Pandvani: Dron Parv- Prabha Yadav & Mandali
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Pandvani: Dron Parv- Prabha Yadav & Mandali

in Video
Published on: 11 May 2019
Raipur, Chhattisgarh, 2018

 

Pandvani is one of the most celebrated performative genres from Chhattisgarh. Known mostly as a regional/ folk version of the Mahabharata, its terms of relationship with the Sanskrit epic are little known.This series of modules presents the recitation of the Pandavani by Prabha Yadav, The recitation presents all the eighteen parv of the epic based on the version compiled by Sabal Singh Chauhan, an author whose text was in circulation in this region. Prabha Yadav is a noted performer of the Pandavani, and represents what has come to be seen as Jhaduram Devangan’s style of rendition.

 

The parv presented in this video is the Dron Parv. The prasangs contained in this parv are Chakravyuh: Abhimanyu Vadh, Kamalvyuh: Jayadrath Vadh, Dhrupad Vadh and Dronacharya Vadh.

 

 

Transcript

Chhattisgarhi: बोलिये वृंदावन बिहारी लाल की जय!

अरे रामे रामे भइया रामे गा रामे गा,

रामे रामे भइया रामे गा रामे गा।

राजा जनमेजय पूछन लागे भईया

वैसममपायेन गा काहन लागे भाई।

वैसममपायेन गा काहन लागे भाई।

 

Hindi: वृंदाबन बिहारी लाल की जय बोलिये। राम, राम, राम ही राम है भाई। राजा जन्‍मेजय पूछने लगे भाई, वैसम्‍पायन कहने लगे भाई।   

 

 

अरे राजा जन्मेजय के प्रति महामुनि वैसमपायन मुनि महाराज कहते है, राजा जन्मेजय, ये तुम्हारे वंशजो की कहानी है जिसे तुम ध्यान लगाकर के सुनो। रागी भइया वैषमपायन जी कथे जब जयद्रथ ल बचाए के गुरू द्रोण प्रतिज्ञा करथे, कमल व्यूह के निर्माण होए हे। महाबीर अर्जुन उहां से चले के तईयारी करत हे, भगवान द्वारिका नाथ ल कहथ हे, केशव !

 

राजा जन्मेजय के प्रति महामुनि वैसम्‍पायन मुनि महाराज कहते हैं, राजा जन्मेजय, यह तुम्हारे वंशजो की कहानी है जिसे तुम ध्यान लगाकर सुनो। रागी भईया, वैषम्‍पायन जी कहते हैं, जब जयद्रथ को बचानें की गुरू द्रोण प्रतिज्ञा करते हैं, कमल व्यूह का निर्माण होता है। महावीर अर्जुन वहां से चलने की तैयारी करते हैं, भगवान द्वारिका नाथ को कहते हैं, केशव !   

          

 

नहुलिया म नंदी डूबे गा, नहुलिया म नंदी डूबे गा

ये गा नहुलिया म, नंदी डूबे गा, नहुलिया म नंदी डूबे ना

ये गा बेरा संग करत हे बिचार, नहुलिया म नंदी डूबे गा

जब-जब होई धरम के हानि, नहुलिया म नंदी डूबे गा

बाढ़य असुर अघम अभिमानी, नहुलिया म नंदी डूबे गा

दोउ कर जोरी कृष्ण कर आगे, नहुलिया म नंदी डूबे गा

येकरे साथ करत हे बिचार, नहुलिया म नंदी डूबे गा

 

ए जी, नहुलिया (शिव लिंग में भक्‍तों के द्वारा पानी चढ़ाने के कारण) में, नंदी डूब गए जी, नहुलिया (शिव लिंग में भक्‍तों के द्वारा पानी चढ़ाने के कारण) में नंदी डूब गए ना। ए जी समय के साथ विचार कर रहे हैं, नहुलिया (शिव लिंग में भक्‍तों के द्वारा पानी चढ़ाने के कारण) में नंदी डूब गए जी। जब-जब धर्म की हानि होती है, नहुलिया (शिव लिंग में भक्‍तों के द्वारा पानी चढ़ाने के कारण) में नंदी डूब जाते हैं। (जब) असुर अघम अभिमानी बढ़ते हैं, (तब) नहुलिया (शिव लिंग में भक्‍तों के द्वारा पानी चढ़ाने के कारण) में नंदी डूब जाते हैं जी। कृष्‍ण के सामने दोनों हाथ जोड़ कर, नहुलिया (शिव लिंग में भक्‍तों के द्वारा पानी चढ़ाने के कारण) में नंदी डूब गए जी। इसी के साथ विचार करते हैं, नहुलिया (शिव लिंग में भक्‍तों के द्वारा पानी चढ़ाने के कारण) में नंदी डूब गए जी।

 

 

भगवान द्वारिका नाथ रथ चलावत हे, रागी भईया कमल व्यूह के दरवाजा म पहुंच जाते हैं। हां भाई! द्रोण के भारी प्रतिज्ञा हे एक ठन भगवान अउ एक ठन अर्जुन हे, अच्छा!

द्रोण कहत हे, कोटिन हरि अर्जुन यहां आवा, तब मोसे द्वार जीत नहिं पावा। ओ!

मैं मेन गेट म रखवार खड़े हंव रक्छा करे बर, मै ये दुवारी ले नई नहाकन दंव। नई नहाकन दंव अर्जुन दरवाजा म खडे़ हे अउ द्रोणाचार्य से रास्ता मांगत हे गुरूदेव मोला कमल व्यूह म जान दे दे। आज मै जयद्रथ ल मारे के प्रतिज्ञा करे हंव, जयद्रथ नइ मरही त स्‍वेम चिता म जल के मैं अपन प्राण ल त्याग देहंव! हव! द्रोणाचार्य कहय अरे अर्जुन!  तै जयद्रथ ल मारे के प्रतिज्ञा करे हस त मै बचाए के प्रतिज्ञा करे हंव। दिन बुड़त ले मै जयद्रथ ल नइ बंचाहूं त मै अपन आप ल द्रोण कहिना छोड़ देहूं। या या!

अर्जुन रस्ता मांगत हे, द्रोणाचार्य रस्ता नई देत ये । भगवान रास खींच रहे हैं। मंद मंद मुसका रहे हैं।

समय बीतत गए, कुछ देर बाद भगवान के नजर परगे, कहत हे या..!

अरे एक जुवर ह बांचेच हावय भाई

भगवान कहात हे, हां भाई, भगवान कहात हे, एक जुवर बीत गे भइया, अभी एके पहर अभी बांचे हावय भाई।

 

भगवान द्वारिका नाथ रथ चला रहे हैं, रागी भईया। कमल व्यूह के दरवाजा मे पहुंच जाते हैं। हां भाई! द्रोण की बड़ी प्रतिज्ञा हैं, एक भगवान और एक अर्जुन हैं, अच्छा!

द्रोण कहते हैं, कोटिन हरि अर्जुन यहां आवा, तब मोसे द्वार जीत नहिं पावा। ओह!

मैं मुख्‍य द्वार में रक्षक खड़ा हूं रक्षा करने के लिए, मै ये द्वार से गुजरने नहीं दूंगा। पार करने नहीं दूंगा। अर्जुन दरवाजे में खड़ा है और द्रोणाचार्य से रास्ता मांग रहा है। गुरूदेव मुझे कमल व्यूह में जाने दीजिए। आज मै जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा किया हूँ, जयद्रथ नहीं मरेगा तो मैं स्‍वयं चिता में जल के अपना प्राण त्याग दूंगा! हॉं! द्रोणाचार्य कहते हैं, अरे अर्जुन! तुम जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा किए हो तो मै बचाने की प्रतिज्ञा किया हूं। दिन डूबते तक मै जयद्रथ को न बच लूं तो मै अपने आप को द्रोण कहना छोड़ दूंगा।

अर्जुन रास्ता मांग रहे हैं, द्रोणाचार्य रास्ता नहीं दे रहे हैं। भगवान (रथ की) रास खींच रहे हैं। मंद मंद मुस्‍कुरा रहे हैं।

समय बीत रहा है, कुछ देर बाद भगवान की नजर पड़ती है, कहते हैं ओह..!

अरे एक पहर ही बचा है भाई

भगवान कहते हैं, हां भाई, भगवान कहते हैं, एक पहर बीत गया है भईया, अभी एक पहर ही बचा है भाई।

 

 

भगवाने कहान लागे गा मोर भाई

भगवाने कहान लागे गा मोर भाई

भगवाने कहान लागे गा मोर भाई

 

भगवान कहने लगे जी मेरे भाई, भगवान कहने लगे जी

 

 

भगवान कथे एक जुवार बीत गे एक जुवार बांचे हे। अर्जुन एक जुवार बीत गे, एक जुवारे बांचे हे, बारा बज गए, तंय तो अभी दुवारीच म खडे़ हस। हां जी! कतका बेर भितरी म जाबे कतका बेर जयद्रथ ल खोजबे अउ कतका बेर जयद्रथ संग लड़बे?  अभी तो तै दुवारीच म खड़े हस! हव भई। द्रोणाचार्य घुसरन नइ  देवय रागी। भगवान कहते हैं, चलो दुसरा दरवाजा, द्राणाचार्य तोला रस्‍ता नइ दय अर्जुन।  भगवान नंदी घोष रथ वापस करते है, रथ वापिस होगे, रागी भाई। वो रथ के चाक के भुइंया म चाक के चिनहा बन जात हे। कमल व्यूह के पिछवाड़ा म लाइस भगवान नंदी घोष ल, निकालिस चाबुक अउ

 

भगवान कहते हैं एक पहर बीत गया और एक पहर ही बचा है। अर्जुन एक पहर बीत गया है, एक पहर ही बचा है, बारह बज गए हैं, तुम तो अभी द्वार में ही खड़े हो। हां जी! कितने समय अंदर जावोगे, कितने समय में जयद्रथ को खोजोगे और कितने समय जयद्रथ के साथ लड़ोगे?  अभी तो तुम द्वार में ही खड़े हो! हां भाई। द्रोणाचार्य अंदर जाने नहीं दे रहा हैं रागी। भगवान कहते हैं, चलो दूसरे दरवाजे से, द्रोणाचार्य तुमको रास्‍ता नहीं देंगें अर्जुन।  भगवान नंदी घोष रथ (अर्जुन का रथ) को वापस करते हैं, रथ वापस हो गया, रागी भाई। रथ के पहिये का निशान जमीन में बन जाता है। भगवान नंदी घोष को कमल व्यूह के पिछवाड़े में लाते हैं, निकालते हैं चाबुक और

 

 

मारिस घोड़ा ल, नंदी घोष अधर उड़ के

नंदी घोष कमल व्यूह म पहुंचन लागय भईया

कमल व्यूह म पहुंचन लागय भाई

मारो मारो! ग काहन लागय भइया

मारो मारो! ग काहन लागय भाई

 

मारे घोड़े को, नंदी घोष अधर उड़ कर कमल व्यूह में पहुंचने लगा भईया। (वहां/युद्ध क्षेत्र में) मारो मारो! (लड़ने वाले) कह रहे हैं भईया। मारो मारो! कह रहे हैं भाई।

 

 

अधर उड़ा गए रथ, पहुचं गए कमल व्यूह म, अच्छा। रागी भइया, कमल व्यूह म जब अर्जुन पहुंचथे, मारो मारो, मारो! बड़े-बड़े बीर ल मारत हे अर्जुन, जयद्रथ ल खोजते हे। अच्छा। जयद्रथ नइ मिलत हे। नइ मिलत थे। सूर्य अस्त होए ल जात हे, राजा ल चिंता होथे, काली चक्रव्यूह तइयार होइस, हव भई, अभिमन्यू जूझ गे। अच्छा आज अर्जुन ह कमल व्यूह तोड़े बर गेहे अर्जुन के खबर नई आवत ये बान के अवाज अउ बात ल सुन के राजा युधिष्ठिर ह सातकी नाम के योद्धा को बुलाते हैं। सातकी रथ सजाओ, कुरूक्षेत्र मे जाओं और जाकरके हरि अर्जुन के खबर ले के आवो। सातकी बीर रथ म सवार होके जाथे, रददा म द्रोणाचार्य रखवार बइठे हे, हां भई। सातकी कहात हे, गुरूदेव, मै भगवान अउ अर्जुन के खभर ले ल आए हवं, संदेस ले ल आए हंव। मै ये भीतरी म जाहूं तै मोला रस्ता देदे। द्रोण ठठा के हस दिस, ताली पीट के हांस के कहाय, कस रे सारथी, मै  भगवान अउ अर्जुन असन ल रस्ता नइ देंव त का तोर असन टेटकू-बैसाखू जावन सकबे रे। हां भई।

 

हवा में रथ उड़ गया, कमल व्‍यूह में पहुंच गए। रागी भईया, कमल व्यूह में जब अर्जुन पहुंचते हैं, मारो मारो, मारो! की आवाज आ रही है। अर्जुन बड़े-बड़े वीर को मारने लगते हैं, जयद्रथ को खोज रहे हैं। अच्छा। जयद्रथ मिल नहीं रहा है, मिल ही नहीं रहा है। सूर्य अस्त होने वाला है, राजा (युधिष्ठिर) को चिंता हो रही है, कल चक्रव्यूह तैयार हुआ था, हॉं भाई, अभिमन्यू वीरगति को प्राप्‍त हुआ। आज अर्जुन कमल व्यूह तोड़ने गया हैं, अर्जुन का संदेश मिल नहीं रहा है। बाणों की आवाज और कोलाहल को सुन कर राजा युधिष्ठिर, सातकी नाम के योद्धा को बुलाते हैं। (कहते हैं) सातकी रथ सजाओ, कुरूक्षेत्र मे जाओं और जाकर हरि-अर्जुन की खबर ले कर आवो। सातकी वीर रथ में सवार होकर जाते हैं, रास्‍ते में द्रोणाचार्य रक्षक बैठे हैं, हां भाई। सातकी कहते हैं, गुरूदेव, मै भगवान और अर्जुन की जानकारी लेने के लिए आया हूँ, संदेश लेनें आया हूँ। मैं अंदर जाउंगा, मुझे रास्ता दे दीजिए। द्रोण ठठा कर हस दिए, ताली पीट के हंसते हुए कहते हैं, कैसे रे सारथी, मै  भगवान और अर्जुन जैसे को रास्ता नहीं दिया तो क्‍या तुम्‍हारे जैसे टेटकू-बैसाखू (अति सामान्‍य व्‍यक्ति) जा सकोगे रे।

 

 

सातकी बोले गुरूदेव मोला रस्ता दे। नहीं, अउ सातकी नाम के बीर लड़े बर तइयार, तइयार हो जथे। लड़त लड़त सातकी पृथ्वी ल देखथे, वाकई नंदी घोष वापिस हो गए है, भगवान रथ ल लहुटाए रहय त चाक ह पृथ्‍वी म गड़े गए रहय। गडे़ रहय चिनहा ल देखिस, सातकी जान डरिस सिरतोन म हरि अउ अर्जुन ल ये नई जान देहे ये। जब हरि अर्जुन ल नइ जान देये त मोला कहां जान देही। या-या सातकी बीर भी रथ ल वापिस कर लेथे। अउ जहां से हरि अर्जुन कमल व्यूह म प्रवेश करे हे उन्हे फेर। मार चाबुक मारे घोड़ा, सातकी फेर कमल व्यूह में प्रवेश करे हे। अर्जुन देखिस, सातकी ला, हां भाई। अर्जुन महराज पूछत हें सातकी ल, तें काबर आए हस। सातकी कथे, तुंहर खभर लेहे ल मोला बड़े भइया भेजेहे। भगवान बोले बहुत बढ़िया करे सातकी, जो तहुं आगेस। काबर, इहां कुछ सहयोगी के जरूरत हे।

 

सातकी बोलता है, गुरूदेव मुझे रास्ता दे दो। (द्रोण कहते हैं) नहीं, और सातकी नाम का वीर लड़ने के लिए तैयार हो जाता है। लड़ते-लड़ते सातकी पृथ्वी की ओर देखता है, (सोंचता है) सहीं में नंदी घोष वापिस हो गया है, भगवान रथ को वापिस किए रहते हैं तो चाक का पृथ्‍वी मे निशान दिखता है। चिन्‍ह को सातकी देखता है तो जान जाता है कि हरि और अर्जुन को द्रोण ने जाने नहीं दिया है। जब हरि अर्जुन को जाने नहीं दिये हैं तब मुझे कहां जान देंगें। सातकी वीर भी रथ को वापस कर लेते हैं। और जहां से हरि अर्जुन कमल व्यूह में प्रवेश किये थे वहीं से पुन: (प्रवेश करते हैं)। घोड़े को चाबुक मारता है, सातकी और कमल व्यूह में प्रवेश करता है। अर्जुन सातकी को देखता है। अर्जुन महाराज सातकी को पूछता है, तुम क्‍यों आये हो। सातकी कहता है, आप लोगों का संदेश लेने मुझे बड़े भईया ने भेजा है। भगवान बोलते हैं अच्‍छा किये सातकी, जो तुम भी यहां आ गए। क्‍योंकि, यहां कुछ सहयोगियों की जरूरत थी।

 

 

सातकी लहुट के नई गीस, राजा ल अउ जादा दुख होगे। आखिर म पवन नंदन भीम ल आर्डर देथे, जावो भीम अर्जुन के पता लगा के आवो। सुने, हव। हाथ म मणि जडे़ गदा लिये, रागी भाई, और जब रथ म सवार होते हैं भीम, अजी लोहा के छत्र हरि बनवाए, अजी तापर चढ़ भीम सोभा पाए, सबल सिंह जी बताये हें, भीम ह दुसर रथ म बइठय नी गा रागी त ओला सोभा नी दय। नी दंय। हाथ म गदा लेके भीमसेन पहुंचते है। गरगर-गरगर रथ चलत हे, द्रोणाचार्य देखिस, भीम आवत हे। द्रोण कहिस थोकुन सचेत होए ल लागही, काबर के ये ह थोकन मुड़पेलवा प्रानी ये। ये बाय, अउ दोनो हाथ जोर के कथे गुरूदेव मैं ये कमल व्यूह म जाहूं, अर्जुन हरि के पता लगाए ल जात हंव, बडे़ भइया भेजे हे, अउ तै मोला रस्ता देदे।  द्रोणाचार्य कहिस रे भीम, तोला कोन पूछय, मैं तो प्रतिज्ञा करे हंव, के कोटिन हरि अर्जुन यहां आवा, तब मोसे द्वार जीत नही पावा। भगवान अउ अर्जुन असन ल रस्ता नई देंव त तोला कोने पूछत हे। हरि-अर्जुन दूसरा दरवाजा से गए हैं, बोले तू भी जा। हां भाई। भीमसेन, हाथ में गदा लेकर के कहे गूरूदेव, दूसरा के धोखा छोड़ दे। भीम कहते है हरि-अर्जुन भले ही दूसरा दरवाजा से गए हे। और मै जब जाहूं त –

 

सातकी वापस लौट कर नहीं आया, राजा युधिष्ठिर की चिंता बढ़ गई। वे पवन-नंदन भीम को आदेश देते हैं, जावो भीम, अर्जुन का पता लगा कर आवो। हाथ में मणि जडि़त गदा लेकर, रागी भाई, जब भीम रथ मे सवार होते हैं, भगवान के द्वारा बनवाए लोहे के छत्र वाले रथ में चढ़ कर भीम शोभा पाते हैं। सबल सिंह (कवि सबल सिंह चौहान, जिनके द्वारा लोक मिश्रित सरल हिन्‍दी में दोहा-चौपाई के माध्‍यम से लिखे गए महाभारत को पंडवानी गायक अपना आधार ग्रंथ मानते हैं)  जी बताये हैं, भीम दूसरे रथ में बैठते हैं रागी तो उन्‍हें शोभा नहीं देता था। हाथ मे गदा लेकर भीमसेन पहुंचते हैं। गरगर-गरगर (काफी तेज/पवन वेग से) रथ चल रहा है, द्रोणाचार्य नें देखा, भीम आ रहा है। द्रोण कहते हैं (सोंचते हैं) थोड़ा सचेत होना पड़ेगा, क्‍योंकि यह थोड़ा मुड़पेलवा प्राणी (बैल बुद्धि) है। ये बाय (यह संकट है), और दोनो हाथ जोड़ कर कहते हैं गुरूदेव मैं इस कमल व्यूह के अंदर जाउंगा, अर्जुन-हरि की जानकारी लेने के लिए जा रहा हूं, बडे़ भइया युधिष्ठिर नें मुझे भेजा है और आप मुझे रास्ता दे दीजिए।  द्रोणाचार्य कहते हैं, अरे भीम, तुमको कौन पूछता है, मैं तो प्रतिज्ञा किया हूँ, कि कोटिन हरि अर्जुन यहां आवा, तब मोसे द्वार जीत नही पावा। भगवान और अर्जुन जैसे को रास्ता नहीं दिया तो तुमको कौन पूछता है। हरि-अर्जुन दूसरे दरवाजे से गए हैं, कहते हैं कि तू भी वहीं से जा। भीमसेन, हाथ में गदा लेकर कहते हैं गुरूदेव, दूसरों का धोखा छोड़ दो। भीम कह रहा है हरि-अर्जुन भले ही दूसरे दरवाजे से गए हैं और मै जब जाउंगा तो –

 

 

इही दरवाजा अंदर जावंव भईया

इही दरवाजा मैं अंदर जावंव भाई

दुसरा के धोखा तै छोडि़य देबे भईया

इही दरवाजा मैं अंदर जावंव भाई

 

इसी दरवाजे से अंदर जाउंगा भईया, इसी दरवाजे से मैं अंदर जाउंगा। दूसरों का धोखा तुम छोड़ देना भाई, मैं तो इही दरवाजे से अंदर जाउंगा।

 

 

हरि अर्जुन के बात छोड़, भीम रथ उपर रहय तउन भुईयां म उतरगे।  द्रोणाचार्य रथ के उपर बिराजमान है। भीम भुंइया म खड़े हे, हाथ म गदा धरे हे, द्रोणाचार्य से कहत हे मोला रस्ता दे दे। दोनों के आंखी आमने सामने मिले हे, हाथ म गदा धरे हे तेन ल रथ के तरी म डारत हे। हाथ के गदा ल रथ के भितरी म खुसेरिस, अउ रथ, चारो ठन घोड़ा, सारथी अउ द्रोणाचार्य समेत -

 

हरि अर्जुन की बात छोड़ दो, भीम रथ के उपर थे, वे धरती में उतर गए। द्रोणाचार्य रथ के उपर ही विराजमान हैं। भीम धरती में खड़े हैं, हाथ मे गदा पकड़े हैं, द्रोणाचार्य से कहते हैं मुझे रास्ता दे दो। दोनों की आंखें आमने सामने मिलती हैं, भीम हाथ मे गदा पकड़े हैं उसे द्रोण के रथ के नीचे में डाल रहे हैं। गदा को रथ के नीचे में घुसाते हैं और रथ, चारो घोड़ा, सारथी और द्रोणाचार्य सहित -

 

 

उठाके फेंकन लागे भाई, फेंकन लागे भाई

भइया गुरू द्रोणे ह गिरन लागे भाई

मने मन म पूजन लागे गा मोर भाई

 

उठा के फेंकने लगे भाई, फेंक दिए। गुरू द्रोण गिरने लगे, गिर गए तब भीम मन ही मन में प्रणाम करने लगे।

 

 

रथ सारथी समेत उठाके फेंकिस, गुरू द्रोण समेंत रथ गिरिस, रथ अउ सारथी रांडी अस कुरिया बइठ गए भइया। चरचर ले टूटगे। गुरू द्रोणाचार्य दूसरा रथ में बैठ करके पहुंचते हैं। द्रोण के आवत ले, भीम ह भितरागे। पहुंच गए कमल व्‍यूह।

अर्जुन हाथ जोड़ के भीमसेन ल कहात हे, तै काबर आगेस भइया, हां भाई। भीम कथे मोला तोर संदेस लेके आए बर भइया भेजे हे। भगवान हांस के कथे, बने बनिस रे भाई। बने करकस भीम, अर्जुन पूछे कइसे ? भगवान कहत हे, अर्जुन ये कुरूक्षेत्र के मैदान में कौरव दल म भीतरी खुसरे म थोकन साकेत जात हे, भीम ह बने रस्‍ता बनाही।

 

रथ सारथी सहित उठा कर फेंक दिए, गुरू द्रोण सहित रथ गिर गया, रथ और सारथी रांडी (विधवा) के कुरिया (कुटिया) जैसा टूट गया। आवाज करते हुए पूर्ण नष्‍ट हो गया। गुरू द्रोणाचार्य दूसरे रथ में सवार होकर पहुंचते हैं। द्रोण के आते तक, भीम अंदर पहुंच जाता है। पहुंच गए कमल व्‍यूह में।

अर्जुन हाथ जोड़ कर भीमसेन से बोलते हैं, तुम क्‍यों आ गए भईया। भीम कहते हैं, मुझे तुम लोगों के का संदेया लेकर आने के लिए भईया भेजे हैं। भगवान हंस कर कहते हैं, अच्‍छा हुआ रे भाई। अच्‍छा किए भीम, अर्जुन पूछते हैं कैसे? भगवान कहते हैं, अर्जुन इस कुरूक्षेत्र के मैदान में कौरव दल के अंदर घुसने में थोड़ी परेशानी हो रही थी,  भीम बढि़या रास्‍ता बना देगा।

 

 

काल के भी महाकाल ये रागी भइया। बताए हे, भीम के भुजा म अड़बड़ अकन ताकत रहिस हे, साठ हजार हजार हाथी के बल रहिस हे, जय हो। रागी भाई, कोनो ल चटकन म मारय भीम ह, कोनो ल मुटका म मारय। ओ समय सातकी नाम के बीर अउ भूरिश्रवा म भयंकर युद्ध होत रहय। भूरिश्रवा कौरव दल के सातकी पाण्डव दल के। बताये हें भूरिश्रवा सातकी ल मारे बर नाग पास म हाथ पांव ल बांध देहे हे, हाथ म तलवार धरे हैं, सातकी बीर के सिर काटे बर तइयार हैं। अउ भूरिश्रवा कहात हे, अरे सातकी तै कते देवता ल मानथस रे। हंव भाई। सुम सुमर ले, तोर इस्‍ट के याद करले। हव। भूरिश्रवा हाथ म तलवार लेके तइयार हे, सर काटे बर। भगवान अर्जुन ले बोले, अर्जुन सातकी के रक्षा कर। भगवान कहते है अर्जुन, सातकी के रक्षा कर। तो अर्जून निकालिस त्रुण से मनव्‍यापक नामक बाण, अब मानव्यापक नाम के बान निकाल के-

 

काल के भी महाकाल हैं रागी भइया। बताया गया है कि, भीम के कंधे में बहुत बल था, साठ हजार हाथी का बल था। रागी भाई, भीम किसी को थप्‍पड़ में मार रहे हैं, किसी को मुक्‍के में मार रहे हैं। उसी समय सातकी नाम के वीर और भूरिश्रवा के बीच भयंकर युद्ध हो रहा है। भूरिश्रवा कौरव दल के सातकी पाण्डव दल के हैं। बताया गया है भूरिश्रवा सातकी को मारने के लिए नाग-पास से उसका हाथ-पांव को बांध दिया है, हाथ में तलवार पकड़ा है, सातकी वीर के सिर को काटने के लिए तैयार हैं। भूरिश्रवा कह रहा है, अरे सातकी तुम किस देवता को मानते हो। उनका स्‍मरण कर लो, तुम अपने इष्‍ट को याद कर लो। भूरिश्रवा हाथ मे तलवार लेकर सिर काटने के लिए तैयार हैं। भगवान अर्जुन से बोले, अर्जुन सातकी की रक्षा करो। भगवान कहते है अर्जुन, सातकी की रक्षा करो। तब अर्जुन तरकस से मनव्‍यापक नामक बाण को निकालते हैं और  मनव्यापक नामक बाण को निकाल कर-

 

 

अब बीरे अर्जुन ह मारन लागय भाई

बीरे अर्जुन ह मारन लागय भाई

छाती म बाने लागन लागे भाई

 

तब वीर अर्जुन भूरिश्रवा को मारने लगते हैं भाई। उसकी छाती में बाण लगती है।

 

 

मनव्यापक नाम के बान जाके भूरिश्रवा के छाती म लगथे अउ भूरिश्रवा के मृत्यु हो जाथे। सातकी नाम के बीर नांगफांस म बंधाए हे रागी भइया। मोर नाम के बान छोड़ के वो नाग फांस ल काट देथे। कुरूक्षेत्र के मैदान म मारो! मारो! के आवाज होवत हे रागी। बुड़ती दिसा म भगवान सूर्यनरायेन ह बुड़े ल जावत हे। अर्जुन खोजत हे, कमल व्यूह म जयद्रथ ल, जयद्रथ के पता नी चलत हे, अंतरयामी बांके बिहारी रथ चलात हे, अउ रथ चलात चलात का कहत हे-

 

मनव्यापक नामक बाण जाकर भूरिश्रवा की छाती में लगती है और भूरिश्रवा की मृत्यु हो जाती है। सातकी नाम का वीर नागफास मे बंधा हैं रागी भइया। तब अर्जुन, मयूर नामक बाण छोड़ कर उस नाग-फास को काट देते हैं। कुरूक्षेत्र के मैदान में मारो! मारो! की आवाज आ रही है रागी। पश्चिम दिशा में भगवान सूर्यनारायण डूबने जा रहे हैं। अर्जुन खोज रहे हैं, कमल व्यूह में जयद्रथ को, जयद्रथ का कोई पता नहीं चल रहा है, अंतरयामी बांके बिहारी रथ चला रहे हैं, और रथ चलाते हुए क्‍या कहते हैं-

 

 

अजी पाण्डव मेरो परम धन, अर्जुन प्रान समान। भगवान विचार करत हे, भगवान ल चिंता होवत हे, पारथ केहि बिधि राखहू प्रान, तब करत सोच भगवान।

भगवान ल दुख होवत हे, मै अर्जुन ल कइसे बचाहंव। आखिर म निकाल करके चक्र छोड़थे, चक्र ल इजाजत देवत हे, जावो जाकर के सूर्य देव को छिपालो अउ जब मै इजाजत देहूं तब तै छोड़बे। चक्र सुदर्शन जाके भगवान सुरूज ल छिपावत हे। लड़ाई के मैदान ह अंधियार होगे, अर्जुन जान डरिस अब बेरा बुडगे, मै जयद्रथ ल नई मार सकेंव। बेरा बुड़ गे, प्रन पूरा नइ होइस, अब चिता म जलके प्रान त्‍याग देहौं।

 

पाण्डव मेर परम धन हैं और अर्जुन मेरे प्राण के समान है। भगवान विचार कर रहे हैं, भगवान को चिंता हो रही है, कि पार्थ के प्राणों की रक्षा मैं कैसे रख पाउंगा, उस समय भगवान सोंच रहे हैं।

भगवान को दुख हो रहा है, मै अर्जुन को कैसे बचा पाउंगा। अंत में चक्र को निकाल कर छोड़ते हैं, चक्र को आदेश देते हैं, जावो जाकर सूर्य देव को छिपा लो और जब मै आदेश दूंगा तभी छोड़ना। चक्र सुदर्शन जाकर भगवान सूर्य को छिपा रहा है। लड़ाई के मैदान में अंधेरा हो गया, अर्जुन जान गया अब दिन डूब गया, मै जयद्रथ को मार नहीं पाया। दिन डूब गया, प्रण पूरा नहीं हुआ, अब चिता मे जल कर प्राण त्‍याग दूंगा।

 

 

अर्जुन चिल्लाकर के कहते है ए बीरो! कौरव पक्ष में जितने भी बीर हैं, मोर प्रन पूरा नई होइस, मै जयद्रथ ल नइ मार सकेंव चिता तैयार कर दव। मैं जयद्रथ ल नइ मार सकेंव, अब मैं प्रान त्‍याग देहौं। कौरव दल ह तिहार माने लागिस संगी। काबर ? अब अर्जुन भुंजा के मरही, मरही। राजा दुर्योधन इजाजत देते है, तुरंत चिता तइयार, कहत देरी हे रागी, करत नइ हे। तइयार, दोनों दल चिता ल घेर के खड़े हे। अर्जुन नंदी घोष ल पकड़ के कहत हे। अर्जुन नंदी घोष ले उतर गे, दोनो हाथ जोड़ के भगवान से कहिथे। प्रणाम करके महाबीर अर्जुन चिता म चढे ल जात हे।  हाथ म गांडीव ल रथ के उपर म मढा दीस, अर्जुन चिता म चढ़गे। भगवान हांस दीस, भगवान हांस के उही समय म कहे ये अर्जुन! अरे चिता चढ़न अर्जुन गईयो, अरे कहेउ कृष्‍ण सुमझाय। अर्जुन!

 

अर्जुन चिल्ला कर कहते हैं ए वीरो! कौरव पक्ष में जितने भी वीर हैं, मेरा प्रण पूरा नहीं हुआ, मै जयद्रथ को मार नहीं सका, चिता तैयार कर दो। मैं जयद्रथ को मार नहीं सका, अब मैं प्राण त्‍याग दूंगा। कौरव दल त्‍यौहार मनाने लगा। क्‍यों? अब अर्जुन जल कर मरेगा, मरेगा। राजा दुर्योधन आदेश देते हैं, तुरंत चिता तैयार हो गया, कहने की देरी है रागी, करने में नहीं है (आदेश देते ही तैयार)। तैयार, दोनों दल चिता को घेर कर खड़े हैं। अर्जुन नंदी घोष को पकड़ कर कहते है। अर्जुन नंदी घोष से उतर गए, दोनो हाथ जोड़ कर भगवान से कहते हैं, प्रणाम कर के महावीर अर्जुन चिता में चढनें जा रहे हैं।  हाथ के गांडीव को रथ के उपर रख दिये, अर्जुन चिता में चढ़ गए। भगवान हंस दिए, भगवान हंस कर उसी समय बोले, एै अर्जुन! अरे चिता चढ़न अर्जुन गयो, अरे कहेउ कृष्‍ण सुमझाय। अर्जुन!

 

 

बोलिये वृंदावन बिहारीलाल की जय।

रामे रामे भइया रामे गा रामे गा

रामे रामे भइया रामे रामे गा

राजा जनमें जय पूछन लागे भइया

वैसम पायन गा कहन लागे भाई

 

वृंदावन बिहारी लाल की जय बोलिये। राम, राम, राम ही राम है भाई। राजा जन्‍मेजय पूछने लगे भाई, वैसम्‍पायन कहने लगे भाई।

 

 

अरे भगवान द्वारिका नाथ अर्जुन ल कथे, अरे भइया अर्जुन तोर बेटा मरिस तउनों वईसने मरिस, तहूं मरथस वइसने तहूं मरत हस। कथे, अरे - क्षत्री के धर्म नो हे, क्षत्री तो बकायदा अस्त्र शस्त्र लेके मरथे।

अरे चिता चढ़न अर्जुन गए तब कहे कृष्ण समुझाय। अरे धनुस बान धर कर चढ़ो तब क्षत्री धर्म नहीं जाय।

 

अर्जुन पलट के आथे तहां गांडीव धनुस ल उठाके

अरे बीरे अर्जुन ल देवन लागे भाई

भगवान कहय येदे सम्हाल येला

वो ह बीरे अर्जुन ल देवन लागे भाई

हो, अर्जुन कर चलन लागय गा मोर भाई

 

भगवान द्वारिकानाथ अर्जुन को कहते हैं, अरे भइया अर्जुन तुम्‍हारा बेटा मरा वो भी वैसे ही मरा, तुम भी उसी प्रकार मर रहे हो। कहते हैं, अरे - क्षत्रीय का यह धर्म नहीं है, क्षत्रीय तो बकायदा अस्त्र-शस्त्र लेकर मरता है।

चिता में चढ़ने के लिए जब अर्जुन गए तब कृष्ण समझाते हुए कहते हैं, धनुष बाण पकड़ कर चढ़ो, ताकि क्षत्रीय धर्म बचा रहे। अर्जुन वापस लौट के आते हैं और आकर गांडीव धनुस को उठा कर

वीर अर्जुन को देने लगे भाई, भगवान कहते हैं ये लो सम्हालो इसे। वो वीर अर्जुन को देने लगे, अर्जुन के पास चलने लगे।

 

 

हाथ म गांडीव लेके अर्जुन चिता म चढगे। रागी भाई चिता म चढ़थे अउ सीधा बुड़ती कोती मुह करके बइठथे। पस्चिम दिसा की ओर आगे करके अर्जुन बइठत हे, जेने खम्भा म जयद्रथ ल छिपाए हे, पाताल लोक गए हे, वो खम्भा गगन पंथ म निकले हे। वही खम्भा म महाबीर अर्जुन निसाना साध के बइठे हे। अच्छा। भगवान रथ उपर बैठे हे मंद मंद मुस्कावत हे।  भगवान दुरिहा ले देखत हे, अर्जुन चिता म बइठ गए हे। हां भई। अई या। सारी बीर चिता ल घेर के बइठे हे। अर्जुन मरही, अर्जुन मरही, अर्जुन मरही। दूर्योधन चिता के जघा ल छोड़ दिए। दुर्योधन, जयद्रथ लुकाए रहय तउन जघा आगे। द्रोणाचार्य पाताल लोक म कमल व्‍यूह के डंडी ल लेजे रहय रागी भइया अउ वो डंडी म छिपा के राखे रहय। अच्छा। दुर्योधन जनत रिसे जयद्रथ कहां लुकाएं हे। हंव भ। दुर्याधन आके उपर ले आवाज देवत हे, कहे जयद्रथ जयद्रथ। ऐ जयद्रथ। त जयद्रथ भितरी ले कहत हे ओए। बता भई। राजा कथे तोर बईरी ह मरत हवय जयद्रथ । अच्‍छा। दुर्योधन कहत हे तो बइरी मरत हे चिता म जलके। कहे आ तोर बइरी के धुंवा देखले। अर्जुन चिता म जलके मरत हे आ अर्जुन ल मरते हुए देख ले कहथे।

 

हाथ में गांडीव लेकर अर्जुन चिता में चढ़ गए। रागी भाई चिता में चढ़ते हैं और सीधे पश्चिम तरफ मुंह करके बैठते हैं। पश्चिम दिशा की ओर मुख करके अर्जुन बैठ रहे हैं, जिस खम्भे में जयद्रथ को छिपाए हैं, वह पाताल लोक में गया है, वह खम्भा गगन पंथ में निकला हे। उसी खम्भे मे महावीर अर्जुन निशाना साध कर बैठे हैं। अच्छा। भगवान रथ के उपर बैठे हैं मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं।  भगवान दूर से देख रहे हैं, अर्जुन चिता मे बैठ गए हैं। हां भाई। सभी वीर चिता को घेर कर बैठे हैं। अर्जुन मरेगा, अर्जुन मरेगा, अर्जुन मरेगा। दुर्योधन चिता के स्‍थान को छोड़ दिया। दुर्योधन, जयद्रथ जहां छिपा है वहां आ गया। द्रोणाचार्य पाताल लोक में कमल व्‍यूह की डंडी को ले गए हैं रागी भईया और उसे उसके डंडी में छिपा कर रखे हैं। दुर्योधन जानता था जयद्रथ कहां छुपा है। दुर्याधन आकर उपर से आवाज दे रहा है, कहता है जयद्रथ, जयद्रथ। ऐ जयद्रथ। तो जयद्रथ अंदर से कहता है, क्‍या। बताओ भाई। राजा कहता हैं तुम्‍हारा बैरी मर रहा है जयद्रथ। दुर्योधन कहता है तुम्‍हारा बैरी मर रहा है चिता मे जल कर। कहता है आओ तुम्‍हारे बैरी की धुंआ देखलो। अर्जुन चिता मे जल कर मर रहा है, आवो अर्जुन को मरते हुए देख लो ऐसा कहते हैं।

 

 

वोतके ल सुनिस त जयद्रथ ह छिपे छिपे कहत हे

नइ देखंव भइया, मै नइ तो देखंव भाई

नइ देखंव भइया, मै नइ तो देखंव भाई

जयद्रथ बीर कहन लागे भइया

जयद्रथ बीरे कहन लागे भाई

जयद्रथ सिर हिला के बोले - दुर्योधन मरत हे त मरन दे । मरन दे। राजा जिद म आगे, नइ। अर्जुन मरत हे आके देख वोला। एक नजर देख लो। अई। हव।

 

इतना सुन कर, जयद्रथ छिपे-छिपे कहता है

नहीं देखुंगा भाई, मै तो देखूंगा ही नहीं भाई। नहीं देखुंगा भाई, मै तो देखूंगा ही नहीं भाई। जयद्रथ वीर कहने लगे भाई, जयद्रथ वीर कहने लगे ..

जयद्रथ सिर हिला कर बोला – दुर्योधन, मरता है तो मरने दो। मरने दो। राजा (दुर्योधन) जिद म आ गए, नहीं। अर्जुन मर रहा है आकर उसे देखो। एक नजर देख लो।

 

 

जयद्रथ कथे मोला विसवास नइ होवत हे अर्जुन मरत हे कथें। काबर के अर्जुन के प्रतिज्ञा पूरा करने वाला जगत के स्वामी भगवान द्वारिका नाथ हे। जिद्दी दुर्योधन नइ मानिस, जयद्रथ कहत हे दुर्योधन मोर में वो सामर्थ नइ हे, के अर्जुन के आघू म प्रत्यक्ष खड़ा होके देख सकंव। दुर्याधन कहय अइसे नई देख सकत लुका के देख। पर देख जरूर। हां छिप के देख।

 

जयद्रथ कहता है कि मुझे विश्‍वास नहीं हो रहा है कि अर्जुन मर रहा है। (वह) कहता है क्‍योंकि अर्जुन की प्रतिज्ञा पूरा कराने वाला जगत के स्वामी भगवान द्वारिका नाथ हैं। जिद्दी दुर्योधन मानता नहीं, जयद्रथ कहता है दुर्योधन मेरे मे वह सामर्थ नहीं है, कि अर्जुन के सामने प्रत्यक्ष खड़ा होकर उसे देख सकूं। दुर्योधन कहता है सीधे नहीं देख सकते तो छुप कर देखो, पर देखो जरूर। हॉं छुप कर देखो।

 

 

राजा अर्जुन जेने मेर निसाना जमाए हे उही मेरा जयद्रथ सिर ल निकालिस, खम्भा निकले हे गंगन पंथ की ओर, वही खम्भा म अर्जुन निसाना साधे हे अउ वही खम्भा म जयद्रथ सिर अतका ल बाहर निकाले हे। हव भई। अउ बाहर निकाल के जयद्रथ ह देखत हे। सिर बाहर हे, भगवान देखिस, मंद मंद मुस्कावत हे द्वारिकानाथ तहान चक्र सुदर्शन ल इसारा कर दिस। चक्र सुदर्शन जाके सूर्य ल छिपाए हे रागी। भगवान इशारा करत हे, चक्र छोड़ दीस। कुरूक्षेत्र के मैदान म रग - रग ले घाम उगे। प्रकाश होगे। हव। भगवान रथ के उपर म बइठे बइठे चिल्ला के बोलय अर्जुन..

 

राजा अर्जुन जहॉं पर निशाना साधे हैं उसी जगह जयद्रथ सिर को निकालता है, व्‍यूह का खम्भा आकाश की ओर जहां निकला है, उसी खम्भे में अर्जुन निशाना साधा है और उसी खम्भे से जयद्रथ सिर को बाहर निकाला है। और (सिर) बाहर निकाल कर जयद्रथ देख रहा है। सिर बाहर है, भगवान नें देखा, द्वारिकानाथ मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं,  फिर चक्र सुदर्शन को इशारा कर दिए। चक्र सुदर्शन जाकर सूर्य को छिपा लिया है रागी। भगवान इशारा करते हैं, चक्र छोड़ देता है। कुरूक्षेत्र के मैदान में तेज धूप निकल गया, प्रकाश हो गया। भगवान रथ के उपर मे बैठे-बैठे चिल्ला कर के बोले अर्जुन..

 

 

अगा मारो मारो मारो कहन लागय भाई

भगवान कहते है मारो। मारो।

भइया मारो मारो एदे कहन लागे भाई

अर्जुल ल हरि कहान लागे ग ए भाई

 

अजी मारो, मारो, मारो, कहने लगे भाई। भगवान कहते है मारो, मारो। भाई मारो, मारो, अब कहने लगे भाई। अर्जुन को हरि कहने लगे जी भाई।

 

 

मारो। भइगे, मारो कहि के कहिस बान ल छोड़ दिए, गरजत हुए बान जाके जयद्रथ के सर ल काटिस अउ निकाल के अपन शंख ल फूंकिस, जयद्रथ के सिर गगन पंथ म उड़ गए। उड़ते उड़ते सिर चिल्लाय मारो। रागी भाई अर्जुन चिता ले उतरथे अउ देवदत्त नाम के शंख ल फुंक देथे। जय हो। देवदत्त शंख जब अर्जुन फुंकते हे अब तीनहु लोक अउ चउदह भुवन म अवाज जात हे। अर्जुन कहय द्वारिका नाथ चलो घर चलते है। काबर के जयद्रथ के वध होगे, मैं अपन प्रन ल पूरा कर डरेंव। भगवान कहय अर्जुन, जयद्रथ मर गए कहत हस तेन धोखा ल छोड़ दे।

 

मारो। बस, मारो कहना हुआ कि (अर्जुन) बाण को छोड़ दिए, गरजता हुआ बाण जाकर जयद्रथ के सिर को काटा और अर्जुन निकाल कर अपना शंख को फूंक दिये, जयद्रथ का सिर गगन पंथ में उड़ गया। उड़ते-उड़ते सिर चिल्ला रहा है मारो। रागी भाई अर्जुन चिता से उतरते हैं और देवदत्त नाम के शंख को फुंक देते हैं। देवदत्त शंख जब अर्जुन फूंकते हैं तब तीन लोक और चौदह भुवन में आवाज जा रहा है। अर्जुन कहते हैं कि द्वारिका नाथ चलो घर चलते हैं। क्‍योंकि जयद्रथ का वध हो गया, मैं अपने प्रण को पूरा कर लिया। भगवान कहते हैं अर्जुन, जयद्रथ मर गया कह रहे हो ऐसा भ्रम छोड़ दो।

 

 

जयद्रथ के सिर भुइंया म गिर जही, जयद्रथ ले पहिली तोर मरना होही। तब अर्जुन पूछिस का उपाय करवं। तब भगवान कहिस, निकाल कर के जउन भगवान महादेव दिए हे वो बान छोड़ दे। महाबीर अर्जुन शंकर के दिए हुए बान छोड़त हे, अउवों बान जयद्रथ के सिर ल धर के सिंधु देस जाथे रागी। जयद्रथ के पिता महाराज सुरथ हाथ पसारे हे, आंख बंद हे, अउ हाथ ल पसार के स्नान करत करत भगवान के याद करत हे रागी भाई। ध्यान मग्न हे। बान गीस सिर ल छोड़ दिस, सिर सूरत के हाथ म गिर गे। राजा सूरथ कहे अरे । आज तै मोर तपस्या ल, जे साधन म बइठे हंव वोला तै भंग कर देस। कहे जा तै ह मर जा। मर जा कहि के पृथ्वी म पटक दीस। जयद्रथ के मृत्यु होगे हरि - अर्जुन नर - नरायण वापिस आथें। अउ वापिस आके महाबीर

 

यदि जयद्रथ का सिर जमीन में गिर जायेगा, तो जयद्रथ से पहले तुम्‍हें मरना होगा। तब अर्जुन नें पूछा क्‍या उपाय करूं। तब भगवान कहते हैं, भगवान महादेव जिस बाण को दिए हैं उस बाण को निकाल कर छोड़ दो। महावीर अर्जुन शंकर के दिए हुए बाण को छोड़ता है और वह बाण जयद्रथ के सिर को पकड़ कर सिंधु देश जा रहा है रागी। जयद्रथ के पिता महाराज सुरथ हाथ को खोले हुए हैं, आंख बंद है, और हाथ को खोल कर स्नान करते हुए भगवान को याद कर रहे हैं रागी भाई। ध्यान मग्न हैं। बाण गया सिर को छोड़ दिया, सिर सूरथ के हाथ में गिर जाता है। राजा सुरथ कहते हैं अरे। आज तुमने मेरी तपस्या को, मैं जिस साधना के लिए बैठा हूं उसे तुमने भंग कर दिया है। कहते हैं जावो तुम मर जावो। मर जावो कह कर सिर को पृथ्वी में पटक देते हैं। जयद्रथ की मृत्यु हो जाती है, हरि-अर्जुन नर-नरायण वापस आते हैं। और वापस आ कर महावीर

 

 

अर्जुन कृष्ण ल कहत हे द्वारिका धीश

हाय रे! हाय रे! काया माटी के हे राम

येकर का भरोसा काया माटी के हे ना

येकर का भरोसा काया माटी के हे ना

हरिशचंद्र अस दानी चल दीस बाल्मीकि अस ज्ञानी

बाली जइसन बीर चले गए रावन कस अभिमानी

काया माटी के हे ना येकर का भरोसा काया माटी के हे ना

 

अर्जुन कृष्ण को कह रहे हैं द्वारिकाधीश, हाय रे! हाय रे! काया मिट्टी का है राम। इसका क्‍या भरोसा काया मिट्टी का है ना। इसका क्‍या भरोसा काया मिट्टी का है ना। हरिशचंद्र जैसे दानी चले गए, बाल्मीकि जैसे ज्ञानी, बाली जैसे वीर चले गए, रावन जैसे अभिमानी (सब चले गए)। इसका क्‍या भरोसा काया मिट्टी का है ना।

 

 

रागी भइया पांचो भइया पांडव भोजन करके विस्राम करत हें। माता द्रौपती भगवान ल आके पूछत हे भइया आज काकर वध करेव। भगवाल बताथे के बहिनी आज जयद्रथ के बध करके आए हन हमन। पांडव दल म खुसी के लहर छाए हे पर कौरव दल म दुख होगे। राजा दुर्योधन कहय हा, जयद्रथ। काबर के जयद्रथ ह कोन ये रागी त राजा दुर्योधन के बहनोई ये । बहनोई ये । महारानी दुसाला के शादी राजा जयद्रथ के संग म होए हे। राजा दुर्योधन गुरू द्रोण ल बोले गुरूदेव तै तो आज तैं जयद्रथ ल बंचाए के प्रण करे रहे ना ? कहां कर दिए अपन पुरूषार्थ ल बोले आज तै जयद्रथ ल कइसे नइ बंचाए महराज? ये बात सुने द्रोणाचार्य कहते है दुर्योधन का आज के लड़ाई म अर्जुन का अपने भुजा के बल म मारे हे जयद्रथ ल? द्रोणाचार्य कहते है दुर्योधन से -

अरे बल से अर्जुन सकेउ न मारन, अपन भुजा के बल से जयद्रथ ल अर्जुन ह नइ मारे ये। दुर्याधन, अरे ये सब खेल करत जगतारन। बोले बेटा तीन दिन के लड़ाई सम्पन्न होए हे अभी दू दिन अउ लड़हूं। आन दिन हम दिन म लड़त रहेन दुर्योधन, फेर कल के लड़ाई मै रात म करिहंव।

 

रागी भैया पांचो भैया पांडव भोजन करके विश्राम कर रहे हैं। माता द्रौपदी भगवान को आकर पूछ रही है भैया आज किसका वध करे हो। भगवाल बताते हैं कि बहन आज जयद्रथ का वध करके आए हैं हम लोग। पांडव दल में खुशी की लहर छाई है पर कौरव दल में दुख हो गया है। राजा दुर्योधन कहते हैं,  हां, जयद्रथ। क्‍योंकि जयद्रथ कौन है रागी, जयद्रथ, राजा दुर्योधन का बहनोई है। महारानी दुशाला का विवाह राजा जयद्रथ के साथ हुआ है। राजा दुर्योधन गुरू द्रोण को बोलते हैं, गुरूदेव आप तो आज जयद्रथ को बचाने का प्रण लिए थे ना? कहां गया आपका पुरूषार्थ। दुर्योधन बोला आज आपने जयद्रथ को कैसे नहीं बचा पाये महाराज? इस बात को सुनकर द्रोणाचार्य कहते हैं दुर्योधन क्‍या आज की लड़ाई मे अर्जुन क्‍या अपने भुजा के बल मे जयद्रथ को मारा है? द्रोणाचार्य दुर्योधन से कहते है -

अरे अर्जुन बल से नहीं मार सकता था, अपने भुजा के बल से जयद्रथ को अर्जुन ने नहीं मारा है। दुर्याधन, अरे ये सब खेल जगतारन (कृष्‍ण) कर रहा है। (द्रोण) बोले बेटा तीन दिन की लड़ाई सम्पन्न हुई है अभी दो दिन और लड़ूंगा। अन्‍य दिनों में हम दिन में लड़ते थे दुर्योधन, पर कल की लड़ाई मै रात में करूंगा।

 

 

चउथा दिवस के लड़ाई संझा के बेरा सुरू होथे रागी। हाथ म मसाल लेकर के हाथी वाला हाथी, रथ वाले रथ घोड़ा वाले घोड़ा, पैदल वाले पैदल, चउथा दिवस के युद्ध म कुरूक्षेत्र म युद्ध होथे।

रागी भाई, पाण्डव के दल ले राजा द्रुपद महराज आए हे, लड़े ल आए हे। आखिर म लड़ते - लड़ते द्रोणाचार्य निकालिस त्रुण से बान, मंत्र पढ़के छोडथे, बान जाके राजा द्रुपद के सिर ल काट देथे। रात के समय हे राजा द्रुपद के सिर म मणि के मुकुट बंधाए हे।  सिर गिर गे पृथ्वी में पर मणि के प्रकाश म राजा द्रुपद के चेहरा दिखत हे। द्रोणाचार्य के नजर परगे रागी भाई। देखिस के आज मै अपन मितान ल अपन हाथ ले मार देंव। द्रोणाचार्य ल दुख होथे, सिर झुका के बइठ जथे। राजा दुर्योधन पूछे गुरूदेव युद्ध थम कइसे गे ? त द्रोणाचार्य कथे दुर्योधन आज तोर हित के खातिर मैं अपने मितान ल मार डरेंव। बोले मितान ? त बोले राजा द्रुपत ह तोर मित्र ये ? राजा दुर्योधन बोले गुरूदेव मै नी जानत रहेंव के वो तोर मितान ये कहिके। कइसे मितान ये, कहां के मितान ये जब तक नि बताबे मैं नी मानव।

 

चौथे दिवस की लड़ाई संघ्‍या के समय में आरंभ होता है रागी। हाथ में मसाल लेकर हाथी वाला हाथी, रथ वाले रथ, घोड़ा वाले घोड़ा, पैदल वाले पैदल, चौथे दिवस के युद्ध मे कुरूक्षेत्र में युद्ध हो रहा है।

रागी भाई, पाण्डव के दल से राजा द्रुपद महाराज आए हैं, लड़ने को आए हैं। आखिर में लड़ते - लड़ते द्रोणाचार्य निकालते हैं तरकस से बाण, मंत्र पढ़ कर छोडते हैं, बाण जाकर राजा द्रुपद के सिर को काट देता है। रात का समय है राजा द्रुपद के सिर में मणि मुकुट बंधा है।  सिर पृथ्वी में गिर गया है पर मणि के प्रकाश में राजा द्रुपद का चेहरा दिख रहा है। द्रोणाचार्य की नजर पड़ी रागी भाई। देखे कि आज मै अपने मित्र को अपने हाथ से मार दिया। द्रोणाचार्य को दुख होता है, सिर झुका कर बैठ जाते हैं। राजा दुर्योधन पूछते हैं गुरूदेव युद्ध थम कैसे गया? तो द्रोणाचार्य कहते हैं दुर्योधन, आज तुम्‍हारे हित के कारण मैं अपने मित्र को मार डाला। दुर्योधन बोलते हैं मित्र ? उन्‍होंनें कहा कि राजा द्रुपद आपके मित्र हैं? राजा दुर्योधन बोलते हैं गुरूदेव मै नहीं जानता था कि वह आपके मित्र हैं। कैसे मित्र हैं, कहां के मित्र हैं, जब तक नहीं बतायेंगें मै नहीं मानूंगा।

 

 

द्रोणाचार्य कथे ये तो इतिहास ये दुर्योधन। जब तुम लइका जात रहेव, तुमला शिक्षा देबर मैं आयेंव, वोकर पहिली के कथा ये। एक समे के बात ये, द्रुपत के राज ल कोल - भील मन छीन ले रहिन हे। स्त्री और मंत्री ल लेके दर दर के ठोकर खात रहिन। एक दिन नंदिया म हम दुनों के भेंट होगे। वो दिन राजा द्रुपत कहे रहिस के कोई भी योद्धा कहूं मोर राज्य ल वापिस कर दिही त भाई बंटवारा आधा राज्य के मालिक बनवा देहंव। वो दिन पंचाल नगर म जाके ऐकर राज ल लहुटा देंव। एक दिन समय बीतिस मोर बेटा अस्वस्थामा गोरस पिये के खाति तरस गे। रागी, कृपि चाउंर ल धोके ओला ठग के गोरस ये कहि के देवत रहिस। लागत गाय मांगे ल गेंव, ये मोला भितरी म नइ जावन दीस। वो दिन मैं प्रतिज्ञा करेंव अरे द्रुपद। तोला बांध के कहूं अपन गोड़ म नइ गिरायेव त मोर नाव द्रोण नहीं। जब तुमला शिक्षा देंव अउ गुरू दक्षिणा के समय आइस तब अर्जुन से इही दक्षिणा मांगेव। गाय अउ गाय के द्रुपद ल लाके मोर चरन म गिरा दे। दुर्योधन,  उही दिन ले ये द्रुपद ह मोर मितान ये। आज तोर हित के खातिर येला मार देंव बेटा। चउथा दिन के लड़ाई बिस्राम कर देथे रागी भइया। कौरव पाण्डव अपन - अपन सिविर म विस्राम करते हें।

 

द्रोणाचार्य कहते हैं यह तो इतिहास है दुर्योधन। जब तुम बच्‍चे थे, तुम लोगों को शिक्षा देनें के लिए मै आया था, उसके पहले की कथा है। एक समय की बात है, द्रुपद के राज्‍य को कोल - भील लोग छीन लिये थे। द्रुपद स्त्री और मंत्री को लेकर दर-दर की ठोकर खा रहा था। एक दिन नदी में हम दोनों की मुलाकात हो गई। उस दिन राजा द्रुपद नें कहा था कि कोई भी योद्धा कहीं मेरे राज्य को वापस दिला देगा तो भाई बंटवारा आधा राज्य का मालिक बना दूंगा। उस दिन पंचाल नगर मे जा कर मैंने इसके राज्‍य को लौटा दिया। समय बीता तब मेरा बेटा अश्‍वत्‍थामा दूध पीने के लिए तरस गया। रागी, कृपि चावल को धोकर उसे भरमा कर दूध है कह कर देती थी। द्रुपद के पास दूध देने वाली गाय मांगने गया, यह मुझे भीतर आने नहीं दिया। उसी दिन मैने प्रतिज्ञा किया, अरे द्रुपद। तुमको बांध कर कहीं अपने पैर मे नहीं गिरा दिया तो मेरा नाम द्रोण नहीं। जब तुम लोगों को शिक्षा दिया और गुरू दक्षिणा का समय आया तब अर्जुन से यही दक्षिणा मांगा। गाय और गाय के साथ द्रुपद को मेरे चरणों में गिरा दो। दुर्योधन,  उसी दिन से यह द्रुपद मेरा मित्र है। आज तुम्‍हारे हित के कारण मैंनें इसे मार दिया बेटा। चौथे दिन की लड़ाई समाप्‍त हो गई रागी भैया। कौरव पाण्डव अपने - अपने शिविर में विश्राम करते हैं।

 

 

और पांचवा दिन के लड़ाई म जब दोनों दल चलत हे तब अर्जुन भगवान ल कहत हे केशव

जय बोलो वृंदावन विपिन बिहारी भाई, सियाराम हो राधेश्यामा

सेसे महेसे ये जान न पाया भाई, सियाराम हो राधेश्यामा

बडे़ बडे़ ज्ञानी अरे तोर गुन गावय रे भाई, सियाराम हो राधेश्यामा

ओ रामा जय बोलो वृंदावन विपिन बिहारी हो

जय बोलो वृंदावन विपिन बिहारी भाई, सियाराम हो राधेश्यामा

 

और पांचवे दिन की लड़ाई में जब दोनों दल चल रहें हैं तब अर्जुन भगवान को कहते हैं केशव

जय बोलो वृंदावन विपिन बिहारी की भाई, सियाराम हो राधेश्यामा। शेष, महेश ये जान नहीं पाये भाई, सियाराम हो राधेश्यामा। बड़े बड़े ज्ञानी आपका गुण गाते हैं भाई, सियाराम हो राधेश्यामा। ओ रामा, जय बोलो वृंदावन विपिन बिहारी हो। जय बोलो वृंदावन विपिन बिहारी भाई, सियाराम हो राधेश्यामा।

 

 

पांचवा दिन के युद्ध म पहुंचते है अपन अपन योग्य, अपन अपन लायक, अपन अपन जहुरिंयां संग लेके लड़त हें। रागी भइया जब पांचवा दिवस के युद्ध जब चलथे तब राजा युधिष्ठिर भगवान ल पूछथें चार दिन म हम द्रोन ल नइ मार सकेन, कल अंतिम दिवस के लड़ाई ये, काली हम द्रोणाचार्य ले विजय कइसे पाबोन? भगवान कथे भइया द्रोणाचार्य के मृत्यु अइसे नइ होय। द्रोण ल तुम अइसे मार ही नइ सकव। त कइसे मरही? कहे द्रोण के मृत्यु ओकर पुत्र म लिखे हे। तो का करे ल परही? भगवान आदेश देथे, भीमसेन काली तैं मैदान म जाबे अउ लड़ाई के मैदान म द्रोणाचार्य के बेटा अस्वस्थामा से लड़बे। एक बात के ध्यान रखबे भीमसेन, अश्वस्थामा से लड़बे अउ लड़त - लड़त अश्वस्थामा ल उठा के युद्ध क्षेत्र से फेंक देबे।  एक बात अउ ध्यान म रखबे, वो कुरूक्षेत्र के मैदान म एक कृतवर्मा नाम के बीर आही लड़े बर। कौन से बीर? त बोले कृतवर्मा। वो कृतवर्मा अस्वस्थामा नाम के हाथी म बइठ के आही। तोला वो कृतवर्मा के हाथी ल मारना हे जेकर नाम अस्वस्थामा हे। अउ द्रोणाचार्य के बेटा अस्वस्थमा ल उठा के फेंकना हे अउ लड़ई म चिल्‍ला देबे, अस्‍वस्‍थामा मारे गे, अस्‍वस्‍थामा मारे गे, मारे गे, अई न?

 

पांचवे दिन के युद्ध में पहुंचते हैं अपने-अपने योग्य, अपने-अपने लायक, अपने-अपने हमउम्र को साथ लेकर लड़ रहे हैं। रागी भइया, जब पांचवा दिन का युद्ध चलने लगा तब राजा युधिष्ठिर भगवान को पूछते हैं, चार दिन मे हम द्रोण को नहीं मार सके, कल अंतिम दिवस की लड़ाई है, कल हम द्रोणाचार्य से विजय कैसे पा सकेगें? भगवान कहते हैं भइया द्रोणाचार्य की मृत्यु ऐसे ही नहीं होगी। द्रोण को तुम ऐसे मार ही नहीं सकोगे। तो कैसे मरेगा? कृष्‍ण कहते हैं द्रोण की मृत्यु उसके पुत्र में लिखा है। तो क्‍या करना पड़ेगा? भगवान आदेश देते हैं, भीमसेन कल तुम मैदान में जावोगे और लड़ाई के मैदान में द्रोणाचार्य के पुत्र अश्‍वत्‍थामा से लड़ोगे। एक बात का ध्यान रखना भीमसेन, अश्‍वत्‍थामा से जब लड़ोगे तब लड़ते - लड़ते अश्‍वत्‍थामा को उठा कर युद्ध क्षेत्र से फेंक दोगे।  एक बात और ध्यान में रखना, उस कुरूक्षेत्र के मैदान में एक कृतवर्मा नाम का वीर लड़ने के लिए आयेगा। कौन वीर? तो कृष्‍ण बोले कृतवर्मा। वह कृतवर्मा अश्‍वत्‍थामा नाम के हाथी मे बैठ कर आयेगा। तुम्‍हें उस कृतवर्मा के हाथी को मारना है जिसका नाम अश्‍वत्‍थामा है। और द्रोणाचार्य के पुत्र अश्‍वत्‍थामा को उठा कर फेंकना है और लड़ाई में चिल्‍ला देना, अश्‍वत्‍थामा मारा गया, अश्‍वत्‍थामा मारा गया, मारा गया, ओह नहीं?

 

 

अब द्रोणाचार्य सब ल पूछही, तुम सब कहि केहू अस्वस्थामा मर गे। पर भइया, तोला  पूछे बिगर द्रोण ह अपन प्रान ल नइ त्यागय। भइया युधिष्ठिर वो जानत हे। धरम राज वो सपना म धलव झूठ नइ बोलय। तोर जघा आही पूछे बर, अस्वस्थामा  मर गे का कहिही, मर गे कहि देबे। राजा दोनो हाथ जोर कर के कहय अतक बड़ काम नइ कर सकंव मै। धरमराज बोले नई द्वारिका नाथ, मै नइ कर सकंव, भगवान कथे केहे ल लागही भईया। कहे ल लागही। भगवान समझात हे, केहे ल लागही। राजा युधिष्ठिर बोले नइ द्वारिका धीस, ये धन के लालच म ये दौलत के लालच म मै गुरू के सामने झूठ नइ बोलंव। भगवान बांके बिहारी कहथे युधिष्ठिर। समय ल ध्यान रख के ही इंसान ल बोले ल परथे। झूठ बोले  के जगा म झूठ गलत बोले के जगा म गलत। सही बोले के जगा म सही अउ लबारी बोले के जगा म लबारी बोले ल परथे।  धरम राज कहूं झूठ बोल के कहूं काकरों काम ह बनत हे काकरो जीव बांचत हे त ये झूठ ह झूठ नी होए। भगवान किथे अरे अतका कन तो कही देबे, भगवान कहय अरे अतकाकन तो कहि देबें, कहे का ? तै अतका कहि देबे जी के अस्वस्थामा नाम के मरे हे ये लड़ाई के मैदान म अस्वस्थामा नाम के मरे हे। नर या कुंजर। नरो या कुंजरो। वोति ल मै बना लिहौ। राजा मान गे रागी।

 

अब द्रोणाचार्य सभी को पूछेंगें, तब तुम सभी कह देना अश्‍वत्‍थामा मर गया। किन्‍तु भैया, तुम्‍हें पूछे बिना द्रोण अपना प्राण नहीं त्यागेगा। भैया युधिष्ठिर वे जानते हैं। धर्मराज जो सपने में भी झूठ नहीं बोलता। तुम्‍हारे पास आयेंगे पूछने के लिए, अश्‍वत्‍थामा  मर गया क्‍या कहेंगे, मर गया कह देना। राजा दोनो हाथ जोड़ कर कहते हैं मै इतना बड़ा काम नहीं कर सकता। धर्मराज बोलते हैं नहीं द्वारिकानाथ, मै नहीं कर सकता, भगवान कहते हैं, कहना पड़ेगा भईया। कहना पड़ेगा। भगवान समझाते हैं, कहना पड़ेगा। राजा युधिष्ठिर बोलते हैं नहीं द्वारिकाधीस, धन के लालच में इस दौलत के लालच में मै गुरू के सामने झूठ नहीं बोलूंगा। भगवान बांके बिहारी कहते हैं युधिष्ठिर। समय को ध्यान में रख कर ही इंसान को बोलना पड़ता है। झूठ बोलने  के स्‍थान में झूठ, गलत बोलने के स्‍थान में गलत। सही बोलने के स्‍थान में सही और झूठ बोलने के स्‍थान में झूठ बोलना पड़ता है।  धर्मराज झूठ बोलने से कहीं किसी का काम बन रहा है, किसी का प्राण बच रहा हो तो यह झूठ, झूठ नहीं होता। भगवान कहते हैं अरे इतना तो कह देना, भगवान कहते हैं अरे इतना तो कह ही देना, पूछते हैं क्‍या? तुम इतना कह देना जी कि अश्‍वत्‍थामा नाम का मरा है इस लड़ाई के मैदान में, अश्‍वत्‍थामा नाम का मरा है। नर या कुंजर। नरो या कुंजरो। उधर मै बना लूंगा। राजा मान गए रागी।

 

 

युद्ध सुरू होगे पांचवा दिन के। दोनो म घमासान युद्ध होवत हे। मारो, मारो के आवाज आवत हे। द्रोणाचार्य बान मारत हे, अर्जुन काटत हे अउ अर्जुन के बान ल द्रोण काटत हे, लड़ाई के मैदान म

 

पांचवे दिन का युद्ध प्रारंभ हो गया। दोनो में घमासान युद्ध हो रहा है। मारो, मारो की आवाज आ रही है। द्रोणाचार्य बाण मार रहे हैं, अर्जुन काट रहे हैं और अर्जुन के बाण को द्रोण काट रहे हैं, लड़ाई के मैदान में

 

 

अरे मारउ मारउ कहन लागे, दोनो दल अब लड़न लाय

हा हा कारे मचन लागे, अरे बड़े बड़े बान छूटन लागे

पानी साहिन बरसन लाए, रोंठे रोंठे कटन लागे

जाके माटी मिलना लाए, खुन के सागर बाहन लागै

कखरो जंघा कटान लाए, ककरो भूजा कटान लाए

अरे ककरो धड़ सब कटन लागे, काकरो सिर अब कटान लाए 

ककरो हाथी कटान लागे, ककरो घोड़ा मरन लाय

हा हा कारे मचन लाय, अगनी बाने छोड़न लागे

सारी दल अब चलान लागे, सौ सौ बाने छूटन लागे

पानी के बरसा होवन लाय, कौरव दल हा डूबन लागे

सारी दल अब बूड़न लागे, नागे बाने उड़न लाए

बड़ बड़ फन छूटन लागे, अपन पराए सूझ नहीं जाए,

अरे मारउ मारउ कहन लागे, दोनो दल अब लड़न लाए

अरे आवत बान अकास ले 

 

अरे मारो मारो कहने लगे, दोनो दल अब लड़ने लगे। हाहाकार मचने लगा, अरे बड़े बड़े बाण छूटने लगे। वाणों की बरसात होने लगी, मोटे-मोटे कटने लगे। जाकर मिट्टी में मिलने लगे, खून का सागर बहने लगा। किसी का जंघा कटने लगा, किसी का भुजा कटने लगा। अरे किसी का धड़ कटने लगा, किसी का सिर कटने लगा। किसी का हाथी कटने लगा, किसी का घोड़ा मरने लगा। हाहाकार मचने लगा, अग्नि बाण छूटने लगा, सभी दल अब चलने लगे, सौ-सौ बाण छूटने लगा। पानी की बरसात होने लगी, कौरव दल डूबने लगा। सभी दल अब डूबने लगा, नाग बाण उड़ने लगा। बड़ा-बड़ा फण फुटने लगा, अपना पराया सूझ नहीं रहा है, अरे मारो मारो कहने लगे, दोनो दल अब लड़ने लगे।

अरे आकाश से बाण आ रहा है 

 

 

मारो। एक से बढ़कर एक हे। रागी भाई, मास - मांटी पहचान न आइ। चील अउ गिद्ध नोच नोच के मांस खात हे। भूत प्रेत योगिनी नृत्य करत हे। खेल - खेल के मांस खात हें, युद्ध के मैदान म कोन अपन हे कोन पराए हे। पवन नंदन भीम भगवान के आदेश के मुताबिक दुसर दिन दुस्सासन संग लड़य, ये दिन भीमसेन कौरव के दल म जाकर के अस्वस्थामा नाम के बीर से लड़ते हैं। द्रोणाचार्य के बेटा अस्वस्थामा ये, दोनों में घोर संग्राम होवथे रागी। लड़ते - लड़ते पवन नंदन भीम सेन रथ समेत अस्वस्थामा ल उठाथे अउ रथ समेत उठाके

 

मारो। एक से बढ़कर एक हैं। रागी भाई, मांस और मिट्टी पहचान में नहीं आ रहा है। चील और गिद्ध नोच-नोच कर मांस खा रहे हैं। भूत, प्रेत, योगिनी नृत्य कर रहे हैं। खेल - खेल कर मांस खा रहे हैं, युद्ध के मैदान में कौन अपना है कौन पराया है पता नहीं चल रहा है। पवन नंदन भीम भगवान के आदेश के अनुसार दूसरे दिन दुस्सासन के साथ लड़ रहा है, इस दिन भीमसेन कौरव के दल में जाकर कर अस्वस्थामा नाम के वीर से लड़ता है। द्रोणाचार्य का पुत्र अश्‍वत्‍थामा है, दोनों में घोर संग्राम हो रहा है रागी। लड़ते - लड़ते पवन नंदन भीमसेन रथ समेत अश्‍वत्‍थामा को उठाता है और रथ समेत उठा कर

 

 

अगा बीरे भीमें ओला फेंकन लागे भाई

अइसे उठा के फेंकिस, त अस्वस्थामा जा के कैलास म गिरगे।

वोला बीरे भीमे ह फेंकन लागय भाई

भगवाने कहाने लागे गा मोर भाई

 

वीर भीम उसे फेंकने लगा भाई, ऐसे उठा कर फेंका, तो अश्‍वत्‍थामा जा कर कैलाश में गिरा। उसे वीर भीम फेंकने लगा भाई, भगवान कहने लगे मेरे भाई

 

 

अस्वस्थामा ल फेंक दिस अउ कृतवर्मा के हाथी जे अस्वस्थामा नाम के रहिस तेला मार दिस। भगवान के आदेश के मुताबिक भीम कौरव के दल म चल दिस अउ जा के चिल्लाय लागिस, अरे अस्वस्थामा मारे गे। अस्वस्थामा मारे गे। अस्वस्थामा मारे गे। अस्वस्थामा मारे गे।  जय हो। अब। कौरव दल म खलबली मचगे। गुरू द्रोणाचार्य के पुत्र अस्वस्थामा मारे गे। कुछ देर के बाद ये खबर द्रोणाचार्य के कान म परगे। अस्वस्थामा मारे गे। द्रोणाचार्य ह पुत्र के शोक म ब्याकुल होगे, द्रोण कहय मोर बेटा मर गे। कौरव दल ल जा के पूछय, कहय हव गुरूदेव हम सुने हन अस्वस्थामा मर गे। गुरू द्रोणाचार्य कहय तुम नइ जानव। कोन जानही। अरे जउन लड़त रहिस तउन ह तो जानही। पवन नंदन भीम के आघू आथे रागी। आकर के द्रोणाचार्य कथे, पूछत हे भीम मै सुने हंव अस्वस्थामा मर गे। मै सुनेंव आज तै अस्वस्थामा संग लड़त रहे। अउ मै अहू सुनेव के अस्वस्थामा मारे गे। कहे बेटा, तै ये बता वाकई अस्वस्थामा मर गे या जीयत हे। पवन नंदन भीम हांस के कहय गुरूदेव अस्वस्थामा मारे गे। मर गे। द्रोणाचार्य बोले नई।

 

अश्‍वत्‍थामा को फेंक दिए और कृतवर्मा के अश्‍वत्‍थामा नामक हाथी को मार दिये। भगवान के आदेश के अनुसार भीम कौरव के दल में चला गया और जा कर चिल्लाने लगा, अरे अश्‍वत्‍थामा मारा गया। अश्‍वत्‍थामा मारा गया। अश्‍वत्‍थामा मारा गया। अश्‍वत्‍थामा मारा गया। जय हो। अब, कौरव दल में खलबली मच गई। गुरू द्रोणाचार्य का पुत्र अश्‍वत्‍थामा मारा गया। कुछ देर बाद यह खबर द्रोणाचार्य के कान में पड़ा। अश्‍वत्‍थामा मारा गया। द्रोणाचार्य, पुत्र के शोक म व्‍याकुल हो गए, द्रोण कहते हैं मेरा बेटा मर गया। कौरव दल में जाकर कर पूछ रहे हैं, कहते हैं हॉं गुरूदेव हम सुने हैं अश्‍वत्‍थामा मारा गया। गुरू द्रोणाचार्य कहते हैं तुम लोग नहीं जानते। कौन जानेगा। अरे जो लड़ रहा था वह तो जानेगा। पवन नंदन भीम के सामने आते हैं रागी। आकर द्रोणाचार्य कहते हैं, पूछ रहे हैं भीम मै सुना हूं अश्‍वत्‍थामा मारा गया। मै सुना हूं आज तुम अश्‍वत्‍थामा के साथ लड़ रहे थे। और मै ये भी सुना हूं कि अश्‍वत्‍थामा मारा गया। कहते हैं बेटा, तुम यह बताओ क्‍या वाकई अश्‍वत्‍थामा मर गया या जी रहा है। पवन नंदन भीम हंस कर कहते हैं गुरूदेव अश्‍वत्‍थामा मारा गया। मर गया। द्रोणाचार्य बोले नहीं।

 

 

कहे मै बिस्वास नइ करंव। नकुल सहदेव ल पूछिस, नकुल सहदेव कहिस मर गे। कथे मै हरि - अर्जुन ल पूछ लेथंव। भीम सेन कहते है जावो पूछ लो। द्रोणाचार्य आके अर्जुन ल पूछत हे, अस्वस्थामा मर गे का? द्रोण आके कहत हे, अर्जुन मै मन म बिस्वास ले के आए हंव, बोले, बेटा बता का वाकई अस्वस्थामा मर गे या जीयत हे। आदेस के मुताबिक अर्जुन तको कहि दीस अस्वस्थामा मर गे। पर द्रोणाचार्य बोले नइ अर्जुन मै तोर बात बिस्वास नइ करव। काबर के, तै ये छलिया के संग हमेसा रहिथस। येकर संग म तहूं  लबारी मारे बर सीख गे हस। भगवान के ओर इशारा करके गुरू द्रोण कहथे, येकर संग म तहूं झूठ बोले ल सीख गे हस। जब तक महाराजा धर्मराज नई कहिही अस्वस्थामा मर गे तब तक ले ये शरीर ल नइ त्यागंव। भगवान हांस के कहय पूछले द्रोन

 

कहते हैं मै विश्‍वास नहीं करूंगा। नकुल सहदेव को पूछे, नकुल सहदेव नें कह दिया मर गए। कहते हैं मै हरि - अर्जुन को पूछ लेता हूं। भीम सेन कहते हैं जावो पूछ लो। द्रोणाचार्य आकर अर्जुन को पूछते हैं, अश्‍वत्‍थामा मर गया क्‍या? द्रोण आकर कहते हैं, अर्जुन मै मन मे विश्‍वास लेकर आया हूं, बोलते हैं, बेटा बताओ क्‍या वाकई अश्‍वत्‍थामा मर गया या जी रहा है। आदेश के अनुसार अर्जुन भी कहता है अश्‍वत्‍थामा मर गया। पर द्रोणाचार्य बोले नहीं अर्जुन मै तुम्‍हारी बात पर विश्‍वास नहीं करूंगा। क्‍योंकि, तुम इस छलिया के साथ सदैव रहते हो। इसके साथ में तुम भी झूठ बोलना सीख गए हो। भगवान की ओर इशारा करके गुरू द्रोण कहते हैं, इसके साथ में तुम भी झूठ बोलना सीख गए हो। जब तक महाराजा धर्मराज नहीं कहेंगे अश्‍वत्‍थामा मर गया तब तक इस शरीर को नहीं त्यागूंगा। भगवान हंस कर कहते हैं पूछ लो द्रोण

 

 

ये बजार ये गा भइया दुनिया मड़ई मेला बजार ये

ये राम नाम दुनिया म सार हे गा मोर भइया, दुनिया दुनिया मड़ई मेला बजार ये

राम नाम जिनगी के अधार हे गा भइया, दुनिया मड़ई मेला बजार ये

हां जिही मेर कचरा उही मेर हीरा, जिही मेर मया उही मेर पीरा।

हां जिही मेर कचरा उही मेर हीरा, जिही मेर मया उही मेर पीरा।

दुनिया म सौदा हजार हे ग मोर भइया,  दुनिया मड़ई मेला बजार ये

 

यह बाजार है जी भैया दुनिया मड़ई (गांवों में उत्‍सव धर्मी मेला) मेला बाजार है। यह राम नाम दुनिया में सार है जी मेरे भाई, राम नाम जिन्‍दगी का अधार है भाई। जहां कचड़ा है वहीं हीरा है, जहां प्रेम है वहीं  दर्द है। दुनिया मे सौदा तो हजार है भाई,  दुनिया मड़ई मेला बजार है।

 

 

भगवान कहय जा पूछ ले। जब द्रोणाचार्य राजा युधिष्ठिर ल पूछे ल जात हे, भगवान मन म विचार करथे। ये गड़बड़ कर दिही तइसे लागत हे। भगवान द्वारिका नाथ राजा युधिष्ठिर के बगल में खड़े हँ। भगवान कहते है पूछलो। द्रोणाचार्य जाके राजा युधिष्ठिर ल कहत हे धर्मराज। आज मै बहुत, बड़े आस अउ बिसवास लेके आए हंव, मै जानत हंव जागते जागत तैं सपना म घला तै झूठ नइ बोलस। असत्य नइ भाखस। अउ इही बिस्वास ल लेके आए हंव। सारी सेना कहत हे, भीम सेन कहत हे, हरि अर्जुन कहत हे, के अस्वस्थामा मारे गे। तै मोला ये बता के अस्वस्थामा मर गे या जीयत हे? रागी भाई बगल म भगवान खड़े हे, घेरी बेरी इशारा मारत हे, धरम राज ल, कइ दे, देर मत कर, राजा युधिष्ठिर कहे मै लबारी कइसे मारिहंव, इतना बड़ा झूठ वो भी गुरू के सामने, एक तुच्छ राज्य के लिए, भगवान बोले युधिष्ठिर। सोच ले कहूं ये बात नइ बोल सकेस त द्रोणाचार्य ल नइ जीत सकबे। समय देख के ही इंशान ल बोलना हे, सही बोले के जगा म सही अउ गलत बोले के जगा म गलत, बोल दे। अस्वस्थामा मर गे। मै अतका कन कहे ल नइ सकंव द्वारिका धीश भगवान कथे अस्वस्थामा मर गे कइ दे। अस्वस्थमा नाम के मरे हे नर या कुंजर। आखिर म राजा युधिष्ठिर ल कहे ल पर गे। दोनो हाथ जोर के कथे महाराज के कुरूक्षेत्र के मैदान म अस्वस्थामा नाम के मरे हे, नर या कुंजर महराज। नरो या कुंजरो। नर कहिस तेन ल सुनिस द्रोन हा अउ कुंजर कहिस ततके बेर भगवान ह

वो ह अपन संखे ल फूंकन लागे भाई

भगवाने फूकन लागे गा मोर भाई

 

भगवान कहते हैं जाकर पूछ लो। जब द्रोणाचार्य राजा युधिष्ठिर को पूछने जा रहे हैं, भगवान मन में विचार कर रहे हैं। यह गड़बड़ कर देगें ऐसे लग रहा है। भगवान द्वारिका नाथ राजा युधिष्ठिर के बाजू मे खड़े हैं। भगवान कहते हैं पूछ लो। द्रोणाचार्य जाकर राजा युधिष्ठिर को कहते हैं धर्मराज। आज मै बड़ी आशा और विश्‍वास लेकर आया हूं, मै जानता हूं जागते हुए क्‍या तुम सपना में भी झूठ नहीं बोलते, असत्य नहीं बोलते और इसी विश्‍वास को लेकर आया हूं, सपूर्ण सेना कह रही है, भीम सेन कह रहा है, हरि-अर्जुन कह रहे हैं, कि अश्‍वत्‍थामा मारा गया। तुम मुझे यह बताओ कि अश्‍वत्‍थामा मर गया या जीवित है? रागी भाई भगवान बाजू में खड़े हैं, बार-बार धर्म राज को इशारा कर रहे हैं, कह दो, देर मत करो। राजा युधिष्ठिर कहते हैं मै झूठ कैसे कहूंगा, इतना बड़ा झूठ वह भी गुरू के सामने, एक तुच्छ राज्य के लिए, भगवान बोले युधिष्ठिर, सोच लो कहीं यह बात नहीं बोल सके तो द्रोणाचार्य को जीत नहीं सकोगे। समय देख कर ही इंसान को बोलना है, सही बोलने के स्‍थान में सही और गलत बोलने के स्‍थान में गलत, बोल दो। अश्‍वत्‍थामा मर गया। मै इतना कह नहीं सकूगा द्वारिकाधीश भगवान कहते हैं अश्‍वत्‍थामा मर गया कह दो। अश्‍वत्‍थामा नाम का मरा है नर या कुंजर। अंत में राजा युधिष्ठिर को कहना पड़ गया। दोनो हाथ जोड़ कर के कहते हैं महाराज कि कुरूक्षेत्र के मैदान में अश्‍वत्‍थामा नाम का मरा है, नर या कुंजर महाराज। नरो या कुंजरो। नर कहा उसे द्रोण ने सुना और कुंजर कहे उसी समय भगवान

वे अपने शंख को फूंकने लगे भाई, भगवान फूंकने लगे जी मेरे भाई।

 

 

नरो या कुंजरो, नर ल सुनन पाइस कुंजर कहिस ततके बेर भगवान ह संख ल बजा दीस। द्रोन ल बिसवास होगे, राजा युधिष्ठिर कइ दिस त मोर बेटा के मृत्यु होगे। अब ये दुनिया म का रखे हे, मै अब ये दुनिया म नइ जियंव रागी भइया। बोले आज मै अपने बेटा के सोक म अपन प्राण ल त्याग देहौं। द्रोणाचार्य लड़ाई के मैदान म अस्त्र सस्त्र त्याग देथे। अउ लड़ाई के मैदान म स्वांस खीच के जब ब्रम्हांड म चढ़ाए के जब कोशिश करथे, सरोवर म स्नान करे के बाद, ओतके बेर फेर रागी भाई राजा द्रुपद के बड़े बेटा धृष्‍टदुम्‍न नाम के बीर आथे। द्रोणाचार्य स्वास खींच के ब्रम्हांड म चढाए हे, अउ वही समय राजा द्रुपद के बड़े बेटा धृष्ट दुम्न  पहुंचत हे। रागी खीचे है कमर से तलवार और हाथ म तलवार लेके राजा द्रुपद का बड़ा बेटा दृष्ट दुम्न बीर ह

द्रोने के सिरे काटन लागे भाई, द्रोणाचार्य के सिर काट देथे

 

नरो या कुंजरो, नर को सुन पाते हैं कुंजर कहे उसी समय भगवान शंख को बजा दिये। द्रोण को विश्‍वास हो गया, राजा युधिष्ठिर कह दिए तो मेरे बेटे की मृत्यु हो गई। अब इस दुनिया मे क्‍या रखा है, मै अब इस दुनिया में नहीं जिऊंगा रागी भइया। बोलते हैं आज मै अपने बेटे के शोक मे अपने प्राण को त्याग दूंगा। द्रोणाचार्य लड़ाई के मैदान में अस्‍त्र शस्‍त्र त्याग देते हैं। सरोवर में स्नान करने के बाद लड़ाई के मैदान में श्‍वास खीच कर जब ब्रम्हांड में चढ़ाने की कोशिश करते हैं उसी समय रागी भाई राजा द्रुपद के जेष्‍ठ पुत्र धृष्‍टदुम्‍न नाम का वीर आता है। द्रोणाचार्य श्‍वास खींच कर ब्रम्हांड में चढाए हैं, उसी समय राजा द्रुपद के बड़े पुत्र धृष्टदुम्न पहुंचता है। रागी खीचते हैं कमर से तलवार और हाथ मे तलवार लेकर राजा द्रुपद का बड़ा बेटा दृष्टदुम्न वीर

द्रोण का सिर काटने लगा भाई, द्रोणाचार्य का सिर काट देते हैं

 

 

ये बड़े बड़े बीरे गा चलान लागे भाई, हाहाकार मचगे द्रोणाचार्य के बध होगे। निकाल के अर्जुन देवदत्त नाम के संख फूंक दीस। पांडव हांसत हांसत चलत हे। अउ कौरव के दल

रोवत रोवत गा चलन लागय गा भाई  हा गुरू द्रोन।

ये राजा दुरूयोधन गा रोवन लागे भाई

ये राजा दुरूयोधन गा रोवन लागे भाई

 

बड़े बड़े वीर चलने लगे भाई, हाहाकार मच गया द्रोणाचार्य का वध हो गया। अर्जुन देवदत्त नाम के शंख को निकाल कर फूंक दिए। पांडव हंसते हंसते चल रहे हैं। और कौरव का दल रोते रोते चल रहा है भाई, हा गुरू द्रोण।

राजा दुर्योधन रोने लगता है भाई, राजा दुर्योधन रोने लगता है भाई

 

 

पांचवा दिवस के लड़ाई म कौरव के दल रोते रोते चलते है। पांडव के दल हांसत हांसत आवत हे। माता द्रौपदी हाथ म भोजन बनाए हे, पांडव के रस्ता देखत हे। पांचो भइया पांडव कृत, कुंडल, बसन भूसन ल उतारथें। अउ कृत, कुंडल, बसन भूसन ल उतार के माता द्रौपदी के मंदिर म भोजन करे जात हें। रागी भइया -

पंच गौर इक श्याम सरीर, पांचों भइया के गोरा रंग भगवान के श्यामला रंग पांडव जब पहुंचिस तहान माता द्रौपदी ह

 

पांचवे दिवस की लड़ाई मे कौरव दल रोते रोते चल रहा है। पांडव का दल हंसते हंसते आ रहा है। माता द्रौपदी हाथ से भोजन बनार्इ हैं, पांडवों का रास्ता देख रही हैं। पांचो भैया पांडव किरीट, कुंडल, वस्‍त्र आभूषन को उतार रहे हैं। और किरीट, कुंडल, वस्‍त्र आभूषण को उतार कर माता द्रौपदी के मंदिर में भोजन करने जा रहे हैं। रागी भइया -

पांच गोरा एक सावला शरीर, पांचों भैया का गोरा रंग भगवान का श्यामल रंग, पांडव जब पहुंचे फिर माता द्रौपदी

 

 

अगा छै ठन लोटा म पानी लावन लागय भाई

दोनो हाथ जोर के बोलय भइया चलव भोजन करव चलव

वो ह छे ठन लोटा म पानी देवन लागय भाई

भगवाने काहान लागै गा मोर भाई

लोटा के पानी ल अंगना म मड़ावत हे द्रौपदी अउ कहत हे भइया चल भोजन करिहव। तब जानो मानो कोनो ठेका लेहे तइसे

भगवान हा उठा उठा के  पांचो भाइ ल देवन लागे न मोर भाई

भगवाने देवन लागे गा मोर भाई

 

अजी छ: लोटे में पानी लाने लगी भाई, दोनो हाथ जोड़ कर बोल रही है भैया चलो भोजन कर लो चलो।

वह छ: लोटे में पानी देने लगती है भाई, भगवान कहने लगे मेरे भाई

लोटे के पानी को आंगन में रखती है द्रौपदी और कहती है भैया चलो भोजन कर लो। तब जैसे कोई ठेका लिये हैं वैसे

भगवान उठा उठा कर पांचो भाई को देने लगते हैं मेरे भाई। भगवान देने लगते हैं मेरे भाई।

 

 

पानी ल उठा उठा के भगवान ह जानो मानो पांडव घर के बछरू चरवाहा लगे हे तइसने पांडव के हाथ म देवत हे। पांडव समेंत भगवान श्यामसुंदर हंसते हुए भोजन करते है। अउ माता द्रौपदी सुन्दर बीडा बना के देवत हे, बीडा बना के दे के बाद भगवान ल पूछत हे भइया आज के लड़ाई म बिजय काकर होए हे। भगवान कथे पांचाली आज के लड़ाई में हमन जीते हन।

 

पानी को उठा उठा कर भगवान जैसे पांडव घर का कोई बछड़ा चराने वाला नियुक्‍त हुआ है वैसे पांडवों के हाथ में दे रहे हैं। पांडव समेत भगवान श्याम सुंदर हंसते हुए भोजन करते हैं। और माता द्रौपदी सुन्दर बीडा बना कर दे रही हैं, बीडा बना कर देने के बाद भगवान को पूछ रही हैं भैया आज की लड़ाई मे किसकी जीत हुई है। भगवान कहते हैं पांचाली आज की लड़ाई मे हम लोग जीते हैं।

 

 

भगवान कहते है, ऐ द्रौपदी आज हमन जीते हन। राजा धरमराज बोले आज तै मोला अपन गुरू के सामने झूठ बोलवा दिये। राजा युधिष्ठिर कहिस केसव मै कभू झूठ नइ बोलेव। ओतका ल सुनिस भगवान तहां ले कहत हे, देख भइया। इंसान ल समय देख के बालेना चाइये। काकरो कहिं प्रान ह बांचत हे त, लबारी मारत हस काकरों काम बनत हे त ओ ह झूठ नई होवय। वोतका ल सुनिस त द्रौपदी कहत हे द्वारिका नाथ।

 

भगवान कहते हैं, एै द्रौपदी आज हम लोग जीते हैं। राजा धर्मराज बोलते हैं आज तुम मुझे अपने गुरू के सामने झूठ बोलने पर विवश कर दिए। राजा युधिष्ठिर कहते हैं केशव मै कभी झूठ नहीं बोला हूं। इतना सुनने पर भगवान कहते है, देखो भैया। इंसान को समय देख कर बालना चाहिये। कहीं किसी का प्राण बच रहा हो किसी का काम बन रहा हो तब झूठ बोलना, झूठ नहीं होता। इतना सुन कर द्रौपदी कहती है द्वारिका नाथ।

 

 

सबरी के बोइर अउ सुदामा के तांदुल रूचि मूचि भोग लगाये

ये रूचि मूचि भोग लगाये, रूचि मुचि भोग लगाये

गज अरू ग्राह लड़य जल भीतर भीतर

गज अरू ग्राह लड़य जल भीतर भीतर

लड़त लड़त गज हारे हो राम

लड़त लड़त गज हारे हो राम

अरे भाई गज के टेर सुनेहू रघुनंदन

तब पाय पियतु पगु धाये

अउ केसव स्तुति करन लागय भइया

अउ केसव स्तुति करन लागय भइया

 

शबरी के बेर और सुदामा के चांवल को पूरे स्‍वाद और आनंद के साथ भोग लगाया है (आपने)। जब गज और ग्राह जल के भीतर लड़ रहे थे और लड़ते लड़ते गज हार गया। तब गज की पुकार सुनकर रघुनंदन नंगे पांव दौड़े चले आये थे। (ऐसा गाते हुए) केशव की स्तुति करने लगी भैया।

 

 

कौरव दल पांडव दल पंद्रा दिन के महाभारत सम्पन्न होए जात हे रागी भइया। दस दिन लड़ के भीष्म बान के सइया म परे हे। पांच दिन लड़ के द्रोणाचार्य कुरूक्षेत्र म जुझ गें, पंद्रा दिवस के महाभारत सम्पन्न होगे। तीन दिवस के महाभारत बाकी है, दोनो दल भोजन पान करते है और दोनो की दल अपने अपने शिविर में विस्राम करते है।

इही जगा ले ये द्रोन पर्व के ये प्रसंग सम्पन्न हो जाथे। वैसम पायन जी कहत हे राजन ये द्रोन पर्व के प्रसंग सम्पन्न हो जाथे अब आगे मैं आप ल करन पर्व के प्रसंग बतावत हंव।

भारत कथा पुनीत अति, अरे भई सुनतेहु पाप बिनास,

अरे श्रवन पान के करत ही छूटइ यम के पास।

बोलिये वृंदावन बिहारी लाल की जय।

 

कौरव दल और पांडव दल के बीच पंद्रह दिन का महाभारत सम्पन्न होने वाला है रागी भैया। दस दिन लड़ कर भीष्म बाण की सैया में पड़े है। पांच दिन लड़ कर द्रोणाचार्य कुरूक्षेत्र मे वीरगति को प्राप्‍त हुए, पंद्रह दिवस का महाभारत सम्पन्न हो गया। तीन दिन का महाभारत बचा है, दोनो दल भोजन कर रहे हैं और दोनो दल अपने अपने शिविर में विश्राम कर रहे हैं।

यहीं से द्रोण पर्व का यह प्रसंग सम्पन्न हो गया। वैसम्‍पायन जी कहते हैं राजन यह द्रोण पर्व का प्रसंग सम्पन्न हो गया अब मै आगे आपको कर्ण पर्व का प्रसंग बताउंगा।

महाभारत की कथा बहुत पवित्र है, इसके सुनते ही पाप का नाश हो जाता है। इसके श्रवन करते ही यम के पाश से मुक्ति मिल जाती है।

बोलिये वृंदावन बिहारी लाल की जय।

 

 

श्रुतलेखन एवं हिन्‍दी अनुवाद – संजीव तिवारी

 

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and archaeology, Government of Chhattisgarh to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.
 

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