प्रभात कुमार सिंह

प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व में स्नातकोत्तर
पुरातत्व, इतिहास एवं साहित्य में रूचि एवं अनेक लेख और पुस्तके प्रकाशित

छत्तीसगढ़ राज्य के उत्तर-पूर्व में स्थित इस जिले की पूर्वी सीमा ओड़िशा राज्य से जुड़ी हुई है। इस राज्य में चित्रित शैलाश्रयों (rock shelters) की खोज करने की शुरूआत सन् 1910 में इसी जिले से हुई। तब से वर्तमान तक, एक सदी में ही विभिन्न अध्येताओं एवं पुरातत्वविदों द्वारा सबसे अधिक चित्रित शैलाश्रय स्थल इसी क्षेत्र से प्रतिवेदित (report) किये गये हैं।

 

रायगढ़ जिले के मानचित्र में चित्रित शैलाश्रय स्थल

रायगढ़ जिले के मानचित्र में चित्रित शैलाश्रय स्थल

 

यहाँ के कतिपय शैलाश्रय (सिंघनपुर, कबरा पहाड़ और करमागढ़) विशिष्ट चित्रांकन शैली और प्राचीनता की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इनके साथ ही जिले के अन्य चित्रित शैलाश्रयों खैरपुर, बसनाझर, सोनबरसा, भैंसगढ़ी, सोंटीघाट, बोतल्दा, नवागढ़ी, सोखामुड़ा, पोटिया, ओंगना, सिरोली-डोंगरी और गोमर्ड़ा के चित्रित शैलाश्रयों से ज्ञात होता है कि यह अँचल प्रागैतिहासिक मानव का न केवल पसंदीदा प्रवास था वरन् आदिम चित्रकला का प्रयोगधर्मी केन्द्र भी, और यह क्रम सदियों तक चलता रहा। इनमें से कुछ का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-

 

सिंघनपुर के शैलचित्र

सिंघनपुर के शैलचित्र. Courtesy: Rohit Rajak

 

सिंघनपुर (तहसील रायगढ़)

बंगाल-रायपुर रेलवे के अधिकारी सी.डब्ल्यू. एण्डरसन ने 1910 में इस स्थल की खोज की थी। इसकी गिनती छत्तीसगढ़ के प्राचीनतम शैलाश्रयों में होती है। यहाँ छोटी-बड़ी चार गुफाएँ हैं लेकिन शैलचित्र कम ही बचे हैं। अधिकांश चित्र चमगादड़ों की विष्ठा, जगह-जगह बने मधुमक्खियों के छत्तों और बारिश के पानी के रिसाव के कारण धूमिल, अस्पष्ट अथवा विनष्ट हो गये हैं। दक्षिणाभिमुखी (south facing) गुफा सबसे गहरी है जिसमें सीढ़ीदार मानवाकृति, नाचते हुये मानव, मछली, सांप और जटिल रेखानुकृतियों आदि का अँकन पाया गया है।

 

कबरा पहाड़ के शैलचित्र

कबरा पहाड़ के शैलचित्र. Courtesy: Rohit Rajak

 

कबरा पहाड़ (तहसील रायगढ़)

कबरा पहाड़ दूसरा महत्वपूर्ण चित्रित शैलाश्रय है, जो रायगढ़ के पूरब में 15 किमी की दूरी पर ओडिशा की सीमा से लगा हुआ है। इसे श्री अमरनाथ दत्ता द्वारा सन् 1931 में प्रकाश में लाया गया था। इस शैलाश्रय में जटिल रेखांकन के साथ ही 36 आरियों वाला पहिया, लकड़बग्घा, हिरण, सेही, नीलगाय, बारहसिंगा, कछुवा, मछली, केंचुवा, मोर, गोह, तितली, मकड़ी और नाचते हुए मानवपंक्ति तथा ताड़ वृक्ष का अँकन, लाल और भूरे रंग में प्राप्त हुये हैं।

 

उषाकोठी के शैलचित्र

बसनाझर के शैलचित्र. बैल, गेंडा, बन्दर, जंगली सुअर, हिरण . Courtesy: Rohit Rajak

 

करमागढ़़ (तहसील रायगढ़)

उषाकोठी नाम से ज्ञात इस शैलाश्रय में चित्रों की सघनता उल्लेखनीय है। करमागढ़ गाँव के निकट जंगल से घिरे पहाड़ी पर स्थित इस शैलाश्रय को धातु की जालियों से घेरकर सुरक्षित किया गया है, जिससे चित्र बहुत सुरक्षित अवस्था में हैं। चित्रों में अधिकतर रेखांकन युक्त जटिल आकृतियाँ हैं, जिनमें वृक्ष, कमल व अन्य फूल, धान और गेहूं के पौधों के तने एवं पत्तियों को पहचाना जा सकता है। इसके साथ ही हाथ उठाये मानवाकृतियाँ, गोह, हाथी, बारहसिंगा, सांप का जोड़ा, कछुवा, मछली, मेंढ़क, मोरनी आदि का अँकन भी पाया गया है। इनमें रेखांकनों द्वारा संयोजित अधिकांश चित्रों की बाहरी रूपरेखा लाल रंग से निर्मित है जबकि अँदरूनी हिस्से में सफेद रंग का प्रयोग हुआ है। चित्रों को बनाने में लाल और सफेद रंग का अधिक तथा कहीं-कहीं पीले रंग का भी उपयोग किया गया है।

 

खैरपुर (तहसील रायगढ़)

खैरपुर शैलाश्रय, रायगढ़ के उत्तर में लगभग 12 किमी की दूरी पर टीपाखोल जलाशय के निकट है। इस छोटी गुफा में वस्त्रावरण सहित मानव मुख, नाक, कान, आँख के अलावा पक्षियों के चित्र प्राप्त हुए हैं। 

 

बसनाझर (तहसील खरसिया)

बम्हनीन पहाड़ी में स्थित बसनाझर चित्रित शैलाश्रय में भी सघन चित्र हैं, जिसमें बहुतायत जंगली जानवरों की ही है। दौड़ता हुआ हिरण, बारहसिंगा, गोह, मोर, भालू के साथ ही धनुष पकड़े, नृत्य करते और घुड़सवारी करते मानव के चित्र भी हैं।

 

सोंटीघाट के शैलचित्र

सोंटीघाट के शैलचित्र. घोड़े पर सवार योद्धा . Courtesy: Rohit Rajak.

 

सोनबरसा (तहसील खरसिया)

जलवायविक कारणों से अस्पष्ट हो रहे यहाँ के चित्रों में जटिल तिर्यक रेखांकन, हाथ उठाये मानव पंक्ति, भालू, हाथी आदि को पहचाना जा सकता है। आसपास के जगलों में आज भी भालू पाये जाते हैं। 

 

सोंटीघाट के शैलचित्र

सोंटीघाट के शैलचित्र. बैल. Courtesy: Rohit Rajak

 

भैंसगढ़ी (तहसील रायगढ़)

बेनीपाट नाम से ज्ञात इस शैलाश्रय में कुछ ज्यामितीय आकृतियाँ ही शेष हैं। मनुष्य अथवा पशु-पक्षियों का अँकन नहीं है। लाल, सफेद और पीले रंग निर्मित त्रिशूल, स्वास्तिक, ताराकृति, हथेली के आधुनिक चित्र भी विद्यमान हैं, जो हाल ही में बनाये गये हैं। एक कोने में पत्थर की देवी मूर्ति रखी है, जिस पर यहाँ आने वाले कुछ अवश्य चढ़ाते हैं। यह एक स्थानीय धार्मिक पर्यटन स्थल बन चुका है। आसपास और भी गुफाएँ हैं जिनमें चित्र नहीं हैं।

 

सोंटीघाट (तहसील खरसिया)

यह शैलाश्रय भालूमाड़ा (भालू की गुफा) कहलाता है। इसमें रेखाओं के संयोजन से बने मानव और पशु की छोटी आकृतियों के साथ ही वक्र रेखाओं का अँकन है।

 

सोखामुड़ा के शैलचित्र
Image: 

सोखामुड़ा के शैलचित्र. हाँथ का छाप . Courtesy: Rohit Rajak

 

बोतल्दा (तहसील खरसिया)

इस शैलाश्रय का नाम लेखापोड़ा है। यहाँ के चित्र बहुत परवर्ती काल के हैं और गुफा में फैले नारियल बुच, अगरबत्ती के खाली पैकेट से अनुमान होता है कि स्थानीय लोग यहाँ विशेष अवसरों पर पूजा करते हैं। तलवारधारी घुड़सवार, एक ओर मुखवाद्य और दूसरी ओर ढोल बजाते पुरूष और बीच में नाचती हुई महिलाओं का समूह आदि अँकन यहाँ देखा जा सकता है।

 

नवागढ़ी (तहसील घरघोड़ा)

यह घरघोड़ा तहसील में अब तक ज्ञात एकमात्र शैलाश्रय है, जहाँ गहरे भूरे रंग से एक बड़ी हथेली और कुछ अस्पष्ट मानव या पशु आकृतियों के अलावा दोहरे वृत्त के भीतर एक-दूसरे को समकोण पर काटती खड़ी और आड़ी रेखाओं के अँकन युक्त चित्र बने हैं।

 

पोटिया के शैलचित्र

पोटिया के शैलचित्र. Courtesy: Rohit Rajak

 

सोखामुड़ा (तहसील धरमजयगढ़)

पंचभैया पहाड़ी में स्थित यह शैलाश्रय हांथा कहलाता है। संभवतः यहाँ के शैलचित्रों में केवल हथेली का अँकन होने कारण इसका यह नाम पड़ा हो। हथेली के चित्र और स्टेंसिल दोनों प्रकार पाये गये हैं। इसके साथ ही बहुत संख्या में कप मार्क्स[1] और प्रस्तर उपकरणों के अवशिष्ट भी आसपास उपलब्ध हैं।

 

पोटिया (तहसील धरमजयगढ़)

यहाँ स्थित शैलाश्रय का नाम रबकोह है। यह बहुत बड़ी गुफा है, जहाँ मध्यपाषाण काल के शैलचित्र पाये गये हैं। इन चित्रों में शिकार करते और नाचते मानव, सांड, हिरन आदि के चित्र पाये गये हैं।

 

ओंगना के शैलचित्र

ओंगना के शैलचित्र. Courtesy: Rohit Rajak

 

ओंगना (तहसील धरमजयगढ़)

धरमजयगढ़ तहसील के ओंगना गाँव के निकट बानी पहाड़ी में स्थित लेखामाड़ा नामक चित्रित शैलाश्रय भी ओड़िशा की सीमा से लगा हुआ है। यहाँ के शैलचित्रों में काफी विविधता एवं ज्यामितीय आकृतियों की प्रधानता है। साथ ही ऊँचे कूबड़ वाले सांड समूह, विशेष केश-सज्जा युक्त मानवाकृतियाँ, तंतु वाद्य बजाते और एक-दूसरे का हाथ पकड़ नाचते मानव, गर्भवती स्त्री भी यहाँ के चित्रों में परिलक्षित हैं।

 

गोमर्ड़ा के शैलचित्र

गोमर्ड़ा के शैलचित्र. Courtesy: Rohit Rajak

 

सिरोली-डोंगरी (तहसील सारंगढ़)

यह डोंगरी (पहाड़ी) गाताडीह गाँव से लगा हुआ है। यहाँ विभिन्न आकार के अनेक शैलाश्रय मिले हैं। आबादी के निकट होने के कारण इन शैलाश्रयों के चित्रों को अत्यधिक नुकसान हुआ है। यहाँ मुख्य रूप से पैरों के निशान (पाद चिह्न), मनुष्य, हिरण, कछुआ, दण्डाकार मानवाकृति, हथेली (चार, पांच और सात अँगुलियों वाले), स्वास्तिक, त्रिशूल एवं जटिल रेखांकन के चित्र बने हुये हैं।

 

गोमर्ड़ा (तहसील सारंगढ़)

गोमर्ड़ा एक वन्यजीव अभ्यारण्य है जिसके सीमान्तर्गत शिवपुर गाँव के निकट ज्ञात शैलाश्रय भी उषाकोठी के नाम से जाना जाता है। यहाँ के चित्र लाल और भूरे रंग से बनाये हैं। इनमें पाये जाने वाले पग (पाद) चिह्न उल्लेखनीय हैं जो एक पंक्ति में हैं। इनमें से कुछ में केवल चार अँगुलियाँ ही हैं जबकि एक उदाहरण में छः हैं। हाथ और पैर फैलाये कुछ मानवाकृतियाँ भी चित्रित हैं। स्थानीय लोग इन चरण चिह्नों को देवी लक्ष्मी का मानते हैं।

 

 


[1] एक प्रकार का प्रागैतिहासिक कलारूप जिसमें पत्थर पर वृत्ताकार आकृतियाँ गुदी होती हैं

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and archaeology, Government of Chhattisgarh to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.