छत्तीसगढ़ के विभिन्न अंचलों की मृणशिल्प परम्परा पर बहुत ही कम शोध हुआ है । रायगढ़ और सरगुजा छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल क्षेत्र हैं , जहां कुम्हार भी  बड़ी संख्या  में रहते हैं । इन कुम्हारों ने यहां के मिटटी के बर्तन और अन्य उपकरणों के आकार प्रकार को अपने-अपने ढंग से न केवल समृद्ध किया है बल्कि, स्थानीय गरीब आदिवासियों के कठिन जीवन को और अधिक सुविधाजनक बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निबाही है।

 

रायगढ़ में मिटटी का काम करनें वाले कुम्हारों की प्रमुख दो शाखाएं हैं लरिया और उड़िया। यहां उड़िया कुम्हार सर्वाधिक संख्या में हैं और वे ही सर्वाधिक कलात्मक मृणशिल्प बनाते हैं । सरगुजा के कुम्हारों में जो सरगुजिहा कुम्हार हैं, वे तो मूलतः सरगुजा के ही हैं, परंतु जो आस-पास के इलाकों (अब उत्तर प्रदेश और बिहार) से यहां आकर बसे हैं, उनकी अनेक पीढ़िया यहां गुजर चुकी हैं । उन्होने सरगुजा के आदिवासियों के लगभग सभी रीति-रिवाज अपना लिए हैं ।

 

  रायगढ़ और विशेष रूप से सरगुजा की मिट्टी बर्तन तथा मूर्तियां बनाने के लिए बहुत ही उपयक्त है। यहाँ पाई जाने वाली पीली मिट्टी सामान्यतः कंकड़ रहित होती है जिससे को मिट्टी तैयार करने में अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती। यहाँ के कुम्हार बर्तनों पर जो पालिश करते हैं वह बहुत चमकदारहोती है। संभवतः इन्हीं कारणों से इस क्षेत्र में मिट्टी का काम बहुत सुन्दर  होता है। फिर वह चाहे रजवार स्त्रयों द्वारा घरों की दीवारों  पर किया जाने वाला भित्ति अलंकरण हो या कुम्हारों द्वारा बनाये  जाने वाले मृणशिल्प।  

 

सदियों  से समान सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों, प्राकृतिक संसर्ग और आदिवासियों के लिए उनकी आवश्यकता के अनुसार बर्तन, खिलौने, खपरैल, मूर्तियां आदि बनाते-बनाते इन कुम्हारों ने आदिवासी सौन्दर्य को सहज ही आत्मसात कर लिया है। 

 

इस  मॉड्यूल में हम  रायगढ़ एवं सरगुजा क्षेत्र के कुम्हार समुदाय तथा उनके द्वारा बनाये जाने वाले मृणशिल्पों  का विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं।

 

 

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.