Raipur, Chhattisgarh, 2018

Pandvani is one of the most celebrated performative genres from Chhattisgarh. Known mostly as a regional/ folk version of the Mahabharata, its terms of relationship with the Sanskrit epic are little known. A series of modules presents the recitation of the Pandavani by Prabha Yadav, who presents all the eighteen parv of the epic based on the version compiled by Sabal Singh Chauhan, an author whose text was in circulation in this region. Prabha Yadav is a noted performer of the Pandavani, and represents what has come to be seen as Jhaduram Devangan’s style of rendition. A conversation with her presents her journey as a Pandvani artist. 

 

 

Transcript

 

Hindi: मैं प्रभा यादव ग्राम चंदखुरी की रहने वाली हूँ, हम लोग जय माँ कौशल्या पंडवानी पार्टी के नाम से कार्यक्रम प्रस्‍तुत करते हैं। मैं झाडूराम देवांगन जी की शिष्या हूँ, जिन्‍हें पंडवानी के पितामह के रूप में लोग मानते हैं। मेरे साथ सहयोगी के रूप में घसिया राम जी वर्मा, हारमोनियम वादक ग्राम घिवरा के चमन लाल जी साहू,  बेंजो मास्टर ग्राम ससहा के प्रेमू साहू, तबला में संगत देने वाले ग्राम ससहा के ही अगराहित धीवर जी, एवं मेरे साथ मेरे पिताजी श्री राम सिंग जी यादव भी संगत करते हैं। इस प्रकार से हम लोगों का छः का ग्रुप है और हम इतने ही लोग पंडवानी की प्रस्तुति देते हैं।

 

 

प्रश्‍न :- यह जो झाड़ूराम जी देवांगन जिसे आपने अपना गुरू बताया, आपका उनसे संपर्क कैसे हुआ, आप उनके यहाँ कैसे गये। क्या आपके यादवों में या आपके खानदान में पंडवानी गाने की परम्परा थी ?

उत्तर :- नहीं सर, हमारे खानदान में पंडवानी गाने की तो कोई परम्परा नहीं थी। हमारे पिताजी एक गरीब मजदूर किसान हैं। हम लोग मजदूरी करके ही अपना जीवन यापन करते हैं। हुआ यह कि मैं तीसरी कक्षा मे पढ़ रही थी, मैं अपने माँ बाप की अकेली बच्ची हूँ, मेरे आगे पीछे अन्‍य कोई भाई-बहन नहीं है । हमारे गाँव में मीना साहू जी पंडवानी का कार्यक्रम देने के लिए आई थी। कार्यक्रम देखने के बाद मुझे ऐसा लगा कि मैं भी उसी की ही तरह पंडवानी गायिका बनूंगी। बस फिर, वही दिखती थी मेरी आँख में। वो ऐसे गाती थी, वो ऐसे करती थी। मैं भी उसी की ही तरह गाऊँगी सोंचती, फिर गाना शुरू कर दिया।

जो सुनी थी, वह दो दिन का प्रसंग था। आदि पर्व के प्रसंग में लाक्षगृह से शुरू करके अर्जुन हनुमान मिलन तक वह गाई थी, आज भी मुझे याद है। बस उसी को मैं गाती थी, उस समय मेरे बाबूजी हमारे गृहग्राम बंगोली में रहते थे। गाँव के लोगों को पता चला, उन्‍होंनें मुझे सुना तब बोले कि - यह लड़की अच्‍छा गाती है कथा में पकड़ भी अच्छा है। गांव वालों ने ही विचार किया कि इसे योग्‍य गुरू के पास भेजकर पंडवानी सिखाया जाए। लोगों नें बताया कि झाड़ूराम देवांगन जी से बढ़कर कोई है ही नहीं। मुझे गुरूजी के पास भेजने का फैसला गांव वालों ने ले लिया।

गुरूजी नजदीक के एक गाँव में कार्यक्रम देने के लिए आए थे। गांव वालों नें झाड़ूराम देवांगन जी से आग्रह किया, पंच-सरपंच नें आवेदन पत्र भी लिख कर दिया। पंडवानी के बीच में मध्यांतर हुआ तो फिर वे उसको पढ़े। मैं भी वहां गई थी, गुरूजी नें मुझे देखा, बोले कि मैं इसे कहाँ ले जाउंगा। ये तो अभी आठ साल की बच्ची है, छोटी है। वहाँ जाने के बाद कहीं रोयेगी कि मुझे यहॉं नहीं रहना है, मैं अपने माँ बाप के पास जाऊँगी तो हम कैसे करेंगे ? उन्‍होंनें साफ इन्‍कार कर दिया। गुरूजी के संगत में जो बेंजो बजाते थे कुंज बिहारी देवांगन जी ...

 

 

 

प्रश्‍न :- वो झाड़ूराम जी के बेटे ?

उत्तर :- हॉं बेटा है। गुरूजी ने तो नहीं बोल दिया फिर भैया से पूछे। उनके बोलने का अजब अंदाज था - ‘कइसे करबो बाबू ?’ तो भैया जी बोले ‘मैं ले जाऊँगा, ले जायेंगें बाबू जी। हमारी एक बहन है अब हमारी दो बहन हो जायेगी।‘ भैया नें जैसे ही हाँ कहा, तो गुरूजी मान गए। भैया बोले कि इसे गाँव में पहुँचा देना, फिर गाँव के दो-तीन लोगों नें मुझे गुरूजी के घर छोड़ दिया। उस दिन गुरूजी प्रोग्राम देने बाहर चले गये थे लेकिन घर मे गुरूमाँ को बता दिये थे। हम लोगों नें बताया कि हम बंगोली से आये हैं गुरू माता जान गयी  यही बच्ची है। गांव के लोग छोड़ कर चले गये और फिर वहीं से मेरी ट्रेनिंग शुरू हो गयी। गुरूजी जहाँ-जहाँ जाते मुझे साथ में ले जाते थे। गुरूजी कार्यक्रम देते तो मैं स्टेज में बेंजो वाले भईया के पास उनके गोद में बैठ कर सुनती थी। कभी-कभी पूरा सुनती थी कभी सुनते-सुनते सो भी जाती थी। गुरूजी जब गॉंवों में कार्यक्रम देने जाते थे कहीं-कहीं कोई बुजुर्ग उत्‍सुकता से अनुरोध करते हुए कहते थे कि देवांगन जी इस बच्ची से पंडवानी सुनवाओ। तब गुरूजी कहते थे - ये क्या गायेगी। उस समय मुझे बहुत डर लगता था, गुरूजी जब सामने होते थे तब पता नहीं मुझे कैसे कंपकंपी सी होती थी। अच्छा करती थी पर लगता था कि बिगड़ रहा है। गुरूजी के जो रागी दादाजी थे, वे बहुत अच्छे थे मुझे इशारा करते, चल बेटी गा। भैया भी कहते चल गा फिर स्टेज में बैठते थे। उस समय मैं तमूरा पकड़ नहीं पाती थी, करताल भी पकड़ते नहीं बनता था फिर भी हम गाते थे। भैया कहते थे इसको गा कर बताओ, संगत वाले लोग कहते थे तो मैं गाती थी। उस समय लाज-शर्म नहीं आती थी, न डर लगता था, बस शुरू हो जाती थी। एक बात आपको और बताऊँ सर, मेरे गुरूदेव जी का एक सपना था, वे कहते थे कि मुझे दूसरा झाड़ूराम देवांगन बनाऊँगा। गुरूजी कहते थे कि इसे मैं दूसरे रूप में तैयार करूंगा।

 

 

 

प्रश्‍न :- उनका सिखाने का तरीका क्या था ?

उत्तर :- उनका कोई तरीका नहीं था वे कहते थे हम किसी को बतायेंगे नहीं। जिसमें सीखने का गुण हैं, ललक है, हम गा रहे हैं बैठ कर सुनो, अपने मस्तिष्क में जो बैठ रहा है उसके सहारे गाओ। मैं सुनती थी, देखती थी अपने गुरू जी के हाव भाव को।  

 

 

 

प्रश्‍न :- यह तो हुआ, एक प्रश्‍न लेकिन जो उसका कथ्य है वो उनको गाती हैं आप, जो कहती हैं तो आप उसे सीरियल से याद करती थीं।

उत्तर - जी हाँ अध्ययन करते थे, कुंजबिहारी देवांगन भईया ने सबल सिंह महाभारत दिया था। उस समय उनका 3 वर्ष का बच्चा था उसको मैं खिलाती थी। भैया दुर्ग में पढ़नें जाते थे मुझे बता कर जाते कि प्रभा यहां तक पढ़ना, मुझे अक्षर ज्ञान था, तीसरी पढ़ी थी मैं, उस समय हिंदी पढ़ लेती थी। मैं पढ़ती थी, शाम को भैया आते और पूछते थे। गुरूदेव का एक ही बेटा है बहुत दिन के बाद हुआ था और एक नाती। आज वो लड़का तीन बच्चे का पिता हो चुका है जिनको मैं खिलाती थी।

 

 

 

प्रश्‍न :- यह जो आपने बताया सबलसिंह चौहान ?

उत्तर :- हाँ, फिर वे सबल सिंह महाभारत मेरे हाथ से ले लेते थे। मुझे देखने नहीं देते थे, हम दोनो भाई बहन बैठे रहते थे। वे जहाँ से पढ़ने के लिए बोलते थे मैं वहीं से शुरू हो जाती थी।

 

 

प्रश्‍न :- जो आप कहती हैं वह तो छत्तीसगढ़ी में है, यह कैसे ?

उत्तर :- यह तो छत्तीसगढ़ी में है सर, सबलसिंह महाभारत हिन्दी में लिखे हैं। यह दोहा चौपाई और अन्‍य छंदों के माध्‍यम से सबल सिंह चौहान द्वारा लिखा गया महाकाव्‍य है। उस समय इसमें से कई कई शब्द समझ में नही आता था। दोहा चौपाई के शब्‍दों के अर्थों में फिर घुसना पड़ता है कि इसका अर्थ क्या है। उस समय लगातार पढ़ने के कारण मुझे सब कथा प्रसंग याद हो गया था, बीच में कहीं कुछ भटकती थी तो भैया बता देते थे, भूला हुआ कुछ गुरूजी के द्वारा सुनने से ग्रहण करती थी।

 

 

 

प्रश्‍न :- सबल सिंह चौहान का महाभारत हिन्दी में दोहा चौपाई के रूप में है, आप उसे तो समझ जाती हैं लेकिन उन प्रसंगों को छत्तीसगढ़ी में कैसे बता पाती है? क्‍या इसके लिए पहले से सोच कर रखी रहती हैं कि क्या बताना है या फिर तत्‍काल उसे छत्तीसगढ़ी में अनुवाद कर लेती हैं ?

उत्तर :- सर छत्तीसगढ़ी हमारी प्रातीय भाषा है इस कारण हम प्रसंग को छत्तीसगढ़ी में बनाकर बोलते हैं। कथा तो हिंदी में है लेकिन हम उसे तत्काल छत्तीसगढ़ी भाषा में बदलकर बोलते हैं। प्रभा यादव ही नहीं, हर पंडवानी गायक गायिका इसी तरह से बोलते हैं। हमारे गुरूजी भी छत्तीसगढ़ी भाषा में बोलते थे और बीच-बीच में हिन्‍दी बोलते थे,  पंडवानी गायन के बीच में जो हिन्‍दी का प्रयोग होता है वह हमारे गुरूदेव का देन है, वे कथा को आधी हिन्दी और आधी छत्तीसगढ़ी में बोलते थे।

 

 

 

प्रश्‍न :- जैसे अगर मानो तत्काल बनायेंगे तो जितने भी गायक गायिका है उनको अपने अपने तरीके से बनायेंगे ?

उत्तर :- जी.. जी. हॉं, अपने अपने ढंग से।

 

 

 

प्रश्‍न :- तो उसमें अंतर रहता है ?

उत्तर :- हॉं अंतर रहता है, सर। प्रसंग में भी अंतर मिलेगा सर। हम जो कथा बता रहे हैं उसके प्रसंग में भी अंतर मिलेगा। मैं अलग बताऊँगी और कोई दूसरा पंडवानी गायक-गायिका अलग बतायेंगे। प्रसंग के साथ ही शब्द भी अलग मिलेगा, गाने बजाने का ढंग भी अलग मिलता है। सब भिन्न है सर।

 

 

 

प्रश्‍न :- क्यों हो जाता है अलग ?

उत्तर :- अलग अलग इस प्रकार से है कि गुरू अलग अलग होते हैं। गायकी में भी कोई स्‍वयं अपने ढंग से गाते हैं कोई अपने गुरूदेव के ढंग से गाते हैं। मैं अपने गुरूदेव के ढंग से गाती हूँ। बजाने का ढंग भी अलग अलग है, जैसे तबला आदि के बजाने में भी अंतर है, मैं गा रही हूँ उसी को बजाने वाले अलग ढंग से भी बजाते हैं। इसी कारण भिन्नता होती है सर।

 

 

प्रश्‍न :- तो ये जो गुरू है जैसे आपने कहा।

उत्तर :- जी।

 

 

 

प्रश्‍न :- तो झाड़ूराम देवांगन जी से पहले भी कोई पंडवानी के गुरू थे?

उत्तर :- हाँ, हमने तो नहीं देखा है सर। लेकिन कहते थे गुरू जी से पहले रायपुर जिला में रावन-छीपन नामक एक गाँव है वहां नारायण लाल वर्मा जी रहते थे। बताते हैं कि वे घुटनों के बल बैठ कर और हाथ में करताल-तमूरा ले कर घूम-घूम कर गाते थे। उनके साथ एक सहयोगी रागी रहता था जो खंझेरी बजाता था।

 

 

 

प्रश्‍न :- उनकी शैली में आज कोई प्रस्‍तुति देते हैं ?

उत्तर :- मैं बता नहीं पाउंगी क्‍योंकि लोगों को पता नहीं है कि वे किस प्रकार से और क्‍या गाते थे। हमारे गुरूदेव नें देखा था, पूनाराम निषाद जी भी उनकी प्रस्‍तुति देखे थे। उनकी शैली के संबंध में वे लोग ही बता पाते, वर्तमान में किसी को भी रावन छीपन वाले नारायण जी की शैली एवं प्रस्‍तुति के ढ़ग के संबंध में कोई जानकारी नहीं है।

 

 

 

प्रश्‍न :- आज पंडवानी के कितने गुरू हैं, जैसे कि झाड़ूराम जी जैसे कोई और गुरू हैं ?

उत्तर :- गुरू तो कईयों हैं, लोग अपने अपने ढंग से पंडवानी के सुप्रसिद्ध व्‍यक्तियों को अपना गुरू मानते है। जैसे कि तीजन अम्मा जी कापालिक शैली की सुप्रसिद्ध गायिका हैं। उनकी शैली में जितने गायक गायिका पंडवानी की प्रस्‍तुति दे रहे हैं वे तीजन अम्मा को गुरू मानते हैं। मैं देवांगन जी का नकल करके गाती हूँ उनके साथ बचपन से रह कर मैं पंडवानी सीखी हूँ। छत्‍तीसगढ़ में पंडवानी के कितने ही गुरू हैं किन्‍तु हमारे गुरूदेव झाड़ूराम देवांगन जी को प्रायः हर गायक गायिका गुरू के रूप में आदर देते हैं। इसीलिए उन्‍हें पंडवानी का पितामह कहते हैं।

 

 

 

प्रश्‍न :- अगर वेदमती कापालिक शैली को छोड़ दें तो जो प्रस्तुति का ढंग है वह तीजन बाई के पंडवानी में और झाड़ूराम जी के पंडवानी में क्या फर्क है ?

उत्तर :- फर्क कुछ नहीं है सर वही प्रसंग गुरूजी भी बोलते हैं।

 

 

 

प्रश्‍न :- नहीं जो प्रसंग है उसको छोड़ दीजिए।

उत्तर :- जी।

 

 

 

प्रश्‍न :- गायकी में या साज में खड़े बैठने का ऐसा कुछ फर्क है ?

उत्तर :- हाँ, फर्क तो है सर।

 

 

 

प्रश्‍न :- क्या फर्क है ?

उत्तर :- गाने बजाने में फर्क है, कार्यक्रम की प्रस्तुति में फर्क है।

 

 

 

प्रश्‍न :- थोड़ा उसके बारे में बताएं ?

उत्तर :- उसके बारे में (हंसने लगती है) अब इसको कैसे बताउं सर। जैसे मैं मंच में जाती हूँ तो हमारे गुरूदेव वेदमती शैली में गाते थे उसी तरह से गाती हूँ। जैसे मैं शुरू में -

तो रामे रामे रामे रामे गा रामे भैया

रामे रामे भैया रामे गा रामे

और अम्मा तीजन बाई जी शुरू करती हैं तो उसकी प्रस्तुति का ढंग सुनिये-

मोर सन न न न न मोहन या भैया ले के

जो भी हो ... लेकर शुरू करते हैं तो इसी में अंतर हो गया सर।

हम तो नहीं जानते किन्‍तु हमारे गुरूजी बताते थे, कभी वे कार्यक्रम देनें दिल्ली गए थे, फिर वहीं से कुछ विद्वान लोग उनके कार्यक्रम की प्रस्तुति को विभाजित कर दिये।

 

 

प्रश्‍न :- ये सन नन... और रामे रामें। ये सन न न क्या चीज है ? इसका अर्थ बताओ। रामे रामे तो समझ आ रहा है। राम है वो हर जगह रमे है वो। ये सन न न क्या है ?

उत्तर :- गुरूजी नें कहा था कि हमे नहीं मालूम भैया इसका अर्थ क्या होता है ? जो गा रहे हैं उन्‍हीं से पूछिए। उसी दिन उन्‍होंनें बताया था कि इसको विभाजित कर दिया गया है। कि ये कापालिक शैली में काल्पनिक कल्पना के माध्यम से गाते है और वेदमती शैली में राम के नाम से कार्यक्रम की शुरूआत करते है। व्यास आदि नरपुंगव... ऐसे हमारे गुरूदेव जी शुरू करते थे। व्यास देव के पद कमल बार ही बार मनाऊँ, गुन गावऊ श्री कृष्ण के हनुमत होऊ सहाय ऐसा उच्चारण करते थे या कोई दूसरा श्लोक बोलते थे फिर हम शुरू करते थे। दिल्ली के संगीत नाटक अकादमी में इस तरह का अंतर बताते थे, तो हम वहां प्रस्‍तुति देने नहीं गए।

 

 

 

प्रश्‍न :- जैसे सबल सिंह चौहान जी का नाम आप बीच बीच में उल्लेख करती हैं ...?

उत्तर :- जी।

 

 

 

प्रश्‍न :- ... कि सबल सिंह चौहान कहते हैं, क्‍या तीजन बाई भी इसी तरह से कहती हैं?

उत्तर :- हाँ, बताते है सर क्यों नही बतायेंगे इतनी बड़ी हैं उनका भी शैली है।

 

 

 

प्रश्‍न :- बताते होंगे ?

उत्तर :- नहीं, हम तो अभी सुने ही नही है सर, तो हम कैसे बतायें कि बीच में वो बोलती है कि नहीं बोलती। लेकिन मैं सोचती हूँ, क्यों नहीं बोलती होगी, वो तो विश्‍व प्रसिद्ध पंडवानी गायिका है तो क्यों नहीं बतायेंगी। बताती होंगी, जैसे हम बता रहे है तो वो भी तो बतायेंगी ना।

 

 

 

प्रश्‍न :- तो जब सबल सिंह चौहान कहते है ..?

उत्तर :- जी।

 

 

 

प्रश्‍न :- .. वो बात आप जब कहती हैं तो हिन्दी की दोहा-चौपाई में कहती हैं कि उसको भी छत्तीसगढ़ी में कहती हैं ?

उत्तर :- नहीं, वो तो सब हिन्दी में है सर।

 

 

 

प्रश्‍न :- तो उसका जब बोलते हो तब हिन्दी में दोहा चौपाई बताते हो?

उत्तर :- जी, कुछ कुछ दोहा चौपाई सबल सिंह जी से बोल देते है, कुछ कुछ ऐसे ही। हमारे गुरूदेव स्वयं हिन्‍दी में दोहा चौपाई निर्मित करते थे और बोलते थे। मैं भी बहुत से दोहा चौपाई उनके बनाये को बोलती हूं।

 

 

 

प्रश्‍न :- अच्छा मैने देखा बीच बीच में कि कोई कव्वाली की शैली में ऐसा कि वो ‘परदेशी लागे नैना..’ ऐसा कुछ गा रहे थे या दूसरी आरती या कोई ऐसा तो क्‍या वह सबल सिंह चौहान जी का नहीं है ?

उत्तर :- नहीं वो अलग से है सर, उसे जोड़ना पड़ता है हम सोचते हैं कि हमारी जो प्रस्तुति है उसमें क्या गायेंगे तो वह ज्यादा मनोरंजक होगा। हमें श्रोताओं को रिझाना होता है, उन्‍हें गूढ़ार्थ में ले जाना होता है। हम प्रयास यह करते हैं कि हम ऐसे गायें ताकि प्रस्‍तुति श्रोताओं की आत्मा को छू ले, तब अच्छा लगता है। अब इसे संक्षिप्‍त रूप में गायेंगे तो अच्छा नहीं लगेगा और ऐसा ही हमारे गुरूजी ने किया था सर।

पहले छत्‍तीसगढ़ में पंडवानी खंझेरी-तमूरा में गाते थे,  तो गुरूजी ने सोचा कि इसको हारमोनियम और तबला में गाकर देखते हैं। इस प्रकार से गुरूजी ने ही हारमोनियम और तबला में पंडवानी गाना पहले शुरू किया। उसके बाद गुरूदेव हारमोनियम तबला और मंजीरा में ही गा रहे थे। बाद में बैंजो में जब हमारे भैयाजी तैयार हुए तो गुरूजी नें उसे संगत पर ले लिया। गुरूजी की पार्टी को सजाने और सवारने में कुंजबिहारी देवांगन जी का बड़ा हाथ है।

 

 

 

प्रश्‍न :- उन्हाने बेंजो शुरू किया ?

उत्तर :- जी, और आज हमारे लाइन के जितने भी वेदमती शैली में पंडवानी गाते है उसमें से जितने भी बेंजो वादक है सब कुंजबिहारी देवांगन की नकल करने की कोशिश करते है। कोई कोई अपने अपने ढंग से बजाते हैं किन्‍तु बेंजो में कुंजबिहारी देवांगन जी का ही नकल करते हैं।

 

 

 

प्रश्‍न :- तो जैसे आप कोई प्रसंग गाती हैं तो उसमें आप उस प्रसंग को, युद्ध भूमि को या और महल का दृष्य जैसा प्रस्तुत कर देती है लोगों के सामने ?

उत्तर :- जी।

 

 

 

प्रश्‍न :- तो वो दृश्‍य बनाने में, मतलब आप कैसे उसे प्रस्‍तुत करती है, कैसे सोचती हैं उस दृष्य  को कि मुझे  दर्शकों के सामने ऐसे रखना चाहिए ?

उत्तर :- जी अब देखिए सर, पहले तो समर्पण की भावना होनी चाहिए। जब हमारे हाथ में तमूरा और करताल आता हैं और हम अपने ईष्ट को याद करके मंच में बैठते है तो लोक लाज-भय सब दूर हो जाता है। हमारे गुरूजी कहते थे कि इसमें समर्पित हो जाओ, पात्र आँखों में दिखना चाहिए, जो बोल रहे हो वह तुम्हारे आँख में दिखना चाहिए। जब अर्जुन की कथा बता रहे हो ता उस समय यह महसूस करो कि मैं अर्जुन हूँ। अर्जुन बाण चला रहा है। यह सोचो कि मैं अर्जुन हूँ या और कोई पात्र। पंडवानी गायक गायिका तो कथा में समर्पित हो जाते हैं। प्रसंगानुसार उस तरह की मुद्रा बनानी पड़ती है सर।

 

 

 

प्रश्‍न :- तो सामने दिखता रहता है जब आप प्रस्तुति देती हैं ?

उत्तर :- हाँ, सर बिल्कुल दिखते हैं जब हम समर्पित हो जाते हैं तो बिल्कुल दिखते हैं।

 

 

प्रश्‍न :- तो जैसे एक ही प्रसंग को आप जब बार-बार गाती हैं, कई बार गाती है तो हर बार वह अलग-अलग होता है या एक ही ?

उत्तर :- हाँ, हाँ सर कई बार तो ऐसे भी होता है कि उसी प्रसंग को यहां गायेंगे तो खूब मजा आयेगा। बहुत सुंदर प्रस्तुति होगी, उसी प्रसंग को कहीं और जाकर गायेंगे तो कभी-कभी उतना मजा नहीं आता। वैसी प्रस्‍तुति नहीं हो पाती जैसा होना चाहिए। (हंसने लगती है।)

 

 

 

प्रश्‍न :- मैं थोड़ी दूसरी बात पूछता हूँ जैसे ये जो बात आप बोलती हैं जो संवाद आप बोलती हैं तो संवाद भी हमेशा बोलती हैं कि आप हमेशा वही याद रखती हैं ?

उत्तर :- नहीं, नहीं। संवाद तो वही होता हैं सर। कभी-कभी प्रस्तुति में फर्क हो जाता हैं। कोई शब्द आगे कोई पीछे हो जाता है। कोई नये ढंग से भी बोल पड़ती हूँ। कभी-कभी हंसी-मजाक भी कर देती हूँ क्योंकि ये अपनों का मंच है, हमें भीड़ को रिझाना भी पड़ता है। कभी-कभी कोई ऐसी बात भी हो जाती है लेकिन प्रस्तुति और प्रसंग को हम पूरा बताते हैं सर।

 

 

 

प्रश्‍न :- अच्छा, ऐसी क्या बात है कि आपको ऐसा क्या लगता है कि जो आपने झाड़ूराम जी से थोड़ा अलग किया है ? ये तो आपने झाड़ूराम जी से सीखा हुआ गाया, लेकिन अब प्रभा देवी कहाँ है ? आप उसमें क्या पाती हैं ? आपनें ऐसा क्या किया है जो झाड़ूराम जी से थोड़ा अलग है ?

उत्तर :- झाड़ूराम देवांगन जी से तो कोई अलग नहीं है सर, बस हमारी वहीं चीज अलग है जो आज के लोग-बाग, नवयुवक और आज कल के बाल-बच्चे थोड़ी आधुनिकता को पसंद करते हैं। इसलिए थोड़ा लाइट या कोई अच्छा गीत हो उसे प्रस्तुती में शामिल कर लेती हूँ। हमारे गुरूजी ब्रम्हानंद, सूरदास जी या कबीर दास जी के भजन गाते थे। हम पहले तो वो भजन गाते ही है लेकिन उसे गाने से आजकल के नवयुवकों को थोड़ा उसमें मजा आता है तो आज की संस्कृति के अनुसार प्रस्तुति देते है। इससे लोग झूम जाते हैं इसलिए उसमें कुछ लोकधुन वगैरह नया डाल देते हैं। कोई कोई नया और बाकी तो सब उन्‍हीं की देन है। ज्यादातर मैं गुरूदेव जी का ही भजन गाती हूँ। कोई सुने या न सुने लेकिन आम दर्शक को बांधकर रखना है यह सोच कर लोक धुन इसमें और सेट करके गाते है। अन्य पंडवानी गायक-गायिका भी इसी तरह से गाते हैं। मैं पूर्णतया गुरूजी का नकल करती हूँ, किसी अन्‍य पंडवानी गायक-गायिका की नकल नहीं करती। मैं सोंचती हूँ मैं हर चीज में, गाने में, बजाने में सबसे भिन्न हूँ। मेरा स्वभाव भी किसी से नहीं मिलता, मेरी प्रस्तुति भी अलग है। मैं छत्तीसगढ़ की हर गायिका से पूरी तरह से अलग हूँ और मिलूंगी भी नहीं। मैं अपने गुरूदेव के सपने को पूरा करने का भरसक प्रयास करूंगी।

 

 

प्रश्‍न :- अभी पिछले 10 साल में पंडवानी में कितना फर्क आया है। मतलब जब आपने शुरू किया था, झाड़ूराम जी को भी देखा है। .. तो अभी 2017-2018 के इन 15 साल में क्या फर्क आया है?

उत्तर :- फर्क वही है सर। देखने-सुनने वालों का ढंग बदल गया है। पंडवानी गाने वालों के स्वर भी बदल गये हैं, आजकल सब  आधुनिकता में ढल गये हैं, सबका नवीनीकरण हो गया है। पहले जमाने की मूल प्रस्तुति को अब सब छोड़ चुके है, कितने ही गायक-गायिका अपने ढंग से प्रस्तुति दे रहे हैं, अब वही भिन्नता है। प्रसंग तो वही है लेकिन प्रस्तुति करने का ढंग बदल गया है।

 

 

 

प्रश्‍न :- तो ये जो कव्वाली जैसे आपने, जो आपकी धुन है इसमें आपने कब डाली ?

उत्तर :- वो तो मेरे गुरूदेव जी गाते थे, जो कव्वाली धुन है वह हमारे गुरूदेव गाते थे, पहले से ही गाते थे। बहुत मजा लेकर गाते थे और एक्‍शन से गाते थे। वे पहले ऐसा केन्द्र बिन्दु बनाते थे .. ‘अरे भई बेइरादा नजर उनसे टकरा गयी..’ तो लोग ऐसे देखते थे कि ये किसे देख रहे हैं। जो वे केन्द्र बिन्दु बनाते थे हमसे उतना नहीं बन पाता जितना वे बनाते थे। गुरूदेव बिल्कुल आमने-सामने किसी की नजर में झांक कर बनाते थे। हम भी बनाने की कोशिश करते हैं किन्‍तु बना नहीं पाते, हमारा प्रयास वही रहता है कि ‘बेइरादा नजर उनसे टकरा गयी..’ कि सुनो तो हैं परदेसिया (क्‍या गाते हैं जी? रागी से पूछती है फिर स्वयं बताने लगती हैं) ‘तुम बिन जिया न लागा, छिन छिन याद सताए..’ ये दोनो गीत एक की साथ जुड़ा हुआ है और इसमें श्रृंगार रस की प्रस्तुति है। सर हम प्रयास करते हैं उसी तरह बढ़िया गायें लेकिन मुझसे बन नहीं पाता जो वे बना पाते थे। एक धुन वे गाते थे ‘ये तोर नाम हे मोहन हरिया भैया गा, कृष्ण कन्हैया तोर पइंया लागौ गा। झन जा झन जा मथुरा नगरी गा भैया काला देख भरिहौं जमुना नगरी।‘ तो जमुना नगरी के संबंध में वो एक्‍शन देते थे ऐसे। इतना बेहतरीन एक्‍शन देते थे उस समय उनका कमर भी इधर उधर होता था वह हमसे नहीं होता। (फिर दोनो हंसते हैं।) ऐसा है, कोई-कोई चीज करना तो चाहते है पर नहीं हो पाता।

 

 

प्रश्‍न :- तो ऐसे कोई नई, कोई गीत या नई कव्वाली आपने शुरू की है इसमें ?

उत्तर :- नहीं सर नई कव्वाली तो नहीं गा पाई हूँ, नया कैसे गायेंगे। वही प्रस्तुति देते हैं जो हम देते आये हैं। उतना ही काफी हो जाता है, ज्यादा समय नहीं रहता क्‍योंकि हमको प्रसंग को आगे ले जाना होता है। अपने ढंग से उसी को प्रस्तुति देते हैं। किसी-किसी मंच में गाते है, किसी मंच में नहीं गाते हैं। कोई ऐसा बंधन नहीं है कि उसी को गाना है।

 

 

 

प्रश्‍न :- अब बहुत लोग पंडवानी गाने लग गये है तो क्या लगता है आपको ? अभी कौन लोग है जो अच्छा गा रहे हैं ? हमारा मतलब है कि जो पुरानी परम्परागत रूप से इसके भारीपन को बचाए हुए है और उसको आगे भी बढ़ा रहे हैं ?

उत्तर :- अब किसका-किसका नाम लें सर। नहीं गा रहे हैं कहेंगे तो ये ठीक नहीं होगा। अभी तो दोनो विधा के लोग बहुत बढ़िया प्रस्‍तुति दे रहे है। गायक-गायिकाओं नें अपनी संस्कृतियों को बचा कर रखा है। वे अपने-अपने ढंग से प्रस्तुति दे रहे हैं।

 

 

 

प्रश्‍न :- एक बात बताइए कि पहले पंडवानी के लिए लोग गाँव में बुलाते थे किन्‍तु अभी तो आप लोग केवल सरकारी कार्यक्रमों में गा रहे है। क्या अभी भी गाँव में बुलाया जाता है ?

उत्तर :- गाँव में भी जाते हैं सर। अभी गणेश पक्ष मे मेरा तीन दिन का कार्यक्रम नियत है। 21, 22  और 23 को धमधा क्षेत्र में जाऊँगी। गाँव में कार्यक्रम निरंतर चलते रहता हैं, किसी के घर मे छट्ठी होगा तो बुलायेंगे। किसी के घर मे गृह प्रवेश होगा या कुछ और तो भी बुलवाते है। कभी-कभी तो दशगात्र वगैरह में भी मैं कार्यक्रम देती हूँ। दशगात्र में मृतक की आत्मा की शांति के लिए दी गई प्रस्‍तुति बहुत अच्छा लगता है।

 

 

 

प्रश्‍न :- ये नवरात्रि का जो ............

उत्तर :- नवरात्रि में भी कार्यक्रम होता है मैडम। नवरात्रि में तो बहुत बढ़िया कार्यक्रम होता हैं। बल्कि इसमें दूसरे सीजन से कुछ ज्‍यादा पैसा मिलता है।

 

 

 

प्रश्‍न :- किस समुदाय के लोग ज्यादा बुलाते है ? कौन सी जाति के लोग?

उत्तर :- (हंसती है) नहीं सर ऐसे तो सब बुलाते है और हम तो जादा करके हिन्दुओं के ही बुलावे में जाते हैं।

 

 

 

प्रश्‍न :-मगर

उत्तर :- हाँ

 

 

 

प्रश्‍न :- मगर

उत्तर :- हाँ

 

 

 

प्रश्‍न :- जैसे आपने कहा था कि सतनामी लोग ज्यादा गा रहे हैं आजकल क्योंकि वे पढ़े लिखे लोग हैं।

उत्तर :- हूँ हूँ

 

 

 

प्रश्‍न :- आप ऐसा कह रहीं थी कि सरस्वती उनके ऊपर मेहरबान है?

उत्तर :- (हंसती है)

 

 

 

प्रश्न :- तो जैसे, ऐसे कौन लोग है जिनपर लक्ष्मी मेहरबान है और आपको बुलाते हैं ?

उत्तर :- (हंसती है) वो तो मैं हंसी मजाक में कह रही थी सर, लेकिन छत्तीसगढ़ में प्रायः आप देखेंगे तो पायेंगें कि सतनामी समाज के लोग ही ज्यादातर पंडवानी गा रहे हैं। अब पता नहीं उनको इसमे क्‍या ज्‍यादा अच्छा लगता है वे जानेंगे और अन्‍य संप्रदायों में बहुत कम है। सब अपने अपने ढंग से इसकी प्रस्तुति देते हैं। बढ़िया प्रस्तुति दे रहे हैं। बढ़िया कार्यक्रम भी हो रहा है और हर सीजन में कार्यक्रम हो रहा है। केवल हमारा ही नहीं हर पंडवानी गायकों का कार्यक्रम चलते रहता है। 

 

 

 

प्रश्‍न :- ये जो रागी होते है, एक बात बताइये..

उत्तर :- जी।

 

 

 

प्रश्‍न :- पंडवानी गायन परम्‍परा में एक रागी होता है, रागी की भी कोई परम्परा होती है क्या ? या कोई बड़े रागी भी हुए है जिनका रागी अनुकरण करना चाहते हों ? उनके जैसा करते हों, इसके संबंध में बताइये। सिया राम जी कुछ इसके बारे में बताईये।

उत्तर :- एक बात पहले मैं बोल दूँ सर फिर वो बोल पायेंगे। इस पंडवानी में जो गायक गायिका की मूल भूमिका है उतना ही रागी की भूमिका है। जब तक रागी ‘हाँ’ कहकर हुंकारू (हॉं की ध्‍वनि) नहीं देगा तब तक हम आगे बढ़ ही नहीं सकते हैं। पंडवानी गाने वाले, जब तक रागी, ‘हॉ’, ‘हौ जी’, ‘या या’, जो भी बोलते है है ना (सब हंसते है) वह यह नहीं बोलेंगा हम गा नहीं पायेंगे। इस हुंकारूवा (गाथा गायन में ‘हां’ कहने वाला) की बहुत बड़ी भूमिका है। हमारे गुरूदेव जी के साथ में रामनाथ यादव जी थे। जब वे ‘हौ’ कहते थे तो लोग झूम जाते थे। उनका ‘हॉ’, ‘हौ’ कहने का ढंग निराला था। अब जितने भी रागी है वे उनका नकल करते हैं, हम उन्‍हीं के जैसे ‘हाँ’ कहेंगे। कोई कोई बोल पाते है, कोई नहीं बोल पाते लेकिन अपने ढंग से कहते हैं। हमारे रागी भी अपने ढंग से कहते हैं। अब वो अपना अनुभव बतायेंगे आप उन्हीं से पूछ लीजिए।

 

 

 

प्रश्‍न :- बताइये जरा कि आप किसको मानकर चलते हैं ? आपने ये रागी का काम कहाँ से सीखा?

उत्तर :- सर मैं तो, ये बहन जब हमारी संगत में आई और झाड़ूराम देवांगन जी को गुरू बनाई तब से साथ हूँ। पहले मैं जब छोटा था तब रामायण मण्डली में जाता था। उसके बाद जब बहन जी नें पाल्टी वाल्टी तैयार किये तो इनके साथ आ गया। मैं भी गुरूजी के रागी रामनाथ यादव जी को देख-सुनकर ‘हौ’ बोलता हूँ। मैं तो कुछ नहीं जानता बस यहीं तक सीमित हूँ।

 

 

 

प्रश्‍न :- उनके साथ में

उत्तर :- जी।

 

 

 

प्रश्‍न :- उनके साथ में

उत्तर :- जी।

 

 

 

प्रश्‍न :- कई बार आप स्वर को आगे ले जाते हैं जब वो चुप हो जाती हैं, हारमोनियम के साथ आप आगे जाते हैं। स्वर को आगे लेकर के जाते हैं ?

उत्तर :- जी।
 

 

 

प्रश्‍न :- तो ये सब, मतलब कैसे करते है आप ?

उत्तर :- क्या है सर कि जो ये गा रही है न तो उसे थोड़ा आगे बढ़ाओगे तो स्वर पूरा बंधा रहता है इसीलिये आवाज को आगे ले जाता हूँ। मार्जिन तक, नेरो से जीरो तक।

 

 

 

प्रश्‍न :- तो आपको पता रहता है कि किस जगह पर लेकर जाना है। आप लोग पहले सेट करते हो या अपने आप से ये कर लेते हो ?

उत्तर :- नहीं सर हम लोग सेट वेट नहीं करते। बस बैठ गये और गुरूदेव का नाम ले कर, माँ कौशिल्या का और आप सबका, अच्छा करना करके सरस्वती माँ जो भी बनाती है वही बनाती है।

 

 

 

प्रश्‍न :- और जो बीच बीच में आप जो मजाकिया बात करते है वो पहले से आपके दिमाग में रहता है, दोनो के या ?

उत्तर :- वो प्रसंग के अनुसार से रहता है सर, जैसे यह प्रसंग बोलेंगे न तो उसके अनुसार से बीच में कुछ न कुछ उसमें चटनी डालोगे तब स्वाद आता है, गुड़ डालोगे तब मिठास आता है। ऐसे ही थोड़ा सा बीच में यह सब डालना पड़ता है।

 

 

 

प्रश्‍न - तो यह आप तत्काल सोच कर उसको वहीं के वहीं कर लेते हो ?

उत्तर :- तुरंत हो जाता है।

 

 

 

प्रश्‍न :- तो आपको भी यह संपूर्ण कथा गायन याद है ? कि नहीं?

उत्तर :- नहीं सर (हंसता है) उतना याद नहीं है, अब साथ में है तो थोड़ा थोड़ा अनुभव रहता है कि यहां से ऐसा जायेगा यहां, ऐसा बोलेगी ऐसा।

 

 

 

प्रश्‍न :- और आप लोग क्या साथ में प्रेक्टिस करते हो ? आप लोग अलग-अलग गाँव में रह रहे हो।

उत्तर :- नहीं, कोई प्रेक्टिस नहीं करते। हम लोग कोई रिहर्सल नहीं करते है।

गायिका - यह टीम ऐसी है सर, हम सब अलग-अलग गाँव से हैं, अभी कार्यक्रम देकर जायेंगे हम लोग, हम सब 50 किमी. के अंतर्गत रहते हैं। ऐसे में रियाज करने के लिये बुलायेंगे तो धन और समय बर्बाद होगा। हम सब खेतिहर हैं। जब कहीं कार्यक्रम तय होता है तो बता देते हैं कि यहां जाना है, सब इकट्ठा हो जाओ तो सब वहां पहुंच जाते हैं। कभी कभी मन लगे समय मिले तो थोड़ा बहुत खोल कर देखे, नहीं तो फिर ऐसा ही कार्यक्रम चलता रहता है। मैं आकाशवाणी भी बिना रियाज किये गयी हूँ, बस जाओ और जो बने गाओ और वहां से निकलो। हमें अनुभव है कि हम यहां गाते है, ऐसा गाते हैं, ऐसा बजाते हैं, इसको ऐसे करना है। प्रसंग भी याद है।

अब जैसे इनको आप पूछ रहे थे रागी को, तो पंडवानी में रागी की मुख्‍य भूमिका है, पंडवानी गायक गायिकाओं के आधा गाने को गाने वाले, रागी ही हैं। हम तो इन्‍हें ही आधा गायक मानते हैं। हम आधा गाकर छोड़ देते हैं, बस शुरू कर देंगे मुखड़ा और पूरा गाने की जिम्मेदारी इनकी होती है। कोई कोई पंडवानी में आप देखेंगे कि रागी ज्यादा गाता हैं, हमारे रागी से। हम बस ‘ये मोर रामा..’ कह देंगे तो आगे क्या कहना है इसे पता है।

 

 

प्रश्‍न :- गायक तो यह आधा है ही लेकिन जो कथा है...

उत्तर :- कथा भी मालूम रहता हैं सर।

 

 

 

प्रश्‍न :- पात्र का नाम रागी को पूरा पता रहता है।

उत्तर :- पता रहेगा तभी तो वह गा पायेगा सर। पता करना पड़ता है इनको।

 

 

 

प्रश्‍न :- अच्छा मान लें कहीं भूल गए आप तो क्‍या वो आपको बताता है?

उत्तर :- अब उसी से पूछ लो ना महाराज।

बहुत बहुत धन्यवाद। बहुत अच्छा बताया आपने।

 

 

छत्तीसगढ़ी श्रुतलेखन एवं हिन्दी  लिप्यांतरण: संजीव तिवारी

 

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and archaeology, Government of Chhattisgarh to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.

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