असुरों की ‘चमत्कारी’ धातु लोहा

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Published on: 30 July 2020

वंदना टेटे

वंदना टेटे एक आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता, कवयित्री, लेखिका और आदिवासी दर्शन की पैरवीकार हैं। पिछले तीन दशकों से आप आदिवासी भाषा, साहित्य संस्कृति व पुरखौती अधिकारों की बहाली के लिए सृजनरत और संघर्षरत हैं। आप झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा नामक संगठन की संस्थापक महासचिव हैं और इसी नाम से एक त्रैमासिक पत्रिका का प्रकाशन एवं संपादन करती हैं।

दुनिया में लोहा सबसे जादुई धातु है। मानव समाज में इस धातु का आगमन पत्थर और कांसे के बाद माना जाता है। पत्थर और लोहे की तरह कांसा (Bronze) कोई एक तत्व नहीं है बल्कि यह दो धातुओं तांबा (Copper) और रांगा (Tin) को मिलाकर बनाया जाता है। जैसे कि पीतल (Brass),जस्ता (Zinc) और तांबा को मिलाने से बनता है। इन दोनों की तुलना में लोहा (Iron Ore) प्राकृतिक रूप से एक स्वतंत्र धातु है जो आम तौर पर तांबाटिन तथा जस्ता की अपेक्षा आसानी से और बड़ी मात्रा में सुलभ है। इस चमत्कारी धातु की खोज ने जहाँ कृषि को उत्पादक और घरेलू कार्यों को व्यापक और आसान बनाया वहीं इसने राज्यसत्ता को मज़बूती देने तथा उसके विस्तार में निर्णायक भूमिका निभायी। क्योंकि लोहे से बने हलफालचाकूतीर और तलवार जैसे औजारों एवं हथियारों को हमेशा धार दी जा सकती थी तथा लंबे समय तक उनका इस्तेमाल किया जा सकता था। बिल्कुल पहली बार निर्मित किसी औजार और हथियार की तरह। इसी विशिष्ट गुण के कारण लोहा जादुई था। चमत्कारी था। यह कठोर से कठोर धरती पर अन्न उगाने में सहायक था। अपने से बलशाली जानवर और शत्रुओं से रक्षा प्रदान करने में समर्थ था और अपने घातक रूप के सहारे किसी को भी गुलाम बना लेने की क्रूर योग्यता रखता था। अर्थात् लोहा पालक था तो संहारक भी था।

इस जादुईचमत्कारीजीवनदायी और जानलेवा धातु के आविष्कार का श्रेय उन आदिम और घुमंतू आदिवासी समुदायों को है जिन्हें भारत में असुरअगरिया और बिरजिया आदि नामों से जाना जाता है। हालाँकि बिहारझारखण्डछत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के विभिन्न इलाकों में रहने वाले ये आदिम आदिवासी समुदाय पेशा और प्रवृति के अनुसार तीन अलग-अलग नहीं बल्कि एक ही समुदाय हैं। क्योंकि ये तीनों ही मूल रूप से आदिम लौहकला के जनक और धातुविज्ञानी हैं। असुरों का नाम इनमें सबसे ज़्यादा लोकप्रिय है जो झारखण्ड के लोहरदगागुमला और लातेहार जिलों में पसरे हुए पठारी क्षेत्र ‘नेतरहाट’ में सघन रूप से निवास करते हैं। 

इतिहासकारों का मानना है कि असुर आदिवासी दुनिया के सबसे प्राचीन धातुविज्ञानी और लौहकर्मी हैं। इन्होंने ही लौह पत्थरों (Iron Ore) की पहचान कर उसका शोधन किया जिससे चमत्कारी धातु लोहे का आविष्कार संभव हुआ। ये लोग हाल-हाल तक लोहा बनाने का काम किया करते थे परंतु बीसवीं सदी की शुरुआत में जब लौह निर्माण के क्षेत्र में टाटा जैसे शक्तिशाली घराने आ गएतो इनकी बड़ी-बड़ी आधुनिक मशीनी भठ्ठियों के सामने असुरों की देशज भठ्ठियाँ बहुत छोटी पड़ गईं और साठ के दशक के आते-आते लोहे के बाज़ार से बिल्कुल गायब हो गईं। 

असुरों की वह आदिम लौहकला कैसी थीउनके लोहा बनाने का पारंपरिक ज्ञानतकनीक और उपकरण कैसे थेउनकी भठ्ठियाँ कैसी होती थीं और वे अपनी भठ्ठियों के लिए उतनी आग या ऊर्जा कहाँ से लाते थे जिससे पत्थरों को पिघला कर उसमें से लोहा निकाल लेना उनके बाएँ हाथ का खेल होता थाइस पूरी प्रक्रिया में कितना संसाधनमानव श्रम और समय लगता थासबसे बड़ी बात कि असुरों के बनाए लोहे में जंग क्यों नहीं लगती थी और उनकी लौह निर्माण प्रक्रिया से प्रकृति व पर्यावरण को कोई नुकसान क्यों नहीं पहुँचता थाक्योंकि तांबाजिंक और टिन की तुलना में लोहा अपने शोधन के लिए बहुत अधिक तापमान (ऊर्जा) की माँग करता है। 

असुरों की नई पीढ़ी अपनी परंपरागत लौहकला को भूल चुकी है। पुराने जानने वाले उम्र गुज़ारकर दुनिया से चले गए। जोगेसर असुर जैसे एक-दो बूढ़े ही अब बचे रह गए हैं जो ये प्राचीन कला जानते हैं। वे कहते हैं, ‘हमारे लिए लोहा बनाना व्यवसाय से कहीं ज़्यादा उत्सव था। एक धार्मिक अनुष्ठान की तरह हम असुर लोग लोहा बनाया करते थे। लोहा हमारे समुदाय को आजीविका भी देता और आध्यात्मिक तौर पर समृद्ध व आनंदित भी बनाए रखता। लेकिन बड़ी कंपनियों ने हमारा यह पारंपरिक उत्सव हमसे छीन लिया। नई पीढ़ी की इस काम में कोई दिलचस्पी नहीं रही क्योंकि आधुनिक शिक्षाबाजार और मनोरंजन उद्योग ने उन्हें पूरी तरह से बदल डाला है।’[1]

झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा’ नामक एक सामुदायिक संगठन से जुड़ी सखुआपानी की सुषमा असुर कहती है, ‘हम असुर लोग अपनी लौहकला नहीं बल्कि अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। लोहा बनाना तो हमलोग भूल ही चुके हैं बहुत तेजी से अपनी भाषा भी खो रहे हैं। फिर भी हमारे जैसे कुछ जागरूक लोग अपनी इस कला परंपरा और भाषा-संस्कृति के संरक्षण में लगे हैं।’[2] अखड़ा संगठन से ही जुड़े जोभीपाट गाँव के मेलन असुर ने कहा कि ‘हमारा नाच-गानबोली-भाषापूजा-पाठ और लोहा बनाने का पुरखा ज्ञान वैसे ही आधुनिक विकास की भट्ठी में जल रहा हैरोज गल रहा है जैसे कि पत्थर गलता था। वह पत्थर तो गलकर भी हमको जीने का साधन प्रदान करता था। परंतु हमलोग तो गलकर भाप की तरह इस दुनिया से उड़कर हर दिन धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं।’[3] घाघरा में बस चुके जोभीपाट गाँव के ही मूल निवासी और सरकारी उच्च विद्यालय के रिटायर्ड प्रिंसिपल चैत टोप्पो इस स्थिति से दुखी तो हैं पर वे निराश नहीं हैं। उन्होंने कहा, ‘हम कोशिश कर रहे हैं कि नये बच्चे अपनी इस परंपरागत कला और ज्ञान को जानें। अपनी भाषा भी बोलना नहीं छोड़ें। अब लोहा बनाना आजीविका तो नहीं दे सकता है पर एक कला के रूप में इसकी प्रासंगिकता तो है ही। यही हमारी पहचान है और इसके खो जाने का अर्थ है असुरों का अस्तित्व हमेशा हमेशा के लिए खो जाना।’[4]

चित्र  1. पोलपोल पाट गाँव के बिरेश्वर असुर लौह पत्थरों के टुकड़े करते हुए। साथ में सखुआपानी गाँव की सुषमा असुर। (फोटो: विजय गुप्ता, सखुआपानी, नेतरहाट, 14 मई 2013)
चित्र 1. पोलपोल पाट गाँव के बिरेश्वर असुर लौह पत्थरों के टुकड़े करते हुए। साथ में सखुआपानी गाँव की सुषमा असुर। (फोटो: विजय गुप्ता, सखुआपानी, नेतरहाट, 14 मई 2013)

लौह कला से जुड़ी लोक मान्यताएँ

 

निद दिरि इदाना 

मियद् दिरि अगुइमे 

असुर होड़कू ओत् काकू कामेआ 

हुकु मेढ़ेद् कामेआ[5]

 

भावार्थ-

ये लौह पत्थर हैं

इन्हें चुनकर ले चलो

असुर लोग खेती नहीं करते

लौहकर्म करते हैं 

 

लोहा नामक जादुई धातु बनाने की कला असुरों ने कैसे सीखी इस संबंध में अनेक लोक कथाएँ इनके बीच मौजूद हैं। सबसे लोकप्रिय लोककथा ‘संड़सी-कुटासी’ (संड़सी मतलब पकड़ने वाला और कुटासी मतलब हथौड़ा)[6] पर्व से जुड़ी है जिसके अनुसार सुकरा और सुकराईन पहले असुर दंपत्ति थे जिन्होंने आदिम काल में पहली बार लोहा बनाया और यह कला अपने वंशजों को दे गए। दूसरी लोक कथाओं में ‘बिर’ नामक असुर राजा और उसकी रानी का ज़िक्र आता है जिन्होंने लोहा बनाने का काम सदियों वर्ष पूर्व किया था। कहानी यह है कि प्राचीन समय में एक बहुत ही शक्तिशाली असुर राजा रहता था। उसका नाम ‘बिर असुर’ था। उन दिनों असुर लोग लोहा बनाने का काम नहीं किया करते थे। एक बार जब बिर असुर राजा अपनी रानी के साथ घने जंगल से यात्रा कर रहा था तो वह शानदार साल (Shorea robusta) के पेड़ों को देखकर बुदबुदा उठा, ‘कितने सुंदर साल के वृक्ष हैं! इनको जलाकर तो बहुत ही बढ़िया क़िस्म का कोयला (चारकोल) बनाया जा सकता है।’ जब बिर राजा ऐसा बोल रहा था तो उसे यह बिल्कुल नहीं पता था कि उसके ये शब्द लोहे का काम करने वालों के साथ उसे जोड़ दे रहे हैं जिन्हें आदिवासी लोग अपने से कमतर मानते हैं। इसलिए जैसे ही बिर राजा के मुँह से ये शब्द निकले पालकियाँ ढो रहे उराँव आदिवासी उनकी पालकी ज़मीन पर रख घने जंगल में नौ-दो ग्यारह हो गए। राजा-रानी दोनों को समझ में नहीं आया अचानक ये क्या हो गया। क्यों पालकी ढोने वाले उराँव उनको इस भयानक जंगल में अकेला छोड़कर गदहे के सींग की तरह से गायब हो गए! बिर राजा और रानी ने बहुत आवाज दी। गला फाड़-फाड़ कर मदद के लिए लोगों को पुकारा। लेकिन न तो उराँव आदिवासी लौटे और न ही कोई दूसरा प्राणी उस बीहड़ जंगल में उनकी मदद के लिए सामने आया। दोनों ने जंगल से बाहर निकलने की बहुत कोशिश की पर वे कोई रास्ता नहीं तलाश सके। आखिर में जब दोनों को लग गया कि उस जंगल में और कोई नहीं है तो थक-हार कर उन्होंने वहाँ एक झोंपड़ी बनायी और मदद की उम्मीद करते और साल के मीठे फलों को खाते हुए दिन गुजारने लगे। अकेलापन काटने के लिए बिर राजा ने साल के हरे पेड़ों को काटकर कोयला बनाना शुरू किया। जब कोयला तैयार हो गया तो उसने लौह पत्थरों को चुनकर इकट्ठा कियाभठ्ठी बनायी और लोहा बनाने में जुट गया। इस काम में कई दिन लग गए और वो रानी के पास घर नहीं लौट सका। इससे रानी को लगा कि साल के मीठे फलों को खाने के चक्कर में वह घर लौटना भूल गया है। असुर रानी जादू जानती थी। सो गुस्से में आकर रानी ने अपने जादू से साल के फलों का मीठापन गायब कर दिया। ताकि बिर राजा को मीठे फल नहीं मिले और वह घर लौट आए। इसी के कारण साल के फल अब खाने लायक नहीं होते। ख़ैरलोहा बना लेने के बाद बिर राजा वापस घर लौट आया। चूँकि अब साल के फल खाने लायक नहीं रह गए थे इसलिए दोनों पिघला हुआ लोहा खाकर दिन बिताने लगे। बाद में बिर राजा को जब ये पता चला कि जंगल के किनारे बसे आदिवासी लोग चावल उपजाते हैं तो उसने लोहा गलाकर उनसे हल-फालटांगी-कुल्हाड़ी जैसे औजार बनाए और उन्हें खेती करने वाले उराँव आदिवासियों को दिया। बदले में उराँव लोगों ने उसे चावल दिया। तब से ही बिर राजा के असुर वंशज लोहा गला कर उससे खेती एवं घरेलू कार्यों के औजार-उपकरण बनाने का काम करने लगे।[7]

चित्र  2. लोहा गलाने के लिए जलाई गई भठ्ठी (फोटो: विजय गुप्ता, सखुआपानी, नेतरहाट, 21 जून 2013)
चित्र 2. लोहा गलाने के लिए जलाई गई भठ्ठी (फोटो: विजय गुप्ता, सखुआपानी, नेतरहाट, 21 जून 2013)

 

लोहा बनाने की पारंपरिक प्रक्रिया 

इसी के साथ असुर लोगों की यह भी मान्यता है कि लोहा बनाने का का काम सबसे पहले उनके जिन पूर्वजों ने शुरू किया वे सुकरा और सुकराईन हैं। इस कथा का वाचन असुर लोग अपने सबसे प्रमुख धार्मिक अनुष्ठान और उत्सव ‘संड़सी-कुटासी’ के दौरान किया करते हैं। इस कहानी के अनुसार सुकरा ईंधन के लिए जंगल से साल पेड़ की लकड़ियाँ और लौह पत्थर ‘दीरी टुकू’ चुनकर लाता। सुकराईन मिट्टी की भठ्ठी बनाती। जब भठ्ठी सूखकर तैयार हो जाती तो दोनों मिलकर उसमें साल की लकड़ियों का चारकोल और लौह पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े- तीन  और एक के अनुपात (3:1) में डाल देते। फिर भठ्ठी का मुँह बंद कर उसमें आग लगा देते और लगभग चार-पाँच घंटे तक रह-रह कर ‘चपुआ’ (चमड़े की बनी धौंकनी) चलाते। जिससे भठ्ठी को लगातार हवा मिलती और उसके भीतर का चारकोल पूरी तरह से भभक कर लाल हो जाता। जब भठ्ठी के निचले हिस्से में बनाए गए छोटे से निकास मार्ग से लावा जैसा गाढ़ा तरल पदार्थ निकलने लगता तो वे जान जाते कि लोहा पिघलना शुरू हो गया है। जब लावा निकलना बंद हो जाता तब चपुआ (धौंकनी) हटा देते और लाल अर्द्ध पिघले लौह पिण्डों को संड़सी से पकड़ कर बाहर निकाल लेते। यही लौह पिण्ड वो चमत्कारी धातु लोहा था जिसे असुरों के पूर्वज सुकरा और सुकराईन ने सदियों पहले बनाया जिसको पुनः आग में गर्म करने के बाद पीट-पीट कर मनचाही शक्ल दी जा सकती थी। हलफालतीरटांगीतलवार आदि औजारउपकरण और हथियार जिससे बहुत ही आसानी से बनाए जा सकते थे। 

नेतरहाट क्षेत्र के असुर तीन तरह के लौह पत्थरों (अयस्कों/ore) की पहचान रखते हैं। पहले को असुर लोग ‘पोला’ (Magnetite) कहते हैं। दूसरे को ‘बीची’ (Hematite) और तीसरे को ‘गोटा’, जो कि लैटेराइट (Laterite) से प्राप्त हेमेटाइट होता है। अनुभवों के आधार पर एक असुर केवल देखकर ही इन अयस्कों की पहचान कर लेता है। जहाँ-जहाँ भी इन तीनों में से किसी एक भी अयस्क बहुतायत में उपलब्ध होता है वैसे स्थानों को ये चिन्हित कर लेते हैं। वहाँ से अयस्कों को भठ्ठी की जगह लाया जाता है और तोड़-तोड़ कर उनके छोटे-छोटे टुकड़े बनाए जाते हैं। उसमें चिपकी हुई मिट्टी साफ की जाती है। ईंधन के लिए असुर लोग साल पेड़ की हरी और कच्ची लकड़ियों से कोयला (चारकोल) बनाते हैं। क्योंकि हरी लकड़ियों से बना कोयला अत्यधिक ताप सृजित करता है जिससे लोहे को पिघलाना संभव हो पाता है। असुरों की लौह भठ्ठियाँ प्रायः उन स्थानों पर बनाई जाती हैं जहाँ पानी भी सहजता से और ज़्यादा मात्रा में उपलब्ध होता है। यही वजह है कि इनकी धमन भठ्ठियाँ छोटे-छोटे प्राकृतिक जल स्रोत ‘डाड़ी’ (एक बड़े कुएँ जितना), ‘चुआं’ (छोटे कुएँ जैसा) या नदी के किनारे हुआ करती हैं। 

असुरों की आज की पीढ़ी अब अपनी लौह निर्माण कला भूल चुकी है। बूढ़े-बुज़ुर्ग लोगों में भी शायद दो-चार ही ऐसे हैं जो इस कला को किसी अनुभवी ‘प्रैक्टिशनर’ की तरह जानते हैं। ऐसे लोग ज़रूर हैं जिन्हें लोहा बनाने की प्रक्रिया की जानकारी तो है पर जिन्होंने अपने जीवन में यह पारंपरिक काम कभी नहीं किया है। लेकिन साठ-सत्तर के दशक तक अपने पहले अपने बाप-दादाओं को यह काम करते हुए ज़रूर देखा है। इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं कि असुरों के पूर्वज लौहकला के उस्ताद थे और वे सब यह काम बख़ूबी किया करते थे। जिससे आज की पीढ़ी भी अच्छी तरह से वाक़िफ़ है। अपने समाज और पुरखों की आदिम विरासत से वे बिल्कुल अनजान और बेख़बर नहीं हैं। उनकी स्मृतियों में लोहा बनाने और लोहे से जुड़ी अनेक पुरखा लोक कथाएँ अभी तक जीवित हैं। ‘संड़सी-कुटासी’ त्यौहार जिन्हें भूलने नहीं देता। जो असुरों की हर पीढ़ी को अपने पारंपरिक लौह ज्ञानकला और कौशल की स्मृतियों से जोड़े रखता है। चाहे वह उनकी प्रैक्टिस में हो या नहीं। क्योंकि ‘संड़सी-कुटासी’ असुरों का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक त्यौहार है। इस त्यौहार में वे अपने पुरखा-पूर्वजों सुकरा और सुकराईन तथा लौह निर्माण में प्रयोग किए जाने वाले उपकरणों की पूजा करते हैं। असुर समुदाय का विश्वास है कि सुकरा और सुकराईन आज भी अदृश्य रूप में उनके बीच मौजूद हैं और वे हर विपत्ति से उनकी रक्षा करते हैं। 

संड़सी-कुटासी’ त्यौहार का धार्मिक अनुष्ठान फागुन (मार्च) महीने के पूर्णिमा की रात को आयोजित होता है। यह अनुष्ठान सामुदायिक रूप से नहीं बल्कि गाँव स्तर पर और हरएक गाँव में तीन या चार जगहों पर संपन्न किया जाता है। इसीलिए इसमें ‘बैगा’ (असुरों का धार्मिक प्रमुख) की कोई भूमिका नहीं होती। घर-परिवार के मुखिया अथवा गाँव के किसी बूढ़े-बुज़ुर्ग ही ‘संड़सी-कुटासी’ अनुष्ठान के पुजारी बनते हैं। उस दिन ये पुजारी उपवास रखते हैं जिनकी देख-रेख में पूजा क़रीब आधी रात को अनुष्ठानपूर्वक संपन्न होती है। पूजा के लिए साफ-सुथरी लिपी हुई जमीन पर एक ‘घाँड़’ (लोहा का एक चौकोर टुकड़ा) पर संड़सी और कुटासी को रखा जाता है। फिर अरवा चावलधूप-धूवन और हंड़िया (चावल से बना मादक पेय) से पूजारी पूरे विधि-विधान से पूजा करता है। इसके बाद एक काली मुर्गी और एक लाल मुर्गा की बलि दी जाती है। काली मुर्गी सुकराईन के लिए जबकि लाल मुर्गा सुकरा को समर्पित होता है। बलि के पश्चात् सुकरा-सुकराईन और सभी पुरखा-पूर्वजों को हंड़िया अर्पित की जाती है। बलि एवं हंड़िया अर्पण के बाद पुजारी घाँड़ को संड़सी से पकड़ कर हाथ में कुटासी रखकर तीन बार दायीं तरफ से घूमता है और अपने कंधों पर रखता है। ऐसा करते हुए पुजारी अपनी औरत को नहीं देखता है। वह पुजारी के पीछे उचित स्थान पर स्थिर बैठी रहती है। जब पुजारी घूमना बंद कर देता है तब उसकी औरत उसके कंधे से घाँड़ को उठाकर निश्चित स्थान पर रख देती है। इस तरह पूजा संपन्न होती है और नाच-गान के साथ उत्सव शुरू होता है। दूसरे दिन सभी लोग शिकार करने जाते हैं। सामूहिक शिकार उत्सव से पहले गाँव भर के अस्त्र-शस्त्र को एक स्थान पर जमा कर उसकी पूजा की जाती है। जिसके बाद सभी असुर शिकार पर जाते हैं। तीसरे दिन ‘गाढ़ा कुजाम’ नामक स्थान पर मेला लगता है। यह मेला तीन दिनों तक चलता है जिसमें आसपास के सभी असुर गाँव के लोग भाग लेते हैं।[8] संड़सी-कुटासी अनुष्ठान और उत्सव की सबसे विशिष्ट बात यह है कि इसमें किसी प्रकार के वाद्य यन्त्रों का प्रयोग नहीं किया जाता। 

 

चित्र  3. असुर भाषा-संस्कृति और लौहकला ज्ञान को संरक्षित करने के लिए सामुदायिक संगठन ‘असुर आदिवासी ज्ञान अखड़ा’ की स्थापना (25 मई, 2019) के अवसर की तस्वीर (फोटो: वंदना टेटे, जोभीपाट, नेतरहाट, 25 मई 2019)
चित्र 3. असुर भाषा-संस्कृति और लौहकला ज्ञान को संरक्षित करने के लिए सामुदायिक संगठन ‘असुर आदिवासी ज्ञान अखड़ा’ की स्थापना (25 मई, 2019) के अवसर की तस्वीर (फोटो: वंदना टेटे, जोभीपाट, नेतरहाट, 25 मई 2019)

नेतरहाट क्षेत्र असुर के असुर समुदायों में अब भी ‘संड़सी-कुटासी’ का प्रचलन है। जो हमें आश्वस्त करता है कि भले ही आज के असुरों की पीढ़ी लौहकला भूल चुकी है पर यह पारंपरिक ज्ञान और तकनीक उनकी स्मृतियों में जीवित है। वे जानते हैं कि उनके पुरखे-पूर्वज इस आदिम कला में पारंगत थे। कुछ असुर अब भी यदा-कदाखासकर के जब कोई देशी-विदेशी धातुविज्ञानीशोधकर्ता अथवा इतिहासकार उनकी परंपरागत लौहकला को जानने के लिए उनके बीच पहुँचता हैतो वे स्मृतियों के आधार पर उसका सफल प्रदर्शन कर पाते हैं। जोभीपाट के मेलन असुर इसीलिए दृढ़ता पूर्वक कहते हैं, ‘हम अपनी इस कला विरासत को खोने के लिए तैयार नहीं हैं। विलुप्त होती इस पुरखा कला और ज्ञान को संरक्षित करने तथा नई पीढ़ी को इसका व्यावहारिक प्रशिक्षण देने के लिए हमने असुर आदिवासी ज्ञान अखड़ा की स्थापना की है।’[9]

 

नोट: - लेख में इस्तेमाल ज़्यादातर फोटोग्राफ स्वर्गीय श्री विजय गुप्ता के लिए हुए हैं जनवरी, 1979 को जन्मे विजय गुप्ता रांचीझारखंड के युवा फोटो जर्नलिस्टसिनेमेटोग्राफर और डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर थे। मात्र 35 वर्ष की आयु में इनका असामयिक निधन अक्टूबर, 2014 को हो गया। ये आदिवासियों के सामुदायिक संगठन ‘झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा’ के साथ सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे और अपनी मृत्यु से पहले असुरों का विजुअल डॉक्यूमेंटेशन कर रहे थे। इस लेख में शामिल उनके फोटोग्राफ लेखिका को उनकी पत्नी मनोनीत तोपनो और अखड़ा संगठन ने उपलब्ध कराए हैं।

 


[1] जोगेसर असुरगाँव पोलपोल पाट नेतरहाट (झारखंड) के साक्षात्कार से उद्धृत लेख में शामिल साक्षात्कारों के अंश लेखिका द्वारा असुर समुदाय के सदस्यों के स्वयं लिए गए साक्षात्कारों से हैं यह सभी साक्षात्कार 2019 के नवंबर महीने में सहपीडिया-यूनेस्को फेलोशिप हेतु ही लिए गए हैं।

[2] सुषमा असुरगाँव सखुआपानी (नेतरहाट) के साक्षात्कार से उद्धृत

[3]मेलन असुरगाँव जोभीपाट (नेतरहाट) के साक्षात्कार से उद्धृत

[4] चैत टोप्पोघाघरा (गुमला) के साक्षात्कार से उद्धृत

[5] यह असुर समुदाय का एक स्थानीय लोकगीत है जो सखुआपानी गाँवनेतरहाट के अजय असुर से मिला है। 

[6] संड़सी (Pencer), कुटासी (हथौड़ा या Hammer)

[7] के. के. लेउबाद असुर. (नई दिल्ली: भारतीय आदिम जाति सेवक संघ, 1963), 141-143.

[8] प्रकाशचन्द्र उरांवबिहार के असुर. (रांची: बिहार जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, 1994), 73-74.

[9] मेलन असुरगाँव जोभीपाट (नेतरहाट) के साक्षात्कार से उद्धृत

संदर्भ: -

लेउबाके. के. द असुर. नई दिल्ली: भारतीय आदिम जाति सेवक संघ, 1963.

उराँवप्रकाशचन्द्र. बिहार के असुर. रांची: बिहार जनजातीय कल्याण शोध संस्थान, 1994.