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बनारस के लकड़ी के खिलौने

गंगा नदी के किनारे बसा बनारस जिसे वाराणसी एवं काशी भी कहा जाता है, भारत का एक प्राचीनतम शहर है। यद्यपि यह नगर अनेक धर्मों का केंद्र रहा है परन्तु हिन्दू धर्म एवं मायथोलॉजी में इसका स्थान सर्वोपरि है।  यहाँ वर्ष भर आने वाले तीर्थयात्रियों का ताँता लग रहता है। यह तीर्थयात्री यहाँ से लौटते समय इस तीर्थ की यादगार निशानिया साथ ले जाना कभी नहीं भूलते। यही कारण  रहा की यहाँ अनेक प्रकार की हस्तकलाएं विकसित हुईं और फली फूली। लकड़ी के रंगीन खिलौने बनाने की कला भी उन्हीं में से एक है।  क्योंकि बनारस में तीर्थयात्रियों के रूप में ग्राहकों का  एक बड़ा वर्ग मौजूद था अतः हस्तशिल्पियों ने उन्हें ध्यान में रखकर कलाकृतियां बनाईं। यहाँ बनाये जाने वाले लकड़ी के खिलौनों में धार्मिक चरित्रों, देवी-देवताओं आदि का बाहुल्य है। इन खिलौनों के माध्यम से अनेक धार्मिक कथाओं, किवदंतियों एवं चरित्रों का परिचय बहुत ही सहज और रोचक ढंग से लोक मानस तक पहुँच जाता है। कालांतर में यह खिलौने बनारस की एक पहचान बन गए हैं। तीर्थ से साथ लाये गए यह खिलौने लोग अपने घरेलू  देवस्थानों में रखने के साथ-साथ घर की सजावट और दिवाली की झांकियों में सज्जा के लिए रखते हैं। इन पारम्परिक खिलौनों का कोई ऐतिहासिक सन्दर्भ अथवा उल्लेख नहीं मिलता परन्तु प्रचलित मौखिक विवरणों के अनुसार शिल्पकारों की अनेक पीढियां इस काम में खप गयीं हैं। वे मानते है की उनके पूर्वज हाथीदांत के कारीगर थे और राजा-नवाबों के समय में हाथीदांत का सामान बनाते थे। बाद में हाथीदांत प्रतिबंधित होने पर उनहोंने लकड़ी का काम भी आरम्भ कर दिया।

 

देश आज़ाद होने से पहले तक प्रत्येक रजवाड़े के अपने कारीगर होते थे जो राजपरिवार अथवा जमीदारों के परिवारों के लिए खिलौने एवं घरेलु उपयोग में आने वाले लकड़ी के सामान बनाते थे।  १९३० के दशक में श्यामनाथ सिंह काशी नरेश के यहाँ खिलौने बनाने वाले दरबारी कारीगर थे। आज उनके परिवार के लोग आम लोगों के लिए खिलौने बनाते हैं। बनारस के कश्मीरी गंज, खोजवां, भोलू पुर, किरैया, शिवपुरवां इलाके एवं बनारस के आस-पास के गावों जैसे सुन्दर पुर, कंदवा, नेवादा ,सुनार पुरा और तिरानंदन में बड़ी मात्रा में खिलौने बनाए जाते थे। अनेक धार्मिक अवसरों जैसे दीपावली, जन्माष्टमी, शिवरात्रि और रक्षाबंधन जैसे त्योहारों पर लगनेवाले मेलों के लिए विशेष खिलौने बनाए जाते थे।  बनारस के अस्सी घाट, दशमेश घाट और काशी विश्वनाथ  मंदिर के आस पास खिलौनों वालों की दुकाने सजी रहतीं थीं। इन खिलौनों के बनाने वाले कारीगरों की संख्या 20 वर्ष पहले तक हज़ारों में थी पर अब यह काम बहुत सिमट गया है और इन शिल्पियों की संख्या भी 500-600 तक सीमित रह गयी है। ।  

 

लकड़ी के खिलौने बनाने का काम खरादी, कुंदेर  विश्वकर्मा एवं लोहार आदि समुदायों के कारीगर करते हैं। बनारस में खराद का काम भी होता है और खरादी अनेक प्रकार के खिलौने बनाते हैं पर वे खिलौने, लकड़ी को तराश कर बनाये गए एवं इन हस्तचित्रित खिलौनों से बहुत भिन्न होते हैं।

 

यहाँ बने खिलौनों में कृष्ण जन्माष्टमी, पालने में बाल कृष्ण, राम दरबार, क्षीरसागर (शेषनाग पर शयन करते विष्णु), नाग नथैय्या (कालिया नाग पर नृत्य करते कृष्ण ), उड़ते हनुमान, पंचमुखी हनुमान, पंचमुखी गणेश, बावला बैंड पार्टी, शहनाई वादक पार्टी, गणेश बावला, वाद्य बजाते गणेश, एवं ईसा मसीह का जन्म अादि बहुत प्रसिद्ध हैं।       

 

विषयों के आधार पर इन पारम्परिक खिलौनों को चार वर्गों में बांटा जा सकता है: धार्मिक, जैसे देवी-देवताओं की मूर्तियां;  सांस्कृतिक जैसे हाथी पर सवार राजा, सिपाही , घुड़सवार, विभिन्न पेशे के लोग जैसे लकड़हारा , संगीतकार , जुलाहा  आदि;  पशु - पक्षी जैसे हाथी, बाघ, मोर , तोता आदि; बच्चों के खेल जैसे पहियों पर चलने वाले और गर्दन हिलानेवाले पशु पक्षी।

 

दो इंच से दस  इंच तक आकार के इन खिलौनों को पारम्परिक रूप से  सलई अथवा सलैया की लकड़ी से बनाया जाता था। सलई लकड़ी के रेशे सीधे, सतह चिकनी और स्वभाव मुलायम होता है जो  खिलौने बनाने के लिए उपयुक्त होता है। परन्तु अब यह लकड़ी आसानी से नही मिलती इस कारण अब इन्हे गूलर वृक्ष की लकड़ी से बनाया जा रहा है। वर्तमान में यूक्लिप्टस की लकड़ी का प्रयोग भी इन्हें बनाने में हो रहा है। शरीर का मुख्य भाग लकड़ी के एक टुकड़े से तथा अन्य भाग जैसे हाथ, पैर, सर, हाथ में पकड़ा कोई हथियार आदि लकड़ी के अन्य टुकड़ों से अलग-अलग बनाकर आपस में जोड़ लिए जाते हैं। शरीर के विभिन्न अंग जोड़ने के लिए बांस से बनाई गई  कील का प्रयोग किया जाता है। चेहरे एवं अन्य भागों के विवरण लोहे के तेज़ धार वाले औज़ारों से उकेर लिए जाते हैं। बनाइ गयी आकृति को सुडौल रूप देने के लिए इसे रेती से घिसकर समरूप किया जाता है।  

 

शिल्पकौशल एवं उत्कृष्टता की दृष्टि से पुराने और आज बनाये जा रहे खिलौनों में बहुत अंतर् आ गया है। पुराने खिलौनों में जहाँ नक्काशी में सुस्पष्टता और रंगांकन में सफाई और सुघड़ता दिखती है वहीँ नए खिलौनों की नक्काशी उतनी स्पष्ट नहीं होती। पहले इन खिलौनों पर प्राकृतिक रंग लगाए जाते थे। पीला रंग हल्दी से, कत्थई रंग कत्थे की लकड़ी से, गहरा लाल रंग रतनजोत से, नीला रंग एक प्रकार के फूल से, सफ़ेद रंग खड़िया से और काला रंग घी के दीपक से बने काजल से बनाया जाता था। रंगांकन आरम्भ करने से पहले खिलौने को रेती से घिसकर एकसार और चिकना कर लिया जाता है। अब इस पर खड़िया के घोल में गोंद  मिलकर उसका लेप किया जाता है। धूप में सुखाकर दो-तीन बार यह क्रिया दोहराई जाती है। इसके बाद रेगमाल से घिसाई करके खिलौने की सतह को पुनः चिकना किया जाता है। अब विभिन्न रंग भरे जाते हैं। आजकल कपडे पर चित्रकारी के लिए बनाये जानेवाले फेब्रिक कलर इन खिलौनों पर लगाए जा रहे हैं। यह रंग बहुत चमकदार होते हैं और पानी से ख़राब भी नहीं होते हैं।

 

वर्तमान में यह पारम्परिक खिलौने अपना अस्तित्व बनाए रखने हेतु संघर्ष कर रहे हैं। बाजार में अनेक प्रकार के विडिओ गेम्स, प्लास्टिक एवं सिंथेटिक मैटेरियल्स आ गए है।