अजय कुमार चतुर्वेदी

अध्यापक, लेखक, कवि, गीतकार एवं शोधकर्ता

 

आकृति 1: गंगा दशहरा- सरगुजा अंचल

 

छत्तीसगढ़ एक कृषि प्रधान क्षेत्र है जिसमे प्राकृतिक जल स्त्रोतों एवं नदिओं का बहुत माहात्म्य है। गंगा दशहरा उत्सव, उनकी सामजिक, आर्थिक महत्ता को रेखांकित करता है। इस उत्सव के द्वारा सामान्य जन, जल और उसके जीवन से सम्बन्ध का उत्सव मानते हैं। भारतीय जीवन और संस्कृति में नदियों का विशेष महत्व है। भारत में गंगा, गोदावरी, यमुना, सरस्वती, ब्रम्हपुत्र आदि महत्वपूर्ण नदियाँ हैं, जिन्हें प्राणदायनी माना जाता है। इनमें देव नदी गंगा भारतीयों के जीवन में धार्मिक आस्था से जुड़ी हुई है। और इसी से जुड़ा है गंगा दशहरा का पर्व और दशहरा मेला। सरगुजा अंचल में गंगा दशहरा पर्व बिल्कुल ही अनूठे ढंग से मनाया जाता है। इस अवसर पर यहाँ पांच दिनों तक मेला लगता है। यह पर्व यहाँ की लोक संस्कृति को समझने में सहायक है।

 

आकृति 2: ग्राम सरहरी का गंगा दशहरा मेला, सरगुजा 

 

गंगा की उत्पति और गंगा दशहरा

देव नदी गंगा की उत्पति के संबंध में मान्यता है कि राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की अस्थियों को विसर्जित करने के लिए कठोर तपरस्या कर गंगा को पृथ्वी पर अवतरित किया था।  पृथ्वी लोक में आने से पहले गंगा ब्रम्हा के कमण्डल में थी। राजा भगीरथ की कठोर तपस्या के फलस्वरूप गंगा, ब्रम्हा के कमण्डल से शिव की जटा में प्रवाहित होती हुई पृथ्वी लोक में अवतरित हुईं। इस तरह राजा भागीरथ ने अपने पुरखों की अस्थियों को विसर्जित कर मुक्ति दिलायी। शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को गंगा, पृथ्वी लोक में अवतरित हुई थीं। इसलिए इस दिन गंगा दशहरा का पर्व, देवी गंगा को समर्पित त्योहार के रूप में मनाया जाता है। गंगा दशहरे के दिन से वर्षा का आगमन होने लगता है और दसों दिशाओं में हरियाली छाने लगती है। अतः इस दिन, वर्षा आगमन का स्वागत करते हुए खुशियां जाहिर की जाती हैं। 

 

गंगा दशहरा अनुष्ठान

वराह पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि को हस्त नक्षत्र में गंगा स्वर्ग लोक से पृथ्वी लोक में अवतरित हुई थी। माना जाता है कि इस दिन गंगा दशहरा सम्बन्धी अनुष्ठान संपन्न करने से दस प्रकार के पाप नष्ट होते हैं। गंगा दशहरा के दिन गंगा पूजन में दस का अंक शुभ माना जाता है। आज के दिन की पूजा दस प्रकार के फूल, गंध, दीपक, पान के पत्ते और फल आदि से की जाती है ।

 

आकृति 3: कमल दल से परिपूर्ण  साधु तालाब, ग्राम सरहरी पर गंगा दशहरा के अनुष्ठान संपन्न करने हेतु एकत्रित हुआ महिलाओं का समूह, सरगुजा 

 

आकृति 4: साधु तालाब  के किनारे अनुष्ठानिक कार्यों हेतु कलसा में पानी भारती  हुई महिलाएं, सरगुजा 

 

 आकृति 5: साधु तालाब  के किनारे अनुष्ठानिक कार्यों में व्यस्त महिलाएं, सरगुजा 

 

 आकृति 6: साधु तालाब  के किनारे अनुष्ठानिक कार्यों में व्यस्त महिलाएं, सरगुजा 

 

मान्यता है कि गंगा जल के छींटे मात्र काया पर पड़ने से शरीर और आत्मा शुद्ध हो जाते हैं, इसलिए इस दिन गंगा नदी में डुबकी भी लगाते हैं। यदि कोई व्यक्ति गंगा तक नहीं जा पाता है, तब वह घर के आस-पास किसी नदी, तालाब या किसी गंगा तुल्य जलाशय में जाकर स्नान-ध्यान करने से पुण्य की प्राप्ति कर सकता है।

 

 गंगा दशहरा- जन्म नाल एवं कमल नाल का सम्बन्ध 

छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में गंगा दशहरा का पर्व धूम-धाम से मनाया जाता है। सरगुजा वासियों की मान्यता है कि गंगा दशहरे के दिन पुरइन (कमल) के पत्ते से युक्त जलाशय में  गंगा विराजती हैं। इसलिए इसी जलाशय को गंगा तुल्य मानकर इसकी पूजा-अर्चना की जाती है।

 

गंगा दशहरे के दिन किसी स्थानीय जलाशय में, साल भर आयोजित शुभ कार्यों से सम्बंधित सामान जैसे- विवाह का मौर, कक्कन, कलश, बच्चे के जन्म के समय का नाल व छटठी का बाल आदि को विसर्जित किया जाता है। इस दिन बैगा (पुरोहित) पूजा-अर्चना करवाता है। गंगा पूजन नारियल, सुपारी, फल-फूल और अगरबत्ती से किया जाता है।

 

आकृति 7: साधु तालाब  के किनारे गंगा दशहरा सम्बन्धी अनुष्ठान पूर्ण कराता बैगा पुजारी, सरगुजा 

 

आकृति 8: साधु तालाब  के किनारे गंगा दशहरा सम्बन्धी अनुष्ठान पूर्ण कराता बैगा पुजारी, सरगुजा 

 

 

आकृति 9: विवाह के मौर, कक्कन एवं बच्चे के जन्म नाल को कमल की जड़ में गाड़ने जाती महिलाएं। 

 

गंगा दशहरे के दिन, दान का विशेष महत्व है इसलिए विसर्जित करने जाने के पूर्व गांव में सगे-संबधियों को निमंत्रित कर उन्हें तेल, कपड़ा, रोटी और यथाशक्ति रूपये दान देकर दशहरा मेला देखने जाने के लिए कहा जाता है। जलाशय में पुरइन (कमल) की जड़ के नीचे, बच्चे के जन्म के समय की नाल को गाड़ा जाता है। यह कार्य गांव का बैगा, पूजा करवाकर करता है। घर का जो व्यक्ति विसर्जित करने जाता है, वह उपवास रखता है। विसर्जित कर घर लौटने पर संगे-सबंधियों को भोज पर आमंत्रित किया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि ‘हम लोग अपने धार्मिक अनुष्ठानों के चीजों को गंगा में सेराना (विसर्जित करना) पुण्य मानते हैं किन्तु गंगा दूर है इसलिए किसी भी जलाशय को गंगा तुल्य मानकर, पूजा-अर्चना कर, शुभ कार्यों के सामान को विसर्जित कर पुण्य लाभ लेते हैं।’

 

गंगा दशहरा और कठपुतली विवाह

कठपुतली का मंचन, प्राचीन मनोरंजक कार्यक्रमों में से एक है। सरगुजा अंचल में भी गंगा दशहरे के अवसर पर कठपुतली विवाह करने की प्रथा प्राचीन समय से है, जिसमें लकड़ी (काष्ठ) से गुडडे-गुड़िया बनाये जाते हैं और उनका विवाह संपन्न कराया जाता है। 

सरगुजा अंचल में प्रति वर्ष जेठ मास शुक्ल पक्ष की दशमी को गंगा दशहरा के अवसर पर गांव की कुंवारी लड़कियां घर वालों के सहयोग से कठपुतली का विवाह करती हैं। लकड़ी के गुड्डा-गुड्डी बनाकर तीन दिनों तक विवाह के सभी रस्मों का पालन करते हुए कठपुतली विवाह का आयोजन किया जाता है। इस आयोजन में घर के बड़े-बुजुर्ग विवाह के सभी रस्मों (मण्डप गाड़ने से विदाई तक) को बताने में सहयोग करते हैं। गांव की कुंवारी लड़कियां गुड्डे-गुड्डी की मां और लड़के, पिता की भूमिका अदा करते हैं। इस आयोजन का उद्देश्य घर के बच्चों को विवाह संस्कार की जानकारी देना और मनोरंजन करना है। कठपुतली विवाह के उपरांत गंगा दशहरे के दिन इन कठपुतलियों को जलाशय में विसर्जित कर दिया जाता है।

 

आकृति 10: कठपुतली विवाह के हल्दी संस्कार हेतु हल्दी पीसती बालिका। 

 

आकृति 11: कठपुतली विवाह के लये, गुड्डा -गुड्डी को कपड़े पहनाकर विवाह मंडप में हल्दी संस्कार हेतु रखा गया है। 

 

आकृति 12: कठपुतली विवाह के लये, गुड्डा-गुड्डी को कपड़े पहनाकर विवाह मंडप में हल्दी लगाकर रखा गया है। 

 

आकृति 13: कठपुतली विवाह के लिए, विवाह मंडप में बनाया जाने वाला चौक। 

 

आकृति 14: कठपुतली विवाह के लिए, विवाह मंडप में मध्य में विवाह स्तम्भ खड़े किये गए हैं, अनुष्ठान हेतु कलस में पानी, धान की बालियाँ आदि राखी है और चौक बनाया गया है। 

 

आकृति 15: बालिकाएं विवाह मंडप में गुड्डा-गुड़िया के साथ हैं।

 

आकृति 16: बालिकाएं  गुड्डा-गुड्डी को विवाह मंडप में हल्दी लगा रहीं हैं। 

 

आकृति 17: कठपुतली विवाह समारोह में, विवाह मंडप में नृत्य करती बालिकाएं। 

 

आकृति 18: कठपुतली विवाह संपन्न होने के बाद गुड्डा-गुड़िया युगल दर्शातीं बालिकाएं। 

 

आकृति 19: कठपुतली विवाह संपन्न होने के बाद ख़ुशी में गले मिलते बच्चे। 

 

आकृति 20: कठपुतली विवाह संपन्न होने के बाद गुड्डा-गुड्डी को भोजन कराती बालिकाएं। 

 

आकृति 21: कठपुतली विवाह संपन्न होने के बाद गुड्डा-गुड्डी को भोजन कराती बालिकाएं। 

आकृति 22: कठपुतली विवाह के उपलक्ष्य में आयोजित सामूहिक भोज में भोजन कराते बालक-बालिकाएं। 

 

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.