Raipur, Chhattisgarh, 2018

 

Pandvani is one of the most celebrated performative genres  from Chhattisgarh. Known mostly as a  regional/ folk version of the Mahabharata, its terms of  relationship  with the Sanskrit epic are little known.This series of modules presents the recitation of the Pandavani by Prabha Yadav, The recitation presents all the eighteen parv of the epic  based on the version compiled  by Sabal Singh Chauhan, an author whose text was in circulation in this region.  Prabha Yadav is a noted performer of the Pandavani, and represents what has come to be seen as Jhaduram Devangan’s style of rendition.

 

The parvs presented in this video are the Karan and Gada. The prasangs contained in these parvs are Ghatotkach Vadh and Karan Vadh.

 

Transcript

Chhattisgarhi: बोलिये बृंदाबन बिहारी लाल की जय!

अजी व्यास देव जी के पद कमल, अरे बारहिं बार मनाव

अजी गुन गावहुं भगवान के श्री हनुमत होहि सहाय।

ये हनुमत होहू सहाये मोरे रामा, हनुमत होहु सहाय

ये हनुमत होहू सहाये मोरे रामा, हनुमत होहु सहाय

या चलिन झुंड के झुंड सकल बृज नारी

कुंदन बिच करत है रास, रास बिहारी

या चलिन झुंड के झुंड सकल बृज नारी

कुंदन बिच करत है रास, रास बिहारी

कुंदन बिच होइहैं है रास, रास बिहारी

 

Hindi: बोलिये वृंदाबन बिहारी लाल की जय!

व्यास देव जी के पद कमल को बार-बार मना रही हूं, भगवान का गुणगान कर रही हूं, श्री हनुमान मेरी सहाता करें। झुंड के झुंड समस्‍त बृज की नारियां जा रही हैं (क्‍योंकि) कुंज वन के बीच में रास बिहारी रास कर रहे हैं। आज कुंज वन के बीच में रास होगा।

 

 

अरे भइया राजा जनमें जय के प्रति मुनि वैसम पायन कहते है जी रागी। द्रोणाचार्य कुरूक्षेत्र के मैदान म जुझ गए। राजा दुर्योधन मन म विचार करत हे

अगा पंद्रा दिन लड़ाई होगे हावय रागी,  राजा पूछते है बीरों

भइया मन मन राजा ह सोचन लागे भाई

है बड़ संग तुंहर हावय गा मोर भाई 

राजा दुर्योधन बड़े बड़े बीर ल पूछत हे भइया, कौरव के दल म जतका झन बीर हव सब झन विचार करके बतावव। बोले सोच लव।

काको सिर अब सेनापति दीजे,   ये योद्धाओं।

अरे जाको बल भारत अस लीजे।

कौरव के दल म है कोई माई के लाल। बड़े बड़े बीर, बड़े बड़े रथी, बड़े बड़े महारथी कथे महराज। अभी कौरव के दल म सेना नायक के लायक अदि कोने है तो

अरे बीरे करन गा अजि दल मे हावय भाई

अरे बीरे करन गा अजि दल मे हावय भाई

कौरव नरेसे कहन लागे भाई, अय बीरों

कौरव नरेसे कहन लागे भाई

 

भैया राजा जन्‍मेजय के प्रति मुनि वैसमपायन कहते है जी रागी। द्रोणाचार्य कुरूक्षेत्र के मैदान में वीरगति को प्राप्‍त हुए। राजा दुर्योधन मन में विचार करते हैं, अजी पंद्रह दिन की लड़ाई हो चुकी है रागी,  राजा पूछते है वीरों, मन ही मन में राजा सोचने लगे भाई, आप लोगों का अच्‍छा साथ बना हुआ है मेरे भाईयों, राजा दुर्योधन बड़े बड़े वीर को पूछ रहे हैं भैया, कौरव के दल में जितने भी वीर हो सब विचार करके बताओ। बोले सोच लो।

किसके सिर में अब सेनापति का मुकुट पहनाया जाये, एै योद्धाओं। जिसके बल में महाभारत जीता जा सके।

कौरव के दल मे है कोई माई का लाल। बड़े-बड़े वीर, बड़े-बड़े रथी, बड़े-बड़े महारथी.. कहते हैं महराज। अभी कौरव के दल में सेना नायक के लायक यदि कोई है तो वह वीर कर्ण ही है भाई। कौरव नरेश सुनने लगे भाई, ऐ वीरों, कौरव नरेश चलने लगे भाई

 

 

राजा दुर्योधन रवि नंदन करन के शिविर म पहुंचथे। जाके करन ल कथे मितान ये महाभारत के लड़ाई तोरे बल म होवत हे। पंद्रा दिन के महाभारत लड़ाई संपन्‍न होगे रागी। दानवीर कर्ण भुजा उठा के कहते हैं, मित्र दुर्योधन पंद्रा दिवस महाभारत लड़ाई संपन्‍न होगे।

अरे सेनापति कुरू पति मोहि दीन्हा

करन कहते हैं, दुर्योधन अगर तै कहीं मोर सिर म सेनापति के मुकुट बांध देबे, अर्जुन समेत सारी सेना मार के हस्तिना के एक छत्र राज अगर तोला नइ देंव

करन कहना मै छोड़े देहूं भइया

करन कहना मै छोड़े देहूं भइया

 

राजा दुर्योधन रविनंदन कर्ण के शिविर में पहुंचते हैं। जाकर कर्ण को कहते हैं, मित्र यह महाभारत की लड़ाई तुम्‍हारे बल में हो रही है। पंद्रह दिन का महाभारत संपन्‍न हो गया है रागी। दानवीर कर्ण भुजा उठा कर कहते हैं, मित्र दुर्योधन पंद्रह दिवस महाभारत लड़ाई संपन्‍न हो गया।

यदि कुरूपति मुझे सेनापतित्‍व  देते हैं तो, कर्ण कहता है, दुर्योधन कहीं आप मुझे, यदि मेरे सिर में सेनापति का मुकुट बांध दोगे, तो अर्जुन सहित समस्‍त सेना मार कर हस्तिनापुर का एक छत्र राज्‍य यदि आपको नहीं दिया तो अपने आपको कर्ण कहना मै छोड़ दूंगा भइया। कर्ण कहना छोड़ दूंगा।

 

 

दुर्योधन। निकालते हैं राजा दुर्योधन । सेनापति के मकुट निकाल कर के करन के सिर म बांध देथे। कौरव दल म दो दिन के सेनानायक कर्णवीर बन जथे। महाबीर कर्ण अर्जुन ल मारे के प्रतिज्ञा करत हे रागी। कौरव दल के सेनानायक जब करन ह बनथे, भगवान बांके बिहारी ल चिंता हो जथे। भगवान ल दुख होगे, पंद्रा दिन महाभारत के लड़ाई मे मैं अर्जुन के रक्छा कर चुकेंव। काली के लड़ाई म मोर पास वो सामर्थ नइ ये रागी। भगवान विचार करत हे, कल मोर पास वो शक्ति नइ ये। मै रवि नंदन करन के हाथ ले अर्जुन ल नइ बंचा सकंव। कल अर्जुन मर जाही, ये बात ल सोचिस त भगवान के आंख म आंसू आ गीस। रो पडि़स भगवान। अचानक राजा युधिष्ठिर के नजर पर गे, राजा धरमराज देखे कहे अरे

अरे यहा का भइया केसव रोवत हावय भाई

रागी काबर भाई मोर रोवत हावय भाई

राजा धरमी कहन लागय गा मोर भाई

राजा धरमी कहन लागय गा मोर भाई

 

राजा दुर्योधन सेनापति का मकुट निकाल कर कर्ण के सिर में बांध देते हैं। कर्णवीर कौरव दल के दो दिन के सेनानायक बन जाते हैं। महावीर कर्ण अर्नुन को मारने की प्रतिज्ञा कर रहे हैं रागी। कौरव दल के सेनानायक जब कर्ण बनते हैं, भगवान बांके बिहारी को चिंता हो जाती है। भगवान को दुख होती है, पंद्रह दिन महाभारत की लड़ाई मे मै अर्जुन की रक्षा कर चुका हूँ। कल की लड़ाई मे मेरे पास वह सामर्थ नहीं है रागी। भगवान विचार करते हैं, कल मेरे पास वह शक्ति नइ है। मै रवि नंदन कर्ण के हाथ से अर्जुन को बचा नहीं सकूंगा। कल अर्जुन मर जायेगा, इस बात को जब भगवान सोंचते हैं तो उनके आंखों मे आंसू आ जाता है। वे रो पड़ते हैं। अचानक राजा युधिष्ठिर की नजर (उन पर) पड़ती है, राजा धर्मराज देखते हैं और कहते हैं अरे !

अरे ! यह क्‍या भैया केसव ? रो रहे हो भाई ? रागी मेरा भाई क्‍यों रो रहा है भाई। राजा युधिष्ठिर कहने लगे मेरे भाई।

 

 

राजा युधिष्ठिर जाके भगवान ल कहत हे, प्रभु काबर रोवत हस? पंद्रा दिवस भइगे, सारथी बनके अर्जुन के रथ ल चलाथस, बड़े बड़े बान आके तोर छाती म लगथे द्वारिका नाथ। बोले हृदय दर्द करत हे? भगवान कहे नहीं भइया। पंद्रा दिन मैं अर्जुन ल बचाएवं फेर कल मैं अर्जुन ल नी बचा पांव। राजा पूछे कइसे? तो बोले कल कौरव दल के सेनानायक करन बने हे। अउ करन अर्जुन ल मारे के प्रतिज्ञा करे हे। अउ मोर पास वो शक्ति नइये काली मै अर्जुन ल नइ बंचावन सकहूं। राजा युधिष्ठिर हाथ जोड़ के बोले  प्रभो । मै काली के लड़ाई मे मै मोर भाई ल, अर्जुन ल सौपत हंव, तै अर्जुन ल बचा ले। भगवान कहे एक शर्त म बांच सकथे। बोल का ? दिदी कुंती ल बुला के ला भगवान बांके बिहारी कुंती ल बला के कहात हे दिदी। भगवान कहात हे दिदी। कल मै करन के हाथ ले अर्जुन ल नइ बचा सकंव। कुंती कथे द्वारिका नाथ, मै अर्जुन ल तोला संउपत हंव काली तोला अर्जुन ल बंचाए ल लगही। भगवान बोले एक शर्त म बंच सकथे। कहे का ? तै करन के सिबिर म जा अउ करन ल कइबे के चल मै तोला लेगे ल आए हंव। तै मोर जेठ बेटा अस, बड़े बेटा अस। पर याद रखबे दिदी करन कौरव दल ल छोड़ के नइ आय। करन नइ आंव कहिन तै कबे करन तोला अड़बड़ दानी हे सुने हंव, हव गा, तोला तो अड़बड़ दानी कथै करन, करन कहि दाई दानीच का सुने हस मांग ले। हां भई । अगर मंग ले कहिही त तै सुरता करके पंचमुखी बान ल मांग लेबे, पांच बान जो भगवान परसुराम दिये है, करन रोज के पूजा करथे अउ अर्जुन ल मारे बर रखे हे ओला। रतिहा के बेरा ये रागी, दाई कुंती करन के सिबिर म पहुंच गे।

 

राजा युधिष्ठिर पास जा कर भगवान को कहते हैं, प्रभु क्‍यों रो रहे हैं? पंद्रह दिन हो गया है, सारथी बन कर अर्जुन के रथ को आप चला रहे हैं, बड़े-बड़े बाण आकर आपके छाती मे लग रहे हैं द्वारिका नाथ। पूछते हैं क्‍या हृदय दर्द हो रहा है? भगवान कहते हैं नहीं भैया। पंद्रह दिन मैं अर्जुन को बचाया हूं किन्‍तु कल मैं अर्जुन को बचा नहीं पाउंगा। राजा पूछते हैं कैसे? तो बोलते हैं कल कौरव दल के सेनानायक कर्ण बने हैं। और कर्ण अर्जुन को मारने की प्रतिज्ञा किया है। मेरे पास वह शक्ति नहीं है, कल मै अर्जुन को बचा नहीं सकूंगा। राजा युधिष्ठिर हाथ जोड़ कर बोलते हैं प्रभो। मै कल की लड़ाई मे मेरे भाई को, अर्जुन को सौप रहा हूँ, तुम अर्जुन को बचा लेना। भगवान कहते हैं एक शर्त मे बच सकते हैं। बोलते हैं क्‍या? बहन कुंती को बुला कर लाओ, भगवान बांके बिहारी कुंती को बुला कर कहते हैं दीदी। भगवान कहते हैं दीदी। कल मै कर्ण के हाथ से अर्जुन को बचा नहीं सकता। कुंती कहती है द्वारिका नाथ, मै अर्जुन को आपको सौंप रही हू कल आपको अर्जुन को बचाना होगा। भगवान बोले एक शर्त मे बच सकता है। कहती हैं क्‍या? तुम कर्ण के शिविर मे जाओ और कर्ण को कहना कि चलो मै तुम्‍हें ले जाने के लिए आई हूँ। तुम मेरे बड़े बेटे हो, जेष्‍ठ बेटे हो। किन्‍तु याद रखना बहन, कर्ण कौरव दल को छोड़ कर नहीं आयेगा। कर्ण नहीं आउंगा कहे ना तो कहना, कर्ण तुम्‍हें बहुत बड़ा दानी है ऐसा सुनी हूं, तुम्‍हें तो बहुत बड़ा दानी कहते हैं कर्ण, कर्ण कहेगा माता दानी भर सुनी हो ना, मांग लो। हां भाई। कहीं माग लो बोला तो तुम याद करके पंचमुखी बाण को मांग लेना, पांच बाण जो भगवान परसुराम दिये हैं, कर्ण रोज उसकी पूजा करता है और उसे अर्जुन को मारने के लिए रखा है। रात्रि का समय था रागी, माता कुंती कर्ण के शिविर में पहुंच गई।

 

 

लगे है समाज, उच्च आसन म बिराजमान है करन महाराज। द्वारपाल जाके करन ल बतावत हे महराज, पांडव के जननी आए हे। पांडव के महतारी कुंती आए हे।  करन सुनथे, कुंती आए हे? आज मै पहिली सेनापति बने हंव दाई के दरसन होवत हे। मोर से सौभागयसाली के द्वापर म कोई नइ हे। करन कहत हे ऐ बीरो।

आवन दे भइया वोला आवन देन गा

आवन दे भइया वोला आवन देन गा

अरे जाके चरन म गिरन लागे राजा

जा के चरन म वो गिरन लागे भइया

 

दरबार लगा है, उच्च आसन मे विराजमान हैं कर्ण महाराज। द्वारपाल जाकर कर्ण को बता रहा है महाराज, पांडवों की जननी आई हैं। पांडव की माता कुंती आई है।  कर्ण सुनते हैं, कुंती आई है? आज मै पहिली बार सेनापति बना हूँ और माता के दर्शन हो रहे हैं। मेरे से बड़ा सौभाग्‍यशाली इस द्वापर मे कोई नहीं होगा। कर्ण कहता है  एै वीरो !

आने दो भैया उन्‍हें आने दो जी, राजा कर्ण जाकर चरण मे गिरने लगते है।

 

 

मां कुंती के दण्डवत प्रणाम करथे करन। सिंहासन म बइठारत हे । दाई के गोड़ ल पानी लान के धोवत हे। हाथ जोड़ के करन कहत हे मां। का सेवा करंव ? कइसे आए हस?  महारानी कुंती कहात हे करन। तोला पांडव मन बलावत हे। तै पांचो भइया ले बड़े अस तै मोर जेष्ठ पुत्र अस । कौरव मन पाण्डव ल मारही तहां तोला हस्थिना के राजा बना दिही। मै तोला लेजे ल आए हंव बेटा।  कुंती के बात सुनके करन कहत हे मां। मै जब ले ये दुनिया म जनम लेंव, तब ले राजा दुर्योधन के नमक खाए हव मै। करन कथे दाई मै एक कुंवारी महतारी के गर्भ ले जन्म ले हंव। करन बीर कहते हैं कुंती मां, मैं कुवारी मां के गर्भ से जन्‍म ले हवं। वो दाई दुनिया के लोक अउ लाज के मारे मोला नदिया म बोहा दिस।

 

कर्ण, मां कुंती का दण्डवत प्रणाम करता है। सिंहासन मे बैठा रहा है। माता के पैरों को पानी ला कर धो रहा है। हाथ जोड़ कर कर्ण कहता है मां! क्‍या सेवा करूं? कैसे आई हो?  महारानी कुंती कहती है कर्ण ! तुम्‍हें पांडव लोग बुला रहे हैं। तुम पांचो भैया से बड़े हो, तुम मेरे जेष्ठ पुत्र हो। कौरव लोग पाण्डवों को मारेंगें फिर तुम्‍हें हस्थिनापुर के राजा बना देगें। मै तुम्‍हें ले जाने के लिए आई हूँ बेटा!  कुंती की बात सुनकर कर्ण कहता है मां ! मै जब से इस दुनिया मे जन्‍म लिया हूं, तब से राजा दुर्योधन का नमक खाया हूं। कर्ण कहता है मॉं मै एक क्‍वांरी माता के गर्भ से जन्म लिया हूँ। कर्ण वीर कहता है कुंती मॉं, मैं कुवारी मॉं के गर्भ से जन्‍म लिया हूँ। वह मॉं दुनिया के लोक और लाज के कारण मुझे नदी में बहा दी थी।

 

 

कहे मां आज तक मै नइ जानेव के महतारी के मया का होथे। दुनिया मोला राधे के नाम से जानथे, अधिरथ के धर्मपत्नी राधा ल मै मां के रूप म जानथव। राधा मोर मां ये अधिरथ मोर बाप ये, जो ये दुनिया म मोला पाल-पोस के बड़े करिस। कुंती बतावत हे नहीं करन, मै तोर मा अंव। मैं तोला जनम दे हव। बेटा ये दुनिया के लोक लाज के डर के मारे मै तोला संदूक म बंद करके नदिया म बोहवा देंव। करन, पर चल आज मै लेगे ल आए हंव। करन कहे दाई मैं कइसे पतिया लंव के तिहीच ह मोर जन्मदात्री मा अस? काबर के मै आज तक नइ जानेंव के ये दुनिया म कोन मोला जनम दे हे। मै तो राधा ल मां के रूप म जानथंव । सबल सिंह जी बताएं हे रागी भइया, एक समय के बात ये जब करन हा पांच-सात बरस के रहिसे, लइका मन संग खेलेल निकलय, काई भी चीज खेलय लइका मन ले जीत जाए। बाते बात म लइका मन कहे अरे

 

कर्ण कहता है मॉं आज तक मै नहीं जाना कि माता का प्‍यार क्‍या होता है। दुनिया मुझे राधे के नाम से जानती है, अधिरथ की धर्मपत्नी राधा को मै मॉं के रूप मे जानता हूँ। राधा मेरी मॉं है अधिरथ मेरे पिता हैं, जिन्‍होंनें इस दुनिया मे मुझे पाल कर बड़ा किया। कुंती बता रही है, नहीं कर्ण! मै तुम्‍हारी मॉं हूँ। मैने तुम्‍हें जन्‍म दिया है। बेटा इस दुनिया की लोक लाज के डर से मैनें तुम्‍हें संदूक मे बंद करके नदी मे बहा दिया था। कर्ण, किन्‍तु चलो आज मै ले जाने के लिए आई हूँ। कर्ण कहते हैं माता मै कैसे विश्‍वास कर लूं कि आप ही मेरी जन्मदात्री मॉं हँ? क्‍योंकि मै आज तक नहीं जानता कि इस दुनिया में किसने मुझे जन्‍म दिया है। मै तो राधा को मां के रूप मे जानता हूँ। सबल सिंह जी बताये हैं रागी भैया, एक समय की बात है जब कर्ण पांच-सात वर्ष का रहा होगा, बच्‍चों के साथ खेलने निकला, कोई भी खेल खेलता सभी बच्‍चों से जीत जाता। बात ही बात मे बच्‍चे लोग कहते थे, अरे

 

 

 

अरे मातु-पिता तुम जानत नाही

बाते बात म लइका मन कहें अरे

अरे मातु-पिता तुम जानत नाहीं

बालक खेल खेलावत नाही

लइका मन कहें अरे। न तो दाई ये न तो ददा ये। जेकर कोई पहचान नइये। पहचान नइ ये। पांच-सात बरस के करन कहे का दुनिया म मोर मां-बाप नइ ये। अगर दुनिया म मोर मां-बांप के पहचान नइ ये त रागी भाई गंगा म डूब के मैं अपन प्रान त्याग दूंहूं।

 

अरे, अपने माता-पिता के संबंध में तुम जानते नहीं हो, बात ही बात मे बच्‍चे लोग कहते हैं। और ऐसा कहकर बच्‍चे उसे अपने साथ खेलने नहीं देते।

बच्‍चे लोग कहते अरे, तुम्‍हारी न तो मॉं है ना तो पिता हैं। जिसकी कोई पहचान नहीं है। पहचान नहीं है। पांच-सात वर्ष का कर्ण कहता क्‍या दुनिया मे मेरे मां-बाप नहीं हैं। दुनिया मे मेरे मां-बांप की पहचान नहीं है रागी भाई तो मैं गंगा मे डूब कर अपन प्राण त्याग दूंगा।

 

 

करन जब गंगा म छलांग लगाए बर तइयार होथे तब साक्षात सूर्य नरायन प्रगट होके करन के हाथ ल धरथे। भगवान सूर्य कहय करन। तोर पिताजी मै अंव, जगत के स्वामी, भगवान सूर्य नरायेन। करन हाथे जोर के कथे मोर महतारी के नाव ल बता दे। बस ऐके ठन अउ कृपा कर मोर मां कोने। भगवान कथे तोर मां के नाव मैं नइ बता पांव करन। सिर म अगनी चीर के पगड़ी बांधे रहय भगवान सूर्य नरायण, निकाल के दीस। येला राख ले येला जेने ह पहिनही तेने ह तो महतारी ये। आज तक करन अगनी चीर ल राखे रहय। ओ दिन कुंती बार बार कहत हे, मै तोर मां अंव करन, मै तोर मां अंव, चल मै तोला लेजे ल आए हंव। करन उठके जाथे अउ अगनी चीर ल कुंती ल दे देथे। मां तै मोर महतारी अंव कहिथस चल तो येला पहिर के देखा। महारानी कुंती जब अगनी चीर के साडी ल पहिरथे रागी, कंचन के समान मां के काया हे चमकथे। कंचन जैसे चमकत हे। करन ल बिसवास होगे ये मोर मां ये। करन कहिस मां मै धन्य हो गेंव। आज युद्ध म जाए के पहिली मोला माता के दरसन होगे।

 

(बालक) कर्ण जब गंगा मे छलांग लगाने के लिए तैयार होता है तब साक्षात सूर्य नारायण प्रगट होकर कर्ण का हाथ को पकड़ लेते हैं। भगवान सूर्य कहते हैं कर्ण ! तुम्‍हारा पिता हूँ मैं, जगत का स्वामी, भगवान सूर्य नारायण। कर्ण हाथ जोड़ कर कहता है मेरी माता का नाम बता दो। बस, एक और कृपा करिए मेरी मॉं कौन है (बता दें)। भगवान कहते हैं तुम्‍हारी मॉं का नाम मै नहीं बता पाउंगा कर्ण। भगवान सूर्य नारायण सिर मे अग्नि चीर की पगड़ी बांधे रहते हैं, उसे निकाल के देते हैं। इसे रखो, इसे जो पहनेगी वही तुम्‍हारी माता होगी। कर्ण आज तक उस अग्नि चीर को रखा है। उस दिन कुंती बार बार कह रही है, मै तुम्‍हारी मॉं हूँ कर्ण, मै तुम्‍हारी मॉं हूँ, चलो मै तुम्‍हें लेने के लिए आई हूँ। कर्ण उठकर जाते हैं और अग्नि चीर को कुंती को देते हैं। मॉं आप मेरी माता हूँ कह रही हैं तो चलो इसे पहन कर दिखाओ। महारानी कुंती जब अग्नि चीर की साडी को पहनती हैं रागी, कंचन के समान मॉं की काया चमकती है। कंचन जैसे चमक रही हैं। कर्ण को विश्‍वास हो गया, यही मेरी मॉं है। कर्ण कहता है मॉं मै धन्य हो गया। आज युद्ध मे जाने के पहले मुझे माता के दर्शन हो गए।

 

 

काला मां किथे मै आज तक नइ जानेंव दाई। मां कुंती के स्तन से सात धार गोरस के बहत हे। करन के मुह म जब जाय त करन कहय मोर जीवन धन्य होगे, अरे मैं भी अपने मां का दुध पिया हूं। कुंती कहय अब तो बिसवास होगे। करन कहे हां हां, करन कहे हां  मां तंय मोर मां अस, कुंती कहय अब जाबें? करन बोले नइ। मां दुर्योधन मोर मित्र ये, मोर भरोसा म दुर्योधन युद्ध करत हे। अउ तै जानत हस करन अउ अर्जुन म बैर है। अगर मै करन मर जहूं तभो ले तोर पांच झन बेटा बांचही । मां तोर पांच बेटा के गिनती के कमी कभी होबेच नई करय । अगर मैं करन मर जहूं तो, तब भी तोर पांच बेटा बांचही, अगर अर्जुन मर जाही फिर भी पांच बेटा।

 

किसे मॉं कहते हैं मै आज तक जान नहीं पाया माता। मॉं कुंती के स्तन से सप्‍तधार दूध का बहने लगा। कर्ण के मुह मे जब दूध गया तब कर्ण नें कहा मेरा जीवन धन्य हो गया, अरे मैने भी अपनी मॉं का दूध पिया। कुंती कहती है अब तो विश्‍वास हो गया। कर्ण कहता है, हॉं हॉं, कर्ण कहता है हॉं  मॉं तुम मेरी मॉं हो, कुंती कहती है अब जाओगे? कर्ण बोलता है नहीं। मां, दुर्योधन मेरा मित्र है, मेरे भरोसे मे दुर्योधन युद्ध कर रहा है। और तुम जानती हो कर्ण और अर्जुन मे बैर है। कहीं मै कर्ण मर जाउंगा तो भी तुम्‍हारे पांच बेटे बचेंगें। मॉं तुम्‍हारे पांच बेटे की गिनती में कमी कभी नहीं होगी। कहीं मै कर्ण मर जाउंगा तो भी तुम्‍हारे पांच बेटे बचेंगें, कहीं अर्जुन मर जायेगा तो भी तुम्‍हारे पांच बेटे बचेंगें।

 

 

आखिर म कुंती कहिस करन। तोला तो दुनिया म बहुत दानी हे कथे बेटा। दानबीर। अंय, दानबीर  के नाम से जानथें तोला। करन कथे दाइ दानीच का सुने हस तहुं कुछु मांग ले। करन कहत हे मां, दानीच का सुने हस,  तहुं कुछू आस लगे होही मांग लें । आखिर में कुंती के आत्मा कलप जाथे। कुंती कहे देबे करन? करन कहे हां मां देहंव। कुंती बोले सोंच ले। हव ओ समे करन कहिस मै तोला का बतावंव मां। आज कही तै मोर प्रान के दान तको मागंबे न मैं तोला प्रान के दान तको दे दिंह दाई। बोले मांग। कुंती कथे, तोर गुरू परसराम जेन पंचमुखी बान देहे ओला मोला देदे। करन हांस के कथे मां। आज तै ह ओ पंचमुखी बान ल मांग के नी लेजत अस ..

 

अंत मे कुंती कहती है कर्ण, दुनिया मे तुम्‍हें तो बहुत दानी है कहते हैं बेटा। दानवीर ! दानवीर  के नाम से जानते हैं तुमको। कर्ण कहता है माता दानी ही क्‍या सुनी हो आप भी कुछ मांग लो। कर्ण कहता है मॉं, दानी ही क्‍या सुनी हो,  आप भी कुछ आस मन में लगा होगा तो मांग लो। अंत मे कुंती की आत्मा तड़फ जाती है। कुंती पूछती है, दोगे कर्ण? कर्ण कहता है हॉं मॉं दूंगा। कुंती बोलती है, सोंच लो। हॉं ! उस समय कर्ण कहता है मै तुम्‍हें क्‍या बताउं मॉं। आज कही तुम मेरे प्राण का दान भी मागोगी तो मैं तुम्‍हें प्राण का दान भी दे दूंगा माता। बोलता है, मांगो। कुंती कहती है, तुम्‍हारे गुरू परसुराम जिस पंचमुखी बाण को दिये हैं उसे मुझे दे दो। कर्ण हंस कर कहता है मॉं। आज तुम उस पंचमुखी बाण को मांग कर नहीं ले जा रही हो ..

 

 

प्राने के दाने मोर मांगे हावय ददा

प्राने के दाने वो मोर मांगे हावय

ले जान न दाई तैं लेई जा ना ओ, ले जा।

लेग जा बाने ल भइया देवय भाई

लेग जा । आज अर्जुन के हित के खातिर, अर्जुन के रक्छा करे के खातिर तै पांच ठन बान ल मांग के लेजत हस। व्याकुल मन से मां कुंती पांच ठन बान ल लाके भगवान ल दे देथे।

 

प्राणों का दान मांगा है तुमने, प्राण का दान। ले जावो माता, तुम ले जावो। बाण को दे रहे हैं भैया, ले जाओ। आज अर्जुन के हित के लिए, अर्जुन की रक्षा करने के लिए तुम पांच बाण को मांग कर ले जा रही हो। व्याकुल मन से मां कुंती पांच बाण को लाकर भगवान को दे देती है।

 

 

भगवान पांचो बान अर्जुन ल देके कथे अर्जुन सम्हाल के रखबे ये बान ल । पंचमुखी बान लेगे देवराज इंद्र जउन अर्जुन के पिताजी हैं। बोले कुंती तो पांच बान लेगे पर अभी तो करन के पास जनम के कवच अउ कुंडल हे रागी। जब तक हृदय म कवछ रहि कान म कुंडल रही त काल भी करन नई जीतय। नइ जीते। पुत्र के प्रेम म बिबस होके, सुर राज फिर पहुंचथे करन के सिबिर म। करन स्वागत सत्कार करथे। कइथे कइसे आए हव महाराज। देवराज कथे सुने हवं पहिली सेनापति बने हस। तोला अड़बड़ दानी हे कथे, करन कहे दानीच का सुने हस, तहुं काहीं मांग ले। रवि नंदन कहते है कान खोलकर तुम सुनलो, सुर राज, दान देने वाले के हांथ हमेसा उपर रहिथे, दान लेवइया के हाथ ह नीचे रथे। अउ देवइया के हाथ हर उपर रहिथे। मैं धन्य हंव जो देवताओं के राजा इन्द्र आज दान मांगे बर आए हे।

 

भगवान पांचो बाण अर्जुन को देकर कहते हैं अर्जुन इस बाण को सम्हाल कर रखना। अर्जुन पंचमुखी बाण ले लेता है। देवराज इंद्र, जो अर्जुन के पिताजी हैं। बोलते हैं कुंती तो पांच बाण ले गई पर अभी तो कर्ण के पास जन्‍म के समय से कवच और कुंडल है रागी। जब तक हृदय मे कवच रहेगा, कान मे कुंडल रहेगी तब तक काल भी कर्ण से जीत नहीं पायेगा, नहीं जीतेगा। पुत्र के प्रेम मे विवश होकर, सुरराज कर्ण के शिविर में पहुंचते हैं। कर्ण स्वागत सत्कार करता है। कहता हैं कैसे आये हैं महाराज। देवराज कहते हैं सुना हूँ पहिले सेनापति बने हो। तुम्‍हें बड़ा दानी है कहते हैं, कर्ण कहता है  दानी ही क्‍या सुने हो, आप भी कुछ मांग लो। रविनंदन कहता है कान खोलकर सुनलो, सुरराज, दान देने वाले का हाथ हमेशा उपर रहता है, दान लेने वाले का हाथ नीचे रहता है और देने वाले का हाथ उपर रहता है। मैं धन्य हूँ जो देवताओं के राजा इन्द्र आज दान मागने आया है।

 

 

इन्द्र कथे कवछ अउ कुंडल ल मोला दे दे। निकाल के करन कवछ कुंडल ल दे देथे। कवछ कुंडल ल लेके विमान म बइठके आथे इन्द्र ह। रागी भाई कुछ दूर म आथे तहां विमान ह बीच म अचल हो जथे। इन्द्र कथे मातुली ये विमान चलत काबर नइ हे। त सारथी कथे महाराज करन के कवछ कुंडल के भार ल ये विमान सहि नइ पात ये। दान तो ले हस येकर बल्दा करन ल कुछ दे नइ अस, जा करन ल कुछु दे के आ। देवराज इन्द्र विमान ले उतर कि फिर जाथे शिविर म । जाके करन ल कथे करन मै तोला कुछ देना चाहत हंव। मांग। करन सोंच के कहय देबे महराज। इन्द्र बोले हव। दोनो बचन हरा करके करन कहय, इन्द्र देना चाहत हस त तोर पास में जो बज्र शक्ति हे ओ बज्र ल मोला दे। देवराज इन्द्र निकाल के बज्र सक्ति ल दे दीस। पर इन्द्र बोले येला एक ही बार उपयोग कर सकबे। एके बार ऐला अपन काम म ला सकबे। ओकर बाद ये ह मोर जगा वापिस आ जही। बज्र सक्ति ल दे दीस। कवछ कुंडल धर के पांडव के सिबिर म आके, इन्द्र भगवान ल कहत हे द्वारिका नाथ।

 

इन्द्र कहता हैं कवच और कुंडल को मुझे दे दो। निकाल कर कर्ण कवच और कुंडल को दे देता है। इन्द्र कवच कुंडल को लेकर विमान मे बैठ कर आता हैं। रागी भाई कुछ दूर में आता है किन्‍तु विमान बीच मे अचल हो जाता है। इन्द्र कहता हैं, मातुली यह विमान चल क्‍यों नहीं रहा है। तो सारथी कहता है, महाराज कर्ण के कवच कुंडल के भार को यह विमान सहन नहीं कर पा रहा है। दान लिये हो तो इसके बदले में कर्ण को कुछ दिये नहीं हो, जाओ महाराज उन्‍हें कुछ दे कर आओ। देवराज इन्द्र विमान से उतर कर पुन: कर्ण के पास शिविर में जाता है। इन्‍द्र, कर्ण को कहता है, कर्ण मै तुम्‍हें कुछ देना चाहता हूँ, मांगो ! कर्ण सोंच कर कहता है दोगे महाराज ! इन्द्र बोलता है, हॉं। दोनो वचन हरा कर कर्ण कहता है, इन्द्र, देना चाहते हो तो तुम्‍हारे पास जो वज्र शक्ति है उस वज्र को मुझे दो। देवराज इन्द्र कर्ण को वज्र शक्ति को निकाल कर दे देता है। इन्द्र बोलता हैं किन्‍तु इसे एक ही बार उपयोग कर सकोगे। एक ही बार इसे अपने काम मे ला सकोगे। उसके बाद यह मेरे पास वापस आ जायेगा। वज्र शक्ति को दे दिये। कवच कुंडल पकड़ कर इन्द्र पाण्‍डव के शिविर मे आकर भगवान को कहता है द्वारिका नाथ..

 

 

अजी घनश्‍याम नाम गुन ल गाबो

प्रभु श्याम नाम गुन गाबो

भव सागर ले तर जाबों गा, बोल हरि ।

घनश्‍याम नाम गुन ल गाबो, प्रभु श्याम नाम गुन गा लव

भवसागर ले तर जाहू जी संगवारी

भवसागर ले तर जाबो जी संगवारी

धन धन कुती तोर भाग ल बेटा पाये भगवाने ल  

धन धन तोर भाग ल बेटा पाये भगवाने ल  

बेटा पाये पाये हस ग घनश्‍याम ल ग

घनश्‍याम नाम गुन ल गाबो, प्रभु श्याम नाम गुन गा लव

भव सागर ले तर जाबों गा, बोल हरि ।

 

रागी भइया देवराज इन्द्र बोलय द्वारिका नाथ, कवछ कुंडल के बदला वोला मैं बज्र शक्ति देके आवत हंव। जब तक करन के हाथ म बज्र सक्ति रहि तब तक तै अर्जुन ल करन के आघू मत लेजबे। देवराज इन्द्र अंतरध्यान होथे।

 

अजी घनश्‍याम नाम गुन को गायेंगे, प्रभु श्याम नाम गुन गायेंगे। भव सागर से तर जायेगें बोलो हरि। घनश्‍याम नाम गुन को गायेंगे, प्रभु श्याम नाम गुन को गा लो, भवसागर से तर जावोगे मित्र।

धन्‍य है कुंती तुम्‍हारे भाग्‍य को जो भगवान को बेटा पाये हो, घनश्‍याम नाम गुन को गायेंगे, प्रभु श्याम नाम गुन को गा लो, भवसागर से तर जावोगे मित्र।

 

रागी भैया देवराज इन्द्र बोलते हैं, द्वारिका नाथ ! कवच कुंडल के बदले में उसे मैं वज्र शक्ति देकर आ रहा हूँ। जब तक कर्ण के हाथ मे वज्र शक्ति रहेगी तब तक तुम अर्जुन को कर्ण के सामने मत ले जाना। देवराज इन्द्र अंतरध्यान हो जाते हैं।  

 

 

होत प्रातः काल सोलवां दिन के लड़ाई म दोनो दल तइयार होथे। कौरव के दल पाण्डव के दल, नंदीघोष रथ भगवान सजात हे। वो समय करन दुर्योधन ल कहत हे, दुर्योधन। अर्जुन के सारथी तो भगवान बांके बिहारी हे, अगर महू ल भगवान जइसे रथ चलइया मिल जतिस। करन कहते है। कृष्ण समान सारथी पांवव, कोटिन अर्जुन मार गिरावंव। काय, भगवान असन सारथी। त कौरव दल म भगवान जइसे रथ कोन चलाथे? त बोले, मामा शल्य हे। राजा शल्य महारानी माधरी के भाई ये रागी। अउ माधरी कोन ये, पांडव के माता ये। बोले, शल्य करा आथे, दुर्योधन कथे ममा। आज तै करन के सारथी बन जा। अउ सारथी बन के करन के रथ ल चला। राजा शल्य कथे देख दुर्योधन, मै सारथी तो बनिहूं, सारथी बन के केवल रथ ही चला सकथंव मैं। रथ भर खेदहूं। अगर दूसरा काम करे ल कइहू त दूसरा काम नइ करंव। राजा कथे काबर दूसर काम करबे जी। राजा शल्य ह करन के सारथी बनथे रागी। दोनो दल तइयार होके कुरूक्षेत्र के मैदान म पहुंचे हे। ओ दिन आदेस हे जब तक करन के हाथं म बज्र सक्ति हे करन के आगू अर्जुन ल नई जाना हे। लड़ाई के मैदान म नाना प्रकार के जुझाउ बाजा बाजत हे। अपन अपन योग्य, अपन अपन लायक, अपन अपन जहूंरिया देख के लड़ाइ करत हें। वो दिन दानबीर करन ह अर्जुन ल खोजत-खोजत

 

प्रातः काल होते ही, सोलहवें दिन की लड़ाई मे दोनो दल तैयार होते हैं। कौरव का दल, पाण्डव का दल, भगवान नंदीघोष रथ को सजाते हैं। उस समय कर्ण दुर्योधन को कहता है, दुर्योधन। अर्जुन का सारथी तो भगवान बांके बिहारी हैं, कहीं मुझे भी भगवान जैसा रथ चलाने वाला मिल जाता। कर्ण कहता है। कृष्ण समान सारथी पांवव, कोटिन अर्जुन मार गिरावंव। क्‍या, भगवान जैसा सारथी। तो कौरव दल मे भगवान जैसा रथ कौन चलाता है? तो बोले, मामा शल्य है। राजा शल्य महारानी मादरी का भाई हैं रागी। और माधरी कौन है, पाण्‍डव की माता है। शल्य के पास आकर दुर्योधन कहता है, मामा। आज तुम कर्ण के सारथी बन जाओ और सारथी बन कर कर्ण के रथ को चलाओ। राजा शल्य कहता है, देख दुर्योधन, मै सारथी तो बनूंगा, मैं सारथी बन कर सिर्फ रथ ही चला सकता हूं। रथ भर हांकूंगा। कहीं दूसरा काम करने को कहोगे तो दूसरा काम नहीं करूंगा। राजा (दुर्योधन) कहता है क्‍यों दूसरा काम करोगे जी। राजा शल्य कर्ण का सारथी बन जाते हैं रागी। दोनो दल तैयार होकर कुरूक्षेत्र के मैदान मे पहुंचते हैं। उस दिन (भगवान का) आदेश है कि, जब तक कर्ण के हाथ मे वज्र शक्ति है, कर्ण के सामने अर्जुन को नहीं जाना है। लड़ाई के मैदान मे नाना प्रकार का जुझाने वाले वाद्य बज रहे हैं। सब अपने-अपने योग्य, अपने-अपने लायक, अपने-अपने हमउम्र देख कर लड़ाइ कर रहे हैं। उस दिन दानवीर कर्ण अर्जुन को खोजते-खोजते

 

 

अरे, बीरे करन गा चलन लागे भईया,  

बीरे करन गा जावन लागे भइया

मन मे केसव ये कहन लागे भईया

मन मे केसव ये कहन लागे भईया

 

करन अर्जुन ल खोजथे पर भगवान करन के आगू अर्जुन ल नइ लेजत हे। जब करन बड़े बड़े सेना ल मारय रागी त करन ल रोके के खातिर

भीमे ह आवन लागय गा मोर भाई

भीमे ह आवन लागय गा मोर भाई

वोला बीरे करन ह मारन लागय भाई

भीमे ह भीड़न लागे गा मोर भाई

पवन नंदन भीम आगे आते हे, रागी करन महान धनुर्धर है और भीम, भीम गदा युद्ध म जादा प्रवीन है। करन बान मार देथे भीम बेहोस हो जथे। करन ल रोके के खातिर राजा युधिष्ठिर आगू आथे। रवि नंदन निकाल करके धरम राज के छाती म बान मार देथे । राजा धरम राज व्याकुल हो जथे रागी।

 

अरे, वीर कर्ण चलने लगता है भईया, वीर कर्ण जाने लगा भैया। मन मे केशव यह कहने लगे भईया, मन मे केशव यह कहने लगे।

कर्ण अर्जुन को खोजता है पर भगवान कर्ण के आगे अर्जुन को नहीं लाते। जब कर्ण बड़े-बड़े सेना को मारते हैं रागी, तो कर्ण को रोकने के लिये

भीम आने लगता है मेरे भाई, भीम आने लगता है मेरे भाई। उसे वीर कर्ण मारने लगते हैं भाई, भीम उससे भिड़ने लग जाते हैं मेरे भाई।

पवननंदन भीम आगे आता है, रागी कर्ण महान धनुर्धर हैं और भीम, भीम गदा युद्ध मे ज्‍यादा प्रवीण है। कर्ण बाण मार देता है, भीम बेहोश हो जाता है। कर्ण को रोकने के लिए राजा युधिष्ठिर आगे आते हैं। रविनंदन निकाल कर धर्मराज की छाती मे बाण मार देते हैं। राजा धर्म राज व्याकुल हो जाते हैं रागी।

 

 

राजा युधिष्ठिर वा समें चिल्ला के कहते है अर्जुन

अरे धृग अर्जुन, अरे धृग धनु सर तोरे

अए अर्जुन, अरे करन बान जरत तन मोरे।

राजा कहते हैं, धिक्‍कार है। रागी भाई राजा युधिष्ठिन ल मुर्छा करके करन आगे चलथे। ओ दिन भीमसेन के बेटा घटोत्कच आये हे लड़े ल, माया के द्वारा भयानक रूप बनाते हैं। अउ भयंकर रूप बनाके,

गगन पथ, अरे भाई गगन पंथ उड़ावन लागे

जाके सुरिये छिपावन लागे, जाके सुरिये छिपावन लागे

 

भीम के बेटा घटोत्कच अकास म जाके भगवान सूर्य नरायेन ल छिपा देहे हे। लड़ाई के मैदान अंधियार हो गेहे। अउ आकास से वो ह कौरव दल म

अरे बड़े बड़े पहाड़ के बरसा करन लागे भाई

वो ह बड़े बड़े पहाड़ के बरसा करन लागे गा मोर भाई

 

राजा युधिष्ठिर उस समय चिल्ला कर कहते हैं अर्जुन ! अरे लानत है अर्जुन, अरे लानत है तुम्‍हारे धनुष और बाण को। एै अर्जुन, अरे कर्ण के बाण से मेरा तन जल रहा है।

राजा कहते हैं, धिक्‍कार है। रागी भाई कर्ण, राजा युधिष्ठिर को मुर्छित करके आगे बढ़ता है। उस दिन भीमसेन का बेटा घटोत्कच लड़ाई की मैदान में लड़ने आया है, वह माया के द्वारा भयानक रूप बनाता है और भयंकर रूप बना कर गगन पंथ ! अरे भाई गगन पंथ में उड़ने लगा। जाकर सूर्य को छिपाने लगता है, जाकर सूर्य को छिपाने लगता है।

भीम का बेटा घटोत्कच आकाश मे जाकर भगवान सूर्य नारायण को छिपा दिया है। लड़ाई के मैदान में अंधेरा हो गया है और आकाश से वह कौरव दल मे, बड़े-बड़े पहाड़ की वर्षा करने लगा भाई। वह बड़े-बड़े पहाड़ों की वर्षा करने लगा मेरे भाई।

 

 

उपर ले पहाड़ के बरसा कर य तउन अलग ये, लड़ाई के मैदान अंधियार हे तउन उलग ये, अउ कौरव दल म भगवान ह अर्जुन ले जावय। जिहां जिहां अर्जुन के नजर ह जावय तिहां तिहां भगवान ह लेजय अउ अर्जुन छांट छांट के पहचान पहचान के कौरव दल के बड़े बड़े बीर ल मारय। आह! अर्जुन के बान जब दुर्योधन के छाती म लगय रागी, राजा व्याकुल हो जाए। बार-बार दुर्योधन चिल्लाय मित्र करन मारो। मित्र करन बचाओं। बचाओं। करन धनुष म बज्र सक्ति ल जोडे हे, अउ बोले मित्र दुर्योधन थोरिकन रूक जा, काबर कि मै अर्जुन के पता लगावत हंव। अर्जुन ल खोजत हंव।

 

उपर से पहाड़ की वर्षा कर रहा है वह अलग है, लड़ाई के मैदान में अंधकार है वह अलग, उसी समय में कौरव दल मे भगवान अर्जुन को ले जाते हैं। जहां जहां अर्जुन की नजर जाती वहां-वहां भगवान ले जाते और अर्जुन छांट-छांट कर, पहचान-पहचान कर कौरव दल के बड़े-बड़े वीर को मार रहे हैं। आह! अर्जुन के बाण जब जब दुर्योधन की छाती मे लगता रागी, राजा व्याकुल हो जाते। बार-बार दुर्योधन चिल्लाता, मित्र कर्ण मारो ! मित्र कर्ण बचाओ ! बचाओ ! कर्ण धनुष मे वज्र शक्ति को जोड़ता है और बोले मित्र दुर्योधन थोड़ा रूक जा, क्‍योंकि मै अर्जुन का पता लगा रहा हूँ। अर्जुन को खोज रहा हूँ।

 

 

दुर्योधन कहे मारो। आखिर म दुर्योधन ल कहे ल पर गे। बोले करन, आज तोर मन म का हे वोला मैं समझा गेंव। कहे तै मोर विजय नइ चाहत हस। तोर तन भले मोर पक्छ म हे तो मन पांडव पक्छ म हे। आज अइसे लगथे तै मोर विजय नइ चाहत हस। मै लड़ाइ म मर जाहूं, पाछू पांडव ल मार के का यस कमाबे? ये बात ल सुनिस त करन के तन मन म आगी लग गे। दुर्योधन कहय तै कपटी हस। तोर मन पांडव के ओर हे। ये बात सुनिस त करन निकालिस अउ निकाल के फेर बज्र शक्ति के, देवराज के बज्र शक्ति पृथ्वी म कोई ल नइ लागिस उड़ गए गगन पंथ की ओर अकास म, भीम के बेटा अकास म पहाड़ जइसे रूप लेके भगवान सूर्य ल छिपा दे हे हे। अकास म गीस जा के हिडंबनी के बेटा घटोत्कच ल लग गे। गर्जना कर के प्रान ल त्याग दे, पृथ्वी म गिर गे। प्राणांत हो जथे, घटोत्कच पृथ्वी म गिर जथे । हजारो लाखों बीर उही म दब के मर जथे।

 

(अर्जुन के बाण से व्‍याकुल है दुर्योधन) दुर्योधन कहता है मारो ! अंत मे दुर्योधन को कहना पड़ गया। बोले कर्ण, आज तुम्‍हारे मन मे क्‍या है, वह मैं समझ गया। कहता है, तुम मेरा विजय नहीं चाहते हो। तुम्‍हारा तन भले मेरे पक्ष मे है किन्‍तु मन पाण्‍डव के पक्ष मे है। आज ऐसा लग रहा है कि, तुम मेरा विजय नहीं चाहते हो। मै लड़ाइ मे मर जाउंगा, तब पाण्‍डव को मार के क्‍या यश कमाओगे? इस बात को कर्ण नें सुना तो उसके तन मन मे आग लग गई। दुर्योधन कह रहे हैं तुम कपटी हो। तुम्‍हारा मन पाण्‍डव की ओर है। इस बात को कर्ण सुनता है तो कर्ण निकालता है वज्र शक्ति! देवराज की वज्र शक्ति पृथ्वी मे किसी को नहीं लगता वह उड़ गया गगनपंथ की ओर, आकाश मे, भीम का बेटा आकाश मे पहाड़ जैसे रूप लेकर भगवान सूर्य को छिपा दिया है। आकाश मे गया और जा कर हिडंबा के बेटे घटोत्कच को लगा। (घटोत्‍कच) गर्जना कर के प्राण को त्याग दिया, पृथ्वी मे गिर गया, प्राणांत हो जाता है, घटोत्कच पृथ्वी मे गिर जाता है। हजारो लाखों वीर उसी मे दब के मर जाते हैं।

 

 

संझा के बेरा दिन भर लडि़न तहां ले लड़ाइ ल  बंद करके आपिस हो गीन। ओ दिन बताए हें कौरव के दल हांसत वापिस जात हे त पांडव के दल में भीमसेन रोवत आइस। भीम रोते हुए आते है भोजन करे बर गीस तब भीम भोजन नइ कर पावत हे। देवी द्रौपदी जब भोजन परोसत हे। चारो भाई अउ भगवान भोजन करत। भीम के सामने थारी माढ़े हे, सिर झुका के भीम बइठे हे, आंखी ले आंसू बोहावत हे। भगवान के नजर पर गे। भगवान देख के कहय भीम। तै भोजन काबर नइ करत अस? भीमसेन कहय द्वारिका नाथ। मै भोजन नइ करंव।

 

संध्‍या का समय हो गया, दिन भर लड़ाई किये फिर लड़ाइ बंद करके वापस हो गए। उस दिन बताया गया है,  कौरव का दल हंसते हुए वापस जा रहा है और पाण्‍डव के दल में भीमसेन रोते हुए आता है। भीम रोते हुए आता है, भोजन करने के लिये जाते है तब भीम भोजन नहीं कर पा रहा है। देवी द्रौपदी जब भोजन परोस रही हैं। चारो भाई और भगवान भोजन कर रहे हैं। भीम के सामने थाली रखी है, सिर झुका कर भीम बैठा है, आंख से आंसू बह रहा है। भगवान की नजर पड़ती है। भगवान देख कर कहते हैं भीम ! तुम भोजन क्‍यों नहीं कर रहे हो? भीमसेन कहता हैं द्वारिका नाथ ! मै भोजन नहीं करूंगा।

 

 

भीमसेन कहय केसव मै आज जेकर बर मै लड़त रहेंव वो लड़ाई के मैदान म मरे परे हे। आज मोर बेटा के सरीर ल चील गिद्ध नीछ नीछ के खावत हे। द्वारिका नाथ आज मोर बेटा युद्ध के मैदान म बीत गे। भगवान हंस दिए, भीम। इही छत्री के धरम ये? छत्री के धर्म तो वो हे भीम, युद्ध के मैदान म जाके विजय करना, विजय  प्राप्त करना, या वीरगति पाना। तोर बेटा तो वीरगति प्राप्त करिस अउ तै तो कायर समान रोवत हस। भोजन कर,  भीमसेन के समझ नई आते, मन नइ मानत ये, भीम के। आखिर म भगवन कहिस कस जी। जे दिन भरे समाज मे दुसासन द्रौपदी ल खींच के लेजिस, अउ देवी द्रौपदी के चीर खींचिस, भरे समाज म भुजा उठा के कहे, अरे दुसासन।

 

भीमसेन कहता है केसव ! मै आज जिसके लिये लड़ रहा था वह लड़ाई के मैदान मे मरा पड़ा है। आज मेरे बेटे के शरीर को चील-गिद्ध नोच-नोच कर खा रहे हैं। द्वारिकानाथ ! आज मेरे बेटे की युद्ध के मैदान मे मृत्‍यु हो गई। भगवान हंस दिए, भीम ! यही क्षत्रीय का धर्म है? क्षत्रीय का धर्म तो वह है भीम ! युद्ध के मैदान मे जाकर विजय प्राप्‍त करना, विजय  प्राप्त करना, या वीरगति पाना। तुम्‍हारा बेटा तो वीरगति को प्राप्त किया है और तुम तो कायर के समान रो रहे हो। भोजन करो, बात  भीमसेन की समझ में नहीं आ रही है।  भीम का मन नहीं मान रहा है। अंत मे भगवन कहते हैं, कैसे  जी। जिस दिन भरी सभा मे दुस्‍सासन द्रौपदी को खींच कर ले गया और देवी द्रौपदी की चीर खींचा, तब भरी सभा मे भुजा उठा कर (तुम) कहे थे, अरे दुसासन !

 

 

अरे जब तक रूधिर, अउ पियंउ नहीं तोरा, कहां गय तोर प्रतिज्ञा, भुजा उठा के कहे अरे दुसासन

जब तक रूधिर पियंउ नहीं तोरा, अरे तब तक शोक जाय नहीं मोरा।

छत्री कुल जनम तुम्ह लीन्हा, नारी एक नगन तुम कीन्हा।

उंच निवास नीच करतूती, देखि नि सकंय पराई विभूति।

कहां गय तोर प्रतिज्ञा? मार डरे दुसासन ल ? टोर डरे दुर्योधन के जंघा ल ? अह। दुसासन के नाम सुने त माने सोते हुए भीम जाग गए। वो दृष्य घूमे लागिस, भीम के आंखी म जे दिन द्रौपदी के चीर हरन होए रिसे। ये, जइसे भीम चिल्लाए द्वारिका धीश। भगवान कथे सपना वथस (हां भाई वइसने लागत हे) भीम कथे काली के लडई मे मै अदि दुसासन ल नइ मारंव। अउ प्रतिज्ञा करते है। कल के युद्ध में कहीं दुसासन को नही मारेंव, दोनों भुजा उखाड़ के कहूं रूधिर के आहार नई करहूं, खुन के आहार नई करहूं, मै भीम कहना छोड़ देहूं। बेटा के सुरता ल भुला गे अउ हंस हंस के भोजन करथे रागी।

 

अरे जब तक तुम्‍हारा रूधिर नहीं पीउंगा.. कहां गई तुम्‍हारी प्रतिज्ञा ? भुजा उठा कर कहे थे, अरे दुसासन ! जब तक तुम्‍हारा रूधिर नहीं पियंउ तब तक मेरा शोक जायेगा नहीं। क्षत्रीय कुल में तुमने जन्‍म लिया है और तुमने एक नारी को भरी सभा में नग्‍न किया है। उंच निवास और नीच करतूती है तुम्‍हारी, पराई विभूति को देख नहीं सकते हो।

कहां गई तुम्‍हारी प्रतिज्ञा? मार डाले दुसासन को? तोड़ डाले दुर्योधन की जंघा को? अहा ! दुसासन का नाम सुनते ही मानो सोते हुए भीम जाग गया। वह दृष्य घूमने लगा, भीम की आंखों मे जिस दिन द्रौपदी का चीर हरण हुआ था। भीम चिल्लाता है द्वारिकाधीश ! भगवान कहते हैं, सपना देख रहो क्‍या भीम ! (हां भाई वैसे ही लग रहा है)। भीम कहता है, कल की लड़ाई मे मै यदि दुसासन को नहीं मारूं.. और प्रतिज्ञा करता है। कल के युद्ध में कहीं दुसासन को नही मारूं, दोनों भुजा उखाड़ कर कहीं रूधिर का आहार नहीं करूं, खून का आहार नहीं करूं, मै भीम कहाना छोड़ दूंगा। पुत्र की याद को भूल गये और हंस-हंस कर भोजन करने लगे रागी।

 

 

रातभर विश्राम करथे, होत प्रातः काल दोनों दल तइयार हो जथे। अउ दोनों दल जब तइयार होवत हे भगवान मंद मंद मुस्कावत हे। भीमसेन कहत हे केसव।

मुरलिया के धुन धुन के गा

बंसरिया के धुन सुन के, सुनकर रहि नहीं जाय हो

बंसुरिया के धुन सुन के

गइया छोड़ दिए चारा चरण को गा

बछुरा छोड़े दूध धार वा बंसुरिया के धुन सुन के

सुनकर कर रहि नहीं जाय हो बंसुरिया के धुन सुन के

 

रातभर विश्राम करते हैं, प्रातः काल होते ही दोनों दल तैयार हो जाते हैं और दोनों दल जब तैयार हो रहे हैं भगवान मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। भीमसेन कहता है केसव..

मुरली की धुन सुन कर, बंशी की धुन सुन कर, सुनकर रहा नहीं जाये हो। बंशी की धुन सुन कर..

उस बंशी के धुन को सुन कर गाय चारा चरना छोड़ दिए हैं, बछड़ा दूध पीना छोड़ दिये हैं, सुनकर रहा नहीं जा रहा है बंशी की धुन को सुन कर।

 

 

कुरूक्षेत्र के मैदान में बड़े बड़े योद्धा,  हाथी वाले हाथी, घोड़ा वाले घोड़ा, पैदल वाल पैदल। सत्रवां दिन के युद्ध ये रागी भइया, दोनो दल कुरूक्षेत्र म पहुंचे हैं। अर्जुन अउ दानबीर करन, नकुल अउ कृत वर्मा, सहदेव और सकुनी, भीम और दुसासन, योग्य लायक रथी रथी से, महारथी महारथी से दोनो दल में घमासान युद्ध होते है। वो दिन बताएं हे, राजा शल्य ल रविनंदन करन बार-बार सचेत करत हें। लड़ते लड़ते करन शल्य ल कहत हे ममा, आज मोर रथ ल तै अइसें चलाबे कि मोर रथ के चाक पृथ्वी म झन परे पृथ्वी से अधर चले करन घेरी बेरी कहय ममा थोडिकन सचेत हो के चला। रागी भाई करन अउ अर्जुन दोनो घोर संग्राम करत हे। बड़े बड़े बान के बरसा होवत हे भइया, मांस माटी पहचान नाहीं। करन छांट छांट के बान मारत हे अउ महाबीर अर्जुन करन के हर बान ल काटत जात हे। आखिर म बताएं हे करन त्रुन से एक ठन बान ल छांटत रहय, का बान ल छोड़व, त करन के त्रुन म एक बान ह गोठियावत रहय। अवाज देथे, त्रुन से बान कहते हे। करन, एक बार मुझे छोड़ दीजे। मोला छोड़ दे करन। करन लहुट लहुट के देखिस ऐती-तेती, का गोठियाथे रागी। देख तो ? त पीछू म ओ त्रुन म समाए रहय तउन बान ह गोठियावत रहय। मोला छोड़ दे, आवाज ल सुनिस त ओ बान ल अइसे खींचिस, बान ल खींचिस त बताए हे, चुन चुनचुक नाम के बान ये।

 

कुरूक्षेत्र के मैदान में बड़े-बड़े योद्धा, हाथी वाले हाथी, घोड़ा वाले घोड़ा, पैदल वाला पैदल। सत्रवां दिन का युद्ध है रागी भैया, दोनो दल कुरूक्षेत्र मे पहुंच गए हैं। अर्जुन और दानवीर कर्ण, नकुल और कृत वर्मा, सहदेव और शकुनी, भीम और दुसासन, योग्य, लायक रथी-रथी से, महारथी-महारथी से दोनो दल में घमासान युद्ध हो रहा है। उस दिन बताया गया है, राजा शल्य को रविनंदन कर्ण बार-बार सचेत कर रहे हैं। लड़ते-लड़ते कर्ण शल्य को कहता हैं मामा, आज मेरे रथ को तुम ऐसे चलाना कि मेरे रथ के पहिये पृथ्वी मे न पड़े पृथ्वी से अधर चले, कर्ण बार-बार कहता है मामा, थोड़ा सचेत हो कर चलाओ। रागी भाई, कर्ण और अर्जुन दोनो घोर संग्राम कर रहे हैं। बड़े-बड़े बाणों की वर्षा हो रही है भैया, मांस और मिट्टी पहचान में नहीं आ रही है। कर्ण चुन-चुन कर बाण मार रहा है और महावीर अर्जुन कर्ण के हर बाण को काटते जा रहा  है। अंत मे बताया गया है, कर्ण तरकस से एक बाण को छांटते रहता है, कौन से बाण को छोड़ूं, तो कर्ण के तरकस मे से एक बाण बोलते रहता है। अवाज देता है, तरकस से बाण कहता है। कर्ण, एक बार मुझे छोड़ दीजिए। मुझे छोड़ दो कर्ण! कर्ण पीछे मुड़ कर देखता है, इधर-उधर, कौन बोल रहा है रागी। देखूं तो ? तो पीछे तरकस मे समाया बाण बोल रहा है। मुझे छोड़ दो! आवाज को सुनकर उस बाण को खींचते हैं, बाण को खींचे तो बताया गया हैं, उस बाण का चुनचुक नाम है।

 

वो बान कहत रहय, करन मोला छोड़ दे। हरि अर्जुन समेंत मै कहीं अपन उदर म समा के नई आहूं, नंदीघोष रथ, भगवान, अर्जुन। समेंत कही मैं ओला खा के नई आंव तो चुंचुक कहिना छोड़ दिहंव मैं ह। चुंचक बान म आगे मंत्र पढ़के करन छोड़ दिस। भयंकर बान। भयानक चुंचुक बान जब सर्प के रूप ले के दौड़ते है कुरूक्षेत्र में। एक फण पृथ्वी में रखे हुए है और एक फण आकास। अउ जब दउडिस, अर्जुन बड़े बड़े बान मारत हे पर वो बाण फन म लगत हे अउ वो बाण निष्फल हो जात हे। बान टुट के गिर जात हे, आखिर म अर्जुन ल पूछे ल परगे भगवान ल कहे-केसव ये आवत हे तउन ह का चीज ये ? अर्जुन पूछत हे प्रभु ये आवत हे तउन कोन ये ? भगवान हांस के कहय भुला गेस ? भगवान कहय अर्जुन तोर स्मरन सक्ति कमजोर हे, अतेक जल्दी भुला गेस । बने सुरता कर ले, आवत हे तउन कोन ये तेला नइ जानस ? त अर्जुन कथे, नई जानव। भगवान बोले अर्जुन ये आवत हे तउन तो धुमी नागिन के बेटा ये। सुरता हे, खांडव बन दहन करे, जंगल म आगी लागिस ओ जंगल म धूमी नाम के नांगिन ल तै मारे रहे। ओ समे धु्मी नागिन के छोटे से लड़का रहिस। जब वो लइका सुनिस के मोर मां मर गे, अर्जुन मार दिस। धु्मि नागिन जल के राख हो गे, तब वो लइका आइस अउ आकर के बोले अरे अर्जुन आज तै मोर मां ल मार देस अउ अतका बड़ दुनिया म तै मोला अनाथ कर देस। आज मै यतीम हो गेंव, अनाथ हो गेंव, याद कर अर्जुन आज मै जलते हुए मां धुमि के सौगंध खात हंव, मोर महतारी ल मारेस, येकर बदला एक दिन कहि मैं नइ लेहंव त मै धु्रमि के बेटा कहना छोड़ देहंव। मै नरकगामी होहूं वो लइका जानत रहिस करन अर्जुन में बैर हे, बान के रूप लेके जाने कतका दिन होगे रिहिसे करन के त्रुन म समाए समय के इंतजार करत रिहिसे। अउ आज अर्जुन ल खाए के खातिर मारे के खातिर दंउडत हे। अर्जुन पूछय अब का करना चइये केशव? अर्जुन कथे मोर बान ह बेकार हो जाथे असर नी करत हे। अब का करंव, तब भगवान कहय मोरो डिमाग काम नई करय। भगवान हांस के कहय महु ल समझ में नइ आए। उपर कोति ल देखय तो हनुमान जी बइठे हे, लाल रंग के पताका लगे हे भइया अउ लाल रंग के पताका म हनुमान जी बिराज मान हे। भगवान देखिस अउ हांस के कहय का बुता करत हस ? बइठे-बइठे ? भगवान कहते है क्या कर रहे हो हनुमान ? इसारा करिस तहां ले हनुमान अइसे उछल दिस। त रथ ह-

 

वह बाण कह  रहा है, कर्ण मुझे छोड़ दो। हरि-अर्जुन समेंत पांडव सेना को मै कहीं अपने उदर मे समा कर नई आया, नंदीघोष रथ, भगवान, अर्जुन समेंत कही मैं उन्‍हें खा कर नहीं आया तो मै चुंचुक कहाना छोड़ दूंगा। आगे चुंचक बाण को मंत्र पढ़के कर्ण छोड़ता है। भयंकर बाण ! भयानक चुंचुक बाण जब सर्प का रूप लेकर दौड़ता है, कुरूक्षेत्र में, एक फण पृथ्वी में रखा हुआ है और एक फण आकास में, और जब दौड़ा, अर्जुन बड़ा-बड़ा बाण मार रहा है किन्‍तु बाण फन मे लगता है और निष्फल हो जा रहा है। बाण टूट कर गिर जा रहा है, अंत मे अर्जुन को भगवान से पूछना पड़ गया, कहते हैं -केशव ये आ रहा है वह क्‍या चीज है? अर्जुन पूछ रहे हैं प्रभु ये आ रहा है वह कौन है? भगवान हंस कर कहते हैं, भूल गये ? भगवान कहते हैं अर्जुन तुम्‍हारी स्मरण शक्ति कमजोर है, इतनी जल्दी भूल गये। ठीक से याद करो, आ रहा है वह कौन है उसे नहीं जान रहे हो? तो अर्जुन कहता है, नहीं जानता हूं। भगवान बोलते हैं, अर्जुन यह जो आ रहा है वह तो धुमी नागिन का बेटा है। याद है, तुमने खांडव वन दहन किया था, जंगल मे आग लगी, उस जंगल मे धूमी नाम की नागिन को तुम मार दिये थे। उस समय धूमी नागिन का छोटा बच्‍चा था। जब वह बच्‍चा सुना कि मेरी मां मर गई, अर्जुन नें मार दिया। धूमि नागिन जल कर राख हो गई, तब वह बच्‍चा आया और आकर बोला था, अरे अर्जुन आज तुम मेरी मां को मार दिये और इतनी बड़ी दुनिया मे तुम मुझे अनाथ कर दिये। आज मै यतीम हो गया, अनाथ हो गया। याद रखो अर्जुन, आज मै जलते हुए मां धुमि की सौगंध खाता हूँ, मेरी माता को मारे हो, इसका बदला एक दिन कहीं मैं नहीं लूंगा तो मै धूमि का बेटा कहाना छोड़ दूंगा, मै नरकगामी होउंगा। वह बच्‍चा जानता था कर्ण और अर्जुन में बैर है, बाण का रूप लेकर जाने कितने दिन से कर्ण की तरकस मे समाए, समय का इंतजार करता रहा। आज अर्जुन को खाने के लिए, मारने के लिए दौड़ रहा है। अर्जुन पूछता है, अब क्‍या करना चाहिये केशव? अर्जुन कहता है मेरे बाण बेकार हो जा रहे हैं, असर नहीं  कर रहे हैं। अब क्‍या करूं, तब भगवान कहते हैं मेरा दिमाग भी काम नहीं कर रहा है। भगवान हंस कर कहते हैं मुझे भी समझ में नहीं आ रहा है। उपर तरफ देखते हैं, हनुमान जी बैठे हैं, लाल रंग का पताका लगा है और लाल रंग के पताका मे हनुमान जी विराजमान हैं। भगवान देखते हैं और हंस के कहते हैं, क्‍या काम कर रहे हो? बैठे-बैठे ? भगवान कहते हैं क्या कर रहे हो हनुमान?  इशारा करते हैं, वैसे ही हनुमान ऐसा उछलते हैं। तो रथ..

 

 

पाताल लोके बइठन लागे भइया

केसरी नंदन कूदन लागे भइया

बस एक घांव, सीधा पाताल लोक। चुंचुक बान लड़ई के मैदान ल खोज डरिस, हरि अर्जुन नइ मिलिस, वो समझिस हरि अर्जुन मोर पेट म समा गे, वापिस होगे। आके करन ल कहत हे महाराज, मै हरि अर्जुन ल खा के आ गेंव। करन बान ल धरिस वोतके बेर वो रथ ल चलावत हे ममा शल्य तेन कहात हे, करन कहां जमीन कहां आसमान, कहां ये नानचुक चुंचुक अउ कहां हरि अर्जुन। का ये हरि अर्जुन ल खा के आ सकथे करन? कहां कउंवा और कहां हंस, हंस और कउंवा एक हो सकथे ? नइ हो सकय? बता रागी-राजा शल्य कहत रहय एक ठन लीम के पेंड़ रहय रागी भइया लीम के पेंड म कउंवा मन बसेर करे रहंय।

 

(रथ से हनुमान के द्वारा पैर के दबाव देते हुए उछल जाने से) रथ पाताल लोक में जाने लगा भैया, केसरी नंदन कूदने लगा भैया।

बस एक बार में (रथ) सीधा पाताल लोक पहुंच गया। चुंचुक बाण संपूर्ण लड़ाई के मैदान को खोज डाला, हरि-अर्जुन नहीं मिले, वह समझा हरि-अर्जुन मेरे पेट मे समा गए, वापस हो गया। आकर कर्ण को कहता है महाराज, मै हरि अर्जुन को खा कर आ गया। कर्ण बाण को पकड़ता है उतने ही समय रथ को चलाने वाले सारथी मामा शल्य कहता है, कर्ण कहां जमीन कहां आसमान, कहां ये छोटा सा चुंचुक और कहां हरि अर्जुन। क्‍या यह हरि-अर्जुन को खा कर आ सकता है कर्ण? कहां कौवा और कहां हंस, हंस और कौवा एक हो सकते हैं ? नहीं हो सकते? बताओ रागी? राजा शल्य कहते हैं एक नीम का पेंड़ था रागी भैया नीम के पेंड मे बहुत सारे कौवों का बसेरा था।

 

एक दिन के बात ये एक ठन हंस उडियात उडि़यात अइस अउ लीम के डारा म बइठे हे। वोला कउंवा देख डरिस, ये का उज्जर उज्जर बइठे ह ग । हव भइ उपर म। त वो पूछथे भइया तें कोन अस ? कहां के रहवइया अस, अउ ये डेरा म काबर मोर घर म बइठे हस? हंस बतावत हे, महराज मै हंस हंव भाई। हंस अंव गा, हां भाई। कहां रिथस, त समुद्र के पार। का खाथस पीथस? हंस बताथे मै मूंगा मोती चरथंव भइया। मूंमा मोती के चरइया आंव, समुद्र के ओ पार रहिथंव। अउ मै हंस अंव। त कंउवा का कहत हे हमु मन तोरे जइसे मूंगा मोती चरन जी, हंस भइया। फेर हमर कोती हमर छत्तीसगढ़ म साल के साल दुकाल परथे भइया, कनकी कोढ़हा ल खाथन तेकर सेती करिया गे हन, नि तो तोरे जइसे हमू मन उज्जर रहे हरन। राजा शल्य कहते है, कहां हंस और कहां ये तुच्छ कउंवा। एक दूसर के बराबरी हो सकथे? नि हो सके भई। ओतके कहत रहय ठउका भगवान रथ ल उपर म लानिस, राजा शल्य देखिस कहिस करन-

 

एक दिन की बात है, एक हंस उड़ते उड़ते आया और नीम के डंगाल मे बैठे गया। उसे कौंवा नें देखा, ये क्‍या सफेद-सफेद बैठा है जी। हॉं भाई उपर मे। वह पूछता है भैया तुम कौन हो? कहां के रहने वाले हो, और इस डेरे मे, मेरे घर मे क्‍यों बैठे हो? हंस बताता है, महाराज मै हंस हू भाई। हंस हो, हॉं भाई। कहां रहते हो, तो समुद्र के पार। क्‍या खाते पीते हो? हंस बताता है मै मूंगा मोती चरता हूँ भैया। मूंमा मोती चरने वाला हूं, समुद्र के उस पार रहता हूँ, मै हंस हूँ। कौवा क्‍या कहता है हम लोग भी तुम्‍हारे जैसे मूंगा मोती चरते थे जी, हंस भैया। किन्‍तु हमारे तरफ, हमारे छत्तीसगढ़ मे हर साल अकाल पड़ता है भैया, कनकी (धान कुटाई में प्राप्‍त चावल का छोटा टुकड़ा) कोढ़ा (धान कुटाई में प्राप्‍त चावल और धान का आटे के समान अवशेष) को खाते हैं इस कारण काले हो गए हैं, नहीं तो तुम्‍हारे  जैसे हम लोग भी सफेद थे। राजा शल्य कहते हैं, कहां हंस और कहां ये तुच्छ कौंवा। एक दूसरे की बराबरी हो सकती है? नहीं हो सकती भाई। यही कह रहे थे उसी समय भगवान रथ को उपर ले आए, राजा शल्य देखे और बोले  कर्ण-

 

 

अगा वहिदे वहिदे अर्जुन आवत हावय भाई, वो देख। देख आगू ल।

अगा वहिदे वहिदे अर्जुन आवत हावय भाई

राजा ह काहान लागे ग मोर भाई

वो देख, वो सामने खडे हे तेन ह भगवान अर्जुन ये के धन ये चुंचुक बान के पेट भितर हे तेन भगवान अर्जुन ये ? करन देखिस वाकई भगवान अउ अर्जुन खड़े हे । क्रोध में भर गए करन। निकाल के चुंचुक बान ल पृथ्वी म पटक दिस। अरे चुंचुक आज ते मोला आसा देके गेस फेर निरासा करेस, बोले जा नरकगामी हो जा।  नगक म बास कर। चुचुंक खड़ा होके हाथ जोड़ के कहे महराज। एक घव मोला अउ छोड़ दे, अभी तो एक फण पृथ्वी अउ एक फण आकास म रिसे महराज अभी में एक फण पताल लोक म पहुंचाहू अउ एक फण अकास में। एक घौ छोड़ दे। करन कथे अरे चुंचुक एक बार मैं जमीन मे थूंक दे हेंव, का वो थूंक ल चांट ले हेंव? नही। क्योकि मै छत्री हूं, जावों नरक गामी हो जावों। चुंचुक दुखी हो के चल दिस रागी भइया।

 

अजी वो देखो वो देखो अर्जुन आ रहा है भाई, वो देखो ! आगे देखो ! वो देखो, वो देखो अर्जुन आ रहा रहा है भाई। राजा (शल्‍य) कहने लगा मेरे भाई।

वो देखो, वो सामने खड़े हैं वे हैं भगवान अर्जुन ! कि ये चुंचुक बाण के पेट अंदर समाये हैं वे भगवान अर्जुन हैं? कर्ण ने देखा वाकई भगवान और अर्जुन सामने खड़े हैं। क्रोध में भर गया कर्ण। निकाल कर चुंचुक बाण को पृथ्वी मे पटक दिया। अरे चुंचुक आज तुमने मुझे आश देकर निराश किया, बोले जा नरकगामी हो जा।  नरक मे वास कर। चुचुंक खड़ा हो कर हाथ जोड़ कर कहता है महाराज। एक बार मुझे और छोड़ दो, अभी तो एक फण पृथ्वी और एक फण आकाश मे था महाराज अभी मैं एक फण पताल लोक मे भी पहुंचाउंगा और एक फण अकाश में। एक बार छोड़ दो। कर्ण कहता है अरे चुंचुक एक बार मै जमीन मे थूंक देता हूँ, क्‍या वह थूंक को चांट लूंगा? नही ! क्योकि मै क्षत्रीय हूँ, जावो नरकगामी हो जावो। चुंचुक दुखी हो कर चल दिया रागी भैया।

 

 

लड़ाई के मैदान मे मारो मारो के आवाज आवें येती भीम अउ दुसासन दूनों युद्ध के मैदान म जुझगे हे। रागी भाई दुसासन के भुजा म दस हजार हाथी के बल, भीम के भुजा म साठ हजार हाथी के बल। वो दिन भीम काल जैसे नजर आथे। सीना म सीना, भुजा म भुजा, जंघा म जंघा, रागी भइया भीम के भुजा म साठ हजार हाथी के बल, दुसासन के भुजा म दस हजार हाथी के बल। येमा थोरिक बिस्लेसण वाले बात ये, देके एक ठन हाथी के ताकत कतका रहिस होही ? हव ? का हव? हव भई? एक ठन हाथी के बल कतका रिहिसे ? तो बताएं हे कोई कोई मन ह एक ठन हाथी के बल ह साठ ठन भइसा के बल होथे । ततका ठन एक ठन हाथी के बल होथे। जानत हस, वा। फिर हव किथे-

सियाराम भजन प्रानी रे तोर दो दिन के जिनगानी ग सियाराम....

सियाराम भजन प्रानी रे तोर दो दिन के जिनगानी ग सियाराम....

 

लड़ाई के मैदान मे मारो मारो ! की आवाज आ रही है। इधर भीम और दुसासन दोनों युद्ध के मैदान मे लड़ रहे हैं। रागी भाई दुसासन की भुजा मे दस हजार हाथी का बल, भीम की भुजा मे साठ हजार हाथी का बल। उस दिन भीम काल जैसा नजर आ रहा है। सीने मे सीना, भुजा मे भुजा, जंघा मे जंघा, रागी भैया, भीम के भुजा मे साठ हजार हाथी का बल, दुसासन की भुजा मे दस हजार हाथी का बल। इसमें थोड़ा विश्‍लेषण वाली बात यह, है कि एक हाथी की ताकत कितनी रही होगी? हां ? क्‍या हॉं? हॉं भाई? एक हाथी का बल कितना था? किसी ने बताया है कि एक हाथी का बल साठ भैंस के बल जितना होता हैं । उतना एक हाथी का बल होता हैं। जानत हो, हॉं ! वाह ! फिर हॉं कहते हो-

सिया राम का भजन कर लो प्राणी तुम्‍हारी जिन्‍दगी दो दिन की है। दो दिन की जिन्‍दगी है सियाराम भजन कर लो।

 

 

दुसासन अउ भीम दुनो म घमासान युद्ध होत हे। आखिर म साठ हजार हाथी के बल  म भीमसेन तउन हे दुसासन ल उठावत है। अउ दूनों हाथ म उठाके

अरे पृथ्वी म भीमें पखारन लागे भइया

जाके सिला म गिरन लागे भइया

पटक देथे दुसासन ल अउ जाके दुसासन के छाती म जाके बइठे जथे। अउ छाती म बइठ के कहय अरे दुसासन। आज मै तोर दुनों भुजा उखाड़ के तोर रूधिर के अहार करिहंव। खून के अहार करना चाहत हंव ये मोर प्रतिज्ञा ये।

 

दुसासन और भीम दोनो मे घमासान युद्ध हो रहा है। अंत मे साठ हजार हाथी के बल से भीमसेन, दुसासन को उठा रहा है और दोनों हाथ मे उठाकर

पृथ्वी मे भीम उसे पटकने लगा भैया (जैसे कपड़ा धोते समय कपड़े को पत्‍थर में पटकते हैं उसी प्रकार) दुसासन शिला मे जाकर गिरने लगता है भैया।

पटक देता है दुसासन को और दुसासन की छाती मे जाकर बैठ जाता है और छाती मे बैठ कर कहता हैं अरे दुसासन ! आज मै तुम्‍हारे दोनो भुजा को उखाड़ कर तुम्‍हारे रूधिर का आहार करूंगा (पीउंगा)। खून का आहार (पीउंगा) करना चाहता हूँ, यह मेरी प्रतिज्ञा है।

 

 

जब तक रूधिर पियंव नहीं तोरा, तब तक शोक जाए नहीं मोरा  दुसासन, आज तोला मैं मारिहंव, अरे है कोई रक्छा करइया ? तीनों लोक चउदा भवन म ता ओला बला ले। भीम कहे समय है दुसासन, और कहे कहां है पितामह भीष्म? कहों है द्रोणाचार्य ? कहां है तोर भाइ दुर्योधन ? बुलाव कोन तोला बंचात हे ? दुसासन जवाब नी देवय रागी भइया। कौरव दल ल देख के भीम बोले है कोई माई के लाल जो दुसासन के रक्छा करना चाहत हे। कोई बीर आघू नइ आवत ये, भीम कहे अरे दुर्योधन। आज मै तोर प्रान से भी  प्यारा भाइ ल मारत हंव।

 

जब तक रूधिर पियंव नहीं तोरा, तब तक शोक जाए नहीं मोरा। दुसासन ! आज तुम्‍हें मैं मारूंगा, अरे है कोई रक्षा करने वाला? तीनों लोक चौदह भुवन मे तो उसे बुला ले। भीम कहता है समय है दुसासन, कहता है कहां है पितामह भीष्म? कहॉं है द्रोणाचार्य ? कहां है तुम्‍हारे भाई दुर्योधन? बुला ले कौन तुम्‍हें बचाता है? दुसासन जवाब नहीं दे रहा है रागी भैया। कौरव दल को देख कर भीम बोलता है, कोई माई का लाल है जो दुसासन की रक्षा करना चाहता हो। कोई वीर आगे नहीं आ रहे हैं, भीम कहता है अरे दुर्योधन ! आज मै तुम्‍हारे प्राणों से भी  प्यारे भाई को मार रहा हूं।

 

 

अरे दुर्योधन, तोर भुजा  मे साहस हे त आ, हां भाई। भीम पांडव दल ल पुकारत है कोई माई क लाल। पांडव दल में भी कही कोई माइ के लाल होंगे। आज दुसासन ल कोई बचाना चाहत हे पांडव दल के वो भी आ सकत हे। पांडव के दल म कोई बीर पैदा नइ हे। भीम उठाइस नजर अउ गगन पंथ डाहर देखथे। भीम सेन चंदा अउ सुरूज ल साक्षी देथे देंवता मन ल साक्षी देथे, तीनों लोक अउ चउदा भुवन के देवता मन के साक्षी देवत हंव आज मै दुसासन ल मारके ओकर रूधिर के पान करना चाहत हंव। सब तुम साच्छी रइहंव। रागी भइया, भयानक दृश्य उत्पन्न होगे। भीम के गोठ ल सुनिस अर्जुन के आंखी लाल होगे। अर्जुन कथे भइया भीम ये तुच्छ बीर ल तै मारत हसअउ चंदा अउ सुरूज ल साक्छी देथस? देवता गण ल साक्छी देथस।  एक बाण म मैं तोला मै नइ मारहूं त अर्जुन कहाना छोड़ देहूं। निकाले हे अर्जुन त्रुन से बान धनुस म, भगवान पलट के देखे का करथस अर्जुन, भगवान कहते हें क्या कर रहे हो अर्जुन ? तोला कोन पूछय अर्जुन। आज भीम ल तीनों लोक अउ चउदा भुवन म कोनो नइ जितय, बैठ जाव। अर्जुन, जे दिन भक्त प्रहलाद ल मारे बर हिरण कश्यप् खम्बा म बांध रहिस । खम्बहा फाड़, जे दिन मै खम्हा ल फार के अपन भक्त के रक्छा खातिर खम्हा ले नरसिंह के रूप म प्रकट होये रहेंव। ओ दिन के नरसिंह बल ल-

 

अरे दुर्योधन, तुम्‍हारी भुजा मे यदि दम है तो आ, हां भाई। भीम पाण्‍डव दल को पुकारते हैं, कोई माई का लाल ! पाण्‍डव दल में भी कही कोई माइ का लाल होगा जो कोई आज दुसासन को बचाना चाहता है वह भी आ सकते हैं। पाण्‍डव के दल मे कोई वीर पैदा नहीं है। भीम उठाते हैं नजर और गगन पंथ की ओर देखते हैं। भीमसेन चंद्रमा और सूर्य को साक्षी देते हैं, देंवताओं को साक्षी देते हैं, तीनों लोक और चौदह भुवन के देवताओं को साक्षी दे रहा हूँ आज मै दुसासन को मार कर उसके रूधिर का पान करना चाहता हूँ। तुम सब साक्षी रहोगे। रागी भैया, भयानक दृश्य उत्पन्न होता है। भीम की बात को अर्जुन सुनता है तो उसकी आंख लाल हो जाती है। अर्जुन कहता है, भैया भीम ये तुच्छ वीर को तुम मार रहे हो और चंद्रमा, सूर्य को साक्षी दे रहे हो? देवता गण को साक्षी दे रहे हो।  एक बाण मे मैं तुम्‍हें नहीं मार दिया तो अर्जुन कहाना छोड़ दूंगा। निकालता है अर्जुन तरकस से बाण धनुस में चढ़ाने वाला है, भगवान पलट कर देखते हैं, क्‍या कर रहे हो अर्जुन, भगवान कहते हैं क्या कर रहे हो अर्जुन? तुम्‍हें कौन पूछता है अर्जुन। आज भीम को तीनों लोक और चौदह भुवन मे कोई नहीं जीत सकेगा, बैठ जावो। अर्जुन, जिस दिन भक्त प्रहलाद को मारने के लिये हिरण्‍यकश्यप उसे खंबे मे बांध दिया था, तब खबां फाड़ कर जिस दिन मै अपने भक्त की रक्षा के लिए खंबा से नरसिंह के रूप मे प्रकट हुआ था। उसी दिन के नरसिंह बल को-

 

 

अरे बीरे भीमे ल देये हवंव गा मोर भाई

भगवाने कहन लागे ग मोर भाई

नरसिंह बल है उसके पास आज कोई नइ जीत सके, अर्जुन शांत हो जथे रागी।

आखिर म भीम कहत हे दुसासन तोर बंचइया कोनो नइये। भीमसेन ओकर छाती म बइठे सहदेव ल कहिथे सहदेव। सहदेव हाथ जोड़ के पूछत हे काय भइया ? जा सिबिर म अउ द्रौपदी ल बता दे के भीम ह दुसासन ह मारत हे, चले आ अपन प्रतिज्ञा ल तहुं पूरा कर ले कहि दे। चल जा के अपन प्रतिज्ञा पूरा कर ले कहि दे। सहदेव नाम के बीर ह रनिवास म पहुंचत हे रागी। मां द्रौपदी के लंबा केस बिखरे हुए हे द्रौपदी के प्रतिज्ञा हे अरे दुसासन। जब तक तोर रूधिर म ये केस ल नइ धोहूं तब तक मै जूड़ा नई बांधव। आज तेरा साल बीत गे हे द्रौपती के केस बिखरे हे।

 

वीर भीम को मैने दिया है मेरे भाई, भगवान कहने लगे मेरे भाई

नरसिंह बल है उसके पास, आज कोई नहीं जीत सकता, अर्जुन शांत हो जाता है रागी।

अंत मे भीम कहता है दुसासन तुम्‍हे बचाने वाला कोई नहीं है। भीमसेन उसके छाती मे बैठ कर सहदेव को कहता है,  सहदेव ! सहदेव हाथ जोड़ कर पूछता है क्‍या है भैया ? जाओ शिविर मे और द्रौपदी को बता दो कि भीम दुसासन को मार रहा है, चले आवो अपनी प्रतिज्ञा को तुम भी पूरा कर लो कह देना। चलो जा कर अपनी प्रतिज्ञा पूरा कर लो कह देना। सहदेव नाम का वीर रनिवास मे पहुंचता है रागी। मां द्रौपदी के लंबे केस बिखरे हुए हैं, द्रौपदी की प्रतिज्ञा है, अरे दुसासन ! जब तक तुम्‍हारे रूधिर मे यह केस को धो न लूं तब तक मै जूड़ा नहीं बांधूंगी। आज तेरह साल बीत गए हैं द्रौपती के केस बिखरे है।

 

 

सहदेव गीस जा के कहय पांचाली। भइया ह तोला बलावत हे। बोले काबर ? कहे चल अपन प्रन ल पूरा कर लेबे। काबर के आज भईया ह दुसासन ल मारना चाहत हे। माता जगत जननी द्रौपदी कुरूक्षेत्र की ओर चलते है रागी। दुरिहा ले भीम दिखत हे, काल के समान। अह। मां द्रौपदी जब भीम ल देखिस त दूर से ही कहे महराज। पति तो मोर पांच हे, मोर पांच पति म तोर जइसे बीर कोनो नइ हे। द्रौपदी कहत हे तोर जइसे कोनो नइ हे। धन्य अस तैं। तैं आज मोर प्रतिज्ञा ल पूरा करात हवस। खड़े होगे द्रौपदी, ओ समे के दृश्य मै का बतावंव रागी भईया। कुरूक्षेत्र के मैदान दूनों दल के बीच भीम दुसासन के छाती म बइठे है और दुसासन के छाती म बइठे हुए जब हाथ को पकड़ के

 

सहदेव गया जा कर कहता है पांचाली। भैया तुम्‍हें बुला रहे हैं। बोली क्‍यों ? कहते हैं चलो अपना प्रण को पूरा कर लेना। क्‍योंकि आज भईया दुसासन को मारना चाहते हैं। माता जगत जननी द्रौपदी कुरूक्षेत्र की ओर चलती हैं रागी। दूर से भीम दिख रहे हैं, काल के समान। ओह ! मां द्रौपदी जब भीम को देखती है तो दूर से ही कहती है महाराज ! पति तो मेरे पांच हैं, मेरे पांच पति मे आपके जैसा वीर कोई नहीं हैं। द्रौपदी कहती है आपके जैसा कोई नहीं है। धन्य हैं आप ! आप आज मेरी प्रतिज्ञा को पूरा करा रहे हो। खड़ी हो गई द्रौपदी, उस समय के दृश्य को मै क्‍या बताउं रागी भईया। कुरूक्षेत्र के मैदान में दोनों दल के बीच भीम दुसासन की छाती मे बैठे हैं और दुसासन की छाती मे बैठे हुए जब हाथ को पकड़ कर

 

 

 दुसासन के दूनों भुजा ग उखाड़न लागन भइया

दुसासन के दूनों भुजा ग उखाड़न लागन भइया

खून के धारा बहन लागे भइया

भुजा ल जब खींचिस रूधिर के धार बह गे। कितना भी खून आथे, भीम द्रौपदी के केश म डारत हे। मां जगदम्बा के केस खून म धुलत हे। लम्बा लम्बा केस जब दुसासन के रूधिर म भीजें हे भाई। ओ समे वाकई  बताए हे कवि ह मां द्रौपती साक्षात काली के रूप म प्रगट होथे। जब कौरव अउ पांडव के दल देखथे, दोनो हाथ जोड़ के कहत हे भइया। मया पिरित के डोरी म दाई। कहे शांत हो जा।

 

दुसासन के दोनों भुजा को उखाड़ने लगे भैया, दुसासन की दोनों भुजाओं को उखाड़ने लगे भैया।

खून की धारा बहने लगी भैया..

भुजा को जब खींचते हैं, रूधिर की धार बह निकली। जितना भी खून निकल रहा हैं, भीम द्रौपदी के केश मे डाल रहा है। मां जगदम्बा का केश खून मे धुल रहा है। लम्बा लम्बा केश जब दुसासन के रूधिर मे भीग रहा है भाई। उस समय कवि बताये हैं कि मां द्रौपती साक्षात काली के रूप मे प्रगट हुई हैं। कौरव और पाण्‍डव दल देख रहे हैं, दोनो हाथ जोड़ कर कह रहे है भैया। प्रेम और स्‍नेह की डोरी मे माता, कहते हैं शांत हो जाओ..

 

 

मया पिरीत के डोरी म दाई अउ, मोला बांघ ले, तोर चरन म सेउक बना के राख ले

तोर सेवा बजावत रइहूं, तोर गुन ल गावत रइहूं

मया पिरीत के डोरी म दाई मोला बांघ ले, तोर चरन म सेउक बना के राख ले

तोर चरन म सेउक बनाके राख ले

तोर सेवा बजावत रइहूं तोर गुन ल गावत रइहूं

तोरे गुने ल गावत रइंहू

तोरे परसादे पायेंव मानुस तन चोला वो मानुस तन चोला

तोरे परसादे पायेव मानुस तन चोला वो मानुस तन चोला ओ

ये मोर जिनगानी हे दाई अरपन हे तोला वो अरपन हे तोला

ये मोर जिनगानी हे दाई अरपन हे तोला वो अरपन हे तोला

भगत के गोहार सुनथे सदा भगवान वो

महूं तोर भगत अंव दाई मोला पहचान वो, मोला पहिचान ओ

तोर चरन में मइया मोर मोला थाम ले चोर तरन म सेउक बना के राख ले

 

प्रेम और स्‍नेह की डोरी मे माता मुझे बांध लो, तुम्‍हारे चरण मे मुझे सेवक बना कर रख लो। तुम्‍हारी सेवा बजाते रहूंगा, तुम्‍हारे गुण को गाता रहूंगा। प्रेम और स्‍नेह की डोरी मे माता मुझे बांघ लो, तुम्‍हारी चरणों मे सेवक बना कर रख लो, तुम्‍हारी चरण मे सेवक बना कर रख लो, तुम्‍हारी सेवा बजाते रहूंगा, तुम्‍हारे गुण को गाते रहूंगा, तुम्‍हारे गुण को गाते रहूंगा। 

तुम्‍हारे ही प्रसाद से यह मनुष्‍य तन के चोले को पाया हूं, मनुष्‍य तन के चोले को तुम्‍हारे प्रसाद से पाया हूँ। माता यह मेरी जिन्‍दगी तुम्‍हें अर्पित है, तुम्‍हें अर्पित है। माता यह मेरी जिन्‍दगी तुम्‍हें अर्पित है, तुम्‍हें अर्पित है। भक्‍त की पुकार भगवान सदा सुनते हैं, मैं भी तुम्‍हारा भक्‍त हूँ माता, मुझे पहचान लो, मुझे पहचान लो। तुम्‍हारे चरण में माता मुझे थाम लो, तुम्‍हारी तरण मे सेवक बना कर रख लो

 

 

सारी सेना दोनो हाथ जोड़ लेथे। मां जगदम्बा शांत होथे,  वापिस चलथे, रागी भाई, सबल सिंह महराज ओ दिन लिखे हें, भीमसेन केवल दुसासन ल मार के शांत नि होइस, वो दिन वो ह कुरूक्षेत्र के मैदान में चिन्ह चिन्ह के कहे जान पहिचान के चिन्ह पहिचान के अउ खोज खोज के सौ भाई कौरव म

अगा निन्यानबे भाइ ल मारन लागे भाई    निन्‍यानबे भाई।

वो ह निन्यानबे भाइ ल मारन लागे भाई  

हा बृकोदर कहान लागे गा मोर भाई

हा बृकोदर कहान लागे गा मोर भाई

 

संपूर्ण सेना दोनो हाथ जोड़ कर खड़ी हैं। मां जगदम्बा शांत होती हैं,  वापस जाती हैं, रागी भाई, सबल सिंह महराज उस दिन लिखे हैं, भीमसेन केवल दुसासन को मार कर शांत नहीं हुए, उस दिन वह कुरूक्षेत्र के मैदान में पहचान-पहचान कर और खोज-खोज कर सौ भाई कौरव में..

अजी निन्यानबे भाई को मारने लगे भाई निन्‍यानबे भाई। वह निन्यानबे भाइ को मारने लगा भाई। बृकोदर कहने लगा मेरे भाई, बृकोदर कहने लगा मेरे भाई।

 

 

एक दिन भीमसेन निन्यानबे भाइ ल मारिस, एक बच गए राजा दुर्योधन । अय। भयानक मार रागी । द्वापर के अंत म होथे महाभारत के लड़ाई करन अउ अर्जुन दोनो म युद्ध होथे कुरूक्षेत्र के मैदान म । आकास म देवता विमान मे बइठ के महाभारत के लड़ाई देखत हे। विधि के विधान, होनी होके रथे रागी। लड़ाई के मैदान म लड़ते लड़ते अचानक करन के रथ खड़ा हो जथे। रथ रूक जाते हैं। करन मामा शल्य से बोले मामा रथ आगे बढ़ावों। राजा शल्य कहत हे राजन रथ तो खड़े हो गए। रथ अचल होगे हे, ये रथ के चाक ह ये पृथ्वी म गड़त हे। धरती म गड़त हे, कहत हे। घोड़ा चल नइ पात ये, रविनंदन करन कथे मामा शल्य। पृथ्वी म उतर अउ पृथ्वी म उतर के रथ के चाक उपर कर। काय ? अतका ल सुनिस

 

एक दिन में ही भीमसेन निन्यानबे भाई को मारा है, एक बच गया है राजा दुर्योधन । ओह !  भयानक मृत्‍यु रागी। द्वापर के अंत मे महाभारत की लड़ाई होती है, कुरूक्षेत्र के मैदान मे कर्ण और अर्जुन दोनो मे युद्ध हो रही हैं। आकाश मे देवता विमान मे बैठ कर महाभारत की लड़ाई देख रहे हैं। विधि का विधान, होनी होकर रहता है रागी। लड़ाई के मैदान मे लड़ते-लड़ते अचानक कर्ण का रथ खड़ा हो जाता है। रथ रूक जाता हैं। कर्ण मामा शल्य से बोलते हैं मामा रथ आगे बढ़ाओ। राजा शल्य कहते हैं राजन रथ तो खड़ा हो गया है। रथ अचल हो गया है, यह रथ का पहिया पृथ्वी मे गड़ रहा है। धरती मे गड़ रहा है, कह रहे हैं,  घोड़ा चल नहीं पा रहा है, रविनंदन कर्ण कहते हैं, मामा शल्य। पृथ्वी मे उतरो और रथ के चाक को उपर करो। क्‍या? इतना सुनते ही..

 

 

तहां राजा शल्य कहिस अरे करन।

तोरे नौकरी रे नइ तो करंव भईया

तोरे नौकरी ग नइ तो करंव भईया

दूसर के धोखा छोडि़ देबे भईया

दूसर के धोखा कहान लागे भाई

अरे करन का मै तोर नौकर अंव रे। जब मै सारथी बन के आयेंव वो समय कहेंव मै केवल रथ ही चला सकत हंव। दूसरा काम नइ कर सकंव । तोर रथ अचल हे, स्वंय पृथ्वी म उतर अउ स्‍वेंम पृथ्वी म उतर के रथ के चाक उठा। करन कहय अर्जुन थोड़ा सा विश्राम कर। करन महाराज कहत हे ये भइया। ए अर्जुन थोरकन विश्राम कर। रथ के चाक पृथ्वी म गड़ गे हे, मै ये रथ ल निकाल लेथंव अर्जुन ।

 

फिर राजा शल्य ने कहा अरे कर्ण ! मैं तुम्‍हारी नौकरी नहीं करूंगा भईया। मैं तुम्‍हारी नौकरी नहीं कर रहा हूँ भईया। दूसरे का धोखा छोड़ देना भाई, दूसरे का धोखा छोड़ देना भाई ऐसा कहने लगे।

अरे कर्ण क्‍या मै तुम्‍हारा नौकर हूं रे ! जब मै सारथी बन कर आया उसी समय कह दिया था कि मै केवल रथ ही चला सकता हूँ। दूसरा काम नहीं कर सकूंगा। तुम्‍हारा रथ अचल है, स्वंय पृथ्वी मे उतरो और स्‍वयं पृथ्वी मे उतर कर रथ के चक्‍के को उठाओ। कर्ण कहते हैं अर्जुन थोड़ा सा विश्राम करो। कर्ण महाराज कहते है, ये भैया ! ए अर्जुन ! थोड़ा विश्राम करो ! रथ का चक्‍का पृथ्वी मे गड़ गया है, मै इस रथ को निकाल लेता हूँ अर्जुन !

 

 

अर्जुन हाथ म धनुस लेके बैठे है। रविनंदन करन अपन धनुस ल अपन रथ उपर मढा दे हे, कमर ल कसिस, पृथ्वी म उतरिस, अउ पृथ्वी म उतर के दोनो हाथ म रथ के चाक ल पकड़त हे। अउ रथ के चाक ल पकड़ के कहूं अइसे रथ ल खींचय नहीं रागी, तो साफ लिखे हे पृथ्वी रथ समेंत जब पृथ्वी ह अधर उठय। पर वो पृथ्वी से रथ के चाक ह नई निकलय रागी। पृथ्वी अधर उठ जाए, इतना ताकत। पर पृथ्वी ले रथ के चाक नई निकलि ये, भगवान बइठे बइठे देखत हे। करन रथ ल निकालत हे। आखिर म भगवान कहय अर्जुन।

मारो मारो भइया अरे मारोच मारो गा

मारो मारो भइया कहन लागे भाई

देवकी नंदन गा कहन लागे भईया

अर्जुन क सुनन लागे भईया

 

अर्जुन हाथ मे धनुष लेकर बैठा है। रविनंदन कर्ण अपना धनुस अपने रथ के उपर रख दिया है, कमर को कसा, पृथ्वी मे उतरा और पृथ्वी मे उतर कर दोनो हाथ मे रथ के चक्‍के को पकड़ता है और रथ के चक्‍के को पकड़ कर ऐसा रथ को खींच रहा है रागी, तो स्‍पष्‍ट लिखा है पृथ्वी रथ सहित अधर में उठ जाती थी, किन्‍तु पृथ्वी से रथ का पहिया नहीं निकल रहा है रागी। पृथ्वी अधर उठ जा रहा है इतनी ताकत ! किन्‍तु पृथ्वी से रथ का पहिया निकल ही नहीं रहा है, भगवान बैठे-बैठे देख रहे हैं। कर्ण रथ को निकाल रहा है। अंत मे भगवान कहते हैं अर्जुन !

मारो, मारो  भैया ! अरे मारो ही मारो कहने लगे, मारो मारो भैया ! कहने लगे भाई। देवकी नंदन कहने लगे भईया, अर्जुन सुनने लगा भईया..

 

 

मारो। अर्जुन हाथ जोड़ के बोलय, कइसे बात करथस द्वारिका नाथ । ये तो अधर म हे। करन निहत्था हे। करन तो रथे के चाक निकालत थे द्वारिका नाथ वो निहत्था के उपर म कइसे वार मारहूं । करन ल कइसे मारहूं ? भगवान  कहते है  सोच लो अर्जुन । आज तै धर्म अउ अधरम के निति विचारत हस, जे दिन भरे समाज म जब द्रौपदी के अपमान होइस ओ दिन ए करन कहां रिहिस, वो दिन ए करन धरम अधरम नी विचारिस। जे दिन सात महारथी मिलके तोर बेटा ल मारिस चक्रव्यूह में, ओ समय ये करन के धर्म कहां गे रहिस हे। तै धर्म बिचारत हस, फेर ये याद रखबे फेर वो जब धनुस लेके खड़ा हो जाहि, तोला कोन पूछे वोकर से तो काल नइ जीते, करन ल जीतना हे, मारो । अब अर्जुन पुछिस का बान छोड़ंव ? भगवान बताथे दाई कुंती मांग के लाने हे तेने पंचमुखी बान ल मार। मां जो मांग के लाने हे न तेने ल मार। आखिर म अर्जुन खींच हे पंचमुखी बान। गांडीव म जोडथे अउ जब मारे हे, गरगर गरगर बान जाथे।

 

मारो ! अर्जुन हाथ जोड़ के बोल रहा है, कैसी बात कर रहे हैं द्वारिका नाथ ! यह तो बिना आधार का है, कर्ण निहत्था है। कर्ण तो रथ के चक्‍के को निकाल रहा है द्वारिका नाथ, निहत्थे के उपर मैं कैसे वार करूंगा। कर्ण को कैसे मारूंगा? भगवान  कहते हैं  सोच लो अर्जुन ! आज तुम धर्म और अधर्म की निति विचार रहे हो, जिस दिन भरी सभा मे जब द्रौपदी का अपमान हुआ था उस दिन यह कर्ण कहां था? उस दिन इस कर्ण नें धर्म-अधर्म का विचार नहीं किया ? जिस दिन सात महारथी मिल कर तुम्‍हारे पुत्र को चक्रव्यूह में मारे, उस समय इस कर्ण का धर्म कहां गया था? तुम धर्म विचार रहे  हो, किन्‍तु याद रखना यदि वह जब धनुस लेकर खड़ा हो जायेगा, तुम्‍हें कौन उससे तो काल भी नहीं जीत पायेगा, कर्ण को जीतना है, मारो ! अब अर्जुन पूछता है कौन सा बाण छोड़ूं? भगवान बताते हैं, माता कुंती जो मांग कर लाई है उसी पंचमुखी बाण को मारो। मां जो मांग कर लाई है ना, उसी को मारो। अंत मे अर्जुन खींचते हैं पंचमुखी बाण गांडीव मे जोडते हैं और जब मारते हैं, बड़ी तेजी से बाण जाता है..

 

 

करन ह निहरे हे अउ निहरे निहर के रथ के चाक ल निकालत हे। जा के अर्जुन के बान करन ल लग जाथे। एक हाथ अउ एक पांव । करन तिरछा परथे, । एक ठन हाथ अउ एक ठन पांव ल बचाथे।  दानबीर करन पृथ्वी म गिर जाथे भइया। करन जब पृथ्पवी म गिरथे तब अर्जुन निकल के देवदत्त शंख ल फुंक देथे। अर्जुन जब देवदत्त शंख ल फुंकिस, तीनो लोक चउदाह भुवन म अवाज होइस । भगवान पांचजन्य नाम के शंख ल फुंक दिस। लड़ाई के मैदान म हाहा कार मच गे, संझा के बेरा दिन बुडे के बेरा ये कौरव के दल रोवत चलत हे, पांडव के दल हंसत आवत हे। सिबिर म कृत-कुंडल उतार के पांडव द्रौपदी के भुवन म भोजन करथे। माता द्रौपदी कृष्णा ल कहत हे महराज आज कोन जीते हे ? भगवान उदास मन से कहे पांचाली। आज हमन जीतेहन। बोले हमर बिजय होए हे। आसन म जब भगवान बइठिस त भगवान के मन नइ मानिस रागी। अनायास भगवान के आंख से आंसू निकलथे। अर्जुन देखिस भगवान रोत हे, अर्जुन पूछे भगवान का बात ये,  भगवान कहिस का बतांव रागी, अर्जुन। आज तोर हित के खातिर आज तोर रक्छा के खातिर आज मोर परम भगत करन ल मै मार के आये हंव।

 

कर्ण झुका है और झ़ुके-झुके ही रथ के चक्‍के को निकाल रहा है। जा कर अर्जुन का बाण कर्ण को लग जाता है। बाण एक हाथ और एक पांव में लगता है, बाण कर्ण को तिरछा पड़ता है। कर्ण एक हाथ और एक पांव को बचाता है।  दानवीर कर्ण पृथ्वी मे गिर जाता है भैया। कर्ण जब पृथ्‍वी मे गिरता है तब अर्जुन देवदत्त शंख को निकाल कर फूंक देता है। अर्जुन जब देवदत्त शंख को फूंकता है, तीनो लोक चौदह भुवन मे अवाज होता है। भगवान पांचजन्य नाम के शंख को फूंकते हैं। लड़ाई के मैदान मे हाहाकार मच जाता है, संध्‍या का समय, सूर्य डूबने का समय है, कौरव का दल रोते हुए जा रहा है, पाण्‍डव का दल हंसते हुए आ रहा है। शिविर मे किरीट-कुंडल उतार कर पाण्‍डव द्रौपदी के भवन मे भोजन करते हैं। माता द्रौपदी कृष्ण को कहती है महाराज आज कौन जीता है? भगवान उदास मन से कहते हैं पांचाली, आज हम लोग जीते हैं। बोलते हैं हमारी जीत हुई है। आसन मे जब भगवान बैठते है तो भगवान का मन नहीं मानता रागी। अनायास भगवान के आंख से आंसू निकलते हैं। अर्जुन देखता है भगवान रो रहे हैं, अर्जुन पूछता है क्‍या बात है भगवान ?  भगवान कहते हैं क्‍या बतांउ रागी, अर्जुन! आज तुम्‍हारे हित के कारण,  आज तुम्‍हारी रक्षा के लिए मेरे परम भक्‍त कर्ण को हम मार कर आये है।

 

 

भगवान ल दुख होथे। आंख से नीर बहते है रागी, अर्जुन कहे करन भक्त है? करन दानी है? करन ल दानी किथस केसव ? हां अर्जुन करन ल दानबीर के नाम से दुनिया जानते हे उनको। अर्जुन कहे मै करन के परिक्छा लेहूं, तै करन ल दानी हे कहात हस, भगवान कहें, तै करन के का परिक्छा लेबें। करन तोला का दिही, तै का मांगबे ? अर्जुन करन तोर जिन्दगी और मौत के बीच झूलत हे। बिसवास नइ ये त चल मै देखात हंव, कितना दानी हे, चलते है हरि अर्जुन कुरूक्षेत्र मे करन के धनुस परे हे, तिरछा कटे हे करन महाराज पृथ्वी म पड़े हें, प्राणांत नइ होए हे रागी। हरि अर्जुन ब्राम्हण के रूप मे गए है, भगवान साधू साधू कहते हुए  कथे जय होवय भइया, हम तोला सुने रहेन करन, पहिली सेनापति बने हे, कुरूक्षेत्र म लडे जात हे। हम गरीब ब्राम्हण अन भइया कुछू मांगबों कइ के आये रहेन। करन कथे महाराज मै तो लड़ाई मे परे हंव, अंतिम समय हे। घर मे जा रानी अंगार मोती से तै जो भी मांगबे  ओ तोला दे दिही। करन के धरमी पत्नी कौन तो अंगार मोती। जावो मंग लो। भगवान कथे अरे देवइया ह नइ देवत हे, का ठिकाना हे उंहा जाबो त वो दे दिही। आसा लेके आये हन पर निरास होके जाथन तोला महादानी सुनेन त आये रहेन। ओ दिन करन ल सोचे बर परगे, हा भगवान ।

 

भगवान को दुख हो रहा है। आंख से नीर बह रहे हैं रागी, अर्जुन कहता है कर्ण भक्त है? कर्ण दानी है? कर्ण को दानी कहते हो केशव ? हां, अर्जुन कर्ण को दानवीर के नाम से दुनिया जानती है। अर्जुन कहता है, मै कर्ण की परिक्षा लूंगा, आप कर्ण को दानी कह रहे हैं ? भगवान कहते हैं, तुम कर्ण की क्‍या परीक्षा लोगे। कर्ण तुम्‍हें क्‍या देगा, तुम क्‍या मांगोगे ? अर्जुन कर्ण तो जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहा है। विश्‍वास नहीं है तो चलो मै दिखाता हूँ, कितना दानी है। हरि-अर्जुन चलते है, कुरूक्षेत्र मे कर्ण का धनुष पड़ा है, कर्ण तिरछा कटा है। कर्ण महाराज पृथ्वी मे पड़ा है, प्राणांत नहीं हुआ है रागी। हरि-अर्जुन ब्राम्हण के रूप मे गए हैं, भगवान साधु-साधु, तुम्‍हारा जय होगा कहते हैं, हम सुने हैं कर्ण तुम पहिले सेनापति बने हो, कुरूक्षेत्र मे लड़ने जा रहे हो। हम गरीब ब्राम्हण हैं कुछ मांगेंगे सोच कर आये थे। कर्ण कहता है महाराज मै तो लड़ाई मे पड़ा हूँ, अंतिम समय है। घर मे जाओ रानी अंगार मोती से तुम जो भी मांगोगे वह तुम्‍हें दे देगी। कर्ण की धर्मी पत्नी कौन है तो अंगार मोती। जावो मांग लो। भगवान कहते है अरे देने वाला ही नहीं दे रहा है, तो क्‍या ठिकाना है वहां जायेंगें तो वह दे देगी। आशा लेकर आये हैं किन्‍तु निराश होकर जा रहे हैं, तुम्‍हें महादानी सुने थे तो आये थे। उस दिन कर्ण को सोचना पड़ा, हा, भगवान।

 

 

आज तक करन के आगे से कोइ खाली हाथ नइ गिस, बताए हे रागी भाई करन जब सूत के उठय, पांव पृथ्वी म नइ माडे रहय पहिली सवा मन सोना वो दान म दय। तब पांव पृथ्वी म धरय। आज मोर आखरी समय हे ये ब्राम्हण मन खाली हाथ चल दिस, करन कहे रूक जाओं महराज, हरि अर्जुन चलत रहय खडे हो जाए। करन कहत हे महराज वहीं दे एक ठन पथरा परे हे, उठा के लादिहा तो भगवान कहे अरे करन। हमन कहूं इही मजदूरी ल करतेन त दान मांगे ल काबर आतेन मजदूरी करके जी नइ लेतेन। लड़ाई के मैदान म करन ह धिलरथ जाथे रागी, एक हाथ एक पांव कटाये हे, एक हाथ एक पांव बाचें हे। घिलरथे हुए जाथे अउ पथरा ल उठाके लाथे। बताए हें करन के बत्तीसो दांत म हीरा हे, ठोकर मार मार के दांत ल टोरथे,  अउ दांत ल टोर के कथे, लो भगवान। ओतको ल देखिस त भगवान कहत हे, अरे करन तोला लाज नई लागे रे। इतना कठिन परिक्छा ये, अरे करन। लाज नी लागे, ये ब्राम्हण ल तै जूठा दान देवथस करन, ये जुठा हे। एक हाथ अउ एक पांव म करन धनुस उठाथे अउ कचरा के बान बनाके रागी अइसा बान मारे हे पृथ्वी ल, पृथ्वी से मां भगवती गंगा ह प्रगट हो जाथे, गंगा म करन दांत ल धो देथे रागी। अउ दांत ल धो के कथे  ये दे महराज।

 

आज तक कर्ण के आगे से कोइ खाली हाथ नहीं गया है, बताया गया है रागी भाई, कर्ण जब निद्रा से जागते थे, पांव पृथ्वी मे पड़ने से पहले सवा मन सोना दान मे देते थे तब पांव पृथ्वी मे रखते थे। आज मेरा आखरी समय है ये ब्राम्हण लोग खाली हाथ चले गए। कर्ण कहता है रूक जाओं महाराज, हरि-अर्जुन आगे बढ़ने ही वाले रहते हैं, खडे़ हो जाते हैं। कर्ण कहता है महराज वह देखिए एक पत्‍थर पड़ा है, उठा कर  ला देगें क्‍या। भगवान कहते हैं अरे कर्ण। हम लोग कहीं यही करते तो  मजदूरी नहीं  करते, दान मांगने क्‍यों आते,  मजदूरी करके जी नहीं लेते ? लड़ाई के मैदान मे कर्ण धिसटते जाता है रागी, एक हाथ एक पांव कट गया है, एक हाथ और एक पांव बचा है। घिसटते हुए जाता है और पत्‍थर को उठा कर लाता है। बताया गया  है कर्ण के बत्तीसो दांत मे हीरा जड़ा है, ठोकर मार-मार कर दांत को तोड़ता है  और दांत को तोड़ कर कहता है, लो भगवान। उसे देखते हैं भगवान और कहते हैं, अरे कर्ण तुम्‍हें शर्म नहीं आई रे। इतनी कठिन परिक्षा है, अरे कर्ण ! शर्म नहीं आई, हम ब्राम्हण को तुम जूठा दान दे रहो हो कर्ण, यह जूठा है। एक हाथ और एक पांव मे कर्ण धनुष उठाता है और घांस का बाण बना कर रागी पृथ्वी में ऐसा बाण मारता है , पृथ्वी से मां भगवती गंगा प्रगट हो जाती हैं, गंगा मे कर्ण दांत को धोता है रागी और दांत को धो कर कहता है  यह लो महाराज।

 

 

अर्जुन के मुह ल देख के भगवान कथे रागी, कितना दानी हे। ओ दनि भगवान ल केहे ल परगे, रूप ल देखाए कहय करन मांग।  भगवान कहेते है अजर करव तन राखेउ प्राना, जे दिन बाती ल मारिस भगवान रामचंद जी हे, वो दिन कहे रहिस हे बाली का तोला अजर कर दंव? का तोला अमर कर दंव ? आज वइ शब्द भगवान दोहराथे, मांग करन। आज अगर कहूं तै कइबे मोला अजर अमर कर दे, मै तोला अजर अमर कर सकथौ, करन कहय नहीं द्वारिका नाथ। आज मोर भाग्य ल देख, हजारों हजार बरस मुनि मन तपस्या करथें

 

अर्जुन के मुख को देख कर भगवान कहते हैं रागी, देखा कितना दानी है। उस दिन भगवान को कहना पड़ गया, अपने रूप को दिखाते हैं, कहते हैं कर्ण मांगो !  भगवान कहते हैं अजर करव तन राखेउ प्राना, जिस दिन बाली को मारे थे भगवान रामचंद जी, उस दिन कहे थे बाली क्‍या तुम्‍हें अजर कर दूं? क्‍या तुम्‍हें अमर कर दूं? आज वही शब्द भगवान दुहराते हैं, मांगो कर्ण ! आज कहीं तुम कहोगे मुझे अजर-अमर कर दो, तो मै तुम्‍हें अजर-अमर कर सकता हूँ, कर्ण कहता हैं नहीं द्वारिकानाथ। आज मेरे भाग्य को देखो, हजारों हजार मुनि लोग तपस्या करते हैं..

 

 

अरे जनम जनम मुनि यतन कराई

अजि अंत राम मुख आवत नाही

मरे के बेर हज्जरों बरिस तपस्या करे के  बार भी रागी भाई, तेकर मु मे राम के नाम नि आवे, आज वो नरायेन मोला दरसन दे हस मोर जइसे  भाग्यशाली कोनो नइये। द्वारिका नाथ देना चाहत हस तब बस एक ही चीज दे मोला, भगवान कथे का ? करन कथे तै जानत हस मैं कुंवारी दाई के गरभ ले जनम ले हंव, मै कुंवारी महतारी के कोंख ले जनम ले हंव प्रभु। तैं ह मोर चिता अइसे जगा म जलाबे जहां कुंवारी होही, करन प्रान त्याग देथे रागी, वो समय के दृश्य बहुत, भगवान व्याकुल हो जथे, तीनों लोक चउदा भुवन म जगह खोजे है जगह नइ मिले, आखिर म कारन करन के चिता ल भगवान ह।

 

जन्‍म-जन्‍म मुनि यतन कराते हैं, किन्‍तु अंत में मुख में राम शब्‍द नहीं आता। मरने के समय हजारों वर्ष  तपस्या करने  के  बाद भी रागी भाई, अंत में राम का नाम नहीं आता, आज वही नारायण मुझे दर्शन दे रहे हैं, मेरे जैसा  भाग्यशाली कोई नहीं है। द्वारिकानाथ यदि देना चाहते हो तब बस एक ही चीज मुझे दो , भगवान कहते हैं क्‍या? कर्ण कहता है तुम जानते हो मैं कुंवारी माता के गर्भ से जन्‍म लिया हूँ, मै कुंवारी माता की पेट से जन्‍म लिया हूँ प्रभु। आप मेरी चिता ऐसी जगह मे जलाना जो कुंवारी हो, कर्ण प्राण त्याग देता है रागी, उस समय का दृश्य बहुत करूणामय हो जाता है, भगवान व्याकुल हो जाते हैं, तीन लोक चौदह भुवन मे हर जगह खोजते है, कहीं जगह नहीं मिलता, अंत मे कर्ण की चिता को भगवान ..

 

 

अपन हाथे म जलावन लागे भाई

अपन हाथे म जलावन लागे भाई

भगवाने काहान लागे ग मोर भाई

सत्रा दिवस महाभारत संपन्‍न होथे रागी भइया । करन जुझ जाते है कुरूक्षेत्र में, यहीं के कर्ण पर्व के जो प्रसंग जो है संपन्‍न हो जाते है।

अब हम गदा पर्व के प्रसंग म जाथन। महामुनि वैसमपायन, महाराजा जन्मेजय श्रोता के आगे बतावथे, जन्मेजय सत्रा दिन के लड़ाई ह संपन्‍न होगे, केवल एक दिन के लड़ाई बांचे हे। अट्ठारा दिवस, कौरव दल मन प्रणय करत हें, थोड़ा बहुत सेना बांचे हे बोले दुर्योधन कहत हे भइया

अरे काको सर सेनापति दीजे ताके बल भारत जस कीजे

 

अपने हाथ मे ही जलाने लगे भाई, अपने हाथ मे ही जलाने लगे भाई।

भगवान कहने लगे मेरे भाई..

सत्रह दिन का महाभारत संपन्‍न होता हैं रागी भैया। कर्ण कुरूक्षेत्र में वीरगति को प्राप्‍त होता है। यहीं से कर्ण पर्व का प्रसंग संपन्‍न हो जाता है।

अब हम गदा पर्व के प्रसंग मे जा रहे हैं। महामुनि वैसमपायन, महाराज जन्मेजय श्रोता के आगे बता रहे हैं, जन्मेजय सत्रह दिन की लड़ाई संपन्‍न हो गई, सिर्फ एक दिन की लड़ाई शेष है। अट्ठारह दिवस, कौरव दल प्रण करते हैं, बहुत कम सेना बची है, दुर्योधन कहता है भैया..

अरे किसके सिर में सेनापति का मुकुट बांधां जाये, जिसके बल पर महा भारत जीता जा सके।

 

 

जाके बल भारत जस लीजे, कौरव दल में है कोई बीर जिसके बल से ये महाभारत बिजय पायेंगे? कौरव दल बोले महाराज, राजा शल्य को सेनापति बनाओं एक दिन के सेनापति राजा शल्य बन गे। अट्ठारा दिन के लड़ाई म दूनो दल सेना ल लेके पहुंचत हें, रागी हाथी वाल हाथी, घोड़ा वाले घोड़ा से, रथ वाले रथ से, पैदल वाले पैदल से, अंतिम दिवस के लड़ाई ये, राजा शल्य अउ युधिष्ठिर म घमासान युद्ध होथे, बड़े बड़े बीर, बड़े बड़े बड़े रथी  बड़े बड़े महारथी लडथे, रागी भाई महाभारत के सुरू जोन सियार मन चर्चा करे रहंय रतिहा के बेर, कोलिहा मन, ओ मन आए रहंय लड़ाई के मैदान म अउ लड़ाई के मैदान मे खेल खेल मांस ल

खेल खेल मांसे ल अरे भाइ खेल खेल मांसे ल खावय अब लागय

बड़े बड़े बीर कटन अब लागय जी, बड़े बड़े बीर कटन अब लागय जी

जिसके बल पर महाभारत जीता जा सके, कौरव दल में है कोई वीर जिसके बल से यह महाभारत विजय पायेंगे? कौरव दल के वीर बोलते हैं  महाराज, राजा शल्य को सेनापति बनाओ, एक दिन के सेनापति राजा शल्य बन गया। अट्ठारह दिन की लड़ाई मे दोनो दल सेना को लेकर पहुंचते हैं, रागी हाथी वाले हाथी, घोड़ा वाले घोड़ा से, रथ वाले रथ से, पैदल वाले पैदल से, अंतिम दिवस की लड़ाई है, राजा शल्य और युधिष्ठिर मे घमासान युद्ध होता है, बड़े-बड़े वीर, बड़े-बड़े रथी  बड़े-बड़े महारथी लड़ते हैं, रागी भाई महाभारत के आरंभ मे रात मे जिन सियारों का झुंड आवाज कर रहे थे, लड़ाई के मैदान मे उन्‍हीं सियारों का झुंड आया है और वे खेल-खेल मांस खा रहे हैं।

खेल-खेल मांस को भाई, खेल-खेल मांस को खाने लगते हैं, अब बड़े-बड़े वीर कटने लगते हैं जी, बड़े-बड़े वीर कटने लगते हैं जी।

 

 

कोलिहा मन खेल खेल के मांस खांय, पांडव ल आर्सिवाद दंय बोले पांडव, पेट भर भेजन खिलाए हंव। हमर आर्सिवार हे ये महाभारत ल तै जीतबे। रागी भइया शल्य पर्व के प्रसंग ये होत प्रातः काल से दिन डूबते तक घमासान युद्ध होते है। और जितने भी बीर बचे थे, अट्ठारा दिवस की लड़ाई में राजा शल्‍य समेत सारी सेना जुझ गे। निकाल करके बिजय शंख संध्या के बेरा, अट्ठारा दिवस के महाभारत जीत के वापस लौटते हैं।

 

सियारों का झुंड खेल-खेल कर मांस खा रहे हैं, पाण्‍डव को आर्शिवाद देते हैं, बोलते हैं पाण्‍डव, पेट भर भोजन खिलाये हो। हमारा आर्शिवाद है इस महाभारत को तुम जीतोगे। रागी भैया शल्य पर्व का प्रसंग है, प्रातः काल होने से दिन डूबने तक घमासान युद्ध होता है और जितने भी वीर बचे थे, अट्ठारहवे दिन की लड़ाई में राजा शल्‍य समेत संपूर्ण सेना वीरगति को प्राप्‍त हो जाती है। पाण्‍डव शंख निकाल कर विजय शंख बजाते हैं। संध्या का समय है, अट्ठारह दिवस के महाभारत को वे जीत कर वापस लौटते हैं।

 

 

शाम के समय जब पांडव महाभारत बिजय पाके वापस आवथें रागी। रानी कुन्ती थारी म आरती सजा के निकलथे, पांचो भइया, भगवान खड़ें हे। रानी थारी म आरती लेके सिबिर ले बाहिर निकलथे, अउ आज कुंती पूछथे,  जउन ह आंखी म देखके चिन्ह के, पहिचान के, राजा दुर्योधन ल मार के आए होही, ओकर आरती आज मै पहिली करिंहंव रागी। पांचो बेटा म कोन हें? जउन आज दुर्योधन ल पहिचान के मारे हे। अर्जुन तै मारे हस?  अर्जुन बोले नइ मां मैं नइ मारे हंव । मै नइ मारे अंव, कुंती पूछय धरमराज तै मारे हस? राजा धरम राज कथे नहीं मां मै तो राजा शल्य संग लड़त रहेंव। नकुल-सहदेव कथे हमू मन नइ मारे अन। कुंती बोले निष्फल हैं, जो तुम अटठारा दिन महाभारत लड़ेव । पांडव । सारी सेना जूझ गे, अट्ठारा अक्षोहिणी सेना, महाभारत के लड़ाई म बेकार होगे। अरे जे मुखिया ये, जेला मारना हे ओला तुम चीन्हा के पहचान के नइ मारेव। जेन आंखी म देख के राजा ल मार के आही ओकर आरती पहिली होही। महारानी कुंती थारी ल धरके लहुट जथे रागी। पांडव द्रौपदी के सिबिर म भोजन पान करथे अउ वहां से चलते है, कइसे करबोन भगवान ? तब भगवान कहय अव पता करे ल लागही जी वाकई दुर्योधन मरे हे धुन नइ मरे हे, पांडव फिर चलथे, ये तिर बताए हें सबल सिंह जी कुरूक्षेत्र के मैदान म कोई नइ बांचे ये रागी, लोथ लोथ धरनी पड़ जाई, माटी मांस पहिचान न आई, मांस माटी के पहचान नइ हे, शल्य महराज जुझ गए हे। यही समय से शल्य पर्व के प्रसंग समाप्त अब गदा पर्व की ओर प्रस्थान करते हे, बोलिए वृंदावन बिहारी लाल की जय।

 

संध्‍या समय मे जब पाण्‍डव महाभारत विजय पाकर वापस आ रहे हैं रागी। रानी कुन्ती थाली मे आरती सजा कर निकती है, पांचो भैया, भगवान खड़े हैं। रानी थाली मे आरती लेकर शिविर से बाहर निकलती है और आज कुंती पूछती है,  जो आंख मे देख कर पहचान कर, राजा दुर्योधन को मार कर आया होगा, उसकी आरती आज मै पहले करूंगी रागी। पांचो बेटों मे कौन है?  जो आज दुर्योधन को पहचान कर मारा है। अर्जुन तुम मारे हो?  अर्जुन बोलता है नहीं मां मैं नहीं मारा हूँ। मै नहीं मारा हूँ, कुंती धर्मराज से पूछती है धर्मराज तुम मारे हो? राजा धर्मराज कहता है नहीं मां, मै तो राजा शल्य के साथ लड़ रहा था। नकुल-सहदेव कहते हैं हम भी नहीं मारे हैं। कुंती बोलती है निष्फल हैं, जो तुम अट्ठारह दिन महाभारत लड़े, पाण्‍डव ! संपूर्ण सेना समाप्‍त हो गई, अट्ठारह अक्षोहिणी सेना, महाभारत की लड़ाई मे समाप्‍त हो गई। अरे जो मुखिया है, जिसे मारना है उसे तुम पहचान कर नहीं मार पाये ! जो आंख मे देख कर राजा (दुर्योधन) को मार कर आयेगा उसी की आरती पहले होगी।

महारानी कुंती थाल को पकड़कर लौट जाती है रागी। पाण्‍डव द्रौपदी के शिविर मे भोजन पान करते हैं और वहां से चलते हैं, सोंचते हैं कैसे करेंगे भगवान ? तब भगवान कहते हैं अब पता करना पड़ेगा जी कि वाकई में दुर्योधन मरा है या नहीं मरा है, पाण्‍डव उसके बाद निकलते हैं। यहां सबल सिंह जी बताये हैं कि कुरूक्षेत्र के मैदान मे कोई नहीं बचा है रागी। शरीर के मांस के लोथड़े भूमि पर पड़े हैं, मिट्टी और मांस पहचान में नहीं आ रही है, मांस-मिट्टी ऐसे घुल-मिल गए हैं कि दोनों की पहचान नहीं हो पा रही है, शल्य महाराज वीरगति को प्राप्‍त हो गए हैं। इसी समय से शल्य पर्व का प्रसंग समाप्त होता है, अब गदा पर्व की ओर प्रस्थान करते हैं, बोलिए वृंदावन बिहारी लाल की जय।

 

 

 

गायिका – प्रभा यादव

छत्तीसगढ़ी श्रुतलेखन एवं हिन्दी लिप्यांतरण: संजीव तिवारी

 

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and archaeology, Government of Chhattisgarh to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.

Video Category