अनीता भारती

अनीता भारती हिंदी लेखिका, कवियित्री और आलोचक हैं| वे एक सामाजिक अधिकार कार्यकर्ता भी हैं और दलित महिलाओं से संबंधित विषयों पर अक्सर लिखती हैं| वे ‘युद्धरत आम आदमी’ नामक हिंदी साहित्य पत्रिका के एक विशेषांक ‘स्त्री नैतिकता का तालिबानीकरण’ की अतिथि सम्पादक रही हैं| इनकी प्रकाशित पुस्तकों में से एक समकालीन नारीवाद और दलित महिलाओं के पुनर्जागरण के विषय पर साहित्यिक आलोचना है|

तुलसीराम की बहुचर्चित आत्मकथा मुर्दहिया में अनेक स्त्री पात्र आए है जिन्हें मैं छः वर्गों में रखकर देखती हूँ| पहला वर्ग लेखक के परिवार के स्त्री पात्रों का है जिसमें लेखक की दादी, माँ, चाची, बुआ, आदि शामिल है। दूसरा वर्ग गाँव की दलित-श्रमिक स्त्री पात्रों का है, तीसरा वर्ग गाँव के सवर्ण स्त्री पात्र, चौथा गाँव की पराशक्तिधारी व काल्पनिक स्त्री पात्रों यथा चुडैल, भूतनियों, देवियों, आदि का है तथा पाँचवे वर्ग में गाँव में बाहर से आने वाली स्त्री पात्र जैसे चूड़ीहारिन, आदि हैं। छठा वर्ग हम उन दलित गैर दलित स्त्री पात्रों का मान सकते है जो शिक्षित-अशिक्षित-अर्धशिक्षित महिलाएं हैं जो लेखक को गाँव से बाहर पढ़ाई के लिए जाते और पढ़ाई करते समय मिलती हैं।

 

हम सबसे पहले यदि गाँव की औरतों की बात करें, खासकर लेखक के परिवार की स्त्रियों की तो पूरे मुर्दहिया में लेखक ने अपनी दादी का ज़िक्र एक नायिका की तरह किया है। लेखक की दादी प्यार, ममता और समझदारी की मूर्ति है। वह वैद्य हैं। वह अच्छी कथा वाचिका हैं, व भविष्य के बारे में सोचने वाली हैं। इसके अलावा वह एक ऐसी जुझारू दलित औरत के रूप में सामने आती हैं जो अपने अधिकारों के लिए लड़ मरती हैं। दादी बालक तुलसीराम को बेहद प्यार करती हैं। दादी का राजदार भी बालक तुलसी ही है। तुलसीराम जी के बीमार पड़ने पर दादी तुलसीराम को ठीक करने के लिए जितने जतन हो सकते हैं, वह सब करती हैं। बालक तुलसीराम को भी दादी से इतना लगाव है कि वह एक बार दादी के बीमार पड़ने पर उनके मरने की आशंका से इतना डर जाता है कि वह कहने लहता है- ‘हे चमरियां माई, मैं भले ही मर जाऊं पर दादी न मरे’ (पृ. 28)| तुलसीराम के ज्ञान विस्तृत करने में दलित समाज के समाजशास्त्रीय अध्ययन की जिज्ञासा में दादी मुसडिया का गहरा योगदान रहा। दादी ने बालक तुलसीराम को दलितों द्वारा मरे जानवर का माँस खाना और उसके संग्रहण के तरीके बताती हैं। दादी के गर्भ में अनेक कहानियाँ छिपी हैं जिनमें भूत, चुडैल, नागिन, अंग्रेज़ी राज की, ब्राह्मणों के दमन की, आदि, आदि। दादी का जन्म लेखक उनकी आयु का अनुमान लगा 1861 या 1870 के आसपास मानता है| यह दादी के अनेक गुणों में से एक गुण था- लेखक से असीम प्यार। जब तुलसीराम जी को चेचक निकली तो दादी ‘उछर मेरी बुढिया दादी जय चमरिया माई, जय चमरियां माई की बार-बार रट लगाते हुए अंगियारी करती रहती थी। दादी मेरी माँ से ज्यादा रोती थी (पृ. 12)| बालक तुलसीराम की जान तो बच गई पर आँख चली गई और चेहरे पर दाग भी पड़ गए। पर दादी को अब और प्यार हो गया। दादी मुझे रात में भी अपने पास सुलाती और हमेशा मेरे मुँह पर हाथ फेरते हुए चमरिया माई विनती करती रहती’ (पृ. 13)|

 

दादी और पोते में तनिक अधिक गहरी दोस्ती और विश्वास था कि दादी अपने बेटे  बहुओं से छिपकर बालक तुलसीराम को अपने विक्टोरिया वाले सिक्के, जो कि उनको अपने पति से मिले थे, को ही दिखाती है और बार-बार गिनकर रखती है। दादी बालक तुलसीराम को अपने पैर और घुटने में ‘ठुंटु मुंटू’ खेल खिलाती। यदि घर में कोई खाने का सामान आता तो वे उसके कुछ हिस्सों को तुलसीराम के लिए छिपाकर रखती। दादी के अटूट प्यार का वर्णन करते हुए तुलसीराम कहते हैं- ‘इसी तरह जाड़े के दिनों में कौड़ा तापते हुए वह आलू तथा ताजा मटर की छिम्मी भूना करती तथा अन्य बड़े बच्चों से छिपाकर सिर्फ मुझे ही खाने को देती’ (पृ. 29)। दादी ने ही लेखक को भय से लड़ने के तरीके बताए जिसमें ‘दादी मुझे अक्सर, याद दिलाती कि किसी झाड़ी से गुज़रते हुए ‘जै राम जमेदर’ जरूर दोहराते जाना। ऐसा कहने से नाग-नागिन भाग जाते है। मैं दादी की सारी बातों को इस धरती का अकार्य, उनका पालन करता था और जब भी किसी कंजास से गुजरता, मैं जै राम जमेदर, जै राम जमेदर रटता जाता, किन्तु इस मंत्र की गुत्थी न दादी जानती थी और न गाँव का कोई अन्य। दादी इस तरह की अनसुलझी गुत्थियों का एक साइक्लोपीडिया थी। लेखक की दादी फक्कड़ बाबा की हत्या के बाद अपने घर को भूतों से भय मुक्त करने के लिए अपने खानदनी भूतबाबा को प्रसन्न करने के लिए भेजती है जिसमें लेखक अपने चाचा के साथ जाता है और चढ़ावा चढ़ाता है। इस पर लेखक का कथन है- ‘इस चढ़ावे के बाद दादी का कहना था कि अब फक्कड़ बाबा की हत्या का बदला लेने के लिए किसी अन्य भूत को हमारे खानदानी भूतबाबा हमारे परिवार के आसपास भटकने नहीं देंगे। दादी की इस बात से घर के सारे लोग पूर्ण रूपेण आश्वस्त हो गए’। (पृ. 47) दलित परिवारों में धनाभाव के कारण कई विद्याएं अपने आप आ जाती है। जब किसी बच्चे के पेर में गाँव में पैदा होने वाले फल-फूल पड़ी बूटियों का वे बहुत अच्छा इस्तेमाल करना सीख जाते है। इन्हीं कामों में लेखक  की दादी सिद्धहस्त है- ‘उधर मुर्दहिया के पलाश के टेसू जब मुरझाकर ज़मीन पर गिरने लगते तो उनकी जगह सेम की चिपटी कलियों जैसी पलाश की भी छः-सात इंच लम्बी-चिपटी फलियाँ जिन्हें दादी टेसुल कहती थी, निकलने लगती। कुछ दिन बाद ये टेसुल सूखकर गिर जाती तो मेरी दादी इन टेसुलों को मुझसे घर पर लाने के लिए कहती। वह टेसुलों को फाड़कर उसी तांबे के बड़े सिक्के डब्बल की तरह दिखाई देने वाले बीजों को निकालकर एक बड़ी सींग में रखती। जब किसी बच्चे के पेट में केंचुए या अन्य कीड़े पैदा हो जाते तो दादी सींग से पलाश के कुछ बीज निकालकर देती और सिल लोढ़े से थोड़े पानी के साथ उसका इस यानी घोल बनाकर पिलाने को कहती जिससे सभी कीड़े मरकर बाहर निकल जाते। दादी घर में बड़ी पुरानी बड़ी बड़ी सींग रखे हुए थी। इन सींगो में वह में वह हींग समेत अनेक प्रकार की खराबिरिया दवाएं रखती थी......... जब भी साही मारी जाती उसकी आंतड़ियों पोटियों को खूब साफ करवाकर पानी में धुलव लेती ओरत सूखने के बाद ये आंतड़ियां सूखी लकड़ी की तरह चटाचट टूट जाती। दादी इन्हें सींग में भरकर रख देती। जब किसी के पेट में दर्द करता, थोड़ी सी आंतड़ी-पोरी तोड़कर उसे सिया पर दो चम्मच पानी डालकर वहीं राख बनाकर सुतुही से पिला देती। पर दर्द तुरन्त बंद हो जाता। दालचीनी तथा बांस का सींका पीसकर ललाट पर लगाने से सिरदर्द बन्द हो जाता। दादी इस तरह एक वैद्य भी थी। (पृ. 49) अकाल में दलितों की सबसे बुरी हालत हो गई थी| एक तो खाने के लिए वैसे ही कुछ नहीं होता था ऊपर से अकाल में तो बिल्कुल भुखमरी की नौबत आ जाती थी। अकाल के दौरान सबसे सस्ती वस्तु चीनी मिल से निकला हुआ चोटा होता था। अधिकतर दलित बाज़ार से लाकर सुबह और दोपहर को उसका रस घोलकर पीते थे तथा उसके साथ मटर की दाल पानी में भिगोकर एक दो मुट्ठी खा लेते थे। रात के समय यदि उपलब्ध हुआ तो आटे की मोरी लिट्टी बनाकर नमक प्याज से लोग गुजारा करते थे। चोटा लगाकर पीते से रहने से विशेष रूप से बच्चों को अक्सर पेचिश की बीमारी हो जाती थी ऐसा होने पर दादी प्राय गाँव की औरतों को कहती कि वे अमरूद या अमलतास की पत्ती पीसकर छानने के बाद उसका रस पेचिश पीड़ितों को पिलायें। इस रस से पेट हमेशा ठीक हो जाता। गाँव के आसपास छोटे मोटे जल स्रोतों के सूख जाने के कारण दलित बच्चे अक्सर बहुत कम नहा पाते थे, इसलिए खुजली की बीमारी बड़ी तेजी से फैल जाती थी। दादी खुजली ठीक करने के लिए 'भंगरैया' नामक पौधे की पत्तियाँ पीसकर उस पर छोपने के लिए कहती थी, जिससे खुजली ठीक हो जाती थी। फोड़े-फुंसी पर अकोल्ड के पत्तों पर मदार के दूध को पोतकर चिपकवा देती, जिससे उसका इलाज हो जाता। इस प्रकार के अनेक नुस्खों से उस अकाल में दादी अनेक लोगों का मुफ्त में इलाज कर देती थी (पृ. 63)|

 

दादी की हार्दिक इच्छा थी कि लेखक खूब पढ़े-लिखे- ‘दादी हमेशा कहती रहती थी कि खूब पढ़ के रंगरेज जइसन बनिया (पेज 83)| दादी की ऐसी बातों से मुझे बहुत राहत मिलती। लेखक का भरोसा जाग जाता कि दादी पढ़ाई के लिए विक्टोरिया वाले सिक्के दे देंगे। मरे जानवरों का माँस खाकर चिल्लाते गिद्धों से जब लोग भयग्रस्त हो जाते तब दादी की दृष्टि अलग होती वे कहती- ‘गिद्धवा ढेर खाइ लेहले हउवैं येहि मारे पेटवा दुखात हउवै, जेहि कारन ऊ चिल्लावै लगै लै’ (पृ. 88)| जब लेखक छठी कक्षा में पहुँचा तो परिवार के अन्य सदस्य लेखक का नाम स्कूल में नहीं लिखाना चाहते थे| बात पैसे की भी थी और तब बड़ी मुश्किल से दादी की जिद पर मुझे चार आना मिला, जो छठी कक्षा में नाम लिखवाने की फीस थी। यह चवन्नी इस बात की गारंटी थी कि अब छठी से लेकर दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई का मार्ग खुल गया’ (पृ. 100)| दादी का प्रकृति प्रेम भी अदूभुत था। गाँव में पेड़ कटने पर दादी कहती- ‘पेड़ कटाने से आसमान उदास लगता है’ (पृ. 130)।

 

मुर्दहिया में दादी का जितना विशद वर्णन है उसके मुकाबले लेखक ने अपनी माँ का चित्रण थोड़ा कम किया है। लेखक की माँ अत्यंत मेहनती, घर के काम में जुटे रहने वाली महिला है। मुर्दहिया में लेखक पैदा के होने पर माँ-बाप द्वारा एक कुशल मछवारा बनने के लिए पैदा होते समय चारपाई के नीचे जिंदा मछली डालने पर कहा- एक दलित खेत मजदूर और मजदूरनी की आकांक्षा इससे ज्यादा और क्या हो सकती थी। इससे पहले इस मजदूर दंपति के कई बच्चे थोड़े बड़े हो-होकर सबके सब मरते गए थे। अत: लेखक के पैदा होने पर अनेक अंधविश्वास भरे कर्मकांड किए गए। गाँव में चेचक की बीमारी फैलने पर लेखक की एक आँख खराब होने पर और घर के कुछ सदस्यों का लेखक के प्रति क्रुर व्यवहार का वर्णन करते हुए माँ के आहत हो जाने का लेखक वर्णन करता हुआ कहता है- ‘यहाँ तक कि मेरी माँ की सिसकियाँ भरते हुए चुप रह जाया करती थी’, जिसका कारण था उन व्यक्तियों का क्रुर व्यवहार (पृ. 13)| लेखक की माँ उनके लिए पिता के साथ मजदूरी करती थी। घर में दीवाली के समय गरीबी भगाने के प्रंसग का वर्णन करते हुए लेखक कहता है- ‘दीवाली का त्यौहार आने पर मेरी माँ परम्परा के अनुसार अनाज पछोरने वाले सूप को एक लकड़ी से भद-भद पीटते हुआ रात की अंतिम घड़ी में घर के एक-एक कोने में जाती और साथ में ज़ोर-ज़ोर से अर्द्धगायन शैली में 'सूप पीटो दरिददर खेदो' का जाप भी करती रहती। गाँव की अन्य महिलाएं भी ऐसा करतीं, किन्तु कोई घर के दरिद्रता भगा पाने में सफल नहीं हुई’ (पृ. 63)। लेखक अपनी माँ को खेतों में जी तोड़ मेहनत करते देखकर बहुत दुखी होता- ‘इस प्रक्रिया के द्वारा मोट का पानी ऊपर आता था जिसे हमेशा औरत मजदूर पकड़कर नाली में गिरा देती थी। इस औरत के काम को मोट छीनना कहते थे। घर्रा खींचने की सारी प्रक्रिया पुर जैसी होती थी, किन्तु पौदर में बैलों की बदले स्वयं आदमी परहे को पकड़कर मोट को खींचते थे। पूरा और घर्रा दोनों में औरत ही मोट खींचती थी। छुट्टियों के दिन मै भी पिताजी के साथ घर्रा खींचने में सहायता करता था और मेरी माँ हमेशा मोट छीननी थी। अपनी माँ को मजदूरी करते देख मुझे बहुत दुख होता था’ (पृ. 66)| जब लेखक सातवीं कक्षा में पहुँचा तो लेखक की माँ को रतौंधी आने लगी- ‘उसी समय मेरी माँ को रात में दिखाई देना बंद हो गया। अत: वह टोटका स्वरूप वह रात के अंधेरे में सरसों के तेल से मिट्टी की ढकनी में कपास की बाती जलाकर यूँ ही कुछ ढूंढने निकल पड़ती थी। कौतुहलवश किसी ने पूछ लिया कि क्या ढूंढ रही है कुछ खो गया है क्या? तो वह तुरन्त घर में यह कहते हुए वापिस आ जाती कि वह रतौंधी ढूंढ रही थी’। अपनी माँ पर हुए अत्याचार का वर्णन करते हुए लेखक कहता है- ‘इस  बीच हमारे घर में भी एक विचित्र स्थिति पैदा हो गई। मेरी माँ बस्ती के किसी भी व्यक्ति से बात करती पिताजी तुरन्त उसके चरित्र पर उंगली उठाना शुरू कर देते थे। वे माँ को बहुत भद्दी-भद्दी गालियां देने लगते थे।....... माँ के चरित्र वे उसी गुस्सैल नग्गर चाचा से भी करते किन्तु नग्गर चाचा हमेशा पिता को बुरी तरह डांट देते...... क्सर वे माँ को फस्खी से मारने दौड़ पड़ते थे।

 

माँ के प्रति अन्याय देख लेखक के मन में पिता के लिए नफ़रत पैदा हो गई, और माँ के प्रति सहानुभूति- ‘मेरी इस घृणा की पराकाष्ठा शीघ्र ही पिताजी के प्रति हिंसा में बदल गई। सन् 1961 के ही जाड़ों की बात है, पिताजी माँ को मारने के लिए फरूही लेकर दौड़े। मैं वहीं खड़ा था। मैंने बहुत ज़ोर से पिताजी को तमाचा मारा। उन्होंने मुझे उलटकर वैसे ही मारा। उनका तमाचा इतना ज़ोर का था कि मैं कुछ देर के लिए चौंधिया सा गया। मुझे कुछ पल के लिए कुछ भी दिखाई नहीं दिया। मुझे ऐसा लगा मानो मैं अंधा सा हो गया। किन्तु इस घटना का परिणाम यह हुआ कि आगे पिताजी माँ को मारने से घबराने लगे। बस्ती के सभी लोगों ने मुझे सही ठहराया’ (पृ. 126)। जिस समय लेखक ने अपनी माँ के ऊपर होने वाले अत्याचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी उस वह समय मात्र 12 साल का था।

 

जब लेखक ने नोवीं पास की तो उसके सामने 10वीं की पढ़ाई जारी रखने की समस्या थी। घर के सभी लोग लेखक की पढ़ाई छुड़वाना चाहते थे, जिससे लेखक बहुत दुखी था। अपने बेटे को दुखी देखकर ‘मेरी माँ फूट-फूट कर रोने लगती, किन्तु वह बेबस थी, वह कुछ कर सकने की स्थिति में नहीं थी। आखिरकार जुलाई आ ही गई, घर वालों के विरोध के बावजूद में सुबह बिना कुछ खाए खाली पेट स्कूल जाने लगा। घर पर संयुक्त परिवारिक जीवन मे व्यक्तिगत रूप से भोजन की व्यवस्था मेरे लिए असंभव थी। बाद में ऊबकर मेरी माँ रात के अपने खाने में से आधा खाना बचाकर ताखा में रख देती थी जिसे न चाहते हुए मैं खाकर स्कूल जाता था। माँ के इस त्याग से द्रवित होकर सुबह खाते हुए मैं अक्सर रो पड़ता था (पृ. 150)।

 

माँ और दादी के अलावा मुर्दहिया में सिर्फ ऐसा नहीं कि माँ को केवल अपने बेटे से ही प्यार है| अपितु वे तुलसीराम जी के साथ पढ़ने वाले ज़मींनदार के लड़के चिंतामणि जिसको मिर्गी का दौरा पड़ता था, के लिए भी वात्सल्य रखती थी| उसके लिए भी ‘मेरी माँ शंकर भगवान की प्रार्थना करते हुए उनकी मिर्गी ठीक हो जाने की गुहार लगाती’।

 

मुर्दहिया में दादी और माँ के अलावा कई और दलित स्त्री पात्र हैं जिनमें सुभगिया और किसुनी भौजी हैं जो लेखक से अपनी चिट्ठी पढ़वाती और लिखवाती हैं। सुभगिया तुलसीराम की गाँव की लड़की है, जो देखने में बहुत सुन्दर है| ‘हमारी बस्ती में रहने वाले जंलधर नाम के बूढ़े दलित की जवान बेटी थी। वह बड़ी सुन्दर थी। कुछ माह पहले उसका गौना बिसराम नामक एक ऐसे युवक के साथ हुआ था जो कलकत्ता के सियालदह स्टेशन के आसपास घोड़े की तरह खींचने वाला ठेला रिक्शा खींचता था और बराबर सुभगिया को चिट्ठी लिखता रहता था। लेखक गाँव का एकमात्र पढ़ा-लिखा तीसरी कक्षा में पढ़ रहा था। लेख को पढ़ना तो आ गया था पर रूक-रूक कर।

 

‘लिखता हूँ खत खून से स्याही न समझना। मरता हूँ तेरी याद में जिन्दा न समझना। यब सुनकर सुभगिया दहाड़ मार-मार कर रोने लगी। उसे लगा शायद उसके पति जिन्दा नहीं है’ (पृ. 36)| दलित औरतों में किसुनी भौजी का वाकया भी बार-बार आता है जब वह अकाल के समय लेखक से चिट्ठी लिखवाती है। लेखक इन दलित स्त्रियों की वर्णन शैली से कई बार इतना प्रभावित हो जाता है कि वह इनके दुख में खुद भी डूबता उतरता है- ‘मैं तो स्वयं अपने दुख में डूबता उतरता फिरता था, किन्तु गाँव की रोती हुई मशीनों जैसी महिलाओं से मैं अत्यंत विचलित हो जता था। अनेक बार उनके आँसुओं में मेरे भी आँसू शामिल हो जाते थे’ (पृ. 89)। ऐसी ही थी किसुनी भौजी, जिसका पति मुन्नीलाल कतरास की कोइलरी में कोयला काटता था। वह अपनी अद्भूत वर्णन यमक शैली में चिठ्टी लिखवाती थी। लेखक का मानना था कि ‘यदि वह पढ़ती तो, शायद दुखांत साहित्य में बहुत कुछ गठती’। लेखक उसके द्वारा लिखवाई गई चिठ्टी में किसुनी भौजी की पीड़ा का चित्र खींचकर अपना मर्म उदूघाटित करता है- ‘हे खेदन के बाबू, हम कवन-कवन बतिया लिखाई, बबुनी बहुत बिलखते। ऊ रोई रोई के मर जाले। हमरे छतिया में धूध न होता। दूहं जाईला त बकेनवा लात मारै ले। बन्सुवा मडारी में साली सड़ले सड़ल साण दे ला। ऊपर से वोकर आंखि बड़ी शैतान न हो। संभगिया क रहरिया में गवुंवा क मेहरिया सब मैदानज ली, त ऊ चोरबत्ती बारै ला।, रकतपेवना हमहुं के गिद्ध नाई तरे रैला। चोटवा से पेटवा हरदम खराब रहै ला। हम का खियी का खाई कुख समझ में न अवैला। बबुनी के दुधवा कहंवा से लिआई? जब ऊ रोबैले, त कब्बे कब्बे हम वोके लेई के बहरवां जाई के बोली ला कि देख तोर बाबू आवत हउवैं, त ऊ थोरी देर चुप हो जाते। तू कइसे हउवा? सुनी ला की कोइलसी में आगि लगि जालैं। ई काम छोड़िदा। गवुवै में मजदूरी कई ले हल जाई। सतुवै से जिनगी चलि जाई। येहर बड़ी मुसकिल में बीतत हो। अके लचें जियरा ना लगैला, ऊपरा त खइले क बड़ा होटा हो सके त बीस रूपया भेज दा। जब अइहा, ई है सब कर चिट्ठिया लिखैले। ई बडा तेज हउवै । अउर का लिखाई हम? थोर लिखना ढेर समझना’ (पृ. 99)।

 

सिर्फ यह दलित महिलाएं चिठ्टी ही नहीं लिखवती थी बल्कि तुलसीराम की चिंता भी करती थी। एक बार बकैना भैंस द्वारा नीचे गिराए जाने पर तुलसीराम को बहुत चोट लगी तब किसुनी भौजी इस बात से बहुत दुखी हो गई। एक दिन उसने लेखक को अपने घर बुलाकर समझाया।- "हे बाबू ई सब हवा -बतास से बचि के रहिहा। इनकर गुस्सा जान लेडवा होला।"।(पृ. ----91) लेखक के भाग जाने पर किसुनी भौजी दुखी होती हुई बोली- ‘देसवा तूं छोड़ि देवा बाबू त हमार चिट्ठिया के लिखी?’(पृ. 111)

 

ऐसे ही एक और दलित महिला है सोमरिया जो लेखक की निगाह में एक अनोखी औरत है सोमरिया गाँव मे चुगल खोरी के लिए बहुत प्रसिद्ध थी। उसकी एक अनोखी आदत यह थी कि वह उसके घर से कोई भी छोटी मोटी चीज़ खो जाती, तो वह अपनी झोपड़ी के पास वाले कुएं पर रात में सबके सो जाने के बाद सन्नाटे में खड़ी होकर जोर-जोर से भद्दी-भद्दी गलियाँ देते हुए खोये हुए सामान का नाम लेकर बिना किसी को इंगित किए उसे लौटा देने का हांका लगाती थी। अगर लहसुन या प्याज भी उसके घर से गायब हो जाती, तो उसके लिए भी उसी शैली में वह रात के सन्नाटे में वापिस करने की माँग दोहराती रहती। उसकी यह शैली इतनी आंतकित कर देती थी कि कई बार गाँव के लोग उस छोटी-मोटी सामग्री को अपने घर में से ले जाकर उसकी झोपड़ी के पास रख देते थे ताकि वह रोज-रोज कुएं पर सोता पड़ने पर शोर न मचाये। गाँव के लगभग सभी लोगों का विश्वास था कि सोमरिया को जब किसी चीज़ की आवश्यकता होती, वह एक जालसाजी के तहत उसे चोरों चले जाने का नाटक करते हुए उस कुएं पर हांका लगाती थी, ताकि लोग उसकी माँग को मुफ्त में पूरा कर दें। (पृ. 79)

 

अपनी इस आदत के कारण वह निरंजन पांडे के घर डाका पड़ने की सूचना देती है, जिससे पूरे गाँव में हडकंप मंच जाता है। यहीं सोमरिया एक दिन तुलसीराम द्वारा मारे गए गेहुबन सांप को एक मोटे रहट्ठा जलाकर डंडे से लटकाकर उसका एक हंडिया तेल निकाल लेती है।

 

दलित महिलाओं क्रम में ही लेखक ने नट जाति की औरतों का वर्णन लेख में किया है। लेखक नट औरतों की सुन्दरता की बात करते हुए कहते है- ‘सोफी की बहु तथा दोनों बेटियां सौन्दर्य के मामले में अपरंपार सुन्दर थीं। किन्तु भूख उन्हें भी लगती है, पर उसे मिटाने के लिए उनके पास कुछ भी नहीं होता था। धीरे-धीरे मजबूरी में उनका सौन्दर्य काम में आने लगा। गाँव में कुछ अभद्र ब्राह्मण युवक संध्या के समय मुर्दहिया के पास उस गुहाने पर लगता था कि स्वयं भतों की चौकीदसी करने लगे। उन नटनियों का सौन्दर्य मुर्दहिया की उन्हीं झाड़ियों में पीछे प्राय: गुम होता रहा’ (पृ. 73)। इसी सोफई की बड़ी बेटी ललती जो कि ‘अप्रतिम, मोहक होने के साथ एक अत्यंत कुशल नर्तकी थी........ नाचना किसी से सीखा नहीं था, किन्तु उसे देखते ही ऐसा लगता था जैसे कि मानो नाचते ही पैदा हुई थी। उसके अंग प्रत्यंग नृत्यकला के कल पुर्जे जैसे लगते थे। यहाँ तक कि संध्या होते ही मुर्दहिया से चरकर लौटीं भैसों की बाय-बाय वाली धुन पर भी नृत्य की दो चार छलांगे लगा लेती थी| हम जब मुर्दहिया पर गोरू चराने जाते, नटनिया अपनी झोपड़ी से निकलकर हम सबके साख लखनी ओलहा पाती तथा "चिल्हिया चिल्होर", आदि सारे खेल खेलती। सिर्फ लिन सबके अंत में हम प्राय: अपने गोरू हांकने वाली लाठियों को किसी पेड़ या झाड़ी से ओठ गांकर दो सूख5 लकड़ियों से लाठी पर नगाड़े की तरह बजाना शुरू कर देते थे जिसके साथ ही शुरू हो जाती थी नटिनिया की अनोखी नृत्यकलाएं। शायद दुनिया की यह पहली नर्तकी थी, जो मेरे जैसे नौसिखिये लट्ठवादकों की लक्कड़ ध्वनि पर किसी श्मशान पर यूँ नाचने लगती थी। कालांतर में नृत्यकला में उसकी स्वाभाविक सहजता ने ही उसे बदनामी का शिकार बना दिया। (पृ. 116)

 

लालती को इंगलिश सीखने की इतनी अधिक इच्छा थी, वह अक्सर 'हमहुं के रिंगरेजिया पढ़ाव रे बाबू' ऐसा कहते हुए एकदम दीन-हीन हो जाती थी। जब लेखक ने उसको पढ़ाने की कोशिश की तो मैं उसके हाथ में दुधिया पकड़कर लिखवाता, किन्तु जब वह स्वयं लिखती तो उसका हाथ कांपने लगता। शीघ्र ही कांपते हाथ नाचने की मुद्रा में आ जाते। वह मेरी विकट शिष्या था। तमाम कोशिशों के बावजूद मैं उसे लिखना नहीं सीखा पाया (पृ. 117)। लेकिन नटनियों के अंग्रेजी सीखने की ज़िद पर 'पिपरा पे गिधवा बइठल हउवैं' लेखक ने जब बताया 'वल्चर्स आर सिटिंग आन पीपल ट्री' यह वाक्य उसे इतना भाया कि उसने इसे तुरन्त रट लिया और यही वाक्य उसके जीवन का तकिया कलाम बन गया। वह लेखक से अक्सर और पढ़ने की ज़िद करती पर वह इस वाक्य के अलावा और शब्द नहीं सीख पाई। लेखक के अंग्रेजी सीखने के कारण लेखक गाँव में 'ई त वारिया निकरि गयल' अर्थात 'यह आवारा हो गया है’ (पृ. 117)| बाद में जब लेखक दसवीं पास कर गाँव छोड़कर शहर आजमगढ़ जाता है तो एक रात पहले अपना बक्सा नटनियों के घर ही रखता है। 'नटनियों की दुख दर्द में भीगी आवाज़ " अब लउटि के ना अइबे का रे बाबू' का जवाब न देने पर नटनियां लेखक के द्वारा सिखाई इंगलिश को भूलकर 'पिपरा पे गिधवा बइठल हउवे’ बोलकर एक बड़ा प्रतीकात्मक उद्बोधन करती है।

 

नटनियों के अलावा कुछ और औरतों का ज़िक्र आया है जिसमें लेखक के घर की एक भाभी दुलरियो भाभी जो एक मनोरोग कि पीड़ित होने पर एक दलित औरत जो औझेती का काम करती है तथा लोग उसे उसे 'चंमैनियां' के नाम से पुकारते थे, उससे रोज भभूत लाने को कहती, चंमैनिया का भभूत खाते ही दुलरिया भाभी को पेट दर्द बंद हो जाता। बाद में लेखक कहीं से भी राख लाकर दे देता, जिसे वह खाकर ठीक हो जाती। इसी तरह गाँव में दो दलित औरतों का और ज़िक्र है जिसमें एक तो नोनिया जाति की रकौड़े तलने वाली औरत है जिसकी शोहरत दूर-दूर कर के गांवों में हो गई थी। रयौती नामक दलित महिला जो घास छील रही थी, उससे रहा नहीं गया वह डांगर के लालच पर खुर्पा लेकर गिद्धों से भिड़ गई और मरे हुए बैल का कलेजा काटकर उनके खूंखार चोंचों से बचते हुए घास से भरी टोकरी में ले आती है- जिसके बाद उसको और उसके परिवार को 'कुजाति' घोषित कर दिया जाता है। बाद में रयौती के परिवार को बिरादरी में तभी शामिल किया जाता है जब उसका परिवार पूरी बिरादरी को 'सूअर भात' की दावत देता है।

 

इसी तरह गाँव में चुड़िहारिन, धोबिन, गोदना गोदने वाली औरतों, मजदूर खेत में काम करती औरतों के साथ भी लेखक की संवेदना जुड़ती है। औरतें धान की रोपनी करती थीं| दलित मजदूरिनें हमेशा एक लोकगीत की कुछ पंक्तियां दिनभर गाती रहती थीं, जो इस प्रकार था- ‘अरे रामा परि गय बहुआ गरेत, चलब हम कइसे ऐ हरि’|-

 

भूख और गरीबी के शिकार सबसे ज्यादा औरतें होती हैं और उनपर मार भी सबसे ज्यादा पड़ती है। इसलिए जगह-जगह मुर्दहिया में ऐसे चित्र मिलते हैं जब दलित औरतें अपने बच्चों को साथ लिए जंगल-जंगल खेत-खेत जंगली खाना ढूंढती हैं जिसमें साग-सब्जी के अलावा चूहें खरगोश, आदि भी शामिल है।

 

जब लेखक दसवीं से आगे की पढ़ाई करने के लिए आजमगढ़ चला जाता है और अम्बेडकर होस्टल में रहता है तो वह दो श्रमिक महिलाएं जिसमें झाडू लगाने वाली अहमदी बीबी तथा दो सफाई कर्मचारी औरतें है। दोनों सफाईकर्मी औरतों का ज़िक्र तुलसीराम जी इस तरह करते है- ‘मैलों से भरे इन घड़ों को दो महिला सफाई कर्मी सुबह-शाम उठाकर लाल डिग्गी बांध के इस पार फेंक आती थीं। वे दिनभर पान चबाया करती थीं। जाहिर है जिस प्रकृति का उनका काम उसमें पान सहयोगी का करता था। काम खत्म करने के बाद वे एक पान की एक दुकान से दूसरी पर चलायमान रहती थी। किसी से भी वे बड़ी आसानी से हंसी मजाक कर लेती थी। किन्तु यदि जरा भी अनबन हो गई तो गोली की रफ्तार से उनके मुँह से गलियाँ फूट पड़ती थीं। इतना ही नहीं वे तुरन्त बाल्टी भर मैला उठा लाती और अंधाधुंध लोगों पर फेंकना शुरू कर देतीं’ (पृ. 174)|

 

मुर्दहिया में उनके अलावा ऐसे अनेक दलित स्त्री पात्र हैं जो समूह के रूप में अपनी भयंकर जिजीविषा के साथ आते है जिनका कई जगह ज़िक्र है। जब दलितों की ब्राह्मण टोलों से लड़ाई होती है तो गाँव की सारी महिलाएं अपने हथियार लेकर ब्राह्मण टोलों से भिड़ जाती हैं।

 

अकाल के दिनों में जब गाँव के उच्च जाति के जमींदार दलितों को उचित मजदूरी नहीं देते तब गाँव में इन उच्च जाति के लोगों की और दलितों की ठन जाती थी। तब दलितों की पंचायत बैठ जाती और गाँव के दलितों के सरपंच गाँव की सीमा पर 'कूएं' बांध देते जिसका मतलब था कि किसी निर्धारित समय स्थान पर जमीन पर खपड़े से एक खूब लम्बी रेखा खींच देना। 'ऐसी कूर बंधी लड़कियो में दलित महिलाओं की योग्यता देखते ही बनती थी। ये सारी महिलाएं मरे हुए बैलों तथ गायों की बड़ी-बड़ी तलवार नुमा पसलियां अपने घरों में अवश्य हथियार के रूप में रखती थीं। कुछ दलित औरतें गाँव के पास वाले गड्ढ़ों में फेंकी बियाना कमाने वाली हांडियों को उठा लाती...... कूर की लड़ाई के दौरान जब दलित महिलाएं इन हांडियों तथा गाय-बैलों की पसलियों को लेकर ब्राह्मणों को मारने के लिए दौड़तीं तो वे जान बचाकर भाल-बल्लम फेंककर बड़ी तेजीं से पीछे भागने लगते, क्योंकि बियाना की हांडियों और मरे बैलों क्या गाय के वे छूना पाप समझते थे। ये औऱतें कुछ हांडियों तथा पसलियों को जोर लगाकर दूर फेंकती, जिससे ब्राह्मण अत्यंत भयभीत हो जाते थे। इस प्रक्रिया में हमेशा दलितों की जीत होती थी’ (पृ. 64)।

 

'धान रोपनी करती हुई दलित मजदूरिनें हमेशा एक लोकगीत की कुछ पंक्तियां दिनभर गाती रहती थी, जो इस प्रकार थी- अरे रामा परि गय बलुआ रेत, चलब हम कइसे ए हरि’ (पृ. 71)|

 

इसी तरह दलित-धोबिन औरतों का दुख एक धोबी की बिटिया के न नइहरे सुख न ससुरे सुख अर्थात झोबी की बेटी को मायके तथा ससुराल दोनों जगह कपड़े धोने पड़ते हैं। (पृ. 72)

 

'अत: डांगर खाने के बाद वाले रात को ये गिद्ध रह रह कर बड़े जोर से चिंघाहने लगते थे। मेरी दादी कहती थी कि गिद्धवा ढेर खाअ लेहले टउवैं, येहि मारे परेखा दुखत जौ ने कारम ऊ चिल्लावै लगै लं।' मुर्दहिया के दलित स्त्री पात्र गाँव के पेड़-पौधे, पशु-पक्षी जानवर, आदि के लिए बेहद संवेदनशील है। दादी पेड़ कटने पर कहती है- पेड कटने पर गाँव उदास हो जाता है। दलित बस्ती की मजदूरिनें बंसु को बगुला मारने पर अक्सर गालियां देती रहती थी, क्योंकि दलित कभी बगुलों को मारकर नहीं खाते पिछले अकाल की भुखमरी में भी किसी दलित ने बगुलो को कभी नहीं मारा। (पृ. 135)

 

अकाल के दिनों में जब गाँव के सारे जल स्रोत सूख जाते तब दलित औरतें इन पक्षियों की प्यास का बहुत ध्यान रखती- 'ये प्यासे कौवे चोंच फैलाए हांफते हुए घरों के आसपास मंडराते रहते थे, क्योंकि जंगल में खाद्य सामग्री तो दूर, पानी भी नहीं मिलता था। मेरी दादी समेत अनेक बूढ़ी महिलाएं मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर घर के बाहर रख देती थी, जहां अनेक पक्षी चें-चें करते हुए आ जाते थे।' (पृ. 68)

 

समूह के रूप में चित्रित महिलाएं खेतो से साग खोंटती हुई, टिड्डी भगाती हुई, मरे जानवरों का माँस पकाती हुई, किसी पुराने रिश्तेदार के वोट डालने के लिए मिलकर रोती हुई, चुनाव में उत्सव के समान गाने गाती हुई, कोहबर बनाती हुई, घास काटती छीलते अपने छोटे-छोटे खेत की अपने पति के साथ सिचांई करती हुई पूरे मुर्दहिया में छाई हुई हैं। दलित महिलाओं में अन्य पात्रों में चमरिया मैय्या और शीतला माता का ज़िक्र कई बार आया है जिन्हें पुजौरा चढ़ाया जाता है तथा गैर दलित महिलाओं में सवर्ण स्त्रियाँ है जो लेखक के सम्पर्क में किसी ना किसी तरह आईं| जैसे कि दो गैर दलित छात्राओं का वर्णन है जिसमें एक आशा है जो गाँव के पंड़ित की बेटी है| आशा कक्षा पांच में पढती थी। देर से दाखिल होने के कारण वह पढ़ाई में लेखक की मदद लेती थी और लेखक को भैया भी कहती है| क्योंकि तुलसीराम के पिता आशा के पिता के हलवाहे थे, आशा का घर आना जाना भी था। नाला पार करके वे स्कूल जाते थे, परन्तु उसमें पानी भरा होने के कारण लेखक उसको अपने कंधे पर बैठाकर नाला पार करा देता है| जिसकी आशा को यह सजा मिली कि उसकी पढ़ाई छुड़वाकर बारह साल की उम्र में ही शादी कर दी गई- ‘वह मुश्किल से बारह साल की थी, किन्तु अनहोनी का भय भयानक था, इसलिए साल भर के ही अन्दर उसकी ससुराल ढूंढ़ ली गई। विदाई के समय मेरी माँ भी वहां मौजूद थी। घर आकर माँ ने बताया कि डोली में बैठते समय पंडित की बेटी रो-रोकर कहती रही कि ‘हमार पढैया छूटि गयल हो बाब’| जाहिर है शिक्षा से यदि एक 'गुलाम पुत्र' इतना कुछ हासिल कर सकता था, तो फिर मालिक कि पुत्री न जाने कितना आगे जाती? किन्तु एक मात्र अदना अफवाह ने उसका सब कुछ छीन लिया और वह अपनी ससुराल में सिर्फ मालकिन बनकर रह गई’।(पृ. 114)

 

गाँव की अन्य बच्ची श्यामा की गाँव में सिर्फ इसलिए पढ़ाई छुड़ा दी गई क्योंकि गाँव की अन्य लड़कियां गाँव में आई बारात में नचनियां दूल्हें के साथ भाग गई थी। उसके भागने से श्यामा की आफत आ गई। लेखक का कथन है- ‘इस घटना के बाद मठिया की अन्य लड़की श्यामा जो हमारे ही स्कूल में सातवें दर्जे में पढ़ती थी, की शामत आ गई, लोग कहने लगे कि यह बाल खोलकर स्कूल जाती है, बेशाव हो गई है। अत: उसकी पढ़ाई छुड़ा दी गई’| (पृ. 125)

 

लेखक जब दसवीं पढ़ने के बाद आजमगढ़ आता है तब एक ऐसी शहरी छात्रा का वर्णन करता है जो दिन में तो कालेज की पढ़ाई करती है परन्तु रात में कोठे पर नाचती है-‘देव नारायण नर्तकी का ऊपरी हिस्सा देखकर बताते है कि वह कितनी सुन्दर थी। सौन्दर्य वर्णन के साथ ही वे बोल पड़े ई ल स्टूडेंट जइसन लगति हौ। ऐसा सुनते ही दीपचन्द बोल उठे तोहार कलास फेलो होई"।

 

मुर्दहिया की सबसे मार्मिक घटना सुदेस्सर पांडे की माँ का देहात 'खरवांस' यानी बहुत अपसकुन वाले महीने में हो जाता है। हिन्दु धर्म के अंध विश्वास के चलते गाँव के पट्टीदार अमिका पांडे ने 'पतरा' देखकर बताया कि अभी पंद्रह दिन शरवांस है इसलिए मृत माँ का दाह संस्कार नहीं हो सकता। यदि ऐसा किया गया तो माता जी नर्क भोगेंगी। उन्होंने सुझाव दिया की माता जी की लाश को मुर्दहिया में एक जगह कब्र खोदकर गाड़ दिया जाए तथा पद्रंह दिन बाद निकालकर लाश को जलाकर दाह-संस्कार हिन्दू रीति से किया जाए’।‘मेरे पिचा जी मुझे लेकर मुर्दहिया पर कब्र खोदने गए। वे फावड़े से कब्र खोदते रहे और मैं मिट्टी हटाता रहा। जब कब्र तैयार हो गई तो सुदेस्सर पांडे अपनी पट्टीदारों के साथ लाश को लाकर उस, कब्र में डाल दिए। तुरन्त उसको मिट्टी से पाट दिया गया। दफनाने से पहले टोटकावश सुदेस्सर पांडे ने कफ़न के एक कोने में सोने की मुनरी गठिया दी थी। एक अंधविश्वास के अनुसार किसी लाश के कफ़न में सोना बांधने से वह जल्दी नही सडेगी’।(पृ. 50) लेखक और पिता जी की जिम्मेदारी थी रोज लाश को देखना कहीं लाश को सियार खोदकर ना खा जाए या फिर कहीं चोर डाकू इस सोने की मुनरी के लालच में कब्र खोदकर लाश बाहर न कर दे। आखिर पन्द्रह दिन बाद जब अमिका पांडे ने उस दैवी पतरे के अनुसार समय तय निर्धारित किया तब सुदेस्सर पांडे अपनी माँ की कब्र मिट्टी दो चार पावड़ें मिट्टी हटाकर दूर खड़े हो गए पर लगातार लेखक और उनके पिता कब्र से मिट्टी हटाते रहे-‘यकायक उस सड़ी लाश की दुर्गन्ध से सारा वातावरण डगमगा गया। सुदेस्सर पांडे भी मुँह पर गमछा बांधे दूर भाग गए, और वही पिता जी से कहते रहे कि वे सोने वाली मुनरी को पहले ढूंढकर कफ़न से निकाल लें। यह एक अजीब स्थिति थी। उस दिन मेरे मन में पहली बार यह बात समझ में आई थी कि किसी के लिए माँ की लाश की अपेक्षा मोना कितना प्रिय होता था। पिता जी ने मुझे भी गमछा मुँह पर बाध लेने को कहा। मैंने वैसा ही कर लिया। उस समय सारे ब्राह्मण वहां से चम्पत हो गए। सिदेस्सर पांडे भी दूर ही खड़े रहे पिताजी ने जैसे-तैसे सड़ी लाशा को पैर की तरफ से पकड़ लिया। अपार दुर्गन्ध और घृणा से मजबूर हम दोनों ने उस लाश को बाहर कफ़न से छुड़ाकर उस सोने की मुनरी को रगडकर पिताजी ने सुदेस्सर पांडे के हवाले कर दिया। वे बड़ी मुश्किल से मुँह-नाक बांध लाश के पास आया और आग जलाकर चिता को जला दिए। पांडे पुत्र भागकर दूर चले गए। वहां सिर्फ मैं और पिताजी खड़े रहे और लाश जलाते रहे’। (पृ. 51)

 

मुर्दहिया में तमाम स्त्री पात्र चीहे वह दलित हो या गैर दलित पूरी अपनी संवेदना दुख पीड़ा के साथ सामाजिक धार्मिक और संस्कार जन्य गरिमाहीन मट्टी में तपते हुए अपने होने का सवाल सबके सामने बार बार प्रश्न चिन्ह की तरह खड़े हो जाते है। जिससे किसी का भी तरह से ध्यान हटाना नामुमकिन हो जाता है।