Raipur, Chhattisgarh, 2018

 

Pandvani is one of the most celebrated forms of folklore from Chhattisgarh. Known mostly as a regional/ folk version of the Mahabharata, its terms of relationship with the Sanskrit epic are little known.This series of modules presents the recitation of the Pandavani by Prabha Yadav, The recitation presents all the eighteen parv of the epic based on the version compiled by Sabal Singh Chauhan, an author whose text was in circulation in this region. Prabha Yadav is a noted performer of the Pandavani, and represents what has come to be seen as Jhaduram Devangan’s style of rendition.

 

The parvs presented in this video are the Ashramvasi, Musal & Swargarohan Parvs. The prasangs contained in these parvs are Raja Dhritarashtra, Gandhari, Vidur ka dehtyag, Yadu vanshiyon ka naash evam Sri Krishn ka paramdhaam gaman, Pandavon ka himalay me praantyag.

 

Transcript- Ashramvasi Parv

 

Chhattisgarhi: राजा जन्मेजय जी ल वैसम्पायन जी कथे - अब हम आश्रम वासिक पर्व की ओर जाथन। एक दिन के बात ये रागी महराज युधिष्ठिर कहते हैं - कहे कलयुग के आगमन होथे। कलयुग अवइया हे। देखिन - दू झन किसान मन लड़त लड़त अइन राजा बइठे हे। एक झन किसान काहत हे - महराज एकर खेत ल मैं जोतत रेहेंव, ले रेहेंव अधिया में। खेल ल जोतत रिहिस हे। खेत ले निकलिस भण्डार। धन निकलथे। रागी भाई वो खेत वाला कथे - ये धन ह मोर ए। काबर! मोर खेत ले निकले हे। दूसर किसान काहत हे - ये धन मोर ए। अरे मैं जोतत रहेंव अऊ तोर खेत ल मैं जोतत मैं जोतेंव वो मारे हल ले निकले हे वो कारण ये मोर धन ए। ये बात ला लेके दोनो म विवाद होथे। राजा युधिष्ठिर ल काहत हे - नियाव कर। फैसला कर। भगवान हंस के किहिस - छै महिना बाद में आके तुमन फैसला करा लिहू। वापिस हो जाव भैया। किसान मन लहूट जथे रागी भाई। विदुर ह भगवान के दर्शन करे बर तीर्थ स्थान गे रहय। घूम के आथे अऊ आके राजा धृतराष्ट्र के चरण में प्रणाम करथे। तब राजा धृतराष्ट्र काहत हे विदुर! तैं तो तीर्थ स्थल के भ्रमण करके आथस। लेकिन मोला पांचो भैया पाण्डव मन मोर सेवा करथे। एमा चार तो सहीं हे विदुर पर मोला भीमसेन के वाणी दूख देथे। भीमसेन जो बोलथे। भीम के बात मोर छाती म बाण जइसे लगथे। कहे - विदुर। अब मैं जंगल जाके अपन ये शरीर ल त्याग देना चाहत हौं। भक्त विदुर जी राजा धृतराष्ट्र महरानी गंधारी अऊर महारानी कुंती फिर राजा से इजाजत लेथे। धरमराज ल समझाथे - बेटा! कलयुग अवइया हे। कलयुग में कोनो धरम करम ल नइ मानैं। बोले अब हम यहाँ से जाना चाहत हन। आघू-आघू विदुर जी चलत हे। विदुर के खांध ल धरे-धरे राजा धृतराष्ट्र जावथे। राजा के खांध ल गंधारी धरे हे। अऊ गंधारी के हाथ ल कुंती धरे हे। भयानक जंगल में जाथे। व्यासनाराण के दर्शन करथे। रागी भैया फिर जंगल में जाके आगी लगा के एमन अपन शरीर ल त्याग देथे रागी भैया। भगवान द्वारिका नाथ द्वारिका मे निवास करत हे। राजा यधिष्ठिर सुनिस। मोर महतारी बापमन प्राण ल त्याग दिन। व्याकुल हो जथे। राजा क्रिया करम करथे अऊर अर्जुन ल भेजथे - भैया! तैं द्वारिका जा। अऊ द्वारिका मे जाके भगवान ल कहि दे अर्जुन। ए बात सुनिस तो रथ मे बइठिस अर्जुन अऊ रथ में जब चलत हे रागी तो बीच मे देवर्षि नारद से मुलाकात होथे।

 

Hindi: राजा जन्मेजय जी को वैसम्पायन जी कहते हैं - अब हम आश्रम्‍वासिक पर्व में जा रहे हैं। एक दिन की बात है रागी, महराज युधिष्ठिर कहते हैं - कलयुग का आगमन होने वाला है। कलयुग आने वाला है। देखते हैं - दो किसान लड़ रहे हैं, राजा बैठे हैं। एक किसान कहता है - महराज इसके खेत को मैं जोतता था, अधिया (भूमि स्‍वामी से कृषि कार्य करने के लिए फसल की उपज में आधा देने का सौदा) में लिया था। खेत को जोत रहा था । उस खेत से भंडार निकला, धन निकला। रागी भाई, वह खेत का स्‍वामी कहता है - यह धन मेरा है। चूंकि! मेरे खेत से निकला है। दूसरा किसान कहता है - यह धन मेरा है। अरे मैं जोत रहा था, तुम्‍हारे खेत को मैं जोत रहा था जिससे मेरे हल से यह निकला है इस प्रकार से यह मेरा धन है। इस बात को लेकर दोनो मे विवाद होता है। राजा युधिष्ठिर को कहते हैं – न्‍याय करें, फैसला करें। भगवान हंस कर कहते हैं – छ: महिने बाद मे आकर तुम लोग फैसला करा लेना। अभी वापस हो जावो भैया। किसान लोग लौट जाते हैं रागी भाई। विदुर भगवान के दर्शन करने के लिए तीर्थ स्थान गए हैं, वहां से घूम कर आते हैं और आकर राजा धृतराष्ट्र के चरणों में प्रणाम करते हैं। तब राजा धृतराष्ट्र कहते हैं विदुर! आप तो तीर्थ स्थलों का भ्रमण कर आ रहे हैं। किन्‍तु हम पांचो भैया पाण्डव में  चार तो मेरी सेवा कर रहे हैं। इसमें से चार तो सहीं हैं विदुर पर मुझे भीमसेन की वाणी दुख देती है। भीमसेन को बोलते हैं तो भीम को यह बात छाती मे बाण मारने जैसे लगता है। कहते हैं - विदुर। अब मैं जंगल जाकर अपना इस शरीर को त्याग देना चाहत हूँ। भक्त विदुर जी राजा धृतराष्ट्र महरानी गांधारी और महारानी कुंती फिर राजा से इजाजत लेते हैं। धर्मराज को समझाते हैं - बेटा! कलयुग आने वाला है। कलयुग मे कोई धर्म कर्म को नहीं मानेगा। बोलते हैं अब हम यहाँ से जाना चाहते हैं। आगे-आगे विदुर जी चलते है। विदुर के कंधे को पकड़े-पकड़े राजा धृतराष्ट्र जा रहे हैं। राजा के कंधे को गांधारी पकड़ी है। गांधारी के हाथ को कुंती पकड़ी है। भयानक जंगल में जाते हैं। व्यास नाराण के दर्शन करते हैं। रागी भैया फिर जंगल में जाकर आग लगा कर ये सब अपने शरीर को त्याग देते हैं रागी भैया। भगवान द्वारिका नाथ द्वारिका मे निवास कर रहे है। राजा यधिष्ठिर सुनते हैं। मेरे माता पिता सब प्राण को त्याग दिये। व्याकुल हो जाते हैं। राजा उनका क्रिया कर्म करते हैं और अर्जुन को भेजते हैं - भैया! तुम द्वारिका जाओ और द्वारिका मे जाकर भगवान को कह दो।  अर्जुन इस बात को सुनता है तो अर्जुन रथ मे बैठ कर निकल जाता है, रागी बीच मे देवर्षि नारद से मुलाकात होती है।

 

 

नारद जी पूछत हे - अर्जुन कहां जाथस ? तो अर्जुन कहे - भैया मैं द्वारिका जाथेंव। देवर्षि नारद अऊ अर्जुन दोनो झन रथ में बइठत हे। अऊर दोनो रथ में बैठ के द्वारिका नगर चलत हे रागी। द्वारिका में जब जाथे अर्जुन दूनो हाथ जोड़के दण्डवत प्रणाम करथे। अऊर भगवान के प्रणाम करके कहे - द्वारिका नाथ!

मनमोहना बर मन लगे का गा

मनमोहना बर मन लगे का गा।

राधा बइठे हे उदास हो, मन मोहना बर मन लगे का

राधा बइठे हे उदास हो, मन मोहना बर मन लगे का।

जय रघुनंदन मुनी जन बंदन, मन मोहना बर मन लगे का

जय जय जय रघुनंदन मुनी जन बंदन, मन मोहना बर मन लगे का।

राधा बइठे हे उदास हो, संवरिया बर मन लगे का

राधा बइठे हे उदास हो, संवरिया बर मन लगे का।

 

नारद जी पूछते हैं - अर्जुन कहां जा रहे हो ? तो अर्जुन कहते हैं - भैया मैं द्वारिका जा रहा हूं। देवर्षि नारद और अर्जुन दोनो रथ में बैठते है और दोनो रथ में बैठ कर द्वारिका नगर चलते हैं रागी। द्वारिका में जब जाते हैं अर्जुन दोनो हाथ जोड़ कर दण्डवत प्रणाम करता है और भगवान को प्रणाम करके कहते हैं – द्वारिका नाथ!

मनमोहना के लिए मेरा मन लगा है क्‍या जी, मनमोहना के लिए मेरा मन लगा है क्‍या। राधा उदास बैठी हो, मनमोहना के लिए मेरा मन लगा है क्‍या जी, रघुनंदन की जय हो, मुनी जनों का वंदन करता हूं, मनमोहना के लिए मेरा मन लगा है क्‍या जी।

राधा उदास बैठी है, संवरिया के लिए मन लगे क्‍या, राधा उदास बैठी है, संवरिया के लिए मन लगे क्‍या।

 

 

पहुंचगे अर्जुन द्वारिका नगर। भगवान के दर्शन करथे। भोजन पानी करके विश्राम करथे। देवर्षि नारद ल भगवान ह पूछत हे - कइसे आये हस। नारद जी दोनो हाथ जोड़ के भगवान ल काहत हे - प्रभु ये मानव के रूप में ये धरती में बहुत दिन होग तोला राहत। परमधाम जाये के समय आगे हे। भगवान ब्रम्हा मोला भेजे हे। बोले देरी काबर करत हस कहे नारद, बोले भगवान आपला अब परमधाम आना हे। भगवान कृष्ण बोले कुछ दिन अऊ रहिहौं नारद। कुछ दिन के बाद में मै वापिस आ जहूँ भैया। भगवान नारद ल समझाके वापिस करथे रागी। भगवान विचार करत हे। यदु कुल के नाश कइसे होही ? यादव के मरैया कोनो जनम नइ लेये ये द्वापर मे। जब तक ये यादव के समाज ल श्राप नइ लगही रागी भैया ये यादव ला कोनो नइ मार सकय। भगवान विचार करथे - बारिस के समय आथे। चातुर्मासा बिताए के खातिर बड़े बड़े तपस्वी बड़े बड़े ज्ञानी, बड़े बड़े महामुनि द्वारिका नगर मे पहुंचत हे रागी। वो सब ऋषि मुनि के संग में महा ऋषि दुर्वासा भी आये हे। बड़े बड़े ज्ञानी, बड़े बड़े तपस्वी। ऋषिमुनि मन काहत हे - महराज! चार महीना चौमास भर हम तोर घर रहीबो द्वारिका नगर में, जइसे चौमास बीत जही महराज वापस हम जंगल चल जाबो। बलदाऊ जी कहे हम धन्य होगेन। रागी भैया वो तपस्वी मन के रेहे के बेवस्था कर देथे। भगवान विचार करत हे कि क्या बेवस्था किया जाय, क्या किया जाय अइसे हरि इच्छा होथे। एक दिन के बात ये रागी यादव लइका मन घूमे ल निकले रहय। अपने अपन मन विचार करिस। अऊ दुर्वासा ऋषि ल देखिन ताहने कहिथे - राहा तो ये जानथे धन नहीं ऋषि दुर्वासा से छल करना चाहिए। हंसी उड़ाये दुर्वासा के। जामवन्ती के एक झन बेटा हे - साम नाम के। वो साम नाम के राजकुमार ल लड़की के स्वरूप में बना देथे। नाना प्रकार के श्रृंगार करथे भैया। गर्भवती स्त्री के रूप में वो लइका ल तैयार करथे। जामवंती के बेटा साम नाम के राजकुमार अऊ गर्भवती लड़की के रूप में दुर्वासा के आगु में खड़े कर देथे। यादव लइका मन पूछथे दुर्वासा ला - महराज! ये स्त्री गर्भवती हे। येला सोच के बतातेव अपन तपोबल के बल से येकर गर्भ ले लड़की पैदा लिही या लड़का ? ये बात ल सुनिस दुर्वासा जी ध्यान लगा के देखिस अऊर ध्यान लगा के देखे तो क्रोध मे दुर्वासा के नेत्र लाल होगे। बोले - अरे! भगवान श्रीकृष्ण के कुल में जन्म लेव। बोले अरे यादव ये बालक बोले आके मोर से आज परिहास करत हौ, मोला छल करत हौ। दुर्वासा जी श्राम देते हैं - जाओ एकर गर्भ ले जनम लिही एकरे द्वारा यादव कुल के मौत होही। एकर गर्भ ले मूसल जनम लिही कहिस। रागी भैया साम के गर्भ ले एक ठन मूसल जनम लेथे। वो मूसल ल देखथे राजा उग्रसेन मन विचार करथे कि भई अब का करना चइए। तो बड़े बुजुर्ग मन विचारथे त समुद्र में घोर देथे। मूसल ल लेगिन अऊ समुद्र मे -

अगा सुन्दर मूसल ल घोरन लगे भैया

रागी सुन्दर मूसल ल घोरन लगे भैया।

हाँ यादव मन काहन लागे गा एगा भाई

यादव मन काहन लागे गा एगा भाई।

 

पहुंच गए अर्जुन द्वारिका नगर। भगवान का दर्शन करते हैं। भोजन पानी करके विश्राम करते हैं। देवर्षि नारद को भगवान पूछते हैं - कैसे आये हो। नारद जी दोनो हाथ जोड़ कर भगवान को कहते हैं - प्रभु मानव के रूप में इस धरती में रहते हुए आपको बहुत दिन हो गए। अब परमधाम जाने का समय आ गया है। भगवान ब्रम्हा मुझे भेजे हैं। बोलते हैं देरी किसके लिए कर रहे हो, कहते हैं नारद, बोलते हैं भगवान आपको अब परमधाम आना है। भगवान कृष्ण बोलते हैं कुछ दिन और रह जाता नारद। कुछ दिन के बाद में वापस आ जाउंगा भैया। भगवान नारद को समझा कर वापस करते हैं रागी। भगवान विचार कर रहे है। यदुकुल का नाश कैसे होगा? द्वापर मे यादवों को मारने वाला कोई जन्‍म नहीं लिया है। जब तक इस यादव समाज को श्राप नहीं लगेगा रागी भैया इन यादवों को कोई मार नहीं सकता। भगवान विचार करते हैं – वर्षा का समय आता है। चातुर्मास बिताने के लिए बड़े-बड़े तपस्वी बड़े-बड़े ज्ञानी, बड़े-बड़े महामुनि द्वारिका नगर मे पहुंचत रहे हैं रागी। वे सब ऋषिमुनि के साथ मे महाऋषि दुर्वासा भी आये है। बड़े बड़े ज्ञानी, बड़े बड़े तपस्वी। ऋषि मुनि सब कहते हैं - महाराज! चार महीना चौमास तक हम तुम्‍हारे घर में रहेंगे, द्वारिका नगर में, जैसे ही चौमास बीतेगी महाराज हम वापस जंगल चले जायेंगें। बलदाऊ जी कहते हैं हम धन्य हो गए। रागी भैया वे सभी तपस्वियों की रहने की व्‍यवस्‍था कर देते हैं। भगवान विचार कर रहे हे कि क्या किया जाय, क्या किया जाय, ऐसे हरि इच्छा होता है। एक दिन की बात है रागी यादव बच्‍चे सब घूमने निकले थे। उन्‍होंनें अपने अपने मन में विचार किया और दुर्वासा ऋषि को देख कर कहते हैं - रूको तो यह जानते हैं कि नहीं, ऋषि दुर्वासा से छल करना चाहिए। इसकी हंसी उड़ाना चाहिए। जामवन्ती का एक साम नाम का बेटा था। उस साम नाम के राजकुमार को लड़की का रूप देकर लड़की बना देते हैं और उसका नाना प्रकार के श्रृंगार करते हैं भैया। उसे गर्भवती स्त्री का रूप देने के लिए उसके पेट में सामान रख देते हैं। जामवंती के बेटे साम नाम के राजकुमार को गर्भवती लड़की के रूप में दुर्वासा के सामने खड़ा कर देते हैं। यादव लड़के दुर्वासा से पूछते हैं - महराज! यह स्त्री गर्भवती है। इसे अपने तपोबल के बल से विचार कर बताइये कि इसके गर्भ से लड़की पैदा होगी या लड़का? इस बात को दुर्वासा जी सुनते हैं, ध्यान लगा कर देखेते हैं  तब क्रोध मे दुर्वासा के नेत्र लाल हो जाते हैं। बोलते हैं - अरे! भगवान श्रीकृष्ण के कुल में जन्म लिये हो, अपने आप को यादवों का बालक बोलते हो और यहां आकर मेरे से आज परिहास कर रहे हो, मुझसे छल कर रहे हो। दुर्वासा जी क्रोधित होकर श्राप देते हैं - जाओ इसके गर्भ से जो जन्‍म लेगा उसी के द्वारा यादव कुल की मौत होगी। कहते हैं इसके गर्भ से मूसल जन्‍म लेगा। रागी भैया साम के गर्भ से सहीं में एक मूसल का जन्‍म होता है। उस मूसल को देखते हैं राजा उग्रसेन, मन में विचार करते हैं कि अब क्‍या करना चाहिए। फिर बड़े बुजुर्ग सब विचार करते हैं कि इसे समुद्र में घोल देते हैं। मूसल को ले कर समुद्र में जाते हैं और -

अजी सुन्दर मूसल को घिसने लगे भैया, रागी सुन्दर मूसल को घिसने लगे भैया। यादव लोग कहने लगे भाई, यादव कहने लगे भाई।

 

 

इस मूसल को घोर दिया जाय। घिस दिया जाय। समुद्र में लेगिन अऊ पथरा में धर के घिस घिस के नास करिन रागी भैया नानचिन मूसल बांचथे तेला फेंक देथे। वो जो मूसर ल घोरे राहय वो समुद्र के तीर मे गोंदलइया के रूप में जाम जथे। खड़े हो जथे गोंदला के रूप में खड़ा होगे। अऊ वो नान चुन जो लोहा के चूर्ण बांचे रहय वोला एक जरक नाम के ब्याध ह आथे अऊ देखथे। शिकारी ह पहुंचाथे जाल मारथे ल। तो कहे येह बान के नोक मे लगाए के लइक हे रागी। वोला बान के नोक मे लगा देथे। समय बीतत हे। एक दिन के बात ए भगवान कृष्ण कहे - जब तक द्वारिका में यादव मन राज करही इकर मौत नइ होवय क्योंकि द्वारिका ला श्राप नइ होय हे यादव के कुल ला श्राप होय हे। भगवान कथे - भैया चलो आज हम प्रभात क्षेत्र चलते हैं। प्रभात क्षेत्र जाके स्नान करना हे। समस्त यदुवंशी समाज उद्धव ला छोड़िस। भगवान समझा दिस कलयुग के आगमन होवथे। कहे - भैया उद्धव तैं बद्रिका आश्रम जाके भगवान के तपस्या करके अपन शरीर ल त्याग दे। बलराम अऊर भगवान यादव के समाज लेके प्रभात क्षेत्र आथे। अऊर प्रभात क्षेत्र में आए के बाद अइसे हरि इच्छा होथे रागी जतका यादव हे तेमन ह -

अरे मदिरापाने गा करन लगे भैया

मदिरापाने गा करन लगे भाई।

नशा म चूर गा होवन लगे भैया

नशा म चूर गा होवन लगे भाई।।

 

इस मूसल को घिस कर समुद्र में घोल दिया जाय। घिस दिया जाय। समुद्र में ले जाते हैं और पत्‍थर के उपर घिस घिस कर इसे नाश कर दिये, रागी भैया छोटा सा मूसल बचता है उसे फेंक देते हैं। वह बचा हुआ मूसल का तुकड़ा समुद्र के तट मे गोंदइया (जल के किनारे उगने वाली प्‍याज सदृश्‍य वनस्‍पति) के रूप में जम जाता हैं। गोंदईला के रूप में खड़ा हो जाता है। बचे हुए उस छोटे से लोहे के तुकड़े को एक जरक नाम का ब्याध देखता है । वह शिकारी उस समय समुद्र में जाल डालने पहुंचता है। उसे वह तुकड़ा मिलता है तो वह सोचता है कि यह बाण के नोक मे लगाने के लायक है रागी। वह उसे बाण के नोक मे लगा लेता हैं। समय बीतता है, एक दिन की बात है भगवान कृष्ण कहते हैं - जब तक द्वारिका में यादव राज करेंगे तो इनकी मौत नहीं होगी क्योंकि द्वारिका को श्राप नहीं मिला है। यादव के कुल को श्राप मिला है। भगवान कहते हैं - भैया चलो आज हम प्रभात क्षेत्र में चलते हैं। प्रभात क्षेत्र जाकर स्नान करना है। समस्त यदुवंशी समाज उद्धव को छोड़ कर। भगवान नें उसे समझा दिया कि कलयुग का आगमन होने वाला है। कहते हैं - भैया उद्धव तुम बद्रिका आश्रम जाकर भगवान की तपस्या करके अपना शरीर त्याग दो। बलराम और भगवान, यादव के समाज को ले कर प्रभात क्षेत्र में आते हैं और प्रभात क्षेत्र में आकर ऐसा हरि इच्छा होता है रागी, जितने यादव हैं वे -

अरे मदिरा पान करने लगते हैं  भैया, मदिरा पान करने लगते हैं  भैया। नशे मे चूर होने लगते हैं भैया, नशे मे चूर होने लगते हैं भैया।

 

 

मदिरा पान करथे। अऊर जब मदिरा पान करथे यादव के समाज नशा मे धूत हो जथे। कोन ह बाप ये कोन ह बेटा ए,कोन ह परिवार ए। रागी भैया एक दूसर से लड़े मिट जथे। एक दूसर से यादव परिवार अपने अपन -

ओमा युद्धे गा होवन लागे भाई

मारो - यदुकुल अपने अपने लड़त हे प्रभात क्षेत्र में

रागी मारो-मारो अब काहन लागे भाई।

यदुवंशी काहन लागे गा मोर भाई

यदुवंशी काहन लागे गा मोर भाई।

कोई ल कोई नइ गुनत हे। अस्त्र-षस्त्र नइ पूरत ए रागी तो जो वो मूसर ल घोरे राहय तेन समुद्र के तीर मे गोंदला के रूप में - तीन भाग में वो बने हे। धार हे तलवार जइसे उही ला तोड़ के -

सारी बीर गा मारन लगे भैया ए भाई

सारी बीर गा लड़न लगे भैया ए भाई।

मारो मारो गा कहन लगे भैया ए भाई

सारी बीर गा मरन लगे भाई।

 

सभी यादव मदिरापान करते हैं और इतना मदिरापान करते हैं कि संपूर्ण यादव समाज नशे मे धुत्‍त हो जाता है। कौन बाप है कौन बेटा है, कौन परिवार है। रागी भैया एक दूसरे से लड़ भिड़ जाते हैं। एक दूसरे से यादव परिवार अपने-अपने -

उनमें युद्ध होने लगा भाई, मारो - प्रभात क्षेत्र में यदुकुल अपने अपने में लड़ रहे हैं। रागी मारो-मारो अब कहने लगे भाई। यदुवंशी कहने लगे भाई, यदुवंशी कहने लगे मेरे भाई।

कोई किसी का सम्‍मान नहीं कर रहा है, बस एक-दूसरे पर प्रहार कर रहे हैं। अस्त्र-शस्त्र की कमी हो गई है। समुद्र के किनारे मे घुले मूसल से उपजे गोंदइला (जिसका पर्ण तीन भाग में बटा है और जिसके किनारे में तलवार जैसे धार है) को तोड़-तोड़ कर ..

सारे वीर एक-दूसरे को मारने लगे भैया, ए भाई सारे वीर लड़ने लगे भैया। मारो मारो कहने लगे भैया, सभी वीर मरने लगे भाई।

 

 

मारो। बीर बलदाऊ जब देखिस प्रभात क्षेत्र में वो समय रूप ल त्याग के भैया फिर शेषनांग के रूप में जाके समुद्र मे समा जथे। शेषावतारी हे गा बलदाऊ जी। प्रभात क्षेत्र ल छोड़के भगवान कुछ दूर जाथे। बताए हे एक पीपल के झाड़ हे। पीपल के झाड़ में भगवान टेक लगा के ओधे हे। एक पांव दूसरा पांव के ऊपर मे रखे हुए हे। भगवान के पांव में पद्म के चिन्ह हे, कमल समान सुन्दर दिखत हे। श्यामला शरीर मोर मुकुट बांधे हे। पिताम्बर पहिने हे भगवान के परमधाम जाये के समय हे। पीपर रूख में ओधे हे रागी। एक पांव ल दूसरा पांव के ऊपर रखे हे भगवान, वहीं बालि नाम के शिकारी के नजर परिस शिकार करत आइस। भगवान के पांव ल देखिस ल दूरिहा ले अइसे दिखत राहय मानो वो मृगा के आँखी कस दिखत हे। शिकारी ल धोखा होगे। निकालथे त्रुण से बान अऊर वही जो नानचुक लोहा फेंकाय राहय लेन ला बान म घुसाए राहय रागी। शिकारी निकाले बान अऊर मंत्र पढ़के छोड़ देथे। बान जाके भगवान के पांव मे लग जथे रागी भैया। भगवान के पांव मे जब लगथे। भगवान व्याकुल हो जाथे। शिकारी दौड़ के जाथे। देखथे त भगवान दर्द के मारे तड़पत रइथे। शिकारी दोनो हाथ जोड़के खड़ा हो जाथे। कहे - महराज मोर से भूल होगे, मैनइ जानत रहेंव मोर से गलती होगे महराज। मैं तो मृगा समझ के तोला बान मारे हौं। भगवान हांस के कहे - भैया। एक दिन महूं तोला लूका के मारे रहे हौं। भगवान कहे - दूखी होय के बात नइये। अरे महूँ तोला मारे रेहेंव। कब ? जे दिन मैं त्रेतायुग में राम अवतरे रेहेंव अऊ तैं बालि रेहे। वो दिन पैं पेड़ के आड़ लेके तोर ऊपर मे बान चलाय रेहेंव बालि। वो दिन मैं मारे रेहेव आज तैं मोला मार ले। दूखी होय के बात नइये। फेर भगवान ब्याकुल हो जाथे रागी भैया। वो समय के दृष्य। फिर भगवान बांके बिहारी ये पंत्रविभूति के शरीर ला त्याग देथे। द्वारिकाधीष भगवान परमधाम चल देथे। रागी भैया, द्वारिका ल समुद्र डूबा देथे।

 

मारो ! वीर बलदाऊ जब देखते हैं कि प्रभात क्षेत्र में उस समय अपने रूप को त्याग कर भैया फिर शेषनाग के रूप में जाकर समुद्र मे समा जाते हैं। शेषावतारी हैं जी बलदाऊ। प्रभात क्षेत्र को छोड़ कर भगवान कुछ दूर जाते हैं। बताया गया है कि एक पीपल का वृक्ष है। उस पीपल के वृक्ष में भगवान टेक लगा कर खड़े है। एक पांव दूसरे पांव के ऊपर मे रखा है। भगवान के पांव में पद्म का चिन्ह है, कमल समान सुन्दर दिख रहे है। श्यामला शरीर मोर मुकुट बधा है। पीताम्बर पहने हैं, भगवान का परमधाम जाने का समय है। पीपल वृक्ष में टिके हैं रागी। एक पांव को दूसरे पांव के ऊपर रखे हैं भगवान, वही बाली नाम के शिकारी की नजर पड़ी वह शिकार करते हुए आ रहा है। दूर से भगवान के पांव को देखा तो दूर से ऐसे दिख रहा है मानो वो मृग की आँख है। शिकारी को धोखा होता है। निकालता है तूणीर से बाण जिसके नोक में वही मूसल का छोटा तुकड़ा लगा है रागी। शिकारी उसे निकालता है और मंत्र पढ़कर छोड़ देता है। बाण जाकर भगवान के पांव मे लग जाता है रागी भैया। भगवान के पांव मे जब लगता है, भगवान व्याकुल हो जाते हैं। शिकारी दौड़ कर जाता हैं। देखता है तो भगवान दर्द के मारे तड़फ रहे हैं। शिकारी दोनो हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता है। कहता है - महराज मुझसे भूल हो गई, मै नहीं जानता था, मुझसे गलती हो गई महराज। मैं तो मृग समझ कर आपको बाण मारा हूँ। भगवान हंस कर कहते हैं – भैया, एक दिन मैं भी तुम्‍हें छिप कर मारा था। भगवान कहते हैं - दुखी होने की बात नहीं है। अरे मैं भी तुम्‍हें इसी तरह मारा था। कब ? जब मैं त्रेतायुग में राम अवतार लिया था और तुम बाली थे। उस दिन मैं पेड़ की आड़ ले कर तुम्‍हारे ऊपर बाण चलाया था। उस दिन मैं मारा था आज तुम मुझे मार लो। दुखी होने की बात नहीं है। भगवान ब्याकुल हो जाते हैं रागी भैया। उस समय का दृश्य, अहा। फिर भगवान बांके बिहारी इस पंचभूत शरीर को त्याग देते हैं। द्वारिकाधीश भगवान परम धाम को चले जाते हैं। रागी भैया, द्वारिका को समुद्र में डूबा देते हैं।

 

 

राजा धरमराज कहिस - अर्जुन। भगवान चलदिस। अब ये दुनिया में हमर कोनो काम नइये। अब हमला भी जाना हे। रागी भाई, फिर बताए हे राजा परीक्षित ल बलाये। परीक्षित राजा युधिष्ठिर के नाती, अभिमन्यु के पुत्र ये। परीक्षित के फिर राज्यभिषेक करथे। कहे - बेटा। अब तोला यहां के राज ल संभाले बर हे। धौम्य पुरोहित राज्यभिषेक कर देथे। तेकर पाछू नगर के प्रजा से विदा लेथे राजा युधिष्ठिर ह। पांचो भैया पाण्डव संग में महारानी द्रोपदी अऊर हस्तिना के प्रजा से विदा लेके के बाद में -

अरे उत्तर दिशा गा चलन लगे भैया जी

उत्तर दिशा गा चलन लगे भाई।

हाँ नगर के प्रजा देखन लगे भाई

बोल – महराज

राजा धर्मराज कहते हैं - अर्जुन ! भगवान चले गये ! अब इस दुनिया में हमार कोई काम नहीं है। अब हमे भी जाना है। रागी भाई, फिर बताया गया है राजा परीक्षित को बुलाते हैं। परीक्षित राजा युधिष्ठिर के पौत्र, अभिमन्यु के पुत्र हैं। परीक्षित का राज्यभिषेक करते हैं। कहते हैं - बेटा ! अब तुम्‍हें इस राज्‍य को सम्‍भालना है। धौम्य पुरोहित राज्यभिषेक कर देते हैं। उसके बाद नगर के प्रजा से राजा युधिष्ठिर विदा लेते हैं। पांचो भैया पाण्डव साथ मे महारानी द्रौपदी हस्तिना की प्रजा से विदा ले कर

अरे उत्तर दिशा में चलने लगे भैया जी, उत्तर दिशा में चलने लगे भाई। नगर की प्रजा देखने लगी भाई,  

बोले - महाराज !

 

 

नगर के प्रजा देखन लगे भाई। उत्तर दिशा की ओर चलते हैं जहां हिमालय पर्वत हे। बताए हे नगर के प्रजा मन एक योजन तक ओला बिदा करे ल गे हे। आखिर मे धरमराज समझा के वापिस कर देथे रागी भैया। पांचो भाई माँ द्रोपदी चलत हे। जात - जात बीच में कैलाश परथे। पांचो भाई आपस में चर्चा करथे - भैया। अब तो हम जाथन हिमालय में अपन ये शरीर के त्याग करे बर। जात जात भोला नाथ के दर्शन कर लेथन। एक बार भगवान के दर्शन कर लेथन। माँ भवानी ल लेके भगवान बइठे हे। भगवान देखिस - पाण्डव आवथे। भगवान पार्वती ल काहथे - गिरजा! ए...ए...ए पापी मन आवत हवय। अपन कुल के नाश करके आज वोमन हिमालय मे प्राण त्यागे ल जात हे। अऊ मोर दर्शन करे के खातिर आवत हे एमन। बोले - गिरजा! मै एमन ला दर्शन नइ देवंव। दर्शन नइ दौं। माँ पार्वती कहे - कइस ? बताए हे रागी उही तीर मे एक ठन डबरा राहय उही डबरा में अड़बड़ अकन भैंसा बुड़े राहय। भगवान भैंसा के रूप धरथे अऊ डबरा में बुड़ जथे। पाण्डव मन आथे त अकेल्ला दाई भर ल बइठे पाथे। अकेला बइठे हे पार्वती ह। पाण्डव मन दोनो हाथ जोड़ के पूछत हे - दाई भगवान कहां हे, कहां गे हे ? माँ भवानी कथे - नइ जानत औ। पाण्डव कथे - आखिरी समय म हमन भगवान के दर्शन करे आये हन। अब वोमन तर्क लगावय गा, कहां गे होही। भीम कथे भैया। हो न हो ये डबरा मे हे वो ह। भीमसेन तर्क लगा के कहे - इहां हे वो ह। अऊ हमला वो दर्शन नई देना चाहत हे। भीमसेन काहय-तुमन ओती ले कुदावत-कुदावत लानौ सब भैसा मन ला। है न अऊ मैं दू ठन पहाड़ में पांव ल फैला के खड़े हौं। सिरतोन के भैसा होही तेन मोर गोड़तरी ले बुलक के नाहक जही। अऊ वो कहूँ लुकाय होही त मोर गोड़ के नीचे ले नइ बुलकय। अब भीम खड़े हे रागी दूठो पहाड़ मे अऊ वाकई सब भइंसा मन ल खेदय त एक ठन भंइसा मेछरावय गा। पाण्डव मन जान डारिस ये दिही हर आय। पांचो भैया पाण्डव भगवान के चरण में गिरजथे रागी। देवाधिदेव! महादेव के दर्शन करते है। अऊर भगवान के दर्शन करके -

अरे पांचो भैया गा चलन लगे भैया

पांचो पाण्डव गा चलन लगे भाई।

बीचे जंगल गा पहुंचन लगे भैया

जंगल जंगल गा चलन लगे भाई।

 

नगर की प्रजा देखने लगी भाई। उत्तर दिशा की ओर जाते हैं जहां हिमालय पर्वत है। बताया गया है प्रजा एक योजन तक उन्‍हें बिदा करने जाती है। अंत मे धर्मराज उन्‍हें समझा कर वापिस करते हैं रागी भैया। पांचो भाई, माँ द्रौपदी चल रहे है। जाते - जाते बीच में कैलाश पड़ता है। पांचो भाई आपस में चर्चा करते हैं - भैया। अब तो हम हिमालय मे अपने इस शरीर को त्याग करने लिए जा रहे हैं। जाते जाते भोला नाथ के दर्शन कर लेते हैं। एक बार भगवान का दर्शन कर लेते हैं। माँ भवानी को लेकर भगवान बैठे हैं। भगवान नें देखा - पाण्डव आ रहे हैं। भगवान पार्वती को कह रहे हैं - गिरजा! ए...ए...ए पापी लोग आ रहे हैं। अपने कुल का नाश करके आज ये  हिमालय मे प्राण त्यागने के लिए जा रहे है और मेरा दर्शन करने के लिए आ रहे हैं। बोलते हैं - गिरजा! मै इन्‍हें दर्शन नहीं दूंगा। दर्शन नहीं दूंगा, माँ पार्वती कहती हैं - कैसे ? बताया गया है रागी वहीं पास मे एक पानी का पोखर था उसमे बहुत से भैंसे डूबे थे। भगवान भैंसा का रूप लेते हैं  और उसमें डूब जाते हैं। पाण्डव आते हैं तो माता बस को अकेली बैठी पाते हैं। पार्वती अकेली बैठी है। पाण्डव दोनो हाथ जोड़ कर पूछते हैं - माता भगवान कहां है, कहां गए हैं ? माँ भवानी कहती हैं – मुझे पता नहीं है। पाण्डव कहते हैं - आखिरी समय मे हम भगवान का दर्शन करने आये हैं। अब वे तर्क लगा रहे हैं, कहां गए होंगे। भीम कहते हैं भैया, हो न हो वे इस पोखर मे हैं। भीमसेन तर्क लगा कर कहते हैं - यहीं हैं वे और हमे वे दर्शन नहीं देना चाहते हैं। भीमसेन कहते हैं –तुम लोग उधर से सब भैसों को दौड़ाते- दौड़ाते लावो और मैं दो पहाड़ में पांव को फैला कर खड़ा हूँ। सही में भैस होंगे वे मेरे पैर के नीचे से पार हो जायेंगें और वे कहीं छिपे होंगे तो मेरे पैर के नीचे से पार नहीं हो पायेंगे। अब भीम खड़े हैं रागी दो पहाड़ मे और वाकई सब भैसों को हंकालते हैं तो एक भैंस इतराने लगा। पाण्डव जान गये यही है। पांचो भैया पाण्डव भगवान के चरण में गिर जाते हैं रागी। देवाधिदेव! महादेव के दर्शन करते है और भगवान के दर्शन करके -

अरे पांचो भैया चलने लगे भैया, पांचो पाण्डव चलने लगे भाई। बीच जंगल में पहुंचने लगे भैया,  जंगल जंगल चलने लगे भाई।

 

 

भयानक जंगल के बीच चलते हैं। रागी भैया जब भयानक जंगल के बीच में जावथे तब पाण्डव ह काहत हे -

लागे मेला गा

लागे मेला गा, जिनगी के कठिन झमेला।

छांटे निमारे बिसा लौ सौदा

काबर करत हौ झमेला रे

लागे मेला गा

लागे मेला गा, जिनगी के कठिन झमेला।।

हाँ कोनो आथे कोनो जाथे, कोनो करत हे तैयारी गा

हाँ कोनो आथे कोनो जाथे, कोनो करत हे तैयारी गा।

तोला जाए ला परही हाँ एक दिन आही पारी गा

तोला जाए ला परही हाँ एक दिन आही पारी गा।

बंधना बांधे घेंच ओरमाए

बंधना बांधे घेंच ओरमाए।

एके पति के खेला रे

लागे मेला, लागे मेला, लगे मेला गा,

जिनगी के कटही झमेला।।3।।

 

भयानक जंगल के बीच में चलते हैं। रागी भैया, जब भयानक जंगल के बीच में जाते हैं तब पाण्डव कहते हैं -

मेला लगा है, मेला लगा है, जिन्‍दगी का कठिन झमेला है। छांट कर खरीद लो, सौदा किसके लिए कर रहे हो, यह सब  झमेला है रे, लगा मेला है रे। लगा मेला है, जिन्‍दगी का कठिन झमेला है। कोई  आता है कोई जाता है, कोई तैयारी कर रहे हैं, हॉं कोई  आता है कोई जाता है, कोई तैयारी कर रहे हैं। तुम्‍हें जाना पड़ेगा एक दिन तुम्‍हारी भी पाली आएगी, तुम्‍हें जाना पड़ेगा एक दिन तुम्‍हारी भी पाली आएगी। बंधन को बांध कर गले में लटकाये हो, बंधन को बांध कर गले में लटकाये हो। एक क्षण का ही खेल है रे, मेला लगा है, मेला लगा है, जिन्‍दगी का कटेगा झमेला रे।

 

 

रागी भैया, पांचो भैया पाण्डव फिर भयानक बर्फ के पहाड़ में हिमालय के ऊपर में चलत हे। आगे-आगे राजा युधिष्ठिर पीछे-पीछे चारो भैया ओकर पीछे मे रानी द्रोपदी। सबल सिंह बताए हे। कुछ दूर जाये के बाद पहाड़ के ऊपर मे अचानक -

रानी द्रोपदी गिरन लगे भैया जी ऽ ऽ

रानी द्रोपदी गिरन लगे भाई।

बीर सहदेवे देखन लगे भैया

बीर सहदेवे देखन लगे भाई।

 

रागी भैया, पांचो भैया पाण्डव फिर भयानक बर्फ के पहाड़ में हिमालय के ऊपर में चल रहे है। आगे-आगे राजा युधिष्ठिर पीछे-पीछे चारो भैया उसके पीछे मे रानी द्रौपदी। सबल सिंह बताये हैं कुछ दूर जाने के बाद पहाड़ के ऊपर मे अचानक -

रानी द्रौपदी गिरने लगी भैया जी, रानी द्रौपदी गिरने लगी भाई। वीर सहदेव देखने लगा भैया, वीर सहदेव देखने लगा भाई।

 

 

माँ द्रोपदी गिर जाथे। रागी अपन प्राण ल त्याग देथे। सहदेव ल दुख होथे। सहदेव नाम के कुमार पलट के देखथे - रानी ल गिर देखथे। मस्तक ल पीट के चिल्ला के रोथे। राजा यधिष्ठिर पलट के पीछे की ओर नइ देखय। राजा धरमराज बोले - सहदेव! 18 दिन महाभारत के लड़ाई होय हे। ए लड़ाई देवी द्रोपदी के नाम से होइस हे। बोले सहदेव शोक ल त्याग दे। बोले - चल आगे चलते हैं। पाण्डव चले। चलते - चलते कुछ दूर आगे जाते हैं। कुछ दूर आगे जाने के बाद अचानक फिर

सहदेवे गिरन लागे गा ए गा भाई

सहदेवे गिरन लागे गा ए गा भाई।

वोला बीर नकुल ह देखन लगे भाई

वोला बीर नकुल ह देखन लगे भाई।

हाँ मने मन सोचन लागे गा ए गा भाई

मने मन सोचन लागे गा ए गा भाई।

 

माँ द्रौपदी गिर जाती हैं। रागी, अपने प्राण को त्याग देती हैं। सहदेव को दुख होता है। सहदेव नाम का कुमार पलट कर देखता है - रानी को गिरते देखता है। मस्तक को पीट कर चिल्ला कर रोता है। राजा यधिष्ठिर पलट कर पीछे की ओर नहीं देखते। राजा धर्मराज बोलते हैं - सहदेव! 18 दिन महाभारत की लड़ाई हुई है। यह लड़ाई देवी द्रौपदी के नाम से हुई है। बोलते हैं सहदेव शोक को त्याग दो। बोलते हैं - चलो आगे चलते हैं। पाण्डव चलते हैं। चलते - चलते कुछ दूर आगे जाते हैं। कुछ दूर आगे जाने के बाद अचानक फिर

सहदेव गिरने लगा भाई, सहदेव गिरने लगा भाई। उसे वीर नकुल देखने लगा भाई, उसे वीर नकुल देखने लगा भाई। मन ही मन में सोचने लगा भाई, मन ही मन में सोचने लगा भाई।

 

 

सहदेव गिर जथे। नकुल रोये। राजा युधिष्ठिर बोले - चिंता मत कर भैया, सहदेव ल अपन पंडिताई के ऊपर में मद रिहिस हे कि मोर से बड़े पण्डित कोई नई हे। आगे चलथे कुछ दूर जाने के बाद में नकुल महराज गिर जथे। अर्जुन रोये - हाय भाई। आज तैं हमला छोड़के कहाँ चल दिये नकुल। राजा युधिष्ठिर कहते हैं - शोक त्याग दो अर्जुन और आगे चलो। नकुल ल अपन सुदरता के ऊपर में गर्व रिहिस हे। बताए हे रागी नकुल जइसे सुन्दर पुरूष तो कोई द्वापर मे है ही नहीं। कहे - चलो। फिर आगे चलते हैं हिमालय की ओर। कुछ दूर जाये के बाद मे अर्जुन फिर गिर गे पहाड़ में। भीम ल दूख होइस। हा भैया तोर जइसे भरतवीर कोई नइये अर्जुन। आज हमला छोड़ के तैं चलदेस। राजा कहत हे भीम! पीछे मुड़के मत देख दूख मत ले। चल चलते हैं। फिर आगे चलत हे। कुछ दूर जाये के बाद मे जऊन ह काल के भी काल महाकाल ए पवन नंदन भीमसेन गिर पड़थे।

 

सहदेव गिर जाता है। नकुल रोता है, राजा युधिष्ठिर बोलते हैं - चिंता मत करो भैया, सहदेव को अपने पंडिताई के ऊपर में बहुत गर्व था कि मेरे से बड़ा पण्डित कोई नहीं है। आगे चलते हैं तो कुछ दूर जाने के बाद में नकुल महाराज गिर जाते हैं। अर्जुन रोते हैं - हाय भाई। आज तुम हमे छोड़कर कहाँ चल दिये नकुल। राजा युधिष्ठिर कहते हैं - शोक त्याग दो अर्जुन और आगे चलो। नकुल को अपनी सुंदरता के ऊपर में गर्व था। बताया गया है रागी नकुल जैसे सुन्दर पुरूष तो द्वापर मे कोई था ही नहीं। कहते हैं - चलो। फिर आगे हिमालय की ओर चलते हैं। कुछ दूर जाने के बाद मे अर्जुन पहाड़ में गिर जाते हैं। भीम को दुख होता है। हा भैया तुम्‍हारे जैसे भरतवीर कोई नहीं है अर्जुन। आज तुम हमे छोड़ कर चले गए। राजा कहते हैं भीम! पीछे मुड़ कर मत देखो, दुख मत लो। चलो चलते हैं। फिर आगे चलते हैं। कुछ दूर जाने के बाद मे जो काल के भी काल महाकाल हैं, पवन नंदन भीमसेन गिर पड़ते हैं।

 

 

राजा युधिष्ठिर बांचगे रागी वहीं जगा एक श्वान फिर आगमन होथे। एक कुकुर आव हेवय। राजा धरमराज के पीछे पीछे वो कुत्ता चलत हवय। कुछ दूर जाने के बाद देवता लोक से विमान आवत हे रागी भैया। अऊर विमान मे जो सारथी आये हे। हाथ जोड़कर राजा युधिष्ठिर ल काहत हे - महराज ये नदिया मे स्नान करले अऊर स्नान करके वस्त्र आभूषण पहन के ये विमान मे बैठजा। राजा नदी मे स्नान करते हैं वस्त्र आभूषण जब पहनथे रागी दूत ह कहिथे - विमान मे बइठ महराज मैं लेगे ल आये हौं। राजा काहत हे भैया! मोर संग में पहिली ए कुत्ता ल बइठारबे तेंह विमान मे तब मैं ये विमान मे बइठ के स्वर्ग जाहूँ। राजा के धर्म ल अऊ राजा के उदारता ल दखिस तो वो कुत्ता अपन आप ल प्रगट करिस, धर्म के रूप में साक्षात कहे - धर्मराज! तैं धन्य हस। रागी भैया राजा युधिष्ठिर विमान में बइठ के स्वर्ग सिधारत हे। सुरलोक जाके देखे सारी देवता बैठे हैं। वहां जाके देखथे राजा यधिष्ठिर भीष्म पितामह, अष्टावसु देवताओं के बीच में विराजमान है। जतेक बड़े-बड़े वीर मन हे कुरूक्षेत्र में सबला देवता के रूप में देखत हे रागी भाई। सब आसीन है पर ओमेर देखिस राजा युधिष्ठिर तो थोड़ा से राजा ल भ्रमित होथे जब स्वर्ग जाथे तो कौरव ल तो देव के सभा में पाये पर बताए हे पाण्डव में चार भाई ल नरक में जगा मिले हे ये देखथे रागी। राजा युधिष्ठिर नरक देखथे। तो काबर नरक देखथे तो बताए हे थोड़ा से विश्‍लेषण में “नरो या कुंजरो” रागी भाई आखरी समय में गुरूद्रोण ल एक ठो झूठ बोलिस धरमराज केवल नर या कुंजर। ये युद्ध के मैदान मे अश्‍वस्थामा मरे हे महराज नर या कुंजर “नरो या कुंजरो” ओतके केहे रिहिस हे। तेमा राजा युधिष्ठिर नरक देखे बर गेहे। रागी भैया हम मनुष्य जोनि मे अवतार ल हन। ये मानव के कर्म ए भगवान न जाने कितना हजारों योनि ला भोगे के बाद हमला मानव तन मे भेजे हे। तो इंसान ल अपन मानव के धर्म ल नइ भूलना चइए। ये कर्म भूमि ये रागी भाई। कर्म करे बर पड़थे। पांचो भैया पाण्डवर सारी सेना अपन अपन शरीर ल त्याग के सब वीरगति प्राप्त करथे। स्वर्ग सिरधारथे यही से स्वर्गरोहण पर्व के कथा संपन्ना होथे।

वैसम्पायन जी महराज राजा जन्मेजय ला ये प्रसंग ल बताये।

कहिथे बेटा! यही से ये महाभारत सम्पन्न हो जाथे।

रघुपति राघव राजा राम

सीताराम सीताराम

रघुपति राघव राजा राम।

बोलिए वृंदावन बिहारी लाल की जय।

 

राजा युधिष्ठिर बच गए हैं रागी, उसी जगह में एक श्वान का आगमन होता है। एक कुत्‍ता आता है। राजा धर्मराज के पीछे पीछे वह कुत्ता चलता है। कुछ दूर जाने के बाद देव लोक से विमान आ रहा है रागी भैया और विमान मे जो सारथी आया है। वह हाथ जोड़कर राजा युधिष्ठिर से कहता है - महराज इस नदी मे स्नान करलो और स्नान करके वस्त्र आभूषण पहन कर इस विमान मे बैठ जाइये। राजा नदी मे स्नान करते हैं वस्त्र आभूषण जब पहनते हैं रागी, दूत कहता है - विमान मे बैठें महराज, मैं ले जाने के लिए आया हूँ। राजा कहते हैं भैया! मेरे पहले मेरे साथ आए इस कुत्ते को विमान मे बैठा लो तब मैं इस विमान मे बैठ कर स्वर्ग जाउंगा। राजा के धर्म  और राजा की उदारता को देखते ही वह कुत्ता अपने आप को धर्म के रूप में प्रगट करता है, धर्म साक्षात कहते हैं - धर्मराज! तुम धन्य हो। रागी भैया राजा युधिष्ठिर विमान में बैठ कर स्वर्ग सिधार रहे है। सुरलोक जाकर देखते हैं सभी देवता बैठे हैं। वहां जाकर देखते हैं राजा यधिष्ठिर भीष्म पितामह, अष्टवसु देवताओं के बीच में विराजमान हैं। जितने बड़े-बड़े वीर हैं कुरूक्षेत्र में सभी को वहां देवता के रूप में देखते हैं रागी भाई। सभी आसीन है किन्‍तु वहां राजा युधिष्ठिर देखते हैं तो थोड़ा भ्रम होता है जब स्वर्ग जाते हैं तो कौरवों को देव के सभा में पाने पर बताया गया है पाण्डव में चार भाई को नर्क में जगह मिलता है यह देखते हैं रागी। राजा युधिष्ठिर नर्क देखते हैं तो किसके लिए नर्क दिये हैं तो बताया गया है थोड़ा सा विश्लेषण में “नरो या कुंजरो” रागी भाई आखरी समय में गुरूद्रोण को एक झूठ बोले धर्मराज केवल नर या कुंजर। इस युद्ध के मैदान मे अश्वस्थामा मरा है महाराज नर या कुंजर “नरो या कुंजरो” इतना ही कहे थे। उसमें राजा युधिष्ठिर नर्क देखने के लिए गए हैं। रागी भैया हम मनुष्य योनि मे अवतार लिये हैं। यह मानव का कर्म है भगवान न जाने कितने हजारों योनि को भोगने के बाद हमे मानव तन मे भेजते है। तो इंसान को अपना मानव धर्म को नहीं भूलना चाहिए। यह कर्म भूमि है रागी भाई। कर्म करना पड़ता है। पांचो भैया पाण्डव समस्‍त सेना अपने अपने शरीर को त्याग कर सभी वीरगति को प्राप्त करते हैं। स्वर्ग सिरधारते हैं, यही से स्वर्गारोहण पर्व का कथा संम्‍पन्‍न होता है।

 

वैसम्पायन जी महराज राजा जन्मेजय को इस प्रसंग को बताये हैं। कहते हैं बेटा! यहीं से यह महाभारत सम्पन्न हो जाता हैं। रघुपति राघव राजा राम, सीताराम सीताराम, रघुपति राघव राजा राम।

 

बोलिए वृंदावन बिहारी लाल की जय।

 

 

Transcript: Musal Parv

Chhattisgarhi: पहुंचगे अर्जुन द्वारिका नगर। भगवान के दर्शन करथे। भोजन पानी करके विश्राम करथे। देवर्षि नारद ल भगवान ह पूछत हे - कइसे आये हस। नारद जी दोनो हाथ जोड़ के भगवान ल काहत हे - प्रभु ये मानव के रूप में ये धरती में बहुत दिन होग तोला राहत। परमधाम जाये के समय आगे हे। भगवान ब्रम्हा मोला भेजे हे। बोले देरी काबर करत हस कहे नारद, बोले भगवान आपला अब परमधाम आना हे। भगवान कृष्ण बोले कुछ दिन अऊ रहिहौं नारद। कुछ दिन के बाद में मै वापिस आ जहूँ भैया। भगवान नारद ल समझाके वापिस करथे रागी। भगवान विचार करत हे। यदु कुल के नाश कइसे होही ? यादव के मरैया कोनो जनम नइ लेये ये द्वापर मे। जब तक ये यादव के समाज ल श्राप नइ लगही रागी भैया ये यादव ला कोनो नइ मार सकय। भगवान विचार करथे - बारिस के समय आथे। चातुर्मासा बिताए के खातिर बड़े बड़े तपस्वी बड़े बड़े ज्ञानी, बड़े बड़े महामुनि द्वारिका नगर मे पहुंचत हे रागी। वो सब ऋषि मुनि के संग में महा ऋषि दुर्वासा भी आये हे। बड़े बड़े ज्ञानी, बड़े बड़े तपस्वी। ऋषिमुनि मन काहत हे - महराज! चार महीना चौमास भर हम तोर घर रहीबो द्वारिका नगर में, जइसे चौमास बीत जही महराज वापस हम जंगल चल जाबो। बलदाऊ जी कहे हम धन्य होगेन। रागी भैया वो तपस्वी मन के रेहे के बेवस्था कर देथे। भगवान विचार करत हे कि क्या बेवस्था किया जाय, क्या किया जाय अइसे हरि इच्छा होथे। एक दिन के बात ये रागी यादव लइका मन घूमे ल निकले रहय। अपने अपन मन विचार करिस। अऊ दुर्वासा ऋषि ल देखिन ताहने कहिथे - राहा तो ये जानथे धन नहीं ऋषि दुर्वासा से छल करना चाहिए। हंसी उड़ाये दुर्वासा के। जामवन्ती के एक झन बेटा हे - साम नाम के। वो साम नाम के राजकुमार ल लड़की के स्वरूप में बना देथे। नाना प्रकार के श्रृंगार करथे भैया। गर्भवती स्त्री के रूप में वो लइका ल तैयार करथे। जामवंती के बेटा साम नाम के राजकुमार अऊ गर्भवती लड़की के रूप में दुर्वासा के आगु में खड़े कर देथे। यादव लइका मन पूछथे दुर्वासा ला - महराज! ये स्त्री गर्भवती हे। येला सोच के बतातेव अपन तपोबल के बल से येकर गर्भ ले लड़की पैदा लिही या लड़का ? ये बात ल सुनिस दुर्वासा जी ध्यान लगा के देखिस अऊर ध्यान लगा के देखे तो क्रोध मे दुर्वासा के नेत्र लाल होगे। बोले - अरे! भगवान श्रीकृष्ण के कुल में जन्म लेव। बोले अरे यादव ये बालक बोले आके मोर से आज परिहास करत हौ, मोला छल करत हौ। दुर्वासा जी श्राम देते हैं - जाओ एकर गर्भ ले जनम लिही एकरे द्वारा यादव कुल के मौत होही। एकर गर्भ ले मूसल जनम लिही कहिस। रागी भैया साम के गर्भ ले एक ठन मूसल जनम लेथे। वो मूसल ल देखथे राजा उग्रसेन मन विचार करथे कि भई अब का करना चइए। तो बड़े बुजुर्ग मन विचारथे त समुद्र में घोर देथे। मूसल ल लेगिन अऊ समुद्र मे -

अगा सुन्दर मूसल ल घोरन लगे भैया

रागी सुन्दर मूसल ल घोरन लगे भैया।

हाँ यादव मन काहन लागे गा एगा भाई

यादव मन काहन लागे गा एगा भाई।

 

Hindi: पहुंच गए अर्जुन द्वारिका नगर। भगवान का दर्शन करते हैं। भोजन पानी करके विश्राम करते हैं। देवर्षि नारद को भगवान पूछते हैं - कैसे आये हो। नारद जी दोनो हाथ जोड़ कर भगवान को कहते हैं - प्रभु मानव के रूप में इस धरती में रहते हुए आपको बहुत दिन हो गए। अब परमधाम जाने का समय आ गया है। भगवान ब्रम्हा मुझे भेजे हैं। बोलते हैं देरी किसके लिए कर रहे हो, कहते हैं नारद, बोलते हैं भगवान आपको अब परमधाम आना है। भगवान कृष्ण बोलते हैं कुछ दिन और रह जाता नारद। कुछ दिन के बाद में वापस आ जाउंगा भैया। भगवान नारद को समझा कर वापस करते हैं रागी। भगवान विचार कर रहे है। यदुकुल का नाश कैसे होगा? द्वापर मे यादवों को मारने वाला कोई जन्‍म नहीं लिया है। जब तक इस यादव समाज को श्राप नहीं लगेगा रागी भैया इन यादवों को कोई मार नहीं सकता। भगवान विचार करते हैं – वर्षा का समय आता है। चातुर्मास बिताने के लिए बड़े-बड़े तपस्वी बड़े-बड़े ज्ञानी, बड़े-बड़े महामुनि द्वारिका नगर मे पहुंचत रहे हैं रागी। वे सब ऋषिमुनि के साथ मे महाऋषि दुर्वासा भी आये है। बड़े बड़े ज्ञानी, बड़े बड़े तपस्वी। ऋषि मुनि सब कहते हैं - महाराज! चार महीना चौमास तक हम तुम्‍हारे घर में रहेंगे, द्वारिका नगर में, जैसे ही चौमास बीतेगी महाराज हम वापस जंगल चले जायेंगें। बलदाऊ जी कहते हैं हम धन्य हो गए। रागी भैया वे सभी तपस्वियों की रहने की व्‍यवस्‍था कर देते हैं। भगवान विचार कर रहे हे कि क्या किया जाय, क्या किया जाय, ऐसे हरि इच्छा होता है। एक दिन की बात है रागी यादव बच्‍चे सब घूमने निकले थे। उन्‍होंनें अपने अपने मन में विचार किया और दुर्वासा ऋषि को देख कर कहते हैं - रूको तो यह जानते हैं कि नहीं, ऋषि दुर्वासा से छल करना चाहिए। इसकी हंसी उड़ाना चाहिए। जामवन्ती का एक साम नाम का बेटा था। उस साम नाम के राजकुमार को लड़की का रूप देकर लड़की बना देते हैं और उसका नाना प्रकार के श्रृंगार करते हैं भैया। उसे गर्भवती स्त्री का रूप देने के लिए उसके पेट में सामान रख देते हैं। जामवंती के बेटे साम नाम के राजकुमार को गर्भवती लड़की के रूप में दुर्वासा के सामने खड़ा कर देते हैं। यादव लड़के दुर्वासा से पूछते हैं - महराज! यह स्त्री गर्भवती है। इसे अपने तपोबल के बल से विचार कर बताइये कि इसके गर्भ से लड़की पैदा होगी या लड़का? इस बात को दुर्वासा जी सुनते हैं, ध्यान लगा कर देखेते हैं  तब क्रोध मे दुर्वासा के नेत्र लाल हो जाते हैं। बोलते हैं - अरे! भगवान श्रीकृष्ण के कुल में जन्म लिये हो, अपने आप को यादवों का बालक बोलते हो और यहां आकर मेरे से आज परिहास कर रहे हो, मुझसे छल कर रहे हो। दुर्वासा जी क्रोधित होकर श्राप देते हैं - जाओ इसके गर्भ से जो जन्‍म लेगा उसी के द्वारा यादव कुल की मौत होगी। कहते हैं इसके गर्भ से मूसल जन्‍म लेगा। रागी भैया साम के गर्भ से सहीं में एक मूसल का जन्‍म होता है। उस मूसल को देखते हैं राजा उग्रसेन, मन में विचार करते हैं कि अब क्‍या करना चाहिए। फिर बड़े बुजुर्ग सब विचार करते हैं कि इसे समुद्र में घोल देते हैं। मूसल को ले कर समुद्र में जाते हैं और -

अजी सुन्दर मूसल को घिसने लगे भैया, रागी सुन्दर मूसल को घिसने लगे भैया। यादव लोग कहने लगे भाई, यादव कहने लगे भाई।

 

 

इस मूसल को घोर दिया जाय। घिस दिया जाय। समुद्र में लेगिन अऊ पथरा में धर के घिस घिस के नास करिन रागी भैया नानचिन मूसल बांचथे तेला फेंक देथे। वो जो मूसर ल घोरे राहय वो समुद्र के तीर मे गोंदलइया के रूप में जाम जथे। खड़े हो जथे गोंदला के रूप में खड़ा होगे। अऊ वो नान चुन जो लोहा के चूर्ण बांचे रहय वोला एक जरक नाम के ब्याध ह आथे अऊ देखथे। शिकारी ह पहुंचाथे जाल मारथे ल। तो कहे येह बान के नोक मे लगाए के लइक हे रागी। वोला बान के नोक मे लगा देथे। समय बीतत हे। एक दिन के बात ए भगवान कृष्ण कहे - जब तक द्वारिका में यादव मन राज करही इकर मौत नइ होवय क्योंकि द्वारिका ला श्राप नइ होय हे यादव के कुल ला श्राप होय हे। भगवान कथे - भैया चलो आज हम प्रभात क्षेत्र चलते हैं। प्रभात क्षेत्र जाके स्नान करना हे। समस्त यदुवंशी समाज उद्धव ला छोड़िस। भगवान समझा दिस कलयुग के आगमन होवथे। कहे - भैया उद्धव तैं बद्रिका आश्रम जाके भगवान के तपस्या करके अपन शरीर ल त्याग दे। बलराम अऊर भगवान यादव के समाज लेके प्रभात क्षेत्र आथे। अऊर प्रभात क्षेत्र में आए के बाद अइसे हरि इच्छा होथे रागी जतका यादव हे तेमन ह -

अरे मदिरापाने गा करन लगे भैया

मदिरापाने गा करन लगे भाई।

नशा म चूर गा होवन लगे भैया

नशा म चूर गा होवन लगे भाई।।

 

इस मूसल को घिस कर समुद्र में घोल दिया जाय। घिस दिया जाय। समुद्र में ले जाते हैं और पत्‍थर के उपर घिस घिस कर इसे नाश कर दिये, रागी भैया छोटा सा मूसल बचता है उसे फेंक देते हैं। वह बचा हुआ मूसल का तुकड़ा समुद्र के तट मे गोंदइया (जल के किनारे उगने वाली प्‍याज सदृश्‍य वनस्‍पति) के रूप में जम जाता हैं। गोंदईला के रूप में खड़ा हो जाता है। बचे हुए उस छोटे से लोहे के तुकड़े को एक जरक नाम का ब्याध देखता है । वह शिकारी उस समय समुद्र में जाल डालने पहुंचता है। उसे वह तुकड़ा मिलता है तो वह सोचता है कि यह बाण के नोक मे लगाने के लायक है रागी। वह उसे बाण के नोक मे लगा लेता हैं। समय बीतता है, एक दिन की बात है भगवान कृष्ण कहते हैं - जब तक द्वारिका में यादव राज करेंगे तो इनकी मौत नहीं होगी क्योंकि द्वारिका को श्राप नहीं मिला है। यादव के कुल को श्राप मिला है। भगवान कहते हैं - भैया चलो आज हम प्रभात क्षेत्र में चलते हैं। प्रभात क्षेत्र जाकर स्नान करना है। समस्त यदुवंशी समाज उद्धव को छोड़ कर। भगवान नें उसे समझा दिया कि कलयुग का आगमन होने वाला है। कहते हैं - भैया उद्धव तुम बद्रिका आश्रम जाकर भगवान की तपस्या करके अपना शरीर त्याग दो। बलराम और भगवान, यादव के समाज को ले कर प्रभात क्षेत्र में आते हैं और प्रभात क्षेत्र में आकर ऐसा हरि इच्छा होता है रागी, जितने यादव हैं वे -

अरे मदिरा पान करने लगते हैं  भैया, मदिरा पान करने लगते हैं  भैया। नशे मे चूर होने लगते हैं भैया, नशे मे चूर होने लगते हैं भैया।

 

 

मदिरा पान करथे। अऊर जब मदिरा पान करथे यादव के समाज नशा मे धूत हो जथे। कोन ह बाप ये कोन ह बेटा ए,कोन ह परिवार ए। रागी भैया एक दूसर से लड़े मिट जथे। एक दूसर से यादव परिवार अपने अपन -

ओमा युद्धे गा होवन लागे भाई

मारो - यदुकुल अपने अपने लड़त हे प्रभात क्षेत्र में

रागी मारो-मारो अब काहन लागे भाई।

यदुवंशी काहन लागे गा मोर भाई

यदुवंशी काहन लागे गा मोर भाई।

कोई ल कोई नइ गुनत हे। अस्त्र-षस्त्र नइ पूरत ए रागी तो जो वो मूसर ल घोरे राहय तेन समुद्र के तीर मे गोंदला के रूप में - तीन भाग में वो बने हे। धार हे तलवार जइसे उही ला तोड़ के -

सारी बीर गा मारन लगे भैया ए भाई

सारी बीर गा लड़न लगे भैया ए भाई।

मारो मारो गा कहन लगे भैया ए भाई

सारी बीर गा मरन लगे भाई।

 

सभी यादव मदिरापान करते हैं और इतना मदिरापान करते हैं कि संपूर्ण यादव समाज नशे मे धुत्‍त हो जाता है। कौन बाप है कौन बेटा है, कौन परिवार है। रागी भैया एक दूसरे से लड़ भिड़ जाते हैं। एक दूसरे से यादव परिवार अपने-अपने -

उनमें युद्ध होने लगा भाई, मारो - प्रभात क्षेत्र में यदुकुल अपने अपने में लड़ रहे हैं। रागी मारो-मारो अब कहने लगे भाई। यदुवंशी कहने लगे भाई, यदुवंशी कहने लगे मेरे भाई।

कोई किसी का सम्‍मान नहीं कर रहा है, बस एक-दूसरे पर प्रहार कर रहे हैं। अस्त्र-शस्त्र की कमी हो गई है। समुद्र के किनारे मे घुले मूसल से उपजे गोंदइला (जिसका पर्ण तीन भाग में बटा है और जिसके किनारे में तलवार जैसे धार है) को तोड़-तोड़ कर ..

सारे वीर एक-दूसरे को मारने लगे भैया, ए भाई सारे वीर लड़ने लगे भैया। मारो मारो कहने लगे भैया, सभी वीर मरने लगे भाई।

 

 

मारो। बीर बलदाऊ जब देखिस प्रभात क्षेत्र में वो समय रूप ल त्याग के भैया फिर शेषनांग के रूप में जाके समुद्र मे समा जथे। शेषावतारी हे गा बलदाऊ जी। प्रभात क्षेत्र ल छोड़के भगवान कुछ दूर जाथे। बताए हे एक पीपल के झाड़ हे। पीपल के झाड़ में भगवान टेक लगा के ओधे हे। एक पांव दूसरा पांव के ऊपर मे रखे हुए हे। भगवान के पांव में पद्म के चिन्ह हे, कमल समान सुन्दर दिखत हे। श्यामला शरीर मोर मुकुट बांधे हे। पिताम्बर पहिने हे भगवान के परमधाम जाये के समय हे। पीपर रूख में ओधे हे रागी। एक पांव ल दूसरा पांव के ऊपर रखे हे भगवान, वहीं बालि नाम के शिकारी के नजर परिस शिकार करत आइस। भगवान के पांव ल देखिस ल दूरिहा ले अइसे दिखत राहय मानो वो मृगा के आँखी कस दिखत हे। शिकारी ल धोखा होगे। निकालथे त्रुण से बान अऊर वही जो नानचुक लोहा फेंकाय राहय लेन ला बान म घुसाए राहय रागी। शिकारी निकाले बान अऊर मंत्र पढ़के छोड़ देथे। बान जाके भगवान के पांव मे लग जथे रागी भैया। भगवान के पांव मे जब लगथे। भगवान व्याकुल हो जाथे। शिकारी दौड़ के जाथे। देखथे त भगवान दर्द के मारे तड़पत रइथे। शिकारी दोनो हाथ जोड़के खड़ा हो जाथे। कहे - महराज मोर से भूल होगे, मैनइ जानत रहेंव मोर से गलती होगे महराज। मैं तो मृगा समझ के तोला बान मारे हौं। भगवान हांस के कहे - भैया। एक दिन महूं तोला लूका के मारे रहे हौं। भगवान कहे - दूखी होय के बात नइये। अरे महूँ तोला मारे रेहेंव। कब ? जे दिन मैं त्रेतायुग में राम अवतरे रेहेंव अऊ तैं बालि रेहे। वो दिन पैं पेड़ के आड़ लेके तोर ऊपर मे बान चलाय रेहेंव बालि। वो दिन मैं मारे रेहेव आज तैं मोला मार ले। दूखी होय के बात नइये। फेर भगवान ब्याकुल हो जाथे रागी भैया। वो समय के दृष्य। फिर भगवान बांके बिहारी ये पंत्रविभूति के शरीर ला त्याग देथे। द्वारिकाधीष भगवान परमधाम चल देथे। रागी भैया, द्वारिका ल समुद्र डूबा देथे।

 

मारो ! वीर बलदाऊ जब देखते हैं कि प्रभात क्षेत्र में उस समय अपने रूप को त्याग कर भैया फिर शेषनाग के रूप में जाकर समुद्र मे समा जाते हैं। शेषावतारी हैं जी बलदाऊ। प्रभात क्षेत्र को छोड़ कर भगवान कुछ दूर जाते हैं। बताया गया है कि एक पीपल का वृक्ष है। उस पीपल के वृक्ष में भगवान टेक लगा कर खड़े है। एक पांव दूसरे पांव के ऊपर मे रखा है। भगवान के पांव में पद्म का चिन्ह है, कमल समान सुन्दर दिख रहे है। श्यामला शरीर मोर मुकुट बधा है। पीताम्बर पहने हैं, भगवान का परमधाम जाने का समय है। पीपल वृक्ष में टिके हैं रागी। एक पांव को दूसरे पांव के ऊपर रखे हैं भगवान, वही बाली नाम के शिकारी की नजर पड़ी वह शिकार करते हुए आ रहा है। दूर से भगवान के पांव को देखा तो दूर से ऐसे दिख रहा है मानो वो मृग की आँख है। शिकारी को धोखा होता है। निकालता है तूणीर से बाण जिसके नोक में वही मूसल का छोटा तुकड़ा लगा है रागी। शिकारी उसे निकालता है और मंत्र पढ़कर छोड़ देता है। बाण जाकर भगवान के पांव मे लग जाता है रागी भैया। भगवान के पांव मे जब लगता है, भगवान व्याकुल हो जाते हैं। शिकारी दौड़ कर जाता हैं। देखता है तो भगवान दर्द के मारे तड़फ रहे हैं। शिकारी दोनो हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता है। कहता है - महराज मुझसे भूल हो गई, मै नहीं जानता था, मुझसे गलती हो गई महराज। मैं तो मृग समझ कर आपको बाण मारा हूँ। भगवान हंस कर कहते हैं – भैया, एक दिन मैं भी तुम्‍हें छिप कर मारा था। भगवान कहते हैं - दुखी होने की बात नहीं है। अरे मैं भी तुम्‍हें इसी तरह मारा था। कब ? जब मैं त्रेतायुग में राम अवतार लिया था और तुम बाली थे। उस दिन मैं पेड़ की आड़ ले कर तुम्‍हारे ऊपर बाण चलाया था। उस दिन मैं मारा था आज तुम मुझे मार लो। दुखी होने की बात नहीं है। भगवान ब्याकुल हो जाते हैं रागी भैया। उस समय का दृश्य, अहा। फिर भगवान बांके बिहारी इस पंचभूत शरीर को त्याग देते हैं। द्वारिकाधीश भगवान परम धाम को चले जाते हैं। रागी भैया, द्वारिका को समुद्र में डूबा देते हैं।

 

Transcript- Swargarohan Parv

Chhattisgarhi: राजा धरमराज कहिस - अर्जुन। भगवान चलदिस। अब ये दुनिया में हमर कोनो काम नइये। अब हमला भी जाना हे। रागी भाई, फिर बताए हे राजा परीक्षित ल बलाये। परीक्षित राजा युधिष्ठिर के नाती, अभिमन्यु के पुत्र ये। परीक्षित के फिर राज्यभिषेक करथे। कहे - बेटा। अब तोला यहां के राज ल संभाले बर हे। धौम्य पुरोहित राज्यभिषेक कर देथे। तेकर पाछू नगर के प्रजा से विदा लेथे राजा युधिष्ठिर ह। पांचो भैया पाण्डव संग में महारानी द्रोपदी अऊर हस्तिना के प्रजा से विदा लेके के बाद में -

अरे उत्तर दिशा गा चलन लगे भैया जी

उत्तर दिशा गा चलन लगे भाई।

हाँ नगर के प्रजा देखन लगे भाई

बोल – महराज

 

Hindi: राजा धर्मराज कहते हैं - अर्जुन ! भगवान चले गये ! अब इस दुनिया में हमार कोई काम नहीं है। अब हमे भी जाना है। रागी भाई, फिर बताया गया है राजा परीक्षित को बुलाते हैं। परीक्षित राजा युधिष्ठिर के पौत्र, अभिमन्यु के पुत्र हैं। परीक्षित का राज्यभिषेक करते हैं। कहते हैं - बेटा ! अब तुम्‍हें इस राज्‍य को सम्‍भालना है। धौम्य पुरोहित राज्यभिषेक कर देते हैं। उसके बाद नगर के प्रजा से राजा युधिष्ठिर विदा लेते हैं। पांचो भैया पाण्डव साथ मे महारानी द्रौपदी हस्तिना की प्रजा से विदा ले कर

अरे उत्तर दिशा में चलने लगे भैया जी, उत्तर दिशा में चलने लगे भाई। नगर की प्रजा देखने लगी भाई,  

बोले - महाराज !

 

 

नगर के प्रजा देखन लगे भाई। उत्तर दिशा की ओर चलते हैं जहां हिमालय पर्वत हे। बताए हे नगर के प्रजा मन एक योजन तक ओला बिदा करे ल गे हे। आखिर मे धरमराज समझा के वापिस कर देथे रागी भैया। पांचो भाई माँ द्रोपदी चलत हे। जात - जात बीच में कैलाश परथे। पांचो भाई आपस में चर्चा करथे - भैया। अब तो हम जाथन हिमालय में अपन ये शरीर के त्याग करे बर। जात जात भोला नाथ के दर्शन कर लेथन। एक बार भगवान के दर्शन कर लेथन। माँ भवानी ल लेके भगवान बइठे हे। भगवान देखिस - पाण्डव आवथे। भगवान पार्वती ल काहथे - गिरजा! ए...ए...ए पापी मन आवत हवय। अपन कुल के नाश करके आज वोमन हिमालय मे प्राण त्यागे ल जात हे। अऊ मोर दर्शन करे के खातिर आवत हे एमन। बोले - गिरजा! मै एमन ला दर्शन नइ देवंव। दर्शन नइ दौं। माँ पार्वती कहे - कइस ? बताए हे रागी उही तीर मे एक ठन डबरा राहय उही डबरा में अड़बड़ अकन भैंसा बुड़े राहय। भगवान भैंसा के रूप धरथे अऊ डबरा में बुड़ जथे। पाण्डव मन आथे त अकेल्ला दाई भर ल बइठे पाथे। अकेला बइठे हे पार्वती ह। पाण्डव मन दोनो हाथ जोड़ के पूछत हे - दाई भगवान कहां हे, कहां गे हे ? माँ भवानी कथे - नइ जानत औ। पाण्डव कथे - आखिरी समय म हमन भगवान के दर्शन करे आये हन। अब वोमन तर्क लगावय गा, कहां गे होही। भीम कथे भैया। हो न हो ये डबरा मे हे वो ह। भीमसेन तर्क लगा के कहे - इहां हे वो ह। अऊ हमला वो दर्शन नई देना चाहत हे। भीमसेन काहय-तुमन ओती ले कुदावत-कुदावत लानौ सब भैसा मन ला। है न अऊ मैं दू ठन पहाड़ में पांव ल फैला के खड़े हौं। सिरतोन के भैसा होही तेन मोर गोड़तरी ले बुलक के नाहक जही। अऊ वो कहूँ लुकाय होही त मोर गोड़ के नीचे ले नइ बुलकय। अब भीम खड़े हे रागी दूठो पहाड़ मे अऊ वाकई सब भइंसा मन ल खेदय त एक ठन भंइसा मेछरावय गा। पाण्डव मन जान डारिस ये दिही हर आय। पांचो भैया पाण्डव भगवान के चरण में गिरजथे रागी। देवाधिदेव! महादेव के दर्शन करते है। अऊर भगवान के दर्शन करके -

अरे पांचो भैया गा चलन लगे भैया

पांचो पाण्डव गा चलन लगे भाई।

बीचे जंगल गा पहुंचन लगे भैया

जंगल जंगल गा चलन लगे भाई।

 

नगर की प्रजा देखने लगी भाई। उत्तर दिशा की ओर जाते हैं जहां हिमालय पर्वत है। बताया गया है प्रजा एक योजन तक उन्‍हें बिदा करने जाती है। अंत मे धर्मराज उन्‍हें समझा कर वापिस करते हैं रागी भैया। पांचो भाई, माँ द्रौपदी चल रहे है। जाते - जाते बीच में कैलाश पड़ता है। पांचो भाई आपस में चर्चा करते हैं - भैया। अब तो हम हिमालय मे अपने इस शरीर को त्याग करने लिए जा रहे हैं। जाते जाते भोला नाथ के दर्शन कर लेते हैं। एक बार भगवान का दर्शन कर लेते हैं। माँ भवानी को लेकर भगवान बैठे हैं। भगवान नें देखा - पाण्डव आ रहे हैं। भगवान पार्वती को कह रहे हैं - गिरजा! ए...ए...ए पापी लोग आ रहे हैं। अपने कुल का नाश करके आज ये  हिमालय मे प्राण त्यागने के लिए जा रहे है और मेरा दर्शन करने के लिए आ रहे हैं। बोलते हैं - गिरजा! मै इन्‍हें दर्शन नहीं दूंगा। दर्शन नहीं दूंगा, माँ पार्वती कहती हैं - कैसे ? बताया गया है रागी वहीं पास मे एक पानी का पोखर था उसमे बहुत से भैंसे डूबे थे। भगवान भैंसा का रूप लेते हैं  और उसमें डूब जाते हैं। पाण्डव आते हैं तो माता बस को अकेली बैठी पाते हैं। पार्वती अकेली बैठी है। पाण्डव दोनो हाथ जोड़ कर पूछते हैं - माता भगवान कहां है, कहां गए हैं ? माँ भवानी कहती हैं – मुझे पता नहीं है। पाण्डव कहते हैं - आखिरी समय मे हम भगवान का दर्शन करने आये हैं। अब वे तर्क लगा रहे हैं, कहां गए होंगे। भीम कहते हैं भैया, हो न हो वे इस पोखर मे हैं। भीमसेन तर्क लगा कर कहते हैं - यहीं हैं वे और हमे वे दर्शन नहीं देना चाहते हैं। भीमसेन कहते हैं –तुम लोग उधर से सब भैसों को दौड़ाते- दौड़ाते लावो और मैं दो पहाड़ में पांव को फैला कर खड़ा हूँ। सही में भैस होंगे वे मेरे पैर के नीचे से पार हो जायेंगें और वे कहीं छिपे होंगे तो मेरे पैर के नीचे से पार नहीं हो पायेंगे। अब भीम खड़े हैं रागी दो पहाड़ मे और वाकई सब भैसों को हंकालते हैं तो एक भैंस इतराने लगा। पाण्डव जान गये यही है। पांचो भैया पाण्डव भगवान के चरण में गिर जाते हैं रागी। देवाधिदेव! महादेव के दर्शन करते है और भगवान के दर्शन करके -

अरे पांचो भैया चलने लगे भैया, पांचो पाण्डव चलने लगे भाई। बीच जंगल में पहुंचने लगे भैया,  जंगल जंगल चलने लगे भाई।

 

 

भयानक जंगल के बीच चलते हैं। रागी भैया जब भयानक जंगल के बीच में जावथे तब पाण्डव ह काहत हे -

लागे मेला गा

लागे मेला गा, जिनगी के कठिन झमेला।

छांटे निमारे बिसा लौ सौदा

काबर करत हौ झमेला रे

लागे मेला गा

लागे मेला गा, जिनगी के कठिन झमेला।।

हाँ कोनो आथे कोनो जाथे, कोनो करत हे तैयारी गा

हाँ कोनो आथे कोनो जाथे, कोनो करत हे तैयारी गा।

तोला जाए ला परही हाँ एक दिन आही पारी गा

तोला जाए ला परही हाँ एक दिन आही पारी गा।

बंधना बांधे घेंच ओरमाए

बंधना बांधे घेंच ओरमाए।

एके पति के खेला रे

लागे मेला, लागे मेला, लगे मेला गा,

जिनगी के कटही झमेला।।3।।

 

भयानक जंगल के बीच में चलते हैं। रागी भैया, जब भयानक जंगल के बीच में जाते हैं तब पाण्डव कहते हैं -

मेला लगा है, मेला लगा है, जिन्‍दगी का कठिन झमेला है। छांट कर खरीद लो, सौदा किसके लिए कर रहे हो, यह सब  झमेला है रे, लगा मेला है रे। लगा मेला है, जिन्‍दगी का कठिन झमेला है। कोई  आता है कोई जाता है, कोई तैयारी कर रहे हैं, हॉं कोई  आता है कोई जाता है, कोई तैयारी कर रहे हैं। तुम्‍हें जाना पड़ेगा एक दिन तुम्‍हारी भी पाली आएगी, तुम्‍हें जाना पड़ेगा एक दिन तुम्‍हारी भी पाली आएगी। बंधन को बांध कर गले में लटकाये हो, बंधन को बांध कर गले में लटकाये हो। एक क्षण का ही खेल है रे, मेला लगा है, मेला लगा है, जिन्‍दगी का कटेगा झमेला रे।

 

 

रागी भैया, पांचो भैया पाण्डव फिर भयानक बर्फ के पहाड़ में हिमालय के ऊपर में चलत हे। आगे-आगे राजा युधिष्ठिर पीछे-पीछे चारो भैया ओकर पीछे मे रानी द्रोपदी। सबल सिंह बताए हे। कुछ दूर जाये के बाद पहाड़ के ऊपर मे अचानक -

रानी द्रोपदी गिरन लगे भैया जी ऽ ऽ

रानी द्रोपदी गिरन लगे भाई।

बीर सहदेवे देखन लगे भैया

बीर सहदेवे देखन लगे भाई।

 

रागी भैया, पांचो भैया पाण्डव फिर भयानक बर्फ के पहाड़ में हिमालय के ऊपर में चल रहे है। आगे-आगे राजा युधिष्ठिर पीछे-पीछे चारो भैया उसके पीछे मे रानी द्रौपदी। सबल सिंह बताये हैं कुछ दूर जाने के बाद पहाड़ के ऊपर मे अचानक -

रानी द्रौपदी गिरने लगी भैया जी, रानी द्रौपदी गिरने लगी भाई। वीर सहदेव देखने लगा भैया, वीर सहदेव देखने लगा भाई।

 

 

माँ द्रोपदी गिर जाथे। रागी अपन प्राण ल त्याग देथे। सहदेव ल दुख होथे। सहदेव नाम के कुमार पलट के देखथे - रानी ल गिर देखथे। मस्तक ल पीट के चिल्ला के रोथे। राजा यधिष्ठिर पलट के पीछे की ओर नइ देखय। राजा धरमराज बोले - सहदेव! 18 दिन महाभारत के लड़ाई होय हे। ए लड़ाई देवी द्रोपदी के नाम से होइस हे। बोले सहदेव शोक ल त्याग दे। बोले - चल आगे चलते हैं। पाण्डव चले। चलते - चलते कुछ दूर आगे जाते हैं। कुछ दूर आगे जाने के बाद अचानक फिर

सहदेवे गिरन लागे गा ए गा भाई

सहदेवे गिरन लागे गा ए गा भाई।

वोला बीर नकुल ह देखन लगे भाई

वोला बीर नकुल ह देखन लगे भाई।

हाँ मने मन सोचन लागे गा ए गा भाई

मने मन सोचन लागे गा ए गा भाई।

 

माँ द्रौपदी गिर जाती हैं। रागी, अपने प्राण को त्याग देती हैं। सहदेव को दुख होता है। सहदेव नाम का कुमार पलट कर देखता है - रानी को गिरते देखता है। मस्तक को पीट कर चिल्ला कर रोता है। राजा यधिष्ठिर पलट कर पीछे की ओर नहीं देखते। राजा धर्मराज बोलते हैं - सहदेव! 18 दिन महाभारत की लड़ाई हुई है। यह लड़ाई देवी द्रौपदी के नाम से हुई है। बोलते हैं सहदेव शोक को त्याग दो। बोलते हैं - चलो आगे चलते हैं। पाण्डव चलते हैं। चलते - चलते कुछ दूर आगे जाते हैं। कुछ दूर आगे जाने के बाद अचानक फिर

सहदेव गिरने लगा भाई, सहदेव गिरने लगा भाई। उसे वीर नकुल देखने लगा भाई, उसे वीर नकुल देखने लगा भाई। मन ही मन में सोचने लगा भाई, मन ही मन में सोचने लगा भाई।

 

 

सहदेव गिर जथे। नकुल रोये। राजा युधिष्ठिर बोले - चिंता मत कर भैया, सहदेव ल अपन पंडिताई के ऊपर में मद रिहिस हे कि मोर से बड़े पण्डित कोई नई हे। आगे चलथे कुछ दूर जाने के बाद में नकुल महराज गिर जथे। अर्जुन रोये - हाय भाई। आज तैं हमला छोड़के कहाँ चल दिये नकुल। राजा युधिष्ठिर कहते हैं - शोक त्याग दो अर्जुन और आगे चलो। नकुल ल अपन सुदरता के ऊपर में गर्व रिहिस हे। बताए हे रागी नकुल जइसे सुन्दर पुरूष तो कोई द्वापर मे है ही नहीं। कहे - चलो। फिर आगे चलते हैं हिमालय की ओर। कुछ दूर जाये के बाद मे अर्जुन फिर गिर गे पहाड़ में। भीम ल दूख होइस। हा भैया तोर जइसे भरतवीर कोई नइये अर्जुन। आज हमला छोड़ के तैं चलदेस। राजा कहत हे भीम! पीछे मुड़के मत देख दूख मत ले। चल चलते हैं। फिर आगे चलत हे। कुछ दूर जाये के बाद मे जऊन ह काल के भी काल महाकाल ए पवन नंदन भीमसेन गिर पड़थे।

 

सहदेव गिर जाता है। नकुल रोता है, राजा युधिष्ठिर बोलते हैं - चिंता मत करो भैया, सहदेव को अपने पंडिताई के ऊपर में बहुत गर्व था कि मेरे से बड़ा पण्डित कोई नहीं है। आगे चलते हैं तो कुछ दूर जाने के बाद में नकुल महाराज गिर जाते हैं। अर्जुन रोते हैं - हाय भाई। आज तुम हमे छोड़कर कहाँ चल दिये नकुल। राजा युधिष्ठिर कहते हैं - शोक त्याग दो अर्जुन और आगे चलो। नकुल को अपनी सुंदरता के ऊपर में गर्व था। बताया गया है रागी नकुल जैसे सुन्दर पुरूष तो द्वापर मे कोई था ही नहीं। कहते हैं - चलो। फिर आगे हिमालय की ओर चलते हैं। कुछ दूर जाने के बाद मे अर्जुन पहाड़ में गिर जाते हैं। भीम को दुख होता है। हा भैया तुम्‍हारे जैसे भरतवीर कोई नहीं है अर्जुन। आज तुम हमे छोड़ कर चले गए। राजा कहते हैं भीम! पीछे मुड़ कर मत देखो, दुख मत लो। चलो चलते हैं। फिर आगे चलते हैं। कुछ दूर जाने के बाद मे जो काल के भी काल महाकाल हैं, पवन नंदन भीमसेन गिर पड़ते हैं।

 

 

राजा युधिष्ठिर बांचगे रागी वहीं जगा एक श्वान फिर आगमन होथे। एक कुकुर आव हेवय। राजा धरमराज के पीछे पीछे वो कुत्ता चलत हवय। कुछ दूर जाने के बाद देवता लोक से विमान आवत हे रागी भैया। अऊर विमान मे जो सारथी आये हे। हाथ जोड़कर राजा युधिष्ठिर ल काहत हे - महराज ये नदिया मे स्नान करले अऊर स्नान करके वस्त्र आभूषण पहन के ये विमान मे बैठजा। राजा नदी मे स्नान करते हैं वस्त्र आभूषण जब पहनथे रागी दूत ह कहिथे - विमान मे बइठ महराज मैं लेगे ल आये हौं। राजा काहत हे भैया! मोर संग में पहिली ए कुत्ता ल बइठारबे तेंह विमान मे तब मैं ये विमान मे बइठ के स्वर्ग जाहूँ। राजा के धर्म ल अऊ राजा के उदारता ल दखिस तो वो कुत्ता अपन आप ल प्रगट करिस, धर्म के रूप में साक्षात कहे - धर्मराज! तैं धन्य हस। रागी भैया राजा युधिष्ठिर विमान में बइठ के स्वर्ग सिधारत हे। सुरलोक जाके देखे सारी देवता बैठे हैं। वहां जाके देखथे राजा यधिष्ठिर भीष्म पितामह, अष्टावसु देवताओं के बीच में विराजमान है। जतेक बड़े-बड़े वीर मन हे कुरूक्षेत्र में सबला देवता के रूप में देखत हे रागी भाई। सब आसीन है पर ओमेर देखिस राजा युधिष्ठिर तो थोड़ा से राजा ल भ्रमित होथे जब स्वर्ग जाथे तो कौरव ल तो देव के सभा में पाये पर बताए हे पाण्डव में चार भाई ल नरक में जगा मिले हे ये देखथे रागी। राजा युधिष्ठिर नरक देखथे। तो काबर नरक देखथे तो बताए हे थोड़ा से विश्‍लेषण में “नरो या कुंजरो” रागी भाई आखरी समय में गुरूद्रोण ल एक ठो झूठ बोलिस धरमराज केवल नर या कुंजर। ये युद्ध के मैदान मे अश्‍वस्थामा मरे हे महराज नर या कुंजर “नरो या कुंजरो” ओतके केहे रिहिस हे। तेमा राजा युधिष्ठिर नरक देखे बर गेहे। रागी भैया हम मनुष्य जोनि मे अवतार ल हन। ये मानव के कर्म ए भगवान न जाने कितना हजारों योनि ला भोगे के बाद हमला मानव तन मे भेजे हे। तो इंसान ल अपन मानव के धर्म ल नइ भूलना चइए। ये कर्म भूमि ये रागी भाई। कर्म करे बर पड़थे। पांचो भैया पाण्डवर सारी सेना अपन अपन शरीर ल त्याग के सब वीरगति प्राप्त करथे। स्वर्ग सिरधारथे यही से स्वर्गरोहण पर्व के कथा संपन्ना होथे।

वैसम्पायन जी महराज राजा जन्मेजय ला ये प्रसंग ल बताये।

कहिथे बेटा! यही से ये महाभारत सम्पन्न हो जाथे।

रघुपति राघव राजा राम

सीताराम सीताराम

रघुपति राघव राजा राम।

बोलिए वृंदावन बिहारी लाल की जय।

 

राजा युधिष्ठिर बच गए हैं रागी, उसी जगह में एक श्वान का आगमन होता है। एक कुत्‍ता आता है। राजा धर्मराज के पीछे पीछे वह कुत्ता चलता है। कुछ दूर जाने के बाद देव लोक से विमान आ रहा है रागी भैया और विमान मे जो सारथी आया है। वह हाथ जोड़कर राजा युधिष्ठिर से कहता है - महराज इस नदी मे स्नान करलो और स्नान करके वस्त्र आभूषण पहन कर इस विमान मे बैठ जाइये। राजा नदी मे स्नान करते हैं वस्त्र आभूषण जब पहनते हैं रागी, दूत कहता है - विमान मे बैठें महराज, मैं ले जाने के लिए आया हूँ। राजा कहते हैं भैया! मेरे पहले मेरे साथ आए इस कुत्ते को विमान मे बैठा लो तब मैं इस विमान मे बैठ कर स्वर्ग जाउंगा। राजा के धर्म  और राजा की उदारता को देखते ही वह कुत्ता अपने आप को धर्म के रूप में प्रगट करता है, धर्म साक्षात कहते हैं - धर्मराज! तुम धन्य हो। रागी भैया राजा युधिष्ठिर विमान में बैठ कर स्वर्ग सिधार रहे है। सुरलोक जाकर देखते हैं सभी देवता बैठे हैं। वहां जाकर देखते हैं राजा यधिष्ठिर भीष्म पितामह, अष्टवसु देवताओं के बीच में विराजमान हैं। जितने बड़े-बड़े वीर हैं कुरूक्षेत्र में सभी को वहां देवता के रूप में देखते हैं रागी भाई। सभी आसीन है किन्‍तु वहां राजा युधिष्ठिर देखते हैं तो थोड़ा भ्रम होता है जब स्वर्ग जाते हैं तो कौरवों को देव के सभा में पाने पर बताया गया है पाण्डव में चार भाई को नर्क में जगह मिलता है यह देखते हैं रागी। राजा युधिष्ठिर नर्क देखते हैं तो किसके लिए नर्क दिये हैं तो बताया गया है थोड़ा सा विश्लेषण में “नरो या कुंजरो” रागी भाई आखरी समय में गुरूद्रोण को एक झूठ बोले धर्मराज केवल नर या कुंजर। इस युद्ध के मैदान मे अश्वस्थामा मरा है महाराज नर या कुंजर “नरो या कुंजरो” इतना ही कहे थे। उसमें राजा युधिष्ठिर नर्क देखने के लिए गए हैं। रागी भैया हम मनुष्य योनि मे अवतार लिये हैं। यह मानव का कर्म है भगवान न जाने कितने हजारों योनि को भोगने के बाद हमे मानव तन मे भेजते है। तो इंसान को अपना मानव धर्म को नहीं भूलना चाहिए। यह कर्म भूमि है रागी भाई। कर्म करना पड़ता है। पांचो भैया पाण्डव समस्‍त सेना अपने अपने शरीर को त्याग कर सभी वीरगति को प्राप्त करते हैं। स्वर्ग सिरधारते हैं, यही से स्वर्गारोहण पर्व का कथा संम्‍पन्‍न होता है।

 

वैसम्पायन जी महराज राजा जन्मेजय को इस प्रसंग को बताये हैं। कहते हैं बेटा! यहीं से यह महाभारत सम्पन्न हो जाता हैं। रघुपति राघव राजा राम, सीताराम सीताराम, रघुपति राघव राजा राम।

बोलिए वृंदावन बिहारी लाल की जय।

 

गायिका – प्रभा यादव

छत्तीसगढ़ी श्रुतलेखन एवं हिन्दी लिप्यांतरण: संजीव तिवारी

 

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and archaeology, Government of Chhattisgarh to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.

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