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लोकगाथा राजा सलहेस

चित्र: राजा सलहेस की टेराकोटा मूर्तियां, रमा पंडित, दरभंगा, 2017 । फोटोग्राफर - सुनील कुमार 

 

नेपाल की तरार्इ में स्थित महिसौथा गांव में दुसाध जाति के एक महात्मा थे। उनका नाम था वाक मुनि। वे 12 वर्ष की कठोर तपस्या में लीन थे। इसी दौरान इन्द्रलोक से मायावती नाम की एक अप्सरा फूल लोढ़ने के लिए महिसौथा आयी। फूल लोढ़ने के क्रम में उनकी नजर साधना में लीन वाक मुनि पर पड़ी और उनके सुंदर रूप को देखकर मोहित हो गयी। मायावती ने अपनी सुंदरता और कामरत हाव-भाव से वाक मुनि की तपस्या भंग कर दी। तपस्या भंग होने से क्रोधित वाकमुनि ने मायावती को श्राप दिया कि जिस प्रकार उसने उनकी तपस्या भंग की है, उसी तरह अब उसे इन्द्रपुरी में स्थान नहीं मिलेगा और उसे मृत्युलोक में भटकना पड़ेगा।

 

 

मुनि के श्राप को सुनकर मायावती विलाप करते हुए उनसे क्षमा याचना करने लगती है। मायावती की क्षमा याचना से द्रवित होकर वाक मुनि कहते हैं कि उनका शाप वापस तो नहीं हो सकता, लेकिन मृत्यु लोक में वह दिव्य शक्ति संपन्न तीन पुत्रों और एक पुत्री की माता बनेगी और गौरव प्राप्त करेगी। मुनि कहते हैं कि मृत्युलोक में वह मंदोदरी के नाम से जानी जाएगी। वह यह भी बताते हैं कि मंदोदरी को पहला महिसौथा के कमलदल तालाब में पुरर्इन के पत्ते पर मिलेगा और वह उसका नाम सलहेस रखे। बड़ा होकर वह दैवी शक्ति से संपन्न राजा बनेगा। उसका बड़ा नाम होगा। कलियुग में भी लोग उसकी पूजा करेंगे। इसके बाद दो पुत्रा और एक पुत्री पैदा होगी। मझले का नाम मोती राम और छोटे पुत्र का नाम बुधेसर रखेगी। उसकी बेटी बनसप्ती के नाम से जानी जाएगी। इतना कह कर मुनि अन्तघ्र्यान हो गये।

 

 

तत्पश्चात, इंद्रलोक की अप्सरा मायावती मृत्युलोक में मंदोदरी बनी। मंदोदरी को महिसौथा के कमलदल तालाब में पुरर्इन के पत्ते पर एक बच्चा मिला। यही बच्चा सलहेस हुए। कालक्रम में मंदोदरी ने दो लड़के और एक लड़की को जन्म दिया। मुनि के कथनानुसार मंझले का नाम मोती राम, छोटे का बुधेसर और लड़की का नाम बनसप्ती हुआ। तीनों भाई बाद में बड़े योद्धा हुए। बनसप्ती तंत्रविद्या में पारंगत होकर जादूगरनी बन गयी। कहा जाता है कि वह छह मास आगे-पीछे सबकुछ जानती थी। बनसप्ती का प्रेम विवाह सतखोलिया के राजा शैनी से हुआ। इससे उसे एक पुत्रा पैदा हुआ जिसका नाम करिकन्हा रखा गया। वह स्वभाव से बड़ा ही उदंड था।

 

 

सलहेस जब 12 वर्ष के हुए तब मंदोदरी को उनके विवाह की चिंता होने लगी। तब तक सलहेस ने महिसौथा में अपना विशाल राज्य स्थापित कर लिया। चौदह कोस में उसके राज्य का विस्तार हो गया। सलहेस के विवाह के लिए योग्य लड़की की तलाश होने लगी। पंडित और नार्इ अनेक राज्यों में घूम-घूम कर योग्य कन्या की तलाश करने लगे, लेकिन सलहेस के योग्य कोर्इ लड़की नहीं मिली। आखिर में मंदोदरी ने पंडित और नार्इ को बुला कर कहा कि बराटपुर के राजा बराट की एक पुत्री है। बड़ी ही सुशील और संस्कारवाली। उसका नाम है सामरवती। जन्म लेते ही उसने प्रतिज्ञा कर रखी है कि वह यदि विवाह करेगी तो महिसौथा गढ़ के राजा सलहेस से, नहीं तो आजन्म कुंवारी ही रहेगी। इसलिए राजा बराट को सलहेस और सामरमती के विवाह हेतु संदेश दीजिए। इस प्रयोजन हेतु मंदोदरी का पत्र लेकर चन्देसर नार्इ महिसौथा से बराटपुर प्रस्थान करता है।

 

 

राजा बराट जाति से क्षत्रिय थे और स्वभाव से अत्यंत कठोर। नार्इ से विवाह संबंधी प्रस्ताव का पत्र पढ़ते ही वह आग-बबूला हो गये और चन्देसर नाई को जेल में डलवा दिया। इधर महिसौथा राज में चन्देसर नाई के वापस नहीं आने से लोगों की चिंता बढ़ गयी। मोतीराम ने माता दुर्गा को स्मरण किया। दुर्गा ने तुरंत प्रकट होकर मोती राम को यह ज्ञात कराया कि राजा बराट ने चन्देसर नाई को कैद कर लिया है। दुर्गा यह भी कहती हैं कि सलहेस का विवाह राजा सामरवती से ही लिखा है। चन्देसर जेल में है यह सुनकर मोतीराम का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। चन्देसर नाई को छुड़ाने और बराटराज की पुत्रि से सलहेस के विवाह हेतु मोतीराम अपने भांजे करिकन्हा के साथ बराटपुर प्रस्थान करते हैं। रास्ते में मोतीराम को एक साथ सात सौ घसवाहिनियां मिलीं। ये सब जादूगरनियां थी। ये मोतीराम का काफी परेशान करती हैं, हांलाकि मोतीराम अंतत: सबको अपने वश में कर लेता है। मोतीराम और करिकन्हा की शक्ति के आगे खुद को निर्बल पाकर राजा बराट आत्मसमर्पण कर देता है और सलहेस और सामरवती के विवाह का प्रस्ताव स्वीकार कर लेता है। इसके पश्चात् विवाह बारात के साथ बराटनगर आने के लिए मोतीराम करिनन्हा और चन्देसर नाई महिसौथा लौटते हैं।

 

 

बीच का एक और घटनाक्रम इस लोकगाथा को विस्तार देता है। मोरंगराज के राजा थे हिमपति। उनकी पत्नी दुखी मालिन की कोख से पांच कन्याओं- रेशमा, कुसुमा, दौना, तरगेना और फूलवंती का जन्म होता है। लोकगाथा में कहीं-कहीं सात बेटियों की चर्चा मिलती है जिसमें हिरिया, जिरिया, रेशमा, कुसमा, दौना, तरेगना और फूलवंती। इनमें सबसे बड़ी फूलवंती थी। ये सभी सलहेस की उम्र के समान ही थी। फूलवंती ने सलहेस से विवाह करने का संकल्प लिया हुआ था, लेकिन उसने कभी सलहेस को देखा नहीं था। ये बहनें दुर्गा की अनन्य भक्त थीं। एक दिन दुर्गा का ध्यान कर वो सलहेस से मिलने की आस लिये घर से निकल जाती हैं। मालिन बहने जादू में पारंगत थीं। अपने जादू की मदद से सलहेस की तलाश करते हुए वे सभी उसी महुरावन में आ गयी, जहां सलहेस अपने भाई मोतीराम और संबंधियों के साथ बाराज सजाकर सामरवती से विवाह हेतु बराटपुर प्रस्थान करने वाले थे। मोतीराम को इसका भान था कि मालिन बहने सलहेस को चाहती हैं और उनकी शादी में विघ्न डाल सकती हैं। इसलिए उन्होंने भौरानंद हाथी पर सलहेस को सवार कर बारातियों को इस बात की चेतावनी दी कि सभी सावधान रहें क्योंकि मोरंग की पांचों बहन मलिनियां भर्इया पर आंख लगाये हुए है। दिन रहते बारात बराटपुर पहुंच गर्इ और दरवाजा लगाने के लिए उचित समय आने के इंतजार में सभी बाराती आराम करने लगे।

 

 

दूसरी तरफ महुरावन में सलहेस को तलाश रही पांचों मलिनियां थककर सो जाती हैं। दुर्गा उनके स्वप्न में आकर उन्हें बताती हैं कि जिस सलहेस से वो विवाह के निमित्त प्रतिज्ञा की है, वह बराटपुर के राजा की पुत्री सती सामरवती से विवाह करने जा रहा है। अगर सामरवती से सलहेस का विवाह हुआ, तो तुम्हारी मनोकामना पूर्ण नहीं होगी। यह सुनते ही पांचों बहन बराटपुर पहुंचती है जहां सलहेस, मोतीराम, करिकन्हा समेत सभी बाराती नींद में बेसुध थे। तब अपने जादू के बल पर मलिनियां सलहेस को सुग्गा बनाकर पिंजड़े में कैद कर लेती है और वहां से भाग जाती हैं।

 

 

जब बारातियों की नींद खुलती है तब सलहेस को भौरानंद हाथी पर न पाकर तरह-तरह की चर्चा होने लगी। मोतीराम तब दुर्गा का स्मरण करते हैं। दुर्गा उन्हें बताती हैं कि पांचों मलिनिया सलहेस को लेकर ठेंगटी गांव पहुंच गयी है। मलिनियां सलहेस को खीर बनाकर बरगद के घोंघड़ में रखे हुई है और स्वयं नटिन के वेश में बैठी हुई है। मोतीराम मलिनियां के पास पहुंच जाते हैं और उनसे सलहेस के बारे में पूछते हैं। मलिनियां सलहेस को लेकर अनभिज्ञता जाहिर करती है, लेकिन मोतीराम का उग्र रूप देखकर मार-पीट के डर से सलहेस को उसके असली रूप में लाकर उसके हवाले कर देती हैं। इसके बाद मोतीराम सलहेस के साथ बराटपुर आते हैं और राजा बराट की पुत्री सामरवती से उनका विवाह होता है।

 

 

मालिनिया जादू के बल पर एक बार फिर सलहेस को चुरा लेती हैं जब विवाह की रात वो अपने कोहबर घर में जाते हैं। लेकिन, सामरवती उन्हें यह विश्वास दिलाती है कि सलहेस जैसे उनके पति हैं वैसे ही मालिनों के भी पति हैं। सामरवती कहती है कि मायके से अपने ससुराल महिसौथा जाने के तुरंत बाद वो सलहेस को उनके पास मोरंग भेज देगी। सामरवती के ऐसा विश्वास दिलाने के बाद पांचों बहनों ने सलहेस को असली रूप में लाकर उन्हें सामरवती को सौंप देती है। सलहेस को जब यह पता चलता है कि सामरवती ने मालिनयां को क्या वचन दिया है तब वह उत्तराखंड राज के राजा भीम सेन के यहां नौकरी करने चले जाते हैं।

 

 

सलहेस के महिसौथा गढ़ से जाने से वहां उदासी छा जाती है। एक दिन राजा भीम सेन के राज में नौकरी करते हुए फुर्सत के समय में सलहेस कदम्ब गाछ के नीचे बांसुरी बजा रहे थे कि पेड़ पर बैठा एक सुग्गा सीता-राम-सीता-राम करने लगा। वे उस सुग्गे को पहचान जाते हैं। वह महिसौथा का उनका प्यारा सुग्गा हिरामन था। हिरामन उड़कर सलहेस के पास पहुंचता है और वह महिसौथा गढ़ का सारा हाल सुनाता है। हिरामन कहता है कि उनके वियोग में मां, भार्इ, सामरवती और महिसौथा का बुरा हाल है। इतना सुनकर सलहेस वापस महिसौथा आ जाते हैं। इसके बाद बंगाल के तीसीपुर के क्षत्रिय राजा की बेटी कुसुमावती से मोतीराम और श्यामल गढ़ के राजा श्याम सिंह की पुत्री श्यामलवती से बुधेसर का विवाह होता है।

 

 

इस अन्तर्जातीय विवाह में संघर्ष, जादू-टोना और दाव-पेंच सलहेस लोक गाथा या नाच को रोमांचित भी करता है और उसे लोकप्रियता भी प्रदान करता है। सामंती समाज व्यवस्था में जातिगत आधार पर जो द्वन्द्व था वह इस लोक गाथा में स्पष्ट दृषिटगोचर होता है। यह लोक गाथा उस समय मोड़ लेती है जब सलहेस की पत्नी सामरवती पांचों बहन मलिनियां को दिये अपने वचन की याद दिलाते हुए अपने स्वामी सलहेस से कहती है कि उन्हें उनके वचन का मान रखने के लिए मोरंग जाकर उनसे मिलना चाहिए। वह कहती है कि जिस रात मेरे कोहबर से आप को चुरा लिया गया था उस दिन इसी शर्त पर मालिन से मैं आपको मांग लायी थी कि गौना के बाद मैं आपको उन्हें सौंप दूंगी। मैं वचन हार चुकी हूं। इसलिए आप वह वचन पूरा कीजिए। इसी बात पर सलहेस मोरंग के लिए प्रस्थान करते हैं। सलहस के साथ उनका प्यारा हिरामन सुग्गा भी मोरंग जाता है जो भूत-भविष्य सब जानता है। मोरंग पहुंच कर वो परबा पोखर पर वे ठहर जाते हैं।

 

 

यहां देवी दुर्गा फिर एक बार करिश्मा करती है। एक पहर रात रहते दुर्गा भोर होने का आभास कराकर फूलवंती को पोखर में स्नान कराने के लिए भेज देती है। दुर्गा के प्रभाव से ही इधर हिरामन की सलाह पर सलहेस पोखर में भरपूर मात्रा में सिंदूर डाल कर एक किनारे बैठ जाते हैं। ज्योंही फूलवंती पोखर में प्रवेश कर पानी छींटा मुंह पर देती है कि संपूर्ण माथा सिंदूर के रंग से लाल हो जाता है। इसके बाद हंगामा मच जाता है कि किसी ने छल से फूलवंती की मांग में सिंदूर डाल दिया है। यह बात फूलवंती के पिता राजा हिमपति तक पहुंचती है। फूलवंती पंडित की वेशभूषा में बैठे सलहेस को नहीं पहचान पाती है और राजा के सिपाही सलहेस को गिरफ्तार कर जेल में डाल देते हैं।

 

 

देवी दुर्गा के प्रभाव से हिरामन महिसौथा लौट आता है और सबको यह सूचना देता है कि मोरंगराज हिमपति ने सलहेस को कैद कर लिया है। तब मोतीराम अपने भांजे करिकन्हा के साथ मोरंग पहुंचते हैं। वहां मोतीराम और हिमपति के पुत्र करण सिंह के बीच घोर युद्ध होता है जिसमें करण सिंह मारा जाता है। उसके बाद हिमपति स्वयं युद्ध के लिए आता है लेकिन वह पराजित होता है। इससे पहले कि मोतीराम के हाथों हिमपति अपनी जान जाती, फूलवंती वहां पहुंच जाती है और मोतीराम से कहती है कि वह उसका देवर है। मोतीराम तब हिमपति को जीवित छोड़ देते हैं और हिमपति सलहेस को कैद से मुक्त कर देता है। सलहेस वापस महिसौथा लौट आते हैं।

 

 

मोरंगराज से सलहेस के चले जाने के बाद विरह में तड़पती मालिन बहनें भी बाद में महिसौथा चली आती हैं। वहां वह दुर्गा का ध्यान करती हैं और उनसे कहती है कि वो किसी तरह से सलहेस का दर्शन करवा दे। मालिन बहने रेशमा, कुसमा, दौना, तरेगना और फूलवंती दुर्गा के समक्ष यह संकल्प लेती हैं कि अगर उन्हें सलहेस को दर्शन नहीं हुए तो वे एक साथ विष खाकर जान दे देंगी। इस पर दुर्गा उन्हें मानिकदह पोखर पर जाकर इंतजार करने के लिए कहती हैं और फिर सलहेस को भी उस पोखर पर आने के लिए प्रेरित करती है। यह बारे में सुग्गा हिरामन को सबकुछ पता था इसलिए वह सलहेस को एक बार फिर सचेत करता है कि अगर वो मानिकदह पोखर जाएंगे तो जादूगरनी मालिनें उनको सुग्गा बनाकर पिंजड़ा में कैद कर लेंगी।

 

 

राजा सलहेस दुर्गा के अनन्य भक्त थे और वो प्रतिदिन मानिकदह में स्नान कर वहां से फूल लोढ़कर दुर्गा को समर्पित करते थे। इसमें वह किसी तरह का व्यतिक्रम करना नहीं चाहते थे। इसलिए हिरामन की सलाह पर वे पंडित का वेश धारण कर मानिकदह स्नान के लिए पहुंचते हैं। सलहेस देखते हैं कि स्नान करने वाले सभी पांचों धरों को पहले से मालिन युवतियां छेके हुई हैं। वे उनसे एक धर खाली कर देने का अनुरोध करते हैं। इस पर पंडित वेशधारी सलहेस से वे कहती हैं कि वो सलहेस से मिलने की प्रतीक्षा में बैठी हैं। तब सलहेस कहते हैं कि वो तो ब्राह्राण हैं और उन्हें स्नान करके पूजा करने जाना है। इसलिए वो एक धर छोड़ दें। उनका सलहेस तो महिसौथा में बैठा हुआ है। यह सुनकर मालिन बहने वहां से चली जाती हैं और सलहेस स्नान कर अपनी पूजा संपन्न करते हैं।

 

 

पांचों बहनों को लगता है कि दुर्गा ने उन्हें ठगा है, इसलिए वो उन्हें बुरा भला कहती हैं। तब दुर्गा सलहेस का भेद खोल देती हैं और कहती हैं जिस पंडित के लिए उन्होंने मानिकदह का धर छोड़ा था, दरअसल वो सलहेस ही थे। दुर्गा मालिनों को यह भी बताती हैं कि सलहेस इसके बाद चन्द्रग्रहण के अवसर पर मानिकदह में स्नान के लिए आएंगे तब वह उनसे मिल सकती है। चंद्रग्रहण के दिन पांचों मालिन बहन मानिकदह के पास समय से काफी पूर्व पहुंचकर सो जाती हैं। जब सलहेस वहां स्नान के लिए आती हैं तब दुर्गा के प्रभाव से मालिन बहनों की नींद टूट जाती है और उन्हें सलहेस के दर्शन होते हैं। इन पांच बहनों का सलहेस से चिर प्रतिक्षित मिलन इस लोक गाथा का सर्वाधिक कारूणिक पक्ष माना जाता है।

 

 

बहरहाल, सलहेस से मुकालात के दौरान जब पांचों बहनें यह कहती हैं कि आपसे विवाह की प्रतीक्षा में मैंने मां-बाप को छोड़ दिया, मोरंग में विवाह के लिए बने मंडप को ठुकराया, सखी-सहेलियों की बातें नहीं मानी और अपने पिता के घर को लात मार कर चली आयी। अब मेरा वयस भी बीत चुका है। बाल पक गये। दांत टूट चुके हैं। अब मेरी जिंदगी का क्या होगा? हमारा नाम कैसे चलेगा, अरे निर्मोही। मेरी आस तो पूरी कर दो। उनके इस कथन पर दिव्यशक्ति संपन्न सलहेस उनसे कहते हैं कि यह सतयुग है, इसके बाद कलियुग आयेगा और कलियुग में मेरे साथ तुम्हारी भी पूजा घर-घर में होगी। मेरे दाहिने भाग में भार्इ मोतीराम और साथ में बुधेसर रहेगा। तुम हमारे बायें भाग में रहोगी और इसी रूप में लोग हमारी पूजा करेंगे। गहवर में हाथी पर सवार राजा सलहेस की प्रतिमा के दोनों ओर फूलों से भरी डाली हाथ में लिए जो मालिन खड़ी दिखार्इ देती हैं, वह वही मालिन है। महिसौथा गढ़ से 6-7 मील दूर आज भी राजा सलहेस की फुलवाड़ी के अवशेष कायम हैं जहां जूड़-शीतल के मौके पर विशाल मेला लगता है।

 

 

संकलन: सुनील कुमार