29 Jul 2018 - 06:15 to 08:30
Hyderabad
The year 2018 marks 500 years since the establishment of the
29 Jul 2018 - 07:00 to 09:30
Raipur , Chhattisgarh
“A concerted effort to preserve our heritage is a

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गिरौदपुरी सतधाम

विवरण

सतनाम पंथ के प्रवर्तक गुरु घासीदास की जन्मभूमि गिरौदपुरी महत्वपूर्ण तीर्थस्थल के रूप में विख्यात है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 137 किलोमीटर दूर यह स्थान महानदी एवं जोगनदी के मध्य मनोरम पर्वतीय क्षेत्र में स्थित है।

                                       

यहां नजदीक में ही स्थित सोनाखान जंगल में स्थित छाता पहाड़ में छः माह की कठोर तपस्या के उपरान्त गुरु घासीदास को आत्म ज्ञान प्राप्त हुआ था । उस ज्ञान के आधार पर उन्होंने सतनाम पंथ का प्रवर्तन किया।

 

उनकी स्मृति में प्रतिवर्ष फाल्गुन शुक्ल पंचमी, षष्ठी एवं सप्तमी को यहां बड़ा मेला लगता है, जिसमें करीब 12 से 14 लाख लोग उपस्थित होते हैं। यहां आए अनुयायी सहज योग, ध्यान, चिन्तन-मनन एवं गुरु-वाणियों का श्रवण कर कृतार्थ होते हैं। मेले के दौरान अनवरत पंथीगीत, पंथीनृत्य, मंगल-भजन, साधु-अखाड़ा, सत्संग प्रवचन एवं सहज योग-समाधि, ध्यान, गुरु-गद्दी, दर्शन-पूजन की क्रिया चलती रहती है।

 

गिरौदपुरी स्थित गुरु घासीदास से सम्बंधित तीर्थ स्थल

जन्मस्थलः गिरौदपुरी बस्ती के उत्तर-पूर्व में स्थित झलहा मंडल के प्राचीन दुतल्ला घर से लगा मिट्टी एवं खपरैल से बनी छोटी सी कक्ष में गुरु घासीदास का जन्म हुआ। जहां पर अखंड सतनाम-जोत प्रज्ज्वलित है।

कुआंबाड़ी

गोपाल मंडल के घर स्थित कुंआबाड़ी जहां पर युवा अवस्था में गुरु घासीदास ने बैंगन की जगह मिर्च तोड़े एवं महिमा दिखाया था।

बाहराडोली

ग्राम से लगभग 1 किलोमीटर दूर प्रसिद्ध पांच एकड़ का बहराडोली जहां गुरु घासीदास ने युवाकाल में अपनी महिमा दिखाई थी, साथ ही पांच मुठ्ठी धान बोकर वहां प्रचलित अंधविश्वास को खत्म किया था।
 

बछिया जीवन दान स्थल

ग्राम से लगे सफुरा-समाधि तालाब के समीप ही बछिया जीवन दान स्थल है। कहते हैं जब गुरुघासीदास ने सिद्धि प्राप्त करने के बाद यहां एक मृत बछिया को जीवित कर दिया था। बछिया के जीवित होने के बाद यहां पास ही पानी का सोता फूट पड़ा, जिसे गंगावतरण कहते हैं।

सफूरामाता समाधि स्थल

यहां से कुछ ही दूर पर गुरु घासीदास की धर्मपत्नी सफूरामाता समाधि स्थल है।

मुख्यमंदिर गुरुगद्दी

पूर्वाभिमुख स्थित मुख्य मंदिर में सूर्योदय की पहली किरण गुरुगद्दी को स्पर्श करती है। यहां अनवरत घी के सतनाम जोत जल रहे हैं। समीप ही चांदी का गुरु आसन एवं गुरु की चरणपादुकाएं रखी हैं। भीतर प्राचीन औरा-धौरा वृक्ष हैं, जिनके नीचे बाबा तपस्या करते थे। समीप ही विशाल तेन्दू का वृक्ष है, जिसके नीचे बैठकर वह आत्म चिन्तन करते थे।


गुरुगद्दी

मुख्य मंदिर स्थित गुरु घासीदास की गद्दी या आसन है। यह काष्ट से निर्मित चांदी से मढ़ित है। इसके समक्ष अखंड सतनाम जोत कलश जलता आ रहे है।

चरण कुंड

मुख्य मंदिर के पीछे चरण कुंड हैं। कहते हैं कि यहां बाबा ने अपने पैरों को धोया तो जल का स्त्रोत फूट पड़ा, जो कभी सूखता नहीं।

 

अमृत कुंड

पहाड़ियों की तलहटी में जल स्त्रोत है, गुरु घासीदास को सिद्धी के उपरान्त इसी कुंड से अमृत मिला।

 

 

 

This content has been created as part of a project commissioned by the Directorate of Culture and Archaeology, Government of Chhattisgarh, to document the cultural and natural heritage of the state of Chhattisgarh.