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लकड़ी का खरादी काम

हाथ से या बिजली से चलनेवाली खराद मशीन की सहायता से लकड़ी को छीलकर वांछित आकर देना एवं उसपर लाख मिश्रित  रंग चढ़ाने की कला, खरादी काम कहलाती है।  इस पद्यति से आमतौर पर  शंकु आकर, बेलनाकार अथवा गोलाकार आकृतियां बनाई जा सकतीं हैं। रंगांकन भी दो प्रकार से किया जा सकता  है , लाख मिश्रित रंग लगाकर अथवा पहले जलरंग से चित्रकारी कर उस पर पारदर्शी लाख चढ़ाकर।  भारत के अनेक राज्यों में प्रचलित यह  कला मध्यकाल में अपने चरमोत्कर्ष थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी यह कला ग्रामीण भारत में अत्यंत लोकप्रिय रही।  विशेष तौर पर खरादियों द्वारा बनाये गए रंग-बिरंगे खिलौने , बच्चा-गाड़ी , किचन सैट, दहेज़ सैट , फिरकी , भौंरा, झुनझुने ,गुड़िया ,सेठ-सेठानी ,इत्रदान, डिब्बियां ,घरेलु उपकरण जैसे रई ,मूसल ,दही बिलोनी, ओखली, चारपाई और पलंग के पाए , हुक्के की नलकी, शतरंज के मोहरे , चौपड़ की गोटियां आदि लगभग प्रत्येक घर  का अभिन्न अंग होते थे। इसके अतिरिक्त फर्नीचर, गुलदस्ते, कलश ,पंखों की डंडी आदि भी खरादियों द्वारा बनाये जाते रहे हैं ।    

 

लकड़ी का खरादी काम संसार में कब और कैसे आरम्भ हुआ यह कहना लगभग असंभव है। विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त पुरातात्विक सूचनाओं के आधार पर हम यह अनुमान कर सकते  हैं कि यह काम ईसा पूर्व बारहवीं सदी में अस्तित्व में आ चुका था।  उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर  यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि ईसा पूर्व  सातवीं से  पांचवीं सदी के मध्य खरादी काम , यूरोप एवं एशिया के अनेक स्थानों पर प्रचलन में था। लकड़ी के खरादी काम के पहले नमूने कोर्नेटो (वर्तमान उत्तरी इटली क्षेत्र ) के 'टोम्ब ऑफ़ वॉरियर्स'  से मिले हैं जिन्हें ईसा पूर्व सातवीं सदी का माना  गया है। यहाँ  लकड़ी के  एक टूटे हुए प्याले के साथ इसी तकनीक से बनाये गए अन्य बर्तन भी मिले हैं। ऐसे ही अन्य अवशेष एशिया माइनर (वर्तमान तुर्की ), क्रीमिया एवं अन्य स्थानों से भी प्राप्त हुए हैं। क्रीमिया से प्राप्त नमूने दर्शाते हैं कि पांचवीं शताब्दी में यह कला वहाँ बहुत विकसित हो चुकी थी।

 

एशियाई देशों में चीन,जापान एवं भारत में यह कला प्राचीन काल से ही प्रचलन में है। भारत में इस कला का पहला ऐतिहासिक उल्लेख अबुलफज़ल द्वारा सन १५९० में लिखित आईने अकबरी’ में मिलता है। उन्होंने तीन प्रकार के खरादी काम का उल्लेख किया है: अबरी काम, आतिशी काम और नक्शी काम।  

 

आरम्भिक काल से वर्तमान समय तक खराद मशीन ने भी एक लम्बी यात्रा तय की है। विभिन्न स्थानों से विभिन्न काल में मिले खराद मशीन के नमूनों से इसकी विकास यात्रा का आभास मिलता है। स्ट्रैप लेथ  यानि  डोरी से चलाई जाने वाली खराद सबसे प्राचीन मानी जाती है, इसे दो लोग मिलकर चलाते हैं , एक व्यक्ति डोरी खींचकर खराद घुमाता है और दूसरा व्यक्ति धारदार औज़ार से लकड़ी को छीलकर आकार देता है। इस प्रकार की खराद का प्राचीनतम उल्लेख मिस्र में  ईसा पूर्व तीसरी सदी में बने भित्तिचित्रों में मिलता है।  

 

खराद मशीन का अगला विकसित रूप बो-लेथ अथवा कमानी द्वारा चलाई जाने वाली खराद है। इसे एक व्यक्ति चला सकता है। इस  खराद  का उल्लेख अनेक देशों में मिलता है। मध्यकालीन भारत में यह खराद अत्यंत लोकप्रिय थी। इसी सिद्धांत पर कार्य करने वाले अन्य उपकरणों में लकड़ी में छेद करने के लिए प्रयुक्त होने वाली बर्मा-कमानी, बढ़ई कारीगरों का प्रिय औज़ार था।  कमानी द्वारा चलाई जाने वाली खराद का प्रयोग लकड़ी के साथ-साथ नरम पत्थर को छीलने के लिए भी किया जाता रहा है। आज भी जिन स्थानों पर बिजली उपलब्ध नहीं है वहां यह खराद मशीन काम में  लायी  जाती  है।

   

यद्यपि यूरोप में बिजली की मोटर से चलने वाली खराद का उपयोग बहुत पहले से होने लगा था परन्तु भारत के खरादियों ने इसका प्रयोग १९७० के आस-पास करना आरम्भ किया। आज भारत में अधिकांश खरादी बिजली की मोटर से चलने वाली खराद मशीन का प्रयोग करते हैं।

 

भारत में खरादी कला लगभग हर प्रान्त में प्रचलित है परन्तु  पंजाब, राजस्थान,गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना  एवं कर्नाटक की खरादी कला विशेष रूप से प्रसिद्ध है। खरादी समुदाय में हिन्दू और मुस्लिम दौनों ही धर्मों के मानने वाले शिल्पी सम्मिलित हैं। काम की शैली की दृष्टि से भी यह कला दो प्रकार की होती है। फर्नीचर के लिए बनाए  जाने वाले अवयव जिन पर रंगांकन नहीं किया जाता, दूसरे चमकीले रंगों वाले खिलौने एवं  घरेलु उपकरण। फर्नीचर के अवयव बनाने हेतु पंजाब का होशियारपुर, उत्तर प्रदेश का सहारनपुर, राजस्थान का जोधपुर, गुजरात का सनखेड़ा विख्यात है।  विभिन्न प्रकार के खिलौनों के लिए मध्यप्रदेश के श्योपुर एवं बुधनी, उत्तरप्रदेश के बनारस और चित्रकूट, कर्नाटक का चेन्नापटना, आंध्रप्रदेश का बंगनपल्ली  तथा  तेलंगाना का एटीकोपाक्का प्रसिद्ध  हैं। इन सभी स्थानों पर किया जाने वाला खरादी  काम समान तकनीक से बनाए जाने के बावजूद देखने में भिन्न-भिन्न विशेषताएं लिए होता  है।  इन्हें अपने रूप विशेष के कारण सहज ही पहचाना जा सकता है।  गुजरात के कच्छ क्षेत्र में स्थित निरोना गांव के वाटा समुदाय के खरादी, लकड़ी पर लहरदार बहुरंगी लाख रंगों से सज्जित चम्मच, करछी, बेलन अदि बनाते जो अपने आप में विलक्षण होते हैं।

 

आम तौर पर खरादी  काम के लिए दोयम दर्जे की लकड़ी काम में लाई जाती है क्योंकि रंगांकन के बाद लकड़ी की सतह रंग से छिप जाती  है और लकड़ी की गुणवत्ता का पता नहीं चलता। अधिकांशतः  बबूल, शीशम और दूधी या खिरनी की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है परन्तु दूधी की लकड़ी सर्वोत्तम मानी जाती है, क्योंकि इसके रेशे सीधे होते हैं, इसमें गठानें कम होती हैं और यह स्वाभाव से मुलायम होती है। खराद मशीन पर चढ़ाने से पहले लकड़ी को आरी से उपयुक्त माप में काट लिया जाता है। फिर उसे वसूले की सहायता से छिलाई करके बनाई जाने वाली वास्तु का बुनियदि आकर दिया जाता है। अंतिम सुव्यवस्थित आकर देने के लिए अब इसे खराद पर चढ़ाकर छीला जाता है। खराद  मशीन पर तेज़ी से घूमती लकड़ी को छिलाई कर आकर देने के लिए लोहे से बने औज़ार जिन्हें नेहरनी कहते हैं, काम में लाते हैं। इन नहरनियों के अगले सिरे सपाट चपटे या अर्धगोलाकार होते है। अलग-अलग उतार चढ़ाव या आकार देने के लिए  अलग-अलग नहरनियां होती हैं। लकड़ी को अंतिम  आकार देने के बाद उस पर रंग चढ़ाए जाते हैं।  

 

पारम्परिक पद्यति के अनुसार,  रंग बनाने के लिए लाख को साफ़ करके उसे हलकी आंच पर गर्म करके मोम जैसा नरम कर लिया जाता है। अब इसमें महीन खड़िया पावडर (आजकल रेडीमेड टाइटेनियम ऑक्साइड पावडर जिसे 'व्हाइटिंग' भी कहते हैं) मिलाकर अच्छी तरह गूंद  लिया जाता है। इस प्रकार लाख का सफ़ेद रंग बनाया जाता है। अन्य रंग बनाने के लिए इसे आधार स्वरुप प्रयुक्त किया जाता है तथा जो रंग बनाना है उस रंग का  पावडर इसमें मिलकर वांछित रंग तैयार किया जाता है। इस प्रकार तैयार रंगों की मोटी बत्तियां बनाकर रख ली जाती  हैं। खराद  मशीन पर तेजी से घूमती लकड़ी के संपर्क में आने पर, लकड़ी और लाखरंग के मध्य घर्षण से उत्पन्न ऊष्मा के कारण लाखरंग नरम होकर लकड़ी पर चिपक जाते हैं। इस प्रकार लकड़ी पर बनी रंगीन सतह को केवड़े के पत्ते से घिस कर समतल और चिकना बना लिया जाता है।  

 

अनेक स्थानों पर खरादी, रंग और लाख को अलग-अलग भी लगाते हैं।  वे पहले खराद द्वारा लकड़ी को वांछित आकर देते हैं, फिर उस पर जल रंगों से चित्रकारी करते हैं और बाद में इस पर लाख चढा कर रंगों को स्थाई और जलरोधी बना देते हैं। लकड़ी पर चित्रकारी के लिए  पहले लकड़ी की सतह बनानी पड़ती है।  इसके लिए लकड़ी की सतह की दरारों को पीली मिटटी, लकड़ी का बुरादा और सरेस या फेविकोल मिलकर बनाए  गये  पेस्ट से भरते हैं।  फिर इस पर खड़िया के गाड़े घोल में थोड़ा  गोंद मिलकर लेप करते हैं। सूखने पर इसे रेगमाल से साफ और एकसार कर लेते हैं।  अब यह लकड़ी की सफ़ेद सतह चित्रकारी के लिए तैयार मानी जाती है। आमतौर पर कपडा रंगनेवाले रंग, गेरू, पेवड़ी, नील, काजल आदि का प्रयोग रंग के रूप में किया जाता है परन्तु आजकल रेडीमेड पोस्टर कलर और वनस्पति रगों का भी उपयोग किया जाने लगा है।            

 

बाजार में प्लास्टिक के खिलौने आ जाने के कारण खरादियों द्वारा बनाये खिलौनों की मांग घटने लगी है और इस कला की लोकप्रियता में दिन प्रति दिन कमी आती जा रही है।  सन २००० ईस्वी के उपरांत चीन में बने रेडीमेड खिलौनों के भारतीय बाज़ारों में प्रचुरता से आ जाने के कारण भारतीय खरादी कला को गहरा धक्का लगा है।  पिछले दशक से  वनस्पति रंगों और नए डिज़ाइनों के खिलौनों के साथ इस प्राचीन कला को पुनः जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है।