Pandvani: Udyog Parv- Prabha Yadav & Mandali
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Pandvani: Udyog Parv- Prabha Yadav & Mandali

in Video
Published on: 11 May 2019
Raipur, Chhattisgarh, 2018

Pandvani is one of the most celebrated performative genres from Chhattisgarh. Known mostly as a regional/ folk version of the Mahabharata, its terms of relationship with the Sanskrit epic are little known.This series of modules presents the recitation of the Pandavani by Prabha Yadav, The recitation presents all the eighteen parv of the epic based on the version compiled by Sabal Singh Chauhan, an author whose text was in circulation in this region. Prabha Yadav is a noted performer of the Pandavani, and represents what has come to be seen as Jhaduram Devangan’s style of rendition.

 

The parv presented in this video is the Udyog Parv. The prasangs contained in this parv are Vidur, Krishna ko apne Paksh me Lena, Yuddh Bhumi ka Chunav.

 

Transcript

Chhattisgarhi: भाई लगे हे विराट के समाज बैठे हे बड़े-बड़े बीर। राजा द्रुपद पांचाल नगर से पहुंचे हे। सुनिन पांडव प्रकट होगे। द्रोपती के पांचों बेटा ल लेकर के द्रुपद महराज। श्रेष्‍ठ दम्‍य राजकुमार श्रीखंठी विराजमान हे। बलराम अउ भगवान बइठे हे राजा युधिष्ठिर अउ राजा विराट बिराजमान हे।

रागी-हव।

राजा युधिष्ठिर भगवान ल काहत हे केशव राजा दुर्योधन के शर्त के मुताबिक तेरह बरस बनवास मोर पुरा होगे। भइया दुर्योधन मोर आधा राज्‍य ल वापस करही। भगवान हस के कहे भइया तेरा साल बिता डरे शर्त के मुताबिक राजा तोर राज ल वापिस करही। दूत के द्वारा खबर दिन दूर्योधन ल पांडव प्रगट होगे हे महराज। पांडव के राज ल देदे। राजा दूर्योधन बोले अरे दूत जाके पांडव ल बतादे। बिना युद्ध के मै पांडव ल सूई के अग्र जगह नइ दवं।

रागी- नइ देवव।

राजा दूर्योधन कहते है अरे सूई अग्र अरे भई देववं नहीं दाना

अरे दूत जा के बतादो पांडव को, अरे भारत युद्ध मै करहू जाना

राजा के बात ल सुनिस। भगवान की अइसे। दुर्योधन के विचार हे युद्ध होही, तो ओकर इच्‍छा जरूर पूरा होही।

रागी- जरूर पूरा होही। हव भई।

 

Hindi: ( राजा विराट का दरबार लगा है बड़े बड़े वीर बैठे है। राजा द्रुपद पांचाल नगर में सुनते है कि पांडव प्रगट हो गये है तो द्रोपदी की पांचों पुत्र को लेकर पहुंचते है। श्रेष्‍ठ दम्‍य राजकुमार श्रीखंठी विराजमान है। बलराम, भगवान बांके बिहारी, राजा युधिष्ठिर और राजा विराट विराजमान है।

रागी-हां।

राजा युधिष्ठिर भगवान केशव से कहते है कि राजा दुर्योधन के शर्त के मुताबिक तेरह वर्ष का वनवास पुरा हो चुका है। भैया दुर्योधन मेरा आधा राज्‍य वापस करेंगे। भगवान हॅस कर कहते है भैया तेरह साल बीत गया है तुम्‍हारा राज्‍य दुर्योधन जरूर वापस करेंगे। दूत के द्वारा खबर देते है दुर्योधन को कि पांडव प्रकट हो गये है उनका राज्‍य वापस कर दो। राजा दुर्योधन बोले अरे दूत जाकर पांडव को बता दो कि बिना युद्ध के आधा राज्‍य क्‍या सुई के अग्र भी जमीन नहीं दूंगा।

रागी- नहीं दूंगा।

राजा दुर्योधन कहते है अरे दूत मैं सुई के अग्र भी जगह नहीं दूंगा बिना महाभारत युद्ध के।

राजा की बात सुनकर भगवान कहते है ये बात है। दुर्योधन का विचार है युद्ध का तो उनकी इच्‍छा जरूर पूरा करेंगे।

रागी- जरूर पूरा करेंगे।)

 

 

विराट द्रुपद दृष्‍यदूम श्रीखंडी जितने बैठे थे सब कहे युद्ध हो। भगवान पुछत हे राजा युधिष्ठिर धरमराज लड़बे नहीं। राजा धरमराज इंकार मे सिर हिला देथे नइ लड़वं। धरमराज बोले नइ प्रभु। भगवान प्रश्‍न करे काबर नइ लड़स। राजा धरमराज बोले पृथ्‍वी में जतका क्षत्रिय हे लड़ाई के निमंत्रण में आही। सारी क्षत्रिय मर जाही। क्षत्राणी विधवा हो जाही। दुनिया में पाप उत्‍पन्‍न हो जाही। वर्ण शंकर कोन पैदा लेही। द्वारिकानाथ मैं महाभरत नइ लड़वं। राजा युधिष्ठिर भगवान ल हांथ जोड़ के काहत हे। सरी दुनिया ल तै नाच नचावत हस। सरी दुनिया तोर अधिन हे। द्वारिकानाथ मै तोर से पराथना करत हवं। एक घांव मोर भाई ल समझा दे। ओ मोर आधा राज ल दे दय। युधिष्ठिर व्‍याकूल हो जाथे।

रागी-हव भई।

केशव ये विनास ल रोक ले। भगवान कहे मै जाके भइया दूर्योधन ल समझ देहवं। आधा राज देही। हो सकथे दूर्योधन आधा राज नइ दव क‍हिस तक का कइहूं। तव राजा युधिष्ठिर काहय पचीस ठन गांव मांग लेबे। भगवान काहत हे अउ पचीस ठन गांव नइ दव कहिस त। त राजा युधिष्ठिर कथे।

तै हा पांचे गांव ल अगा मांगी लेबे भाई, केशव पांचे गांव ग मांगी लेबे

धमरेराज काहन लागे ग भाई, धमरेराज काहन लागे ग भाई।

पांच गांव मांग लेबे।

रागी- हव।

 

(विराट, द्रुपद, दृष्‍यदूम, श्रीखंडी जितने भी वीर बैठे थे सबके सब ने कहा युद्ध हो। भगवान युधिष्ठिर से पूछते है कैसे धर्मराज लड़ोगे की नहीं। धर्मराज सिर हिलाकर इंकार कर देते है। भगवान प्रश्‍न करते है क्‍यों नहीं लड़ोगे, तो धर्मराज जी कहते है प्रभु पृथ्‍वी पर जितने भी क्षत्रिय है सभी निमंत्रण में आयेंगे और सब मारे जायेंगे। क्षत्राणी विधवा हो जायेगी। दुनियां में पाप उत्‍पन्‍न हो जायेगा द्वारिकानाथ मैं महाभारत नहीं लड़ूंगा। हाथ जोड़कर राजा युधिष्ठिर कहते है भगवान सारी दुनियां आपके इशारों में नाचती है एक बार और दुर्योधन को समझाकर देख लीजिए। युधिष्ठिर व्‍याकुल हो जाता है।

रागी- हां भाई।

केशव इस विनाश को रोक लीजिए। भगवान कहे मैं भैया दुर्योधन को समझाकर देखता हूं। हो सकता है आधा नहीं दूंगा बोले तब, धर्मराज जी कहते है पचीस गांव मांग लेना यदि पचीस गांव देने को तैयार न हो तो पांच गांव मांग लेना।

रागी- हां जी।)

 

 

भगवान कहे ठीक हे तोर विचार हे शांति के संदेश लेके शांति के दूत बनके मै जाहूं महाराज दूर्योधन समझा के देखहूं। मानना नइ मानना राजा के काम।

रागी- हव भाई।

भगवान पहुंचथे हस्तिना नगर दरवाजा म द्वारपाल खड़े हे। भगवान जाके द्वारपाल से कहते है भइया जाके दूर्योधन ल बतादे। पांडव घर के दूत बनके भगवान आए हे। दूत दउड़त जाके दूर्योधन ल काहत हे महाराज भगवान बाके बिहारी जी आए हे। दरवाजा में खड़े हे। अगर कहू आप आदेश देहू त ओ आके मिलना चाहत हे महराज। राजा दूर्योधन बोले आने दो, कहे आवन दे। भगवान जब पहुंचाथे रागी तो भीष्‍म समेत जतेक बैठे है सब सिहासन छोड़ देते है। राजा दूर्योधन भगवान ल बइठार के पुछत हे। का सेवा करवं केशव। कइसे आए हस दुख सूख गोठियाइस, अब भगवान ह समझइस गा। दूर्योधन झगड़ा लड़ई झन कर भइया। पांडव के राज ल देदे। आधा राज्‍य देदे। राजा दूर्योधन कहते है द्वारिकानाथ तै तो आधा राज्‍य कहिथस मै।

अजी सुई अग्र देवव नहीं दाना, भारत युद्ध करहूं मै जाना।

अगर पांडव के भुजा में सामर्थ है तो द्वारिकानाथ तो पिता के राज्‍य वापिस लेवय। भगवान कहते है सोच लो। दूर्योधन पांडव के जीतने वाला ये द्वापर मे पैदा नइ लेये। रागी भाई भगवान के गोठ ल सुनिस तो दूर्योधन कथे अरे एक राउत, एक गहिरा, काली कमली के ओड़हई जंगल जंगल में गउ चरइया स्‍त्री मन के संग म लीला करइया, घर घर के माखन खवइया। अरे घर ल नइ संभालन सकत हे अउ मोला अक्‍कल बलाये ल आये हे रे। राजा दूर्योधन बोले घेर लो अउ भगवान ल बंदी बना के कारागृह मे बंद कर दो। डाल दो कारागृह मे।

रागी-हव।

(भगवान कहते है ठीक है मैं शांति दूत बनकर संदेश ले जाऊंगा। दुर्योधन को समझाकर देखता हूं मानना न मानना राजा का काम।

रागी- हां भाई।

भगवान हस्तिना नगर पहुंचते है दरवाजे पर द्वारपाल खड़े है। भगवान द्वारपाल से कहते है जाकर राजा दुर्योधन को बता दो। पांडव के घर से दूत बनकर भगवान आये है। दूत दौड़ जाता है और राजा से कहता है कि भगवान बाके बिहारी जी आए है दूत बनकर। दुर्योधन कहते है आने दो। भगवान जब पहुंचाथे है दरबार में तो रागी भीष्‍म सहित जितने भी सिंहासन प बैठे थे सभी सिहासन छोड़ देते है। राजा दुर्योधन भगवान को बैठा कर पूछते है, कैसे आए हो केशव, क्‍या सेवा करू। भगवान दुर्योधन को समझाते है झगड़ा लड़ाई मत करो भैया आध राज्‍य पांडव को देदो। राजा दुर्योधन कहते है द्वारिकानाथ तुम तो आधा कहते हो मैं तो सुई के नोक के बराबर भी जमीन नहीं दूंगा।

अगर पांडव के भुजा में सामर्थ है द्वारिकानाथ तो राज्‍य वापस ले लेवे। भगवान कहते है सोच लो। दुर्योधन पांडव को जीतने वाला इस दुनिया में पैदा नहीं हुआ है। इस बात को सुनकर दुर्योधन कहता है अरे एक राऊत (गाय चराने वाला यादव), जंगल-जंगल गाय चराने वाला, स्‍त्री के साथ लीला करने वाला, घर-घर माखन खाने वाला अपना घर तो संभाल नहीं पा रहा है और मुझे समझाने आया है। राजा दुर्योधन बोले घेर लो और भगवान को बंदी बनाकर कारागृह में बंद कर दो।

रागी-हां।)

 

भगवान आसन में विराजमान हे। दूर्योधन के बात सुनके भगवान मंद मंद मुस्‍काये वाह रे दुर्योधन। रागी भाई बताये हे ओ समय फेर राजा दुर्योधन ल आत्‍म ज्ञान होथे। राजा दुर्योधन ल भगवान बैठे बैठे विराट रूप के दर्शन कराथे। राजा दुर्योधन देखत हे। सारी सेना लड़र्इ में जूझ गेहे रागी भइया।

रागी-हव भई।

लोथ लोथ धरनी बठजाई, मांस माटी पहचान न आई। जब दुर्योधन ल आत्‍म ज्ञान होइस देखिस। तब राजा दूर्योधन हांथ जोड़ के कथे। तै तो सारी लीला ल तइयार कर डारे हस केशव। तोर तो सारी लीला तइयार होगे हे। ओ लीला म तै मोला आड़ लेवत हस कहे मोला दोस लगावत हस। ओ समे राजा ल आत्‍म ज्ञान होथे। भगवान सामान्‍य रूप म आथे ताहन राजा दुर्योधन दुसासन ल बलाके कथे। दुसासन आतो। दुसासन कथे का बाते भइया। तो दुर्योधन कथे दुसासन आज हमर घर खास अतिथि आए हे, मेहमान आए हे। अतिथि देवो भव:।

रागी- हव भइ।

रागी भाई अतिथि आए हे जा के रानी ल बताबे अइसे भोजन बनाबे अउ अइसे भोजन बनाके भगवान ल आज खिलाही के भगवान के आजा के आजा नई खाए होही पुरखा घलो नइ खाये तइसना। सोचे के लायक बाते।

रागी- हव भई।

अरे जेकर दे ल सारी दुनिया खाथे, विश्‍वभरण है भगवान।

रागी- हव भई।

(भगवान आसन में विराजमान है दुर्योधन की बात सुनकर मंद-मंद मुस्काते है, वाह दुर्योधन। रागी भैया बताते है कि उस समय दुर्योधन को अत्‍मज्ञान हो जाता है। राजा दुर्योधन को भगवान बैठे-बैठे ही अपना विराट रूप का दर्शन कराते है। दुर्योधन देख रहा है कि सारी सेना लड़ाई में जूझ गया है। रागी भैया।

रागी-हां भई।

लोथ-लोथ धरनी बजाई,  मांस माटी पहचान न आई।

दुर्योधन को जब आत्‍मज्ञान होता है तब कहता है केशव सारी लीला तो आप तैयार कर लिये है और उस लीला में मेरा आड़ ले रहे हो, मुझे दोस लगा रहे हो। भगवान जब सामान्‍य रूप में आते है तो दुर्योधन दुशासन को बुलकर कहते है आज हमारे घर एक खास मेहमान आए है। अतिथि देवो भव:।

रागी- हां भई।

अतिथि आए है जाओ रानी को बता दो और ऐसा भोजन बनाकर खिलायेंगे जो भगवान के पूर्वज भी नहीं खाये होंगे। सोचने लायक बात है जो भगवान सरी दुनियां को खिला रहे है उन्‍हे कहता है कि उनका पूर्वज नहीं खाया है हो ऐसा भोजन कराना है।

रागी- हां भई।

जिनका दिया हुआ सारी दुनियां खा रहा है, विश्‍वभरण है भगवान।

रागी- हां भई।)

 

 

ओला काहत हे ओकर आजा के आजा नइ खाये होही पुरखा के पुरखा नइ खाये होही। बाप दादा नइ खाये।

रागी- अच्‍छा।

ओ भोजन बनाही। रानी भानमति ह हंस हंसके भोजन तइयार करथे। भोजन बनगे सभा उसलिस। भगवान काहत हे येकर घर मोर पुरख के पुरख नइ खाये, येकर घर महु काबर खाहू रागी भाई।

रागी- जय हो जय हो।

भगवान उठके चलथे। विदुर जी के घर पहुंचत हे। विदुर सभा से उठ के आथे। बेरा होगे राहय लकर धकर रानी पारासरी जगा लोटा दतवन मांगथे अउ नदिया म स्‍नान करे बर जाथे।

रागी- अच्‍छा।

रानी पारासरी पूजा के समान ल सकेलत हे।

रागी- हव।

काबर के विदुर महराज भगवान के पूजा करे बिना भोजन नइ करे। भगवान पहुंचगे विदुर के घर के अंगना मे। अउ अंगना म जाके चिल्‍लावथे विदुर र, ये विूदर। पारासरी भितरीच ले काहत हे कोने।

रागी- हव भइ कइसे आहे।

चिल्‍लावत हे तेमन कोने। भगवान फिर से आवाज देते है, ये विदुर। रानी पारासरी सकेलत पूजा के समान ल तेन दुआरी म निकलथे। दरवाजा मे निकलथे रानी के नजर भगवान उपर परथे। आह मउर मुकुट बांधे पितांबर पहने हाथ म बंशी लिये मंद मंद मुस्‍काते हुये भगवान खड़े हे। विदुरानी देखिस कहे ओ भगवान आहे। बताए हे रागी भाई जब विदुरानी भगवान ल देखथे त सुध बुध खो देथे। अपन आप ल भुला जथे। आज मोर घर मे मोर नरायण आए हावय रागी। मोर भगवान आए हे, मोर ठाकुर आए हे। विदुरानी सुध बुध खो बैठिस। हाथ ल धरथे भगवान के भितरी म लेगथे। लेगके पिड़हा म बइठारत हे। अउ पिड़हा म बइठार के विधिवत पूजा करत हे। जउन ल आपन आप के सुध नइये वो भगवान के काए पूजा करही ओतो भगवान ल देखके आपन आप ल भुलगे हे विदुरानी। ओला अतके सुरता हे मोर भगवान आहे। मोर भगवान आहे। ओ दिन विदुर जी महराज भगवान के भोग लगाये के खातिर केला ला के रखे हे।

रागी- हव।

 

(रागी- अच्‍छा।

रानी भानुमति प्रसन्‍न होकर भोजन तैयार करती है। सभा समाप्‍त होता है तब भगवान विचार करते है जो भोजन मेरा पूर्वज नहीं खाया है वह मैं भी नहीं खाऊंगा।

रागी- जय हो।

भगवान उठकर चले जाते है। विदुर जी के घर पहुंचे है। विदुर सभा से उठकर आते है। समय बहुत हो चुका था जल्‍दी-जल्‍दी विदुरानी से लोटा दातुन मांग कर नदी जाता है स्‍नान करने के लिए।

रागी- अच्‍छा।

रानी पारासरी पूजा का सामान इकट्ठा करती है।

रागी- हां जी।

क्‍योकि विदुर महाराज भगवान का पूजा किये बिना भोजन नहीं करते है। भगवान पहुंच गये विदुर के आंगन में और चिल्‍लाते है ये विदुर। रानी पारासरी अंदर से ही कहती है कौन है।

रागी- हां भई कैसे आये है।

कौन आवाज दे रहे है। भगवान फिर से आवाज देते है, ये विदुर। रानी पारासरी दरवाजे पर निकलती है। रानी भगवान को देखती है आह मोर मुकुट बांधे पितांबर पहने हाथ में बंशी लिये मंद-मंद मुस्‍काते हुये भगवान खड़े है। विदुरानी भगवान को देखकर सुधबुघ खो बैठती है। आज मेरे घर नारायण आए है। भगवान का हाथ पकड़कर अंदर ले जाती है और आसन में बैठाकर विधिवत भोजन कराती है। उस दिन विदुर भगवान को भोग लगाने केला लाए थे। रागी- हां।)

 

 

लकर धकर रानी विदुरानी ओ केरा ल लानथे। अउ केला लानथे भगवान के आगू म बइठे हन रागी भाई। अउ केला ल लानके केला ल छिलथे, अउ केला ल छिलके गुदा अतका ल भुइंया कोति फेक देथे अउ गुदा अतका ल फेक के।

फोकला ल ओला खवावन लागे, छिलका ल केशव ल खववान लागे भाई

श्‍याम सुंदर गा सोचन लागे भाई, श्‍याम सुदंर गा खावन लागे भाई

केला ल छिलत हे, गुदा ल फेकत हे फोकला ल भगवान ल खवावत हे। भगवान मंद मंद मुस्‍काये। केला के छिलका ल खाये अउ भगवान करे वाह कितना स्‍वादिष्‍ट हे। भगवान ह विदुरानी के हाथ देखत राहय काहय एक खाव वो हाथ कोति चल देते। अउ वो हाथ के ह एक घाव ये हाथ कोति आ जतिस। काबर केला के छिलका म ये स्‍वाद हे रागी भइया त येकर गुदा ह अउ कतेक मिठावत होही। छिलका म ये स्‍वाद हे, भगवान छिलका ल खावत हे विदुर जी के घर में। ठउका उही समय विदुर सी स्‍नान करके आवथे अउ चिल्‍लावथे पारासरी। ये विदुरानी। तो विदुरानी काहत हे महराज अतेक दिन ते बिन मुंह वाला ठाकुर के पूजा करत रहे।

आज हमर घर साक्षात मुंह वालो ठाकुर ह आये हे। भगवान के आगमन होय हे। विदुर जाके देखे, विदुरानी केला के छिलका ल खवावथे। भगवान ह विदुरानी से केला के छिलका ल खावथे। विदुर दंडवत प्रणाम करत हे गलती के छमा याचना करत हे। द्वारिकानाथ आज तै मोर घर म आके केला के छिलका ल खावत हस। तब भगवान कथे विदुर तै काबर चिंता करत हस। भगवान ल ओ दिन केहे बर परगे रागी ये विदुर ये केला के छिलका में अतका अकन सुवाद हे। जब मै छोटे राहत रेहे।

 

(विदुरानी केला लेकर आती है और भगवान के सामने बैठ कर केला छिलकर गुदा नीचे फेक रही है और छिलका भगवान को खीला रही है। छिलका-छिलका उसे दे रही है और भगवान भी छिलका ही खा रहे है। भगवान सोचते है छिलक-छिलका ही खिला रही है कभी गलती से गुदा भी खिला देती तो क्‍या होता। भगवान मंद-मंद मुस्‍काते हुये सोचते है जब केले का छिलका इतना स्वादिष्ट है तो केले में कितना स्‍वाद होगा। ठीक वही समय विदुर स्‍नान करके आते है। विदुरानी विदुर महाराज को कहती है इतने दिनों तक बिना मुंह वाले भगवान की पूजा कर रहे थे आज ठाकुर जी आए है। विदुर जाकर देखे तो भगवान केले का छिलका खा रही है विदुर दंडवत प्रणाम करके गलती के लिए क्षमा याचना करता है तब भगवान कहते है विदुर बहुत ही स्‍वादिष्‍ट है केले का छिलका।)

 

 

अति माति युस‍मति हम क्षिर पिलायी। भगवान कहते है भइया विदुर जब मै छोटे रेहेवं माता यशोदा के गोद म बइठ के जब मै दूध पियव तो माता यशोदा के गोरस से भी कही जादा केला के छिलका म हे।

रागी- जय हो।

भक्‍त विदुर जी भगवान के चरन म गिर जथे रागी। अउ विदुर चरन में गिर के काहत हे द्वारिकानाथ।

गाना- मुरारी मुरारी मुरारी रखिहवं लाज हमारी, ये मुरारी मुरारी मुरारी हो रखिहव लाज हमारी।

ये मुरारी मुरारी मुरारी हो रखिहवं लाज हमारी।

गज अउ ग्राह ल तै जल भितर, लड़त लड़त गये हारी। हो मुरारी

गज अउ ग्राह ल तै जल भितर, लड़त लड़त गये हारी। हो मुरारी

ब्रज के फेर सुने रघुनंदन ब्रज के फेर सुने रघुनंदन गरूड़ तोड़ पगधाये।

हो मुरारी रखिहव लाज हमारी, ये मुरारी रखिहवं लाज हमारी।

मुरारी मुरारी मुरारी हो रखिहवं लाज हमारी, ये मुरारी मुरारी मुरारी हो रखिहव लाज हमारी।

भगवान द्वारिकानाथ वापिस हस्तिना नगर आये थे विराट नगर पहुंचाथे। राजा दुर्योधन के संदेश ल पांडव ल बतावथे। कि भइया वो बिना युद्ध करे राज ल नइ दव कइथे। आखिर म पांडव ल लड़े बर तइयार होथे। रागी भाई पांडव जब लड़े बर तइयार होथे तब। व्‍सास नारायण जाके दूर्योधन ल समझाथे। दूर्योधन अभि भी समय हे तै विनाश ल रोक ले।

रागी- राके ले।

 

(भगवान कहते है भैया विदुर जब मैं छोटा था तो माता यशोदा गोद में बैठाकर मुझे जो दूध पिलाती थी उससे भी कहीं ज्‍यादा स्‍वाद था केले के छिलके में।

रागी- जय हो।

भक्‍त विदुर जी भगवान के चरण में गिर जाते है और कहते है द्वारिकानाथ-

गाना- मुरारी मुरारी मुरारी रखना लाज हमारी

ये मुरारी मुरारी मुरारी हो रखना लाज हमारी।

गज और ग्राह जल के अंदर लड़ते-लड़ते हार गये।

ब्रज का फेर सुने रघुनंदन ब्रज का फेर सुने रघुनंदन गरूड़ तोड़ पगधाये।

ये मुरारी मुरारी मुरारी हो रखना लाज हमारी।

भगवान द्वारिकानाथ वापस हस्तिना नगर से विराट नगर पहुंचते है। राजा दुर्योधन का संदेश पांडव को बताते है कि वे बिना युद्ध के राज्‍य नहीं देंगे। अंत में पांडव भी लड़ने के लिए तैयार हो जाते है। व्‍सास नारायण जाकर दुर्योधन समझाते है अभी भी समय है इस विनाश को रोक लो।)

 

 

भक्‍त विदुर समझावत हे फेर राजा नइ मानत हे। हस्तिना नाम के नगर से दुर्योधन और विराट नगर से राजा युधिष्ठिर। सेना इकटठा करथे। लिख लिख के पतरिका भेजत हे चारों दिशा में कि कौरव अउ पांडव में युद्ध होवइया हे। हम आप सबको सादर आंमंत्रित करते है। नेवता देवत हन ये युद्ध के निमंत्रण मे जरूर आहू। बीर मन पतरिका ल पढ़त हे रागी जेन ल जेकर दल में जाना हे, सहयोग देना हे ओकर दल म पहुंचव। राजा धरमराज अर्जुन ल काहत हे। अर्जुन तै सबला बलाये हस पर भगवान द्वारिकानाथ अभि नइ आये। भगवान ल लाना हे।

रागी- हव भई।

तो कहे अर्जुन जाव अउ भगवान ल आमंत्रित करके लान। विराट नगर ले अर्जुन निकल हे हाथ म नरियर, धोती, सुपरी धरके। हस्‍तिना म राजा दुर्योधन ल भीष्‍म काहत हे भगवान कृष्‍ण ल लाना हे लड़ाई के नेवता मे। दुर्योधन कथे काकर सो बनही। त कहे तही मुखिया अस तोर से जमही।

रागी- हव भई।

 

(भक्‍त विदुर समझाते है किन्‍तु राजा नहीं माना। हस्तिना नगर से दुर्योधन और विराट नगर से राजा युधिष्ठिर सेना इकटठा करते है। पत्र लिख-लिखकर भेजते है चारों दिशा के राजाओं को कि कौरव और पांडव में युद्ध होने वाला है हम आपको सादर आमंत्रित करते है। युद्ध का निमंत्रण है जिसे जिसके दल में सहयोग करना है पहुंचे। राजा धर्मराज अर्जुन से कहते है सबको बुलाए हो पर भगवान अभी तक नहीं आए है। भगवान को लाना है।

रागी- हां भई।

धर्मराज अर्जुन से कहते है जाओ निमंत्रण देकर आना। अर्जुन विराट नगर से हाथ में नारियल, धोती, सुपरी निकलता है। हस्‍तिना में राजा दुर्योधन को भीष्‍म कहते है भगवान कृष्‍ण को लड़ाई का निमंत्रण देना है, दुर्योधन तुम जाओ।

रागी- हां भई।)

 

 

हस्तिना से दुर्योधन चलते है और विराट नगर से अर्जुन। चउक में मिले हे जंगल म रस्‍ता ह। हस्तिना तरफ से राजा दुर्योधन और विराट नगर तरफ से अर्जुन आवथे दूनो रस्‍ता चउक म मिले अउ दूनो भाई के बीच म मुलाकत होवथे। अर्जुन से बड़ ये राजा दुर्योधन ह भइया, दउड़ के अर्जुन दुर्योधन के दंडवत प्रणाम करथे। राजा छाती म लगावथे अर्जुन ल। आखिर म दूर्योधन पुछत हे कहां जात हस अर्जुन। तो अजु्रन कथे भइया मै भगवान ल नेवता देला जाथवं। कहा तो द्वारिका नगर। राजा दुर्योधन काहय महू जाथव भगवान ल नेवता देबर। अब राजा काहत हे अतका बेरा ले अकेल्‍ला अकेल्‍ला जात रेहेन अर्जुन। अब दूनो भाई मुहांचाही हांसत गोठियावत जाबो। भगवान जानके अर्जुन अउ दुर्योधन दोनो झन नेवता देला आवत हे। अंतरयामी जान गये। काकर निमंत्रण ल स्‍वीकार करिहू अउ काकर नइ स्‍वीकार करिहवं। काबर दोनो एके साथ आवाथे। भगवान चिल्‍लाये बोले रूकमनी। मां रूकमनी पूछे काये केशो। भगवान कहे मोला भूख लागथे। लकर धकर भगवान पिड़हा म बइठे भोजन करे बर मां रूकमनी ह तेन भोजन परोसे हे, अउ दूरिहा म बइठ के हावा देवत हे। भगवान हे तउन लकर धकर खइस दू चार कवंरा अउ खाना खाके उठके भइया। भोजन करके उठते बोले ही मोला निदं आवाथे मै विश्राम करिहवं। सोना के पलंग अउ मखमल के गद्दा में भगवान पितांबर ओड़ के  सोवथे। गोरस के फड़ से भी जादा सफेद अउ मुलायम मखमल के गद्दा म सोय हे भवागन। रागी भगवान खा डरिस। भगवान के आठो रानी मन ल भोजन निकालत राहय ठउका अर्जुन अउ दूर्योधन पहुंचथे। आवाज देथे तो मां रूखमनी लोटा में पानी धरके निकलथे। महाबीर अर्जुन रूखमनी ल देख के दोनो हाथ जोड़ देथे। हाथ जोड़ के अर्जुन पुछत हे ए दीदी रूखमनी कहे भगवान ह कहां गेहे। तो माता इशारा कर दीस

गाना- अगा वहिदे वहिदे सोये गा हेवय भाई,

इशारा करत हे रागी

रागी वहीदे वहीदे सोये ग हेवे गा भाई अर्जुन ह देखन लागे भाई।

अर्जुन ह देखन लागे भाई, अर्जुन ह देखन लागे भाई।

सीधा इशारा कर दीस रूखमनी। इशारा ले देखिस ता‍हन दूर्योधन जान नइ डरिस गा भगवान इही कोति होही किके।

रागी- हहो वो।

 

(हस्तिना नगर से दुर्योधन चलते है और विराट नगर से अर्जुन। चौक में दोनो मिल जाते है और फिर आगे का सफर दोनो एक साथ तय करते है। अर्जुन दुर्योधन को प्रणाम करता है और आपस में चर्चा करते हुए कहते है कि आओ भाई एक साथ चलते है दोनो को वहीं जाना है। अन्तर्यामी भगवान जान गये कि दोनो एक साथ निमंत्रण देने आ रहे है। अब किसका निमंत्रण स्‍वीकार करुंगा बड़ी दुविधा है।

रागी- हां भई।

भगवान चिल्‍लाकर बोले रूकमणी। मां रूकमणी पूछे क्‍या है केशव, तो भगवान कहते है मुझे भूख लगी है। मां रूकमणी जल्‍दी-जल्‍दी भोजन परोसती है भगवान थोड़ा ही खाकर कहते है कि अब मुझे निंद आ रही है मैं आराम करूंगा। सोने के पलंग और मखमल के गद्दे पर पितांबर ओढ़े भगवान सोये है। भगवान की आठ रानियां भोजन निकाल रही थी तभी अर्जुन पहुंचते है और रूकमणी को हाथ जोड़कर पुछते है दीदी भगवान कहां है। माता भगवान की ओर इशारा करती है।

गाना- वे वहां है वहां तो सोये है, अर्जुन को इशारा करती रागी भैया।

रूकमणी भगवान की ओर इशारा करती है।

अर्जुन देखते है और दुर्योधन भी इशारा समझकर पहुंच जाता है भगवान कृष्‍ण के पास।

रागी- हां जी।)

 

 

दुर्योधन पहले चलिस। जाके देखे। भगवान सोये सोनो के पंतग म। राजा खड़े खड़े आस पास ल देखिस तो उही कना खाली टेबल राहय। ओ खाली टेबल म नारियल, धोती, सुपरी ल रख दीस दुर्योधन ह। अउ भगवान के सिराना दुर्योधन ह सीना तान के बइठगे। सिर की ओर भगवान सोये। भगवान के सिरहाना म दुर्योधन बइठे हे। अर्जुन पाछु आइस।

रागी- हव भई।

हांथ म नारियल, धोती, सुपारी ल धरे देखिस भइया दुर्योधन भगवान के सिराने मे बइठे हे। महाबीर अर्जुन भगवान के गोड़तरिया म पांव के तरफ खड़े हे। पैर के तरफ अर्जुन खड़े हे दोनो हाथे जोड़ के काहत हे मै तोर भरोसा मे अतका बड़े बल करे हवं। मन ही मन अर्जुन बाके बिहारी के याद करत हे। रागी भाई भगवान ल सो के उठे बर होइस। धीरे पितांबर ल सरकाइस अउ एकदम सीधा उठगे।

रागी- अच्‍छा।

कोनो भी सोय हे भइया रागी वो उठही त वो गोड़तरियच ल देखही। मुड़सरिया ल नइ देखय। जैसे भगवान सो के उठे भगवान के नजर अर्जुन के उपर पड़थे। भगवान देखते ही पूछे अर्जुन तै भइया कइसे आये हाथ म नारियल, धोती, सुपारी राहय रागी। अर्जुन एक पल नइ चूकिस। तोला नेवता गा देवत हाववं भाई तोला नेवता गा दवत हाववं भाई

तोला नेवता गा देवत हाववं ग भाई तोला नेवता गा दवत हाववं भाई

येदे द्वारिकानाथ लड़ई के नेवता देवत हवं। भगवान ह झोक डरिस तब दुर्योधन ल चेत अइस। नारियल, धोती, टेबल म माड़े राहय तेन बरदी असन बगरगे।

रागी- चारो मुड़ा छरियागे।

 

(दुर्योधन पहले पहुंचते है और देखते है भगवान सोये है तो पास रखे टेबल में नारियल, धोती, सुपारी रख कर सिर की ओर जा कर बैठ जाता है। पीछे-पीछे में अर्जुन पहुंचता है।

रागी- हां भई।

हाथ में नारियल, धोती, सुपारी लेकर भगवान के पास पहुंचता है और देखता है कि दुर्योधन सिर के पास बैठा है तो महावीर अर्जुन पैर की ओर हाथ जोड़कर खड़ा हो जाता है। मन ही मन अर्जुन बांके बिहारी को याद करता है। रागी भैया भगवान सो करके उठते है तो सबसे पहले अर्जुन को देखते है और कहते है कैसे आए हो अर्जुन। अर्जुन के हाथ में नारियल, धोती, सुपारी है भगवान से कहते है आपको युद्ध का निमंत्रण देने आया हूं। द्वारिकानाथ अर्जुन का निमंत्रण स्‍वीकार कर लेते है उसके बाद दुर्योधन को याद आता है पास में नारियल, धोती, सुपारी रखा था जो बिखर गया है।

रागी- चारो ओर बिखर गया है।)

 

 

रागी भइया राजा दुर्योधन ल धियान आथे हाथ के नारियल, धोती, सुपारी ल सकेल‍थे अउ सकेले के बाद कइथे प्रभु अर्जुन ले पहिली मै आये हवं। नियम के मुताबिक मोर आमंत्रण ल आप ल स्‍वीकार करना चाहिए। क्‍याकि मै पहले आया हूं। भगवान कथे दूर्योधन फेर तोर ले पहिली मै अर्जुन ल देखे हवं। काबर वो गोड़तरिया म खड़े रिहिसे लेकिन ते चिंता मत कर। तुम दोना भाई आपस मे सलाह कर लव। भगवान कहे हे जब कौरव अउ पांडव म महाभारत के युद्ध होही तो मै लड़ाई के मैदान म अस्‍त्र शस्‍त्र नइ लाव, लड़व भिड़व नहीं। जेखर जाहू भाते खाये के बूता करहू। खाए बर जाहू लड़व नहीं। अउ तुमन ल लड़ाई करके महाभारत ल जीतना हे। तुम सलाह लेलव एक डहर मोर साठ हजार नरायणी सेना हे अउ एक तरफ मै हवं। लड़ाई जीतना हे दूर्योधन ने तिही बता डार काला लेगबे ते।

रागी- हव भाई।

राजा सोचे येहा लड़व नही किथे। घर म जाही ये बइठे बइइे खाही है ना।

रागी- हव भई।

मोला तो महाभारत जीते बर हे रागी भाई। राजा दुर्योधन काहत हे महराज मोला वो साठ हजार नरायाणी सेना ल देदे। भगवान अर्जुन ल देख के हांस के किथे तोर का विचार हे। अर्जुन हांथ जोड़ के कथे द्वारिकानाथ नारायणी सेना मोला जरूरत नइये कहे मै आपे ल लेगे बर आये हवं। नेवता देके लहुट के भइया। अब भगवान विचार करते है महाभारत सुरू होने वाला हे। न जाने ये युद्ध में कोन मरही अउ कोन बाचही। भयंकर महाभारत के लड़ाई हे द्वापर के अंत में। कौरव के पक्ष में भइया हे अउ पांडव के पक्ष में मै हवं। कोन जनी ये लड़ाई मे दोनो भाई मरबो के बाचबो। मरे के पहले दोनो भाई एक साथ बैठ के भोजन कर लेते है, बलदाउ भइया ल बलावथे। आज हम दोनो भइया एक साथ बैठ के भोजन करेंगे। बलराम रेवती बन में निवास करे। बुलावा ल पाके बलराम अइस द्वारिका। दोनो बइठ के फेर भोजन करते है। भोजन करिस, गोठियात बतावत ले मुंधियार होगे।

रागी- मुंधियार होगे।

 

(रागी भैया राजा दुयोधन को ध्‍यान आता है तब नारियल, धोती, सुपारी इकट्ठा कर कहता है प्रभु मैं पहले आया हूं। नियम के मुताबिक मेरा निमंत्रण पहले स्‍वीकार कीजिए। भगवान कहते है दुर्योधन मैंने पहले अर्जुन को देखा खैर चिंता मत करो तुम दोनो भाई आपस में फैसला कर लो क्‍याकि जब महाभारत का युद्ध होगा तब मै लड़ाई के मैदान में अस्‍त्र-शस्‍त्र उठाऊंगा। जिसके घर जाऊंगा खाना खाने ही जाऊंगा। तुम्‍हे लड़ाई करके महाभारत जीतना है। तुम दोनो ही आपस में फैसला कर लो एक तरफ मैं हूं और दूसरी तरफ मेरी साठ हजार नारायणी सेना। दुर्योधन तुम ही बताओ क्‍या करना है।

रागी- हव भाई।

राजा सोचे ये ता लड़ाई नहीं करेगा बैठा ही रहेगा।

रागी- हां जी।

मुझे तो महाभारत जीतना है राजा राजा दुर्योधन विचार कर कहते है मुझे साठ हजार नारायणी सेना देदो भगवान। अर्जुन हाथ जोड़कर क‍हते है द्वारिकानाथ मुझे नारायणी सेना की जरूरत नहीं है आपको ही लेने आया हूं।

अब भगवान विचार करते है कि महाभारत शुरू होने वाला है न जाने युद्ध में कौन मरने वाला है और कौन बचेगा। भंयकर लड़ाई है। कौरव की ओर बड़े भैया है और पांडव की ओर। न जाने दोनो भाई लड़कर मरेंगे या बचेंगे। मरने से पहले दोनो भाई एक साथ भोजन कर लेते है ऐसा विचार करके बलदाऊ को बुलावा भेजते है। बलदाऊ रेवती वन में निवास करते है जो भगवान के बुलावे पर द्वारिका आते है। दोनो साथ बैठ कर भोजन करते है और बात करते-करते रात हो जाती है।

रागी- अंधेरा हो गया।)

 

 

बलराम देखित अरे अबड़ रतिहा होगे ग। रात हो गये है यहां से जंगल जाना है रेवती बन भगवान ल बलराम पुछत हे एकत ठन कुरिया खाली हे, घर खाली हे। रात भर रइ जतेव द्वारिकानाथ बिहनिया चल देतेवं। भगवान कथे तोर भाई बहु मन के मारे जम्‍मो कुरिया भरे हे। भगवान के कतका रानी सोला हजार एक सौ आठ रानी। ए‍कक ठन कुरिया म एकक झन हे एको ठन कुरिया खाली नइये। भगवान कथे भइया बूक होगे हे त कहे मै जावत हवं। द्वारिका के गली गली जावत हेवे बलदाउ जी महाराज जैसे भगवान के इच्‍छा। ऐसे भगवान के माया एक झन ब्राम्‍हण आड़ी आड़ा सुते हे अंधियार हे रागी अउ ब्राम्‍हण रस्‍ता म सुते सुते अंतिम सांस लेवत हे।

रागी- हव जी।

बलदउ जी दूर से कहते है। बलराम दूरिहा ले काहय अरे भइया कोन अस। रास्‍ता मे सोय हस कहे रास्‍ता ल छोड़। मै यहां से गुजरना चाहत हवं। दू तीन आवाज देथे ब्राम्‍हण आवाज नइ दय। बलराम निहरथे अउ निहर करके छोटे से गोटी ल उठा लेथे। एक छोटे गोटी उठाये अउ उठाकर के बलदाउ जी फेक कर के मार देथे। कोन जनी अंधियार म ओ गो‍टी ब्रम्‍हण ल परिस के नइ परिस। न जाने वो गोटी परिस के या न परिस। ब्रम्‍हण देवता राम कहिके प्रण ल तियाग देथे।

रागी- जय हो।

बलदाउ जी काप गे। कहे रागी भइया मोला ब्रम्‍ह हत्‍या लगगे। तुरंत वापिस होगे। भगवान घर जाके चिल्‍लाथे। ये द्वारिकानाथ। भगवान हांस देथे। अंगना म निकल के बलराम ल कथे भइया सपनावत हस का गा।

रागी- हव भई चिल्‍लावत हस।

 

( बलराम देखते है अरे बहुत रात हो गई है, जंगल का रास्‍ता है रेवती वन जाना है यही रूक जाता हूं सोच कर भगवान से पुछते है केशव कोई कमरा खाली है क्‍या रात्रि विश्राम के लिये सुबह चला जाऊंगा। भगवान कहते है आपकी बहु रहती है, कमरा खाली कहां है। भगवान की तो सोला हजार एक सौ आठ रानियां है एक भी कमरा खाली नहीं है। द्वारिका की गलियो से चलते हुये बलदाऊ जी जा रहे है तभी भगवान जी माया रचते है। एक ब्राह्मण रास्‍ते में सोया हुए अंतिम सांस ले रहा है।

रागी- हां जी।

बलदाऊ जी दूर से कहते हैं अरे कौन हो भैया, रास्‍ते में क्‍यों सोये हो। रास्‍ता छोड़ो मैं यहा से गुजरना चाहता हूं। तीन आवाज में भी ब्राह्मण कुछ नहीं बोलता है तो बलराम वहीं छोटा सा कंकड़ उठाकर मार देता है। न जाने अंधेरे में कंकड़ लगी या नहीं लगी ब्राह्मण राम कहकर प्राण त्‍याग देता है।

रागी- जय हो।

बलदाऊ ती कांप जाता है। कहता है मुझे अब ब्राह्मण हत्‍या लग गया। तुरंत वापस आकर द्वारिकानाथ के द्वार पर आकर चिल्‍लाता है। भगवान बाहर निकल कर कहते है कुछ सपना देखे क्‍या दऊ भइया।

रागी- हां भई इतना चिल्‍ला रहे हो।)

 

 

बलराम कहे केशव रस्‍ता म एक झन ब्राम्‍हण सुते रिहिस। मै गोटी म मारेव परिस धन नइ परिस ओ महराज ह प्राण ल तियाग दिस। भगवान कथे तोला तो ब्रम्‍ह हत्‍या लग गे भइया। छलिया भगवान काहत हे तोला तो हत्‍या लगगे। तै ब्राम्‍हण ल मार डरेस। काली बिहनिया ये हत्‍या ल काटे बर जा। बलराम ह साठ हजार नरायणी सेना ल कौरव दल म भेज देथे। अउ अपन होवत बिहनिया ओ ब्रम्‍ह हत्‍या ल काटे बर जावथे। त भगवान हांस के काहत हे

गाना- अरे कहां जाबे मथुरा कांशी अउ कहां तिरथ धाम,

कहां जाबे मथुरा कांसी अउ कहां तिरथ धाम,

घट घट म बिराजे हावय भइया सिताराम,

घट घट म बिराजे हावय भइया सियाराम

कहां जाबे मथुरा कांसी अउ कहां तिरथ धाम, कहां जाबे मथुरा कांसी अउ कहां तिरथ धाम,

घट घट म बिराजे हावय भइया सिताराम, घट घट म बिराजे हावय भइया सिताराम।

घट घट म बिराजे हावय भइया सिताराम, घट घट म बिराजे हावय भइया सिताराम।

बलदाउ हत्‍या काटे बर जाथे भगवान पांडव पक्ष म सामिल हो जाथे। भइया कौरव दल म ग्‍यारह यक्षोणी सेना इकटठा होगे। पांडव दल में सात यक्षोणी सेना कुल मिलाके अटठारह यक्ष होगे।

रागी- अच्‍छा।

बोले इतना सेना जगह के चुनाव करे ल परही, जगह खोजे ल परही जहा महाभारत के युद्ध करबो।

रागी- जय हो।

जगह खोजही कोन। तो पांच व्‍यक्ति ल चुने गिस। पांडव के पक्ष से दो अउ कौरव के पक्ष से तीन। भीष्‍म, द्रोणाचार्य, राजा दूर्योधन। पांडव के पक्ष से राजा युधिष्ठिर अउ भगवान द्वारिकानाथ। चार झन रथ म बइइे हे भगवान रथ ल चलावथे। जगह के तलाश म घुमत हे। चलते चलते भयानक बड़ भरर्री म पहुंचत हे रागी भाई। किसान के खेत हे भयानक बड़े भरर्री।

रागी- हव।

 

(बलराम कहे केशव रस्‍ते में एक ब्राह्मण सोये थे मैने कंकड़ मार दिया पता नहीं लगा भी की नहीं वह मर गया। भगवान बोले तुम्‍हे ब्रम्‍ह हत्‍या लगा है, ब्राह्मण मारे हो। छलिया भगवान कहते है कल से ही ब्रम्‍ह हत्‍या काटने के लिये चले जाना। बलराम साठ हजार नरायणी सेना कौरव दल में भेज कर स्‍वयं ब्रम्‍ह हत्‍या काटने चले जाते है।

गाना- अरे कहां जाओगे मथुरा कांशी और कहां तीर्थ धाम।

घट घट में बिराजे है भैया सीताराम, घट घट में बिराजे है भैया सीताराम।।

बलदाऊ ब्राह्मण हत्‍या काटने चले जाते है, भगवान पांडव पक्ष में शामिल हो जाते है। कौरव दल में ग्‍यारह यक्षिणी सेना इकटठा हो गया है और पांडव दल में सात यक्षिणी सेना कुल मिला कर अट्ठारह यक्षिणी है।

रागी- अच्‍छा।

बोले इतनी सेना है लड़ाई के लिए जगह का चुनाव करना पड़ेगा, स्‍थान तलाश करो जहां महाभारत का युद्ध करेंगे।

रागी- जय हो।

जगह कौन तलाश करेंगे, तो पांच व्‍यक्ति का चुनाव होता है। पांडव के पक्ष से दो और कौरव के पक्ष से तीन। भीष्‍म, द्रोणाचार्य, राजा दुर्योधन। पांडव के पक्ष से राजा युधिष्ठिर और भगवान द्वारिकानाथ। चारों रथ में बठे है और भगवान रथ चला रहे है। जगह की तलाश में घुम रहे है। चलते-चलते बहुत ही बड़े एक पथरीली मैदान में पहुंचते है किसान हल चला रहा है।

रागी- हव।)

 

 

वो भरर्री म दू झन किसान हल चलावथे। नांगर जोतत हे, आगू आगू बाप के नांगर चलत हे पाछू म बेटा के नांगर चलत हे। विधि के विधान ए रागी भइया। उही मरे एक ठन भिभोंरा म ज‍हरिला सांप राहय। सांप ह निकल के आथे अउ डोकरा के बेटा ल कांट देथे।

रागी- अच्‍छा।

लइका के मौत हो जथे रागी भाई। सांप चाब दिस लड़का मरगे, नांगर जोजत जोजत किसान लहुट के देखत कहे मोर बेटा मर गे। किसान मन म विचार करे ये मोर बुड़ापा के सहारा रिहिसे। आज सब दिन बर ये मोला छोड़ के चल दिस रागी भइया। ये चल दिस बेटा के दुख म ये भरर्री ल छोड़के येकर क्रिया करम करे बर जाहू, येकर क्रिया करम करत से भरर्री के ओल भगा जही, न जाने ये कब से ओल ह मिलही या नइ मिलय।

रागी- नइ मिलही।

 

( उस पथरीली मैदान पर दो किसान हल चला रहे थे। आगे में बाप का और पीछे में बेटे का हल। वही पर एक जहरीले सर्प का एक बिल था जहां से सर्प आकर किसान के बेटे को डस लेता है।

रागी- अच्‍छा।

लड़के की मौत हो जाती है। सर्प काटने से लड़का मर गया है, हल चलाता हुआ किसान पलट कर देखता है कि बेटा मर गया है। किसान सोचता है कि मेरे बुढ़ापे का सहारा छिन गया। किसान विचार करता है कि मेरा बेटा तो मर ही गया है शोक में डूब कर यदि मैं इसका क्रियाकर्म करता हूं तो खेत का समय निकल जायेगा। आज जो खेत में नमी है वो पता नहीं और आगे मिलेगा या नहीं।

रागी- नहीं मिलेगा।)

 

 

ये तो मोला छोड़ के चल दिस वापिस नइ आवे। डोकरा सोचथे ये भरर्री ल जोत लेहू तभे मै येकर क्रिया करम करहूं। नंगर ल डिल दिस बइला ल खेद दिस बेटा ल परिया तिर दिस। अउ अपन एके झन नांगर जोतत हे। पहुंचते है भगवान वहां पे। रथ ल खड़ा करके रथ से उतर करके किसान ल पुछत हे कस बबा काबर सुते हे येहा। भगवान प्रश्‍न करत हे काबर सुते हे, नागर ल काबर ढिल दे हस। किसान बतावत हे ये सूते नइये गा मर गेहे येहा। भगवान कहे क्रियाकर्म काबर नइ करत हस। सियान किसान काहत हे देख बाबू एके झन मोर बेटा ए बुड़ापा के सहारा ए। येहा मरगे येकर दुख ल धरके क्रियाकर्म करे ल जाहू त ये भरर्री के ओल ह भगा जही। भरर्री ल जोत लेहू तेकर पाछू येकर क्रिया करहू। भगवान हंस देते है कहे वाह, वाह रे बाप। भाई बताये प्राण पुत्र दोउ बड़े। प्राण से जादा प्‍यारे होते है अपने पुत्र। पर ये सियान ल देख ले बेटा मरे परे हे अउ येला दुख नइये।

रागी- नइये।

हमर महाभारत में तो बाप के आगे बेटा मरही, बेटा के आगे बाप मरही सकल सहादर एक दूसर के आगे मर मिट जाही। युद्ध सही पे होगा। एक लकीर भगवान वही खिचथे। फिर आगे चलथे बोले लड़ाई के मैदान मे पानी के जरूरत परही। तो बोले आगे चलके देखते है क्‍या होता है। कुछ दूर चलते है भगवान। त उही डोकरा के बहु ह मुड़ म बासी बोह के।

भइया बासी बोह के पहुचाये बर जावय भाई

 

(यह अब तो बेटा वापस नहीं आयेगा। किसान सोचता है मैं इसका क्रियाकर्म खेत जोतने के बाद कर लूंगा। हल को निकाल कर बैलो को छोड़ देता है और बेटे का शव किनारे में रख कर अकेले ही अपने खेत में हल चलाने लगता है। भगवान वहां पहुंचते है और किसान से पुछते है ये यहां कैसे सोया है तो किसान बताता है कि मेरा बेटा है मरा पड़ा है। इस दुख में मैं क्रियाकर्म करने जाऊंगा तो खेत का समय चूक जायेगा इसलिए खेत जोतने के बाद बेटे का क्रियाकर्म करूंगा। भगवान देखकर कहते है वाह रे बाप। प्राणों से भी प्‍यारा होता है अपना पुत्र पर इस किसान को देखो बेटे की मौत का गम नहीं है।

रागी- दुख नहीं है।

हमारे महाभारत में भी बाप के आगे बेटा मरेगा, बेटा के आगे बाप मरेगा। सभी रिश्‍ते एक दूसरे के आगे मरेंगे। भगवान एक लकीर खींच कर कहते है युद्ध यही पर होगा। फिर आगे चलते है, बोले लड़ाई के मैदान में पानी की जरूरत पड़ेगी। आगे बड़ते है और कुछ दूर चलने के बाद उसी किसान की बहु सिर पर खाना लेकर आ रही है।)

 

 

मुड़ के उपर ल बोहे हे अपन पति देव के हिस्‍सा अउ ससुर बर बासी अमराये बर आत हे।

वोहा बासी पहुंचाये बर आवन लागे भाई, भगवान जो‍हार लागे गा भाई।

लड़की आवत हे, भगवान से भेट होथे तव लड़की पुछत हे भगवान ल कस बबा वो भरर्री म नांगर चलत हे तेन कते जगह हे। तब भगवान पुछत हे कन्‍या वो नांगर जोतत हे तेन मन तोर का का लागे। लड़की बतावत हे सियान असन हे तेन मोर ससुर ए अउ ओकर म अउ हे तेन मोर स्‍वामी ए। मोर पति ये। भगवान कथे कन्‍या तो पति ल सांप काट देहे। तोर पति के मृत्‍यु होगे हे। लड़की सुन के कथे सही कथस बबा। भगवान बोले हा बिलकुल सत्‍य कथवं। लड़की बोले दू झन के हिस्‍सा बासी लेगत हवं वो जगह मोर ससुर अपन बाटा के बासी ल खाही। पति के बाटा बांच जही कठियारा छुआ लग जही। लक्ष्‍मी ए काबर खइता होवय उतारिस सिर के बासी लड़की बइठिस पति के हिस्‍सा ल ढारिस अउ हस हस के भोजन करत हे। स्‍त्री के पुरूष मरगे रागी भइया। स्‍त्री ल जरा से भी दुख नइये। भगवान कहे वाह।

रागी- वाह भई वाह।

सारे क्षत्रिय मर जाही सारी क्षत्राणी विधवा हो जाही। बोले दुर्योधन युद्ध यही पे होगा। एक लकीर वही पे डालते है भगवान ले दुयोधन कथे अतका बड़ बड़ रूख राई हे तेला कइसे करबो। बोले सब ल साफ करना हे। जगह के चुनाव भी होगे रागी भाई सेना भी तइयार हे।

रागी- हव भई।

 

(सिर पर खाना रख कर अपने पति और ससुर के लिए लाती है। लड़की आ रही है रास्‍ते में भगवान से मुलाकात होती है लड़की पुछती है किसान जो हल चला है वे कहां पर है। तब भगवान कहते है वे तुम्‍हारे कौन है। लड़की बताती है कि वे मेरे ससुर और पति है। भगवान बताते है तुम्‍हारे पति को साप काट दिया है उनकी मृत्‍यु हो चुकी है। सुन कर लड़की कहती है सच में, तो भगवान कहते है सत्‍य है। लड़की बोली दो लोगो के लिए खाना लेकर जा रही हूं। ससुर अपने हिस्‍से का खायेंगे लेकिन पति के हिस्‍से का भोजन खराब होगा, मौत का छुआ लगेगा यह सोचकर लड़की वही बैठकर पति के हिस्‍से का खाना खाती है। स्‍त्री का पति मरा है जरा भी दुख नहीं है अन्‍न की चिंता है। भगवान कहे वाह।

रागी- वाह भई वाह।

सारे क्षत्रिय मर जायेंगे, सारी क्षत्राणि विधवा हो जायेगी। बोले दुर्योधन युद्ध यही पर होगा। एक लकीर वही पर डालते है भगवान दुर्योधन से कहते है इतना बड़ा-बड़ा पेड़ कौन काटेगा। भगवान कहते है सब साफ करना होगा। जगह का चुनाव भी हो गया सेना भी तैयार है।

रागी- हां भई।)

 

 

अब पांडव दल में पांडव भगवान ल पुछत हे। द्वारिकानाथ अब महाभरत तो होथे लेकिन तै एके ठन बात बातते कि ये लड़ाई म काकर विजय होही केशव। तब भगवान हास के काहय तहु मन बड़ वि‍चित्र पुछथव। जिसके भुजा मे सामर्थ होगे जो बलवाल होंगे वो महाभारत विजय पायेंगे। लेकिन भगवान मै तो नइ बताववं युधिष्ठिर फेर एक व्‍यक्ति हे जेकर माध्‍यम से तै तान डारबे से लड़ाई ल कोन ह हारही अउ कोन ह जीतही। कहे कोन, तो मेड़वा।

रागी- अच्‍छा हव भई।

मेड़वा लाने ल लागही। अब मेड़वा काला कथे नइ जाने गा, भीम भी नइ जाने फिर भी भीमसेन प्रतिज्ञा करत हे भइया अगर कही से भी खोज के मेड़वा आदमी लाके या बात के लगा न लाय तो मै भीम कहाना छोड़ दवं। भीम जेने गांव म जाये तेने गांव म पुछे तुहर गांव म मेड़वा मिलही रागी।

रागी- नइ मिलय भाई।

 

(अब पांडव भगवान द्वारिकानाथ से पुछते है महाभारत तो हो रहा है अब ये बताओं की इसमें जीत किसकी होगी और हारेगा कौन। तब भगवान हॅस कर कहते है बड़ा विचित्र प्रश्‍न है, जिसके भुजा में सामर्थ है जो बलवान है विजय उसी की होगी। मैं तो नहीं बताऊंगा युधिष्ठिर लेकिन एक व्‍यक्ति है जिसके माध्‍यम से तुम जान जाओगे कि लड़ाई में कौन हारेगा और कौन जीतेगा। कौन है वो, भगवान कहते है मेड़वा अर्थात पत्‍नी के आजू बाजू मंडराने वाला, जोरू का गुलाम।

रागी- अच्‍छा।

मेड़वा(पत्‍नी की गुलामी करने वाला पति) लाना पड़ेगा। अब मेड़वा किसे कहते है ये भी नहीं पता फिर भी भीमसेन प्रतिज्ञा करते है कि भैया अगर कहीं से भी मेड़वा लाकर या बात का पता लगाकर न आऊ तो मैं भीम कहलाना छोड़ दूंगा। भीम जहां जाते वहीं पुछते है यहां कोई मेड़वा है क्‍या। सबसे पुछते थे यहां मेड़वा मिलेगा क्‍या।

रागी- नहीं मिलेगा भाई।)

 

 

है ना। कोन अपन प्राण देबर ताही जी। हमर गावं नइ मिलय आगे देख। जेने गांव जाये तेने गांव म पुछय कोना नी बताये। एक ठन गाव गिस गिरे ल धर लिस पानी ओरवाती तिर म राहय चौरा अब चौरा म भीम ह बइठे हे। अउ विचार करत हे बड़ा बाय हे रागी।

रागी- हव भाई।

काला मेड़वा किथे नइ जानव अउ ये मेड़वा ल कहा खोजिहवं। चौरा म बइठे हे पानी गिरत हे जे घर के ओरवाती तिर म चौरा म बइठे राहय ओर घर म दू नेवार परया। पति अउ पत्‍नी। लड़का गे राहय गली कोति घुमे बर ओकर पत्‍नी राहय घर में पानी गिरत राहय। पानी गिर के छोड़ दीस। लड़का ह गली कोति ले घुम के घर आगे। घर आके देखिस होकर पत्‍नी आगी नइ जलाये। लड़का खिसियावथे अरे मै घुम के आगेवं तभी ले आगी बारे हस।

रागी- हव चुल्‍हा सुन्‍ना सुन्‍ना दिखत हे।

लड़की काहत हे का बताववं बबा पानी गिरगे हे। मै गोड़ में महुर लगा डरे हवं। छेना ल धरके परोसी घर आगी मांगे ल जाहू चिखला म रेंगहू त मोर गोड़ के महुर धोवा जही। महुर ह धोवा जही। तेकर सेती मै आगी नइ बारे अवं। त लड़का फेर किथे आगी ल मांग के लान लेते त महुर ल नइ लगाते। त लड़की कथे मे महुर ल रचाये हवं ततके बेर पानी नइ गिरत रिहिसे, महुर ल लगा डरेव तेकर पिछु पानी ह गिरिसे। त लड़का काहत हे त पानी गिरस त पानी के गलती ए गा, येकर गलती नोहय। अब बिचार करत हे लड़का ह के मै जिद करके भेजत हवं रागी भइया मोरे कमई के पइसा के महुर दू रूपिया के महुर धोवा जही। आगी बर नइ भेजत हवं रात भर हमन ल लांघन रेहे बर लागही। लड़का विचार करिस अउ कहे दे लान छेना ल मै जावत हवं आगी मांगे बर। लड़का आगी मांगे बर छेना ल धरके चलिस परोसी घर अउ आगी मांग बर चलथे त किथे तै छेना ल धरके मोर खांद उपर बइठ जा हम दूनो झन चलते है।

रागी- अच्‍छा।

 

( कौन अपना प्राण गवाने के लिए बतायेंगे। हमारे यहां नहीं है, हमारे यहां नहीं है। भीम  आगे चलते-चलते एक गांव में पहुंचता है पानी गिरना शुरू हो गया, बचने के लिए एक घर के बरामदे में खड़ा हो गया।

रागी- हां भाई।

भीम सोचता है किसे मेड़वा (पत्‍नी की गुलामी करने वाला पति) कहते है नहीं जानता हूं कहां तलाश करूंगा। जिस घर के बरामदे में भीम खड़ा है वहां दो ही लोग रहते है पति और पत्‍नी। पति घुमने गया है और पत्‍नी घर में है। पानी बंद होने बाद पति घर लौट कर देखता है कि पत्‍नी घर में चुल्‍हा नहीं जलाई है। पति गुस्‍सा हो जाता है।

रागी- हां चुल्‍हा सुनसान है।

लड़की कहती है पानी गिर रहा था और मैं पांव में माहुर (लाल रंग जिसे लड़कियां पांव में लगाती है) लगाई थी यदि छेना लेकर पड़ोसी के घर आग मांगने जाती तो मेरा माहुर न धुल जाता। लड़का कहता है आग लेकर आने के बाद माहुर लगाना था। लड़की फिर कहती है जब माहुर लगा रही तब पानी नहीं गिर रहा था। इस बात को सुन कर लड़का कहता है तुम्‍हारी कोई गलती नहीं है सब पानी के कारण हुआ, गलती पानी की है। अब लड़का विचार करता है कि यदि मैं जिद करके भेजता हूं तो मेरे ही पैसे का माहुर है जो पानी में धुन जायेगा। इससे अच्‍छा तो मै ही आग मांग कर ले आता हूं। फिर कहता है तुम छेना लेकर मेरे कंधे पर बैठ जाओ दोनो चलते है।

रागी- अच्‍छा।)

 

 

लड़की छेना ल धरत हे अउ धर के पति के खांद म बइठत हे। परोसी घर गिन जाके आगी मांगिन अउ आगी मांगिन ताहन लड़का फेर चिखला म रेंगत रेंगत आइस। ओ दूनो झन के गोठ ल भीम ह चौरा म बइठे बइठे सुनत हे। अचानक भीम के नजर परगे या।

ये तो मेड़वा सहिन लागत हाबे भाई, ये तो मेड़वा सहिन लागत हाबे भाई।

राहत तो देखन दे येहा मेड़वा सही मोला लागत हे भाई।

हा भीमे ह काहन लागे गा भाई ये तो मेड़वा सहिन लागम हाबे भाई।

दौड़ के गये भीमसेन लड़की खांद उपर बइठे अपन पति के तेन ल धरिस, चिखला म उतार दिस लड़का ल धरिस अउ चलिस।

रागी- अच्‍छा।

लड़ाई मैदान म अइस अउ मुड़ भर गडडा खोदिस अउ ओ लड़का ल गड़ा दिस। खड़ी गड़ईस ताकि मरय झन सब बदन ल मिटटी म ढांक दीस मुड़ भर बाहिर हे। अपन एक ठन पेड़ म चड़गे रतिहा के बेरा ये ठीक बारा बजे रात कन अबड़ अकन कोलिहा आइस रागी।

रागी- हव भइ दल के दल।

 

(लड़की छेना लेकर पति के कंधे पर बैठ जाती है और पड़ोसी के घर से आग लेकर आ जाती है। इन दोनो की बाते भीम सुन रहा था। आचनक भीम को ध्‍यान आता है कि यही तो है मेड़वा। यही तो है पत्‍नी की गुलामी करने वाला पति, भीम दौड़कर जाता है और लड़के को पकड़ कर ले आता है।

रागी- अच्‍छा।

और लड़ाई मैदान में ओकर उसके सिर को छोड़कर बाकी शरीर गड्डे में दबा देता है। खड़ा गड़ा दिया ताकि मरे ना और भीम एक पेड़ पर चड़कर देखने लगा। ठीक बारह बजे सियारों का दल आता है।

रागी- हां भई झुंठ का झुंठ।

 

 

सब झन अगवा गे राहय। एक झन ह एकदम सियान हे एक झन ह एकदम लइका हे। ये दोनो पीछे-पीछे आवत हे। लइका भूख के मारे व्‍याकूल हे अचानक कोलिहा के नजर परगे। सियान कोलिहा ल काहत हे बबा मोला भूख लागत हे। मै येकर मुंह ल खा लवं का। सियान कोलिहा कथे येकर मुंह ह अशुभ हे येला मत खा। काबर, कहे ये अपन मुंह से कभी राम के नाम नइ लेहे। कहे कान ल खावं, तो बोले येकर कान भी अशुभ हे कभु येहा राम के नाम श्रवण नइ करे हे। आंखी ल खा लवं का बबा किथे ये कभु साधु संत के दर्शन नइ करे हे। आंख भी अशुभ हे।

रागी- हव तिरित धाम नइ करे हे।

काली होवत बिहनिया युद्ध के मैदान म इही जगा बड़े बड़े बीर मन मरही। काली आके हम इही जगा पेट भर भोजन करबो। बोले कल इहां बड़े बड़े बीर के मृत्‍यु होही अउ कल आके हम पेट भर इहा भोजन करबो। त लइका कोलिहा सियान ल पुछत हे त राह तो बबा लड़ाई तो होही फेर ये लड़ाई ल जीतही कोन अउ हारही कोन। सियान कोलिहा कहे ये लड़ाई ल कौरव जीतही अउ पांडव हारही। जब लड़े बर आही कौरव अउ पांडव तो कौरव पूर्व दिशा म खड़ा होही अउ पांडव पश्चिम दिशा म खड़ा होही। द्रोणाचार्य पूर्व दिशा म जीत के पताका बांधे हे अउ पांडव के तरफ हार के, बोलिये बृंदाबन बिहारी लाल की जय।

 

(एक बुजुर्ग सियार और एक बच्‍चा सियार को छोड़कर बाकी सब आगे चल रहे थे। ये दोनो पीछे-पीछे आ रहे है। बच्‍चा भूख से व्‍याकुल हो जाता है बोले बाबा मुझे भूख लगी है। सियार की नजर आचनक उस व्‍यक्ति पर पड़ा, कहने लगा बाबा मुझे भूख लगी है इसका मुं‍ह खा लूं। बुजुर्ग सियार कहते है नहीं इनका मुंह अशुभ है। इसने कभी राम का नाम नहीं लिया है। तो कहते है कान खा लू बोले नहीं इसने कभी राम का नाम नहीं सुना है। अब बोले आंख खा लूं तो कहते है नहीं इसने कभी साधू, संतों का दर्शन नहीं किया है।

रागी- हां जी तीर्थ नहीं किया है।

कल सुबह होते ही यहां महाभारत का युद्ध होने वाला है यहां कल बड़े-बड़े वीर मारे जायेंगे। हम आकर पेट भर भोजन करेंगे। तब सियार का बच्‍चा पुछता है कि लड़ाई में जीत किसकी होगी। सियार बताते है कल जब लड़ाई होगी तो कौरव की जीत होगी और पांडव हार जायेंगे। जब लड़ने आयेंगे दोनो दल तो कौरव पूर्व दिशा में खड़ा होगा और पांडव पश्विम दिशा में और गुरू द्रोणाचार्य पूर्व दिशा की और विजय पताका बांधे है और पांडव की तरफ हार का।

बोलिए वृंदावन बिहारी लाल की जय।)

 

--------------------------- ब्रेक --------------

 

गाना- बोलिये बृंदाबन बिहारी लाल की जय

सियाराम भजन गा ले मोर भइया, सियाराम भजन गा ले मोर भइया

सियाराम भजन गा ले मोर संगी, सियाराम भजन गा ले मोर भइया

कोनो नइये तोर संग म जवइया, कोनो नइये तोर संग म जवइया

सियाराम भजन गा ले मोर संगी, सियाराम भजन गा ले मोर भइया

दोनो सियार आपस म चर्चा करत हे। लइका कोनिहा पुछत हे बबा पताका बदल दिही तब। सियान कोलिका काहत हे बेटा अगर पताका कही बदल दिही तो पांडव के विजय हो जाही।

रागी- अच्‍छा।

अउ कौरव के हार हो जाही। दूनो झन गोठिवाथे ओला भीमसेन पेड़ के उपर म चड़े चड़े सुनत हे।

रागी- हव।

कोलिहा मन चल दिन। भीम पेड़ ले उतरगे, रागी भइया अउ वो लड़का ल फिर लकर धकर निकालथे। और निकाल के कथे अरे आज ले अब तै अपन स्‍त्री के बात ल झन मानबे। अरे माने के लइक बात होही मानबे, अउ सबो बात ल थोरे मानबे।

रागी- नी मानबे।

भीमसेन लइका ल वापिस भेज देथे। अपन ह फिर विराट नगर आथे। अउ विराट नगर म आके भगवान के चरन म गिर जथे अउ बोले द्वारिकानाथ मै जान गया हू कि युद्ध में हमारा ही विजय होगा। दोनो हांथ जोड़ करके फिर पांडव कहते है।

 

(गाना- बोलिये वृंदावन बिहारी लाल की जय।

सीताराम का भजन कर लो मेरे भाई, सीताराम का भजन कर ला मेरे भाई

नहीं कोई तुम्‍हारे साथ जाने वाला, नहीं है कोई तुम्‍हारे साथ जाने वाला।

सीताराम का भजन कर मेरे भाई।

दोनो सियार आपस में चर्चा करते है बच्‍चा सियार बुजुर्ग से पुछता है दादा पताका बदल दिया जायेगा तो क्‍या होगा। तब सियार कहते है बेटा पताका कहीं बदल गया तो पांडव जीत जायेंगे।

रागी- अच्‍छा।

और कौरव हार जायेंगे। दोनो सियार की बात भीम पेड़ से सुन रहा है।

रागी- हां जी।

सियार चले गये तब भीम नीचे उतरते है और जल्‍दी से उस आदमी को बाहर निकालकर कहते है आज के बाद अपनी स्‍त्री की हर बात मत मानना। जो मानने लायक होगा केवल उसे ही मानना।

रागी- मत मानना।

भीमसेन लड़के को वापस भेजकर विराट नगर आ जाता है और भगवान के चरण में गिर कर कहता है द्वारिकानाथ मैं जान गया हूं युद्ध में हमारा ही विजय होगा। पांडव हाथ जोड़कर कहते है।)

 

 

गाना- कइसे मुधबन म बांजे बंशी धुन, कइसे मुधबन म बांजे बंशी धुन।

ये रानी राधा नाचे झुम-झुम, ये रानी राधा नाचे झुम-झुम।

कइसे मुधबन म बांजे बंशी धुन, कइसे मुधबनम  बांजे बंशी धुन।

ये रानी राधा नाचे झुम-झुम, ये रानी राधा नाचे झुम-झुम।

होली के बहाना लेके खेले नंदलाल, खेले नंदलाल।

होली के बहाना लेके खेले नंदलाल, खेले नंदलाल।

रंग बिरंगी गोप गुवालिन राधा होगे लाल, राधा होगे लाल।

रंग बिरंगी गोप गुवालिन राधा होगे लाल, राधा होगे लाल।

ये मोर कान्‍हा ये मोर कन्‍हैया

कइसे मुधबन म बांजे बंशी धुन, कइसे मुधबन म बांजे बंशी धुन,

कइसे मुधबन म बांजे बंशी धुन, कइसे मुधबन म बांजे बंशी धुन,

ये रानी राधा नाचे झुम-झुम, ये रानी राधा नाचे झुम-झुम,

विराट नगर में पांडव विश्राम करते है। हस्तिना नगर मे कौरव के दल विश्राम करत हे।

रागी-हव।

रागी भइया यही जगह से उद्योग पर्व के जो प्रसंग हे उद्योग पर्व के कथा समाप्‍त हो जाथे। महामुनी वैसमपान जी कहत हे जनमेजय यही से उद्योग पर्व के प्रसंग संपन्‍न हो जाथे अब मै आप ल भीष्‍म पर्व के प्रसंग बातथवं।

बोलिये वृदाबन बिहारी लाल की जय।

 

(गाना- कैसे मधुबन में बज रहा है बंशी की धुन

और राधा रानी नाच रही है झुम-झुम

होली का बहाना लेकर खेले नंदलाल, खेले नंदलाल

रंग बिरंगी गोप ग्‍वालिन राधा हो गई लाल, राधा हो गई लाल।

ये मेरे कान्‍हा ये मेरे कन्‍हैया

कैसे मधुबन में बज रहा है बंशी की धुन

और राधा रानी नाच रही है झुम-झुम

विराट नगर में पांडव विश्राम करते है। हस्तिना नगर में कौरव का दल विश्राम करते है।

रागी-हां जी।

रागी भैया यहां से उद्योग पर्व का जो प्रसंग है वह कथा समाप्‍त होता है। महामुनि वैश्‍मपायन जी महाराज भीष्‍म पर्व की कथा बताते है।

बोलिये वृदाबन बिहारी लाल की जय।)

 

 

लिप्‍यंतरण- जयंत साहू

 

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and archaeology, Government of Chhattisgarh to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.

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