है, ‘‘ओ पापी! तू जंगल से यह क्या पाप कमा लाया? सत्तर हिरणियों के पति को मार कर तूने घोर पाप किया है!” भरतहरी जवाब देता है, ‘‘मैंने तो सिर्फ एक हिरण को ही मारा है लेकिन तुम ने तो जंगल के सैंकड़ौ हरे पेड़ों को धूणी के हवाले कर दिया है। क्या उसका पाप नहीं लगता? मैं तुम्हें असली जोगी तब मानूँ जब तुम मेरे द्वारा मारे गए हीरामृग को ज़िंदा कर दो।” भरतहरी की बात सुन गोरखनाथ उससे पूछता है कि अगर वह हीरामृग को ज़िंदा कर दे तो बदले में वह उसे क्या देगा। भरतहरी कहता है कि गोरखनाथ ने अगर ऐसा चमत्कार कर दिया तो वह उसका चेला बन जाएगा व ज़िंदगी भर उस घने जंगल में उसकी सेवा करेगा।

 

भरतहरी काले हिरण को घोड़े से उतार लेता है। गोरखनाथ ने जैसे ही नाद बजाया और अमृत जल के छींटे दिये वैसे ही हिरण ज़िंदा हो गया। बाबा गोरखनाथ का यह चमत्कार देख भरतहरी विचार करता है कि यह ज्ञान तो उसे भी सीखना है जिससे कि उज्जैन शहर में किसी को ऐसा ही कुछ हो जाए तो वह भी उसे ज़िंदा कर सके। भरतहरी गोरखनाथ के समक्ष अपनी इच्छा ज़ाहिर कर देता है और निवेदन करता है कि वह उसे जल्दी से अपना चेला बना लें। गोरखनाथ भरतहरी की पहली परीक्षा लेते हुए कहता है कि अगर वह अपनी रानी पिंगला को बहन कह कर भिक्षा ले आए तो वह उसे अपना चेला स्वीकार कर लेगा।

 

भरतहरी अपने नौलखे घोड़े और अस्त्र–शस्त्रों को जंगल में त्याग, भगवा कपड़े धारण कर लेता है। गले में माला पहने, नाद बजाते हुए वह भिक्षा माँगने के लिये निकल जाता है और पिंगला के पास आकर कहता है कि वह अब जोगी हो गया है। पिंगला को माता–बहन संबोधित करते हुए कहता है कि वह उसे भिक्षा दे दे, उसे तो अब बाबा गोरखनाथ के पास भगती करनी है। भरतहरी की ऐसी बात सुन कर पिंगला का दिल टूट जाता है और वह फूट–फूट कर रोने लगती है, पूछती है कि ऐसा उल्टा ज्ञान उसे किसने दे दिया है। अगर उसे ऐसा पहले से पता होता तो वह भरतहरी से कभी विवाह नहीं करती। वह कोसते हुए कहती है कि जिस नाई ने उसकी विवाह रस्म करवाई थी उसको काला नाग डसे और जिस ब्राह्मण ने कांकड़–डोरे बाँधे थे उस पर तेज बिजली गिरे। यह सोचते हुए कि अब आगे भविष्य में क्या होगा पिंगला ज़ोर–ज़ोर से विलाप करती है।

 

राजा भरतहरी कहता है कि वह तो अब धूणी पर तपने के लिये घने जंगल में जा कर अपना धूणा लगाएगा और जोगी बनेगा। वह पिंगला से कहता है कि वह विक्रमादीत को राज संभला देगा जो उसका खयाल रखेगा। लेकिन रानी इसके लिये राजी नहीं होती, कहती है कि वह उसे ग़लत बोल बोलेगा। भरतहरी कहता है कि ऐसा है तो वह अपनी बहन के पाँच पुत्रों में से किसी एक को राजा बना ले। पिंगला कहती है कि वह कब तक लोगों के बोल झेलेगी कि खुद का कोई पुत्र ना होने की वजह से पराये पुत्र को राजगद्दी पर बिठा दिया। पिंगला भरतहरी से निवेदन करती है कि वह उसे भी अपने साथ जोगनिया बना कर ले चले। उसके तो अभी दूध के दाँत भी नही गिरे हैं वह अपना बचा हुआ जीवन कैसे काटेगी। भरतहरी कहता है कि लोग उसके जोगी होने पर वहम करेंगे और उसे कभी जोगी नहीं मानेंगे। भरतहरी पिंगला से अंतिम विदा लेते हुए जब आगे बढ़ने लगता है तो पिंगला पूछती है कि आज का गया वह कब वापस लौटेगा। भरतहरी कहता है, ‘‘जवानी और माया मेहमान की तरह है, इसे जाते देर नहीं लगती, और जो विधाता ने लेख लिख दिये हैं उसे कोई नहीं टाल सकता।” पिंगला कहती है कि उसके बिना महल सूना हो जाएगा, उज्जैन नगर फीका लगने लगेगा, उस पर कौवै बैठेंगे। उसका श्रृगाल उसे ही खाने दौड़ेगा। रानी पिंगला भरतहरी को बहुत समझाती है, कई निवेदन करती है, लेकिन भरतहरी जोगी बनने के अपने निर्णय पर अडिग रहता है। आखिर में वह भरतहरी को भिक्षा दे देती है। भरतहरी वहाँ से चल देता है। पीछे से पिंगला विलाप करती हुई रह जाती है।

 

राजा भरतहरी कानों में मंदरा पहने, गले में सेली और हाथ में सुमरण नाद ले गुरू गोरखनाथ के पास जंगल में आ जाता है। गुरू के चरणों में सिर झुका वह आशीर्वाद पाता है कि उसका नाम हमेशा के लिये अमर हो जाएगा। संसार उसका नाम ले कर गाता रहेगा, बजाता रहेगा और उसकी कथा सुनाता रहेगा। राजा भरतहरी जोगी बन छह महीने तक कुछ नहीं खाता। उसके सत की वजह से एक दिन गोरखनाथ का सिंहासन काँप उठता है। गोरखनाथ उसकी तपस्या से खुश हो कर उसे वरदान देता है कि वह अब जोगी बन खूब तपस्या करे, दुनिया में घूमे, सद्मार्ग पर चले व माता–बहन कह कर भिक्षा माँगे।

 

राजा भरतहरी रमते–रमते अलवर नगर के बाज़ार में आ जाता है। वहाँ बारह साल तक एक प्रजापत के घर रहता है। बारह साल में जब एक दिन बाकी रह जाता है तो रमते–रमते वह एक गूजरी के यहाँ आकर अलख जगाता है और अपना नाद बजाता है। भिक्षा में एक कटोरा दूध पिलाने के लिये कहता है। गूजरी जवाब देती है कि उसका घर चलते रास्ते के पास है, वहाँ लाखों लोग आते–जाते रहते हैं। इस तरह वह किस–किस को दूध पिलाएगी। उसके पास दूध तो नहीं है लेकिन दो दिन पहले की छाछ ज़रूर पड़ी है जिसे वह जितना चाहे पी सकता है। दूध तो वह अपने हाली को ही देगी जो दिन रात उसके खेतों पर काम करता है। भरतहरी गूजरी से नाराज़ होकर आगे चल देता है और गूलर के पेड़ के नीचे आ कर धूणी लगा लेता है। अपने झोली–झण्डे पेड़ पर टाँग देता है। नाराज़ भरतहरी भैरू को बुला कर गूजरी की गायों को चमका देता है जो खूँटे तोड़ कर पहाड़ी में चली जाती हैं। गूजरी की गायें–भैसों के थनों में कीलें पड़ जाते हैं। वे खल–काँकड़े खाना छोड़ देती हैं। उसके बैल भी खाना खाना छोड़ देते हैं। गूजरी को अपनी ग़लती का एहसास होता है और वह भरतहरी को ढूँढने जंगल की ओर निकल जाती है। तेज बारिश में भीजती गूजरी भरतहरी को चारों तरफ ढूँढती फिरती है। रास्ते में उसे ग्वाले मिलते हैं जिनसे वह भरतहरी का ठिकाना पूछती है। आखिर में गूजरी भरतहरी को ढूँढ लेती है और उसके चरणों में ढोक लगाती हुई अपनी ग़लती के लिये क्षमा माँगती है। और वचन देती है कि वह हर भादवा की छठ–साते को उसका मेला भरवाएगी व अष्टमी के दिन रसोई कर भोग लगाएगी। यह परम्परा आज भी जारी है। अलवर में गूजरी के परिवार के लोग ही भरतहरी का जागरण करवाते हैं और उन्हीं का सबसे पहले भोग लगता है।

 

भरतहरी कथा खत्म होने के बाद भैरू जी व अन्य देवी–देवताओं की आरती गाई जाती है व घी का होम किया जाता है। अन्त में परसाद बाँटा जाता है। आए हुए जोगियों को भेंट सामग्री व रूपये देकर रवाना किया जाता है। यह सब होते–होते सूर्योदय हो जाता है और लोग अपने घर लौट जाते हैं।

 

Bharthari-ki-Katha Sung by the Jogi of Eastern Rajasthan

 

 

Original text written in Hindi by: Dr Madan Meena

Translated by: Dr Shubhra Joshi

 

Like any folktale which starts with the singing of praises upon gods and goddesses (mostly Ganesha), the tale of Raja Bharthari too begins by praising the goddess Durga. These tales are present both in prose and poetic form, and are sung by the lead singer known as Media. He is invited by the patrons, mostly from the surrounding villages. They are provided with the travelling expenses, a certain amount is also allotted for the performance.

 

Bharthari-ki-Katha expresses the values of love, sacrifice, advocacy, spirituality and dutifulness in a person. In the ballad, the king marries off his daughter to the foal that belonged to the potter because of his promise. Later King Bharthari becomes a disciple of Baba Gorakhnath, obeys his order of killing a blackbuck and brings its hide for him, later becoming a Jogi and leaving his empire to his younger brother Vikramaditya. The tale portrays various aspects of human life full of exciting emotions. The Bharthari tale can be divided into three parts but it is sung in a way gives it the feel of a unified story completed in a single night. Once the tale is sung, gods and goddesses are worshipped, followed by distribution of bhog and prasad­.

 

The tale of Bharthari

 

This tale belongs to a time when the celestial nymphs of King Indra danced on earth and fragrant plants beautified the land. Indra asked his son Gandharavsen to be born as a foal on earth and hence he was born in Lakha, the potter’s house.

 

In a few days the foal matured and cried every night to Lakha asking him to get him married to King Pepsingh’s daughter, Paan-de. This daily request worried Lakha as he could not go to the King to ask him to marry off the princess to his foal. This could have proved fatal so he decided to leave the village instead. He asked his wife to pack their belongings and load them all on the donkeys. As he left the village, people started questioning his decision and asked him to stay because he was the only potter in the village from whom everyone bought their household utensils. They said that if he did not stay back, they would go with him too, as it was impossible to live without a potter in the village. After the intervention of the panch-patel (community leaders), Lakha agreed, but on the condition that they had to spend a night in his home before returning. The villagers and the patels had no choice but to agree.

 

As the night grew, the foal again cried out to Lakha to get him married to the princess. Listening to this, the patels and villagers also decided to leave the village with Lakha as they also could not go to the King and ask him to get his daughter married to a foal. When King Pepsingh came to know that the villagers were leaving, he came on his horse preventing them from leaving and asked them the reason behind such a decision. He reasoned that a king is nothing without the people he rules. So the villagers said that Lakha would explain. Lakha told the king that if he was ready to spend a night at his home, he himself would know the reason for their leaving the village. The king spent the night and heard the foal cry. He was shocked to listen to the demand for his daughter. To prevent the match he told the foal that if he was able to make the fort’s boundary out of brass and copper in one night, he would let his daughter marry him.

 

King Pepsingh then left for his palace, but both Lakha and the foal were nervous about the deal that the king had made. The foal asked Lakha to load him on one side with black sand and on the other with yellow sand and to take him round the fort. Lakha had no other option but to accept the foal’s demand. To his surprise, the boundary wall of the village was converted into brass and copper. This came as a shock for Pepsingh who heard the news in the morning. He then asked the queen to arrange for the marriage of their daughter with the foal as he had given his word to him. He decided that the princess should stay with the foal in the palace. The king asked his barber to carry lagna (invitation) to Lakha’s house for the marriage of the princess and the foal. Lakha called out to everyone to see the lagna. He did all the arrangements to form the marriage procession and kept everything quiet and simple. The groom foal was excited and was distributing money to those who were dancing in his procession. When the procession reached the palace, ladies sang at the toran (welcome entrance), welcoming the groom, and the queen herself welcomed the groom. The knot was tied and marriage ceremonies were conducted following the Hindu rituals. The guests went back leaving the bride and groom in the palace.

 

The newly-weds were given a separate portion in the talghar (basement) of the palace to reside. To the princess’ surprise, the foal became Gandharvasen (human-being) at night, and in the morning he turned back into a donkey. After some time Paan-de delivered four babies at short intervals, the oldest was Bharthari, next to him was Vikramaditya, followed by a sister Menawanti and the youngest was Salimadit. All of them were happy together.

 

One day the queen was thinking of her daughter and to check on how she was doing, she sent her maids to find out about Paan-de and her whereabouts. The maids saw that Paan-de was reading a book and her four children were happily playing. Paan-de told the maids to go back and inform the queen that even though they made her marry a donkey, she is a mother of four human children. In the evening the donkey came back home after grazing and at night he turned into Gandharvasen and hung the donkey’s hide on the hanger. When the queen came to know about this, she immediately instructed the maids to burn the hide so that only the human form of Gandharvasen stayed with her daughter. As soon as his hide was set on fire, Gandharvasen could not bear the heat as his body was burning and he asked Paan-de to escape to the jungle with their four children. He promised that he would take revenge on those who did this to him. He set the palace on fire.

 

Paan-de and her four children ran into the jungle to save their lives. They were without any food. As she couldn’t breastfeed, Salimadit became very weak and was dying of hunger. They saw a tiger and tigress coming towards them. Finding themselves in danger, Bharthari suggested that the mother should abandon the dying Salimadit for the tigers and leave for a safer place. She left Salimadit under a Narsal tree and went to a mound called Dhoba-pyaad. Reaching there, Vikramaditya and Bharthari decided to take turns to conduct a night-watch. First was Vikramaditya’s turn. Near the baoli (step-well) lived a pair of skylarks in a banyan tree. A black snake also lived there. He overheard them saying that if anyone killed them and ate the male skylark, the person would become the king of the Dhara kingdom, and the one who could eat the female skylark would receive one gold coin every day.

 

Vikramaditya thought to himself that if he was able to kill them and if Bharthari ate the male skylark he would become the king of the Dhara kingdom. And if he himself ate the female skylark, he would receive a gold coin daily. He killed them both, woke Bharthari up and told him everything. Bharthari ate the male skylark and Vikramaditya ate the female. It was now midnight and Bharthari’s turn to stand guard, as Vikrmaditya slept. While he was asleep, the black snake came out of the tree and bit Vikramaditya. He died in his sleep and ants crawled all over his face.

 

In the morning when Paan-de discovered this, she started crying at the loss of her second son. Bharthari wanted to make arrangements for the rituals of his dead brother and went across the forest to the kingdom of Dhara, but he found the gates of the kingdom closed. The kingdom was without a king. Previously, all the kings had been devoured by the devil and the goddess Kamakhya. Finding Bharthari, people of the kingdom pleaded him to become the king of Dhara, to which he agreed. In the process, he forgot all about his mother, sister and dead brother. He spread fragrant flowers around his seat to welcome and to impress the devil and the goddess. Both were pleased by this gesture and gave him a boon that only he could become the king, fearlessly. Meanwhile in the forest Paan-de, with her daughter was in tears and waiting for Bharthari to return. Seeing her pain Lord Shiva appeared to ask about her trouble. He played his Naad and the black snake which had bitten Vikramaditya came down from the tree and sucked out all the poison from his body. Lord Shiva then sprinkled holy water from the Ganges and brought him back to life.

 

Meanwhile in the kingdom of Dhara, one night some dacoits took away the cows. The people of the kingdom pleaded the King to help them to get their cows back. King Bharthari went on his horse to the place where the dacoits had camped and threatened them to return the cows, but their leader Ganpat Singh threatened him in return. A battle ensued between the dacoits and King Bharthari, in which the dacoits lost and Bharthari was able to rescue the cows and even married the daughter of Ganpat Singh, Shyam-de. When he brought Shyam-de to his palace she asked him how he stayed alone in such a huge palace. If only he had a younger brother and sister, she would have loved them as her own. She continued that if she would have had a mother-in-law, she would have massaged her legs. Suddenly, he remembered his mother and the incident of the snake and how he had left them behind to get the khappan (piece of white cloth) for the last rites. He went back to the same place in the forest where he had left them and on finding his family, took them back to his kingdom.

 

As time passed, Bharthari remembered his vow made to Lord Shiva while rescuing the cows from the dacoits. He had promised to worship him for twelve years if he succeeded in the mission and so he left the palace and handed over the responsibility of the kingdom to Vikramaditya. Bharathari’s reign was so peaceful that a tiger and a goat drank water from the same pond without any fear. He asked Vikramaditya to manage the kingdom in a similar manner, and left for the jungle.

 

After Bharthari left for his penance of twelve years, his queen Shyam-de, overcome by physical desire, asked her maids to call for the male servant in the pretext that there was a black snake in her room. Then she forced him into a relationship. One day they were caught in the palace by Vikramaditya. The servant got worried for his life but Shyam-de reassured him and planned to teach a lesson to Vikramaditya.

 

Finally Bharthari’s twelve years’ penance was over. Shyam-de was unhappy seeing Bharthari in the palace. Bharthari too noticed that his wife looked upset, and in her anger she twisted her ivory band. He asked, 'Oh my queen! If you’ve been hit I shall remove mountains from here. If a thorn pricked you, I shall trim the bamboo trees. And if someone has pointed a finger at you I shall cut his finger. Tell me what happened?' She started complaining saying, 'I am not happy with Vikramaditya’s rule. He had ill-governance and management. If you want to know the truth, then ask the maids and the servants.'

 

After listening to his queen, Bharthari called for Vikramaditya who came running, excited to meet his brother after twelve years. As soon as he entered the palace Bharthari hit him hard and reprimanded him 'Did I leave behind such kind of a kingdom? What kind of rule was yours?' Vikramaditya started crying seeing his brother angry. Bharthari hung his brother from the ceiling hook. Taking advantage of the situation, the servant suggested that Vikramaditya should be thrown out of the palace. Bharthari agreed and Vikramaditya was thrown out.

 

One day Bharthari gave the immortal fruit to his queen saying, 'This is an immortal fruit given to me by Shiva as a blessing for my penance. You should eat this and you shall remain young and beautiful always.' She realized that by eating it she would have to always abide by Bharthari, so she gave the fruit to her servant. The servant thought that by eating it he would have to be in the service of the king forever. He gave it to the charvardar (one who grazes horses). The charvardar too did not have it thinking that he would have to keep feeding grass to the horses all his life. So he passed it to the maid, who again refused to have it as she did not wish to work as a maid all her life. She took it to the temple priest telling him that king Bharthari would give him half of the villages of the fifty-two garh (states) if he ate it. But even he didn’t eat it knowing he would have to conduct rituals at the temple all his life and keep banging the iron bells forever. So he thought of giving the fruit to King Bharthari. When the king saw the immortal fruit coming back to him he went and asked Shyam-de about it. She lied saying that she had eaten it herself. Bharthari called the priest and asked from where he had got the fruit. The temple priest got scared and said that the maid had given it to him. The maid said the charvardar, who said that it was the servant, and the servant in turn revealed the truth about the queen to the king. Listening to the truth he felt sad for his brother and repented his mistake.

 

After leaving the palace Vikramaditya started working at a bania’s (trader) home. The bania had a son with impaired vision and his marriage was finalised with the daughter of another bania. The parents of the bride demanded that nobody in the groom’s procession and gathering with an eye problem could be present. The father of the groom decided to let Vikramaditya conduct all the marriage rituals, but to see to it that later the girl should remain with his son and not with Vikramaditya.

 

During the marriage rituals, Vikramaditya wrote on the odhni (shoulder cloth) of the bride that even though she was getting married to the prince Vikramaditya, she would be given away to the bania’s son who was visually impaired. The bride’s name was Pingla. After marriage, the groom’s parents sent Vikramaditya to do his routine chores, they took the bride and groom to seek blessings from the gods and goddesses but Pingla refused to do so. Pingla had read what Vikramaditya had written and she said that she would only seek blessings when she was with the man with whom she got married and also that she would only stay with him.

 

The parents of the groom complained about Vikramaditya and the king ordered his soldiers to bring him to the palace. When the King’s men brought Vikramaditya in front of Bharthari, he was overwhelmed with emotions and realizing his fault, ordered that he should be released immediately. He asked for forgiveness from Vikramaditya and ordered Shyam-de to be hung from the ceiling. He threw her out from the palace for deceiving him. Vikramaditya pleaded forgiveness for her but in vain. Bharthari did not agree and she was banished.

 

Bharthari asked Vikramaditya of his whereabouts for the last twelve years. Vikramaditya said that he was at the bania’s house and that they made him marry Pingla. Both the brothers hugged each other. After sometime, Bharthari also got married to Pingla, daughter of Raja Prakshit of Singal town. The Dhara kingdom was eventually renamed Ujjain.

 

There were one thousand, four hundred and fifty disciples of the guru Gorakhnath. Except one, all the places at the dhoona (fire place) were occupied by his disciples. One day his disciple asked him, 'Why is this one vacant?' Gorakhnath replied, 'Because this one is for Bharthari.' The disciple said, 'Why would Bharthari come here for penance? He is a king of fifty two forts!' Gorakhnath asked his two disciples to go to Bharthari asking him to fetch the skin of a deer named Heera, and he was given three days to bring it.

                                         

Heera was the Lord of 70 female deer, who thought of moving to the kingdom of King Bharthari, considering it to be safer for them and their Lord. They would have grass to graze and the Kshipra River to quench their thirst. What they weren’t aware of was that now the saviour King Bharthari was after Heera’s life. Bharthari asked for his best horse for the hunt. Bharthari’s wife requested him not to go for the game. She had the gift of premonition and knew about events about to occur six months in advance. Bharthari asked her to prepare for him five sets of clothes and to give him his spear. She kept on requesting him not to go but he said that once he had mounted the horse he wouldn’t get off before completing his task.

 

On his way to the hunt, the King came across many bad omens such as hearing the hoot of an owl on his right, the howling of a jackal on his left. The ivory bangle on the wrist of Bharthari’s queen broke too. She said to the King, 'I shall become a widow.' But Bharthari didn’t pay any heed and reached the bank of the river Kshipra. In a few hours, the day would be over and so the king decided to camp near the river bank.

 

To their amazement the seventy deer with Heera came there to have water. Half went to have water and the rest went to the king to ask about the reason for his visit to the forest with his soldiers. The deer said, 'Oh! You are the Lord of fifty forts. Why are you here with your troops? Did you fight at home? Did you leave home in anger and was there a tiff between you and your parents or wife? If so then you must go back to your palace.'

 

Bharathari replied 'I have heard that amongst seventy of you, there is one blackbuck. I am here to kill him for his hide.' The deer were dumbfounded at Bharthari’s words. They said 'Oh King! Why do you want to kill our husband? We shall become widows and roam the jungle without him. Instead you can kill one or two of us but do not kill our Lord.' Bharthari said 'I shall not leave without hunting the blackbuck.’' He added that if they wanted to talk to their husband one last time they might do so but in the morning he would hunt Heera.

 

The deer became anxious and started running in panic but Heera calmed them by saying, 'Do not run like this and make your mother’s milk ashamed.' He said to Bharthari 'Like you have a wife, these are my wives. I am not scared as the previous three hundred and fifty attempts to kill me have failed. This time too I would save myself.' Severely angry, Bharthari mounted his horse and aimed his spear at the blackbuck but Heera camouflaged himself by flattening himself on the ground. Bharthari fell from his horse and all his weapons too fell down. He blamed his horse. The horse advised him to worship the earth by touching it three times and then it would launch to kill the deer. Bharthari followed the instructions and then mounted his horse. Once again, he aimed at Heera and this time it went piercing right through his chest. While dying, Heera asked for a promise from Bharthari, 'Donate my four legs to a thief, they might help save his life; give my heart to a baniya who shall always keep it in the shade; give my horns to a Nath Jogi so that my sound can travel far; give my eyes to a lady who shall keep them in purdah (cover) and give my skin to guru Gorakhnath to meditate upon.' He asked Bharthari to fulfill his wishes and died on the banks of the river Kshipra.

 

Bharthari was carrying the dead deer on his horse back to Ujjain. On his way he was surrounded by the seventy female deer who had lost their husband. They were crying unstoppably and cursed the king saying that now he too would never be able to go back to his wife and would spend his life as a Jogi. Bharthari left the mourning deer and moved towards Ujjain. On his way, he met Baba Gorakhnath with his dhooni. The King thought of giving the skin to the Baba to lessen his guilt but on seeing him the Baba got angry and said 'You have committed a sin by killing the animal.' Bharathari replied, 'Even you are sinning by cutting so many trees for your dhooni. I shall only believe you, if you have powers to bring this deer back to life.' Goraknath replied, 'If I bring the deer to life what will you give me in return?' Bharathari said he would become his disciple and serve him forever.

 

Bharthari lowered the dead deer to the ground and Gorakhnath, playing his drum sprinkled holy water, brought the deer back to life. Bharthari wanted to learn this magical power from Gorakhnath so that he might help anyone in trouble in Ujjain. He requested the Baba to take him as his disciple. As his first test, the Baba asked him to get some alms from his wife addressing her as his sister.

 

Bharthari left his horse, clothes and weapons in the forest and changed his attire into that of a Jogi clad in saffron clothes. He wore a necklace and playing a drum went to his wife. He started calling her ‘Sister,’ saying, 'I have to do bhagati (service) of Baba Gorakhnath, you should give me some alms as charity.' Hearing his words, she started mourning and crying, 'If I knew that you would do this I would never have married you! What will become of me now?' She started cursing the barber who carried out the marriage rituals, 'May he be bitten by the black snake and the Brahmin who tied the knot should be hit by a thunder bolt!'

 

Bharthari said he was going to do penance and have his own dhooni there. He assured her that Vikramaditya would manage the kingdom and would also take care of her needs. She disagreed, 'He will keep taunting me.' At this, Bharthari replied, 'Then you may choose amongst the five sons of your sisters to be the king.' She objected again, 'People will taunt me about not having my own son.' She pleaded with Bharthari, 'Take me too and let me become the joganiya.' Bharthari refused saying that everyone would doubt his intentions. He bade farewell to his queen. Finally she asked him, 'When will I be able to see you again?' King Bharthari replied, 'Adolescence and wealth are like guests, they don’t stay for long and what is written in the destiny, cannot be avoided.'

 

The queen kept begging and pleading with him not to go and that Ujjain would be deserted in his absence, that the colours and jewelleries would lost their lustre, that everything would become lifeless and only crows would reside there. But Bharthari had made up his mind to leave and become a Jogi. He wore mandra in his ears, put on seli on his neck and playing his sumaran drum went to Baba Gorakhnath. He bowed to his guru and asked for his blessings. Gorakhnath blessed him saying that his name would be immortal and people would sing his glories forever.

 

For six months Bharthari did not have food. His hard penance even made the dhooni of Gorakhnath tremble. Gorakhnath told him that he could now wander to places as a Jogi and carry the message of good deeds for people. He should envision women as his sisters and mothers and should live on the charity given to him by people.

 

Later he went to Alwar and stayed there for twelve years in the home of a potter. When only a day was left for the completion of his twelve years of penance, Jogi Bharthari reached a Gujari’s (herder) place and asked for a bowl of milk. The Gujari said, 'I cannot keep feeding people who come to my door every day! As it is my home is placed such that people keep coming here to ask for a bowl of milk. I have two-day old butter-milk. If you want to have it, you may have as much as you want. I will give milk only to my servant who works in the field.'

 

King Bharthari went away and sat across from her home under a Goolar tree and started his dhooni by hanging his bag and flags on the tree. Angered, Bharthari called Bhairu who scared Gujari’s cows away. They broke away and ran towards the mountains, the udders of the cows and buffalos were affected. Even the bulls stopped eating. Gujari realized her mistake and rushed out in search of Bharthari. It was raining heavily and she kept asking people about him. Having found him, he asked for forgiveness. She vowed that in the month of Bhadwa on the sixth and seventh day, she would organize a fair and on the eighth day she would arrange a feast for people in his honour. In Alwar, it is still celebrated by the descendants of the Gujari.

 

After the Bharthari-ki-Katha is completed, the gods and goddesses are invoked and sweets are distributed to people as prasad. The Jogi who sang the tale are given gifts and tokens. By this time the sun rises and the jagaran gets over.