मैत्रेयी पुष्पा ने हिंदी साहित्य में अनेक उपन्यास लिखे हैं। इनमें से बुन्देलखण्डी संस्कृति पर आधारित कुछ मुख्य उपन्यास ‘त्रिया-हठ’, ‘खुली खिड़कियाँ’, ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’, ‘इदन्नमम’ व ‘बेतवा बहती रही’ हैं। (फोटो: अमिता चतुर्वेदी, 28 नवम्बर 2019)

मैत्रेयी पुष्पा से बुन्देलखण्ड पर आधारित साहित्य एवं बुन्देलखण्डी संस्कृति पर एक साक्षात्कार

in Interview
Published on: 29 June 2020

अमिता चतुर्वेदी

अमिता चतुर्वेदी एक स्वतन्त्र लेखिका हैं। उन्होंने सन् 2014 में भीमराव अम्बेडकर यूनीवर्सिटी से हिन्दी में एम.फिल. की उपाधि प्राप्त की है। उनके लेख गृहशोभा, पोलिस प्रोजेक्ट, और ग्रिट फेलोशिप के अन्तर्गत द वायर हिन्दी प्रकाशन में प्रकाशित हो चुके हैं। वर्तमान में वे ‘अपना परिचय’ नामक ब्लॉग संचालित कर रही हैं।

हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा का अधिकांश जीवन बुन्देलखण्ड के खिल्ली गाँव में बीता और उच्च शिक्षा झाँसी में हुई।

बुन्देलखण्डी परिवेश में रहकर बड़ी हुईं मैत्रेयी पुष्पा के विभिन्न उपन्यासों, ‘इदन्नमम’, ‘बेतवा बहती रही’, ‘अल्मा कबूतरी’ आदि में बुन्देलखण्ड के भूगोल, सामाजिक-जनजीवन, संस्कृति आदि का सम्पूर्णता से परिचय मिलता है। मैत्रेयी पुष्पा को हिन्दी अकादमी द्वारा साहित्य कृति सम्मान, ‘फैसला’ कहानी पर कथा पुरस्कार, ‘बेतवा बहती रही’ उपन्यास पर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा प्रेमचन्द सम्मान, इदन्नमम’ उपन्यास पर शाश्वती संस्था बंगलौर द्वारा नंनजनागुडु तिरुमालम्बा पुरस्कार, म.प्र. साहित्य परिषद द्वारा वीरसिंह देव सम्मान तथा वनमाली सम्मान आदि से सम्मानित किया गया है। प्रस्तुत साक्षात्कार में मैत्रेयी पुष्पा ने बुन्देलखण्ड से सम्बन्धित साहित्य एवं विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार व्यक्त किए हैं।

 

अमिता चतुर्वेदी (अ.च.): बुन्देलखण्ड आपके अधिकांश उपन्यासों की पृष्ठभूमि रहा है। वहाँ से आपके जुड़ाव के बारे में कुछ बताएँ।

मैत्रेयी पुष्पा (मै.पु.): मैं बुन्देलखण्ड के खिल्ली गाँव में रहती थी जहाँ मेरी माँ नौकरी करती थीं। वहाँ उनकी पहली पोस्टिंग हुई थी। इसके बाद उनके स्थानांतरण होते रहे। खिल्ली गाँव से लगभग दस किलोमीटर दूर एक कस्बा है मोंठ, जहाँ मैं कभी बस और कभी साईकिल से पढ़ने जाती थी। मोंठ में इंटर तक पढ़ने के बाद मैं झाँसी आ गई। वहाँ हमारा घर नहीं था। मेरे तीन भाई, जो गाँव से मेरे साथ आए थे, और मैं एक कमरा लेकर रहते थे। मेरे भाई बिपिन बिहारी कॉलेज में पढ़ते थे। झाँसी में मैंने बुन्देलखण्ड कॉलेज से स्नातक एवं परास्नातक की पढ़ाई पूरी की। मेरा अभी भी अपने गाँव जाना-आना रहता है। झाँसी में जब कभी बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय में मुझे बुलाया जाता है, उस समय मैं गाँव भी जाती हूँ।

 

अ.च. : बुन्देलखण्डी संस्कृति का हिन्दी साहित्य में जो स्थान है, उसके बारे में आपका क्या सोचना है?

मै.पु. : सच बात तो ये है कि हिन्दी साहित्य में मैथिलीशरण गुप्त और वृन्दावनलाल वर्मा के बाद बुन्देलखण्ड से सम्बन्धित कुछ खास नहीं लिखा गया। मुझे इस बात का दु:ख भी रहा कि उनके बाद साहित्य में ऐसा कुछ नहीं लिखा गया, जिसे हम रेखांकित कर सकें। हालांकि मेरे बारे में एक बार नामवर जी ने कहा था कि वृन्दावनलाल वर्मा जिस क्षेत्र के बारे में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखते रहे थे, मैत्रेयी उसको सामाजिक-परिदृश्य में ले गईं। 

 

अ.च. : पहले के और आज के लेखकों में आप क्या अन्तर पाती हैं, जिसके कारण बुन्देलखण्डी संस्कृति को साहित्य में उचित स्थान नहीं मिल पा रहा है?

मै.पु. : बुन्देलखण्ड के अनेक लेखक हैं और दिल्ली में भी बुन्देलखण्ड के लेखक रहते हैं लेकिन कोई भी बुन्देलखण्ड को उस गहराई से नहीं देखता। इसका मुख्य कारण है कि वृन्दावनलाल वर्मा ने जब उपन्यास लिखे, चाहे गढ़ कुण्डार हो या मृगनयनी, तो उन्होंने सब जगह घूम-घूम के अध्ययन किया। जब मैंने लिखा तो मैंने भी प्रत्येक स्थान को देखकर लिखा। झाँसी की कोई तहसील और कोई स्थान नहीं है जिसके बारे में मैंने ना लिखा हो, लेकिन आज के लेखक बुन्देलखण्ड का उस तरह अध्ययन नहीं करते। मुझे दु:ख इस बात का है कि वहाँ के लेखकों की वजह से बुन्देलखण्ड को साहित्य में वो स्थान नहीं मिलता जो उसे मिलना चाहिए। 

 

अ.च. : बुन्देलखण्ड में क्रशर और बाँध बनने के कारण लोगों का उत्पीड़न हुआ। इस बात का आपने प्रमुखता से चित्रण किया है। अधिकांशतः जब बुन्देलखण्ड की चर्चा होती है, उसमें इन विषयों को कभी नहीं उठाया जाता। आपका इन पर ध्यान कैसे गया?

मै.पु. : हाँ, बुन्देलखण्ड के इन विषयों पर कोई नहीं बोलता है। मेरा ध्यान इन पर अपने व्यक्तिगत अनुभव के चलते गया। मैं खिल्ली में रहती थी। खिल्ली के साथ ही एक सड़क उरई जाती है। सड़क से लगा ही हुआ एक तालाब था। उस के पास एक गोल पहाड़ था। उस तालाब का पानी बहुत अच्छा था, जिसमें कमल खिला करते थे। जब क्रशर वाला काम शुरू हो गया तो उसमें लोगों को सरकार द्वारा लीज पर पहाड़ियाँ दी जाने लगीं। उनके ठेके मिलने लगे। गिट्टी और बजरी बनाने के लिए पहाड़ियाँ तोड़ी जाने लगीं। पहाड़ तोड़ने के लिए ब्लास्ट किया जाता है जिसके कारण मलबा बहुत दूर तक छिटक-छिटक के गिरता है जिसके कारण आस-पास की ज़मीन खेती के लिए बेकार हो जाती है। वहाँ केवल धूल-धंगड़ रह जाता है। उसी समय वह गोल पहाड़ बिल्कुल सपाट हो गया। क्रशर वालों ने उसकी बजरी और गिट्टी बना कर बेच दी। और वह तालाब भी नहीं रहा। अब वो जगह पहचान में नहीं आती है कि पहाड़ी और तालाब कहाँ थे। वहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य इस प्रकार समाप्त होता जा रहा है इसीलिए मैंने इस विषय का अपने साहित्य में चित्रण किया है। 

 

अ.च. : आपने वहाँ की बोली सहजता से लिखी है। बुन्देलखण्डी बोली का आपने कैसे अध्ययन किया? क्या आपको बुन्देलखण्डी लोक गीत भी आते हैं?  

मै.पु. : बुन्देलखण्डी बोली मुझे बहुत अच्छी तरह आती है। अपने गाँव वालों से मैं बुन्देलखण्डी बोली में ही बात करती हूँ। मुझे वहाँ के लोक-गीत भी आते हैं। जैसे वहाँ सुअटा खेला जाता है (बुन्देलखण्ड की क्षेत्रीय प्रथा) जिसमें गाना गाया जाता है। वह गीत मुझे आता है। उसी प्रकार कार्तिक मास में एक रिवाज होता है जिसे कार्तिक नहाना कहते हैं। मैं भी जब इस अवसर पर गाँव जाती हूँ तो सभी औरतों के साथ मिलकर इस रिवाज को मनाती हूँ। ग्वाल-बाल हमें घेर लेते हैं और हम लोग इस अवसर के गीत गाते हैं। 

 

अ.च. : पहले और आज के बुन्देलखण्ड में आप क्या अन्तर पाती हैं?

मै.पु. : सबसे बड़ा अन्तर है कि क्रशर और बाँध बनने से बुन्देलखण्ड की प्राकृतिक सम्पदा को नुकसान पहुँचा है। इसके अतिरिक्त अब वहाँ चौड़ी सड़कें बन गई हैं। लोगों को उससे सुविधा है क्योंकि वो कम समय में अपने गन्तव्य तक पहुँच जाते हैं और उनका समय बचता है लेकिन इन सड़कों के बनने से रास्ते में मिलने वाले गाँव, वहाँ के लोग, रास्ते के पेड़ आदि अब दिखाई नहीं देते। इन सड़कों के बनने से गाँव की प्राकृतिक सम्पदा खत्म हो रही है।

 

अ.च. : क्या आपके अनुसार बुन्देलखण्ड के जनजीवन में भी कुछ अन्तर आया है?

मै.पु. : पहले और आज के बुन्देलखण्ड में बहुत अन्तर आ गया है। इसका मुख्य कारण है कि अधिकतर गाँव की नई पीढ़ी अब शहरों में रहने लगी है। चाहे कोई नौकरी करे या नहीं, सब शहरों में रहना चाहते हैं। गाँवों में बस बुजुर्ग और और वृद्ध जन रह गये हैं। गाँव में खेत-खलिहान, गाय-भैसें सब कुछ हैं लेकिन फिर भी वे खाली हो रहे हैं। नई पीढ़ी शहर में रहना चाहती है क्योंकि उन्हें लगता है कि शहर में सब सुविधाएँ हैं। उन्हें लगता है कि गाँव में उनके बच्चों की पढ़ाई नहीं हो सकती। 

 

अ.च. : आपने अपने उपन्यास इदन्नमम में आँचलिक उपन्यासों के सभी पहलू मिलते हैं जिसमें आपने बुन्देलखण्ड के भौगोलिक, सांस्कृतिक, सामाजिक तथा राजनीतिक सभी परिदृश्यों का चित्रण किया है। क्या आप इदन्नमम को आँचलिक उपन्यास मानती हैं? 

मै.पु. : इदन्नमम बुन्देलखण्ड अंचल का उपन्यास है इसलिए इसको आँचलिक उपन्यास माना जा सकता है। लेकिन यह आँचलिक बिल्कुल नहीं है। अब इदन्नमम पूरे देश में जगह-जगह पढ़ाया जा रहा है। वहाँ लोग इस उपन्यास को आँचलिक ना मानकर इसे सामाजिक उपन्यास मानते हैं। आज पूरे देश के गाँव की स्थिति बुन्देलखण्ड की तरह ही है। इसलिए मैं उसे पूरे देश का उपन्यास मानती हूँ क्योंकि यह पूरे देश से सम्बन्धित है। इसलिए यह सारे देश का ही है। 

एक उदाहरण देती हूँ कि मैंने उसमें लिखा है कि ‘मन्दा ने कहा कि हमारे गाँव के विकास के लिये कोई नहीं सोचता। मेरे अस्पताल में कोई डॉक्टर नहीं आया। बिजली के तार खिंच गये लेकिन बिजली नहीं आयी। हर चीज के लिए धोखेबाजी है। अबकी जब वोट डालेंगे तो हम किसी को वोट नहीं देंगे।’ बीस साल पहले जब ये उपन्यास आया तो सबने कहा कि मैत्रेयी ने तो लोकतन्त्र का अपमान कर दिया। फिर बीस साल बाद अब पूरे देश में नोटा लग गया है। इसलिये वो पूरे देश का एवं पूरे समाज का उपन्यास है। अब इदन्नमम पर आधारित धारावाहिक भी बन गया है जिसे किसान चैनल पर दो बार दिखाया गया है। अब यह यू ट्यूब पर भी आ गया है जिसका नाम मन्दा हर युग में रखा गया है।

 

अ.च. : आपने अपने उपन्यासों में बुन्देलखण्ड के रीति-रिवाजों और मान्यताओं का वर्णन किया है। इन रीति-रिवाज और मान्यताओं के विषय में कुछ बताएँ

मै.पु. : वहाँ एक रिवाज है कि जब किसी का लड़का एक साल का होता है तो खेतों पर पूड़ी बना कर ले जाते हैं। लड़के की माँ, दादी और सब औरतें खेतों पर जाती हैं। वहाँ लड़के की दादी या माँ उसे यह कहकर खेत दिखाती है कि ‘ये तेरे खेतों की सीमा है और ये तेरी ज़मीन की सीमा है। ये तेरी जिम्मेदारी है कि इस पर कोई दुश्मन ना आ पाये।’ यह प्रथा लड़के के मामले में ही होती है। किसी और प्रदेश में ऐसा नहीं होता।

बुन्देलखण्ड के शादी के रीति-रिवाज महाराष्ट्र की संस्कृति से ज्यादा मिलते हैं। लड़कियों को शादी में महाराष्ट्र के रिवाज की तरह काले पोत की माला और काली चूड़ी पहनायी जाती है जबकि और सब जगह हरी और लाल चूड़ी पहनाते हैं। इसका कारण है कि बुन्देलखण्ड में मराठी लोग बहुत हैं। 

 

अ.च. : बुन्देलखण्ड के रीतिरिवाज और मान्यताएँ अन्य प्रदेशों से किस तरह अलग हैं?

मै.पु. : प्रत्येक प्रदेश की अपनी एक विशेषता भी होती है। सब जगह की अलग-अलग जातियाँ होती हैं। बुन्देलखण्ड के रीतिरिवाज और मान्यताओं में अन्य जगह से यह अन्तर है कि वहाँ के गीतवीरता और बहादुरी के अधिक हैं। अन्य सब जगह प्रेम के गीत, लड़की की मायके से विदा के गीत तथा इसी से सम्बन्धित गाने अधिक मिलते हैं। वहाँ भाईयों के नाम लेकर गीत गाये जाते हैं कि उनके ‘गुल्ला छूटे’। इसका मतलब है कि युद्ध में लड़ने के लिए उनके घोड़े छोड़े गए। किसी और प्रदेश में इस तरह के गीत नहीं सुनाई देते। बुन्देलखण्ड में हमेशा वीरता के गीत गाए जाते हैं। वहाँ की स्त्रियाँ भी वीरता के गीत गाती हैं। सुअटा भी वहाँ के ऐसा गीत है जो वीर रस का द्योतक है। वहाँ के हर गाँव जैसे कि मोंठ, समथर, अमरा आदि में किले देखने को मिलते हैं जैसा और जगह नहीं है। ये बुन्देलखण्ड की विशेषता है जो और कहीं नहीं मिलती।